Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
हमने देखे हैं कई साथ निभानेवाले
बरगला लेंगे तुझे भी ये ज़मानेवाले
बारिशों में ये नदी कैसा कहर ढाती है
ये बताएंगे तुझे इसके मुहानेवाले
धूप जिस पल मिरे आंगन में उतर आएगी
और जल जाएंगे दीवार उठानेवाले
मौत ने ईसा को शोहरत की बुलंदी बख्शी
ख़ाक़ में मिल गए सूली पे चढ़ानेवाले
रास्ते सच के बहुत तंग, बहुत मुश्क़िल हैं
सोच ले ये भी ज़रा जोश में आनेवाले
अपनी ऑंखों को भी सिखला ले हुनर धोखे का
झूठी बातों से हक़ीक़त को छिपानेवाले
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
जो क़ामयाब हो जाए ज़रा, वो बदगुमान हो जाता है
जो फूल गया सत्तामद में, मूरख समान हो जाता है
जो लक्ष्मी के पीछे भागे, वो अर्थवान हो जाता है
लक्ष्मी जिसके पीछे भागे वो वर्द्धमान हो जाता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Doha, Poetry, Purushottam
रावण के व्यक्तित्व में, कुछ तो होगी बात
जिसे मारने जन्म लें, तीन लोक के नाथ
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry
राष्ट्र के निमित्त बलिदान कैसे करते हैं
भामाशाह वाली वो कहानी मत भूलना
आस्था के बल से जो कर्मों से जीत गई
महासती मैना जैसी रानी मत भूलना
सत्य के लिए जिन्होंने प्राण तक त्याग दिए
अकलंक जैसे महादानी मत भूलना
राजुल ने जहाँ धोई मेहंदी सुहागवाली
गिरनार का वो लाल पानी मत भूलना
जियो और जीने दो की बात करते हैं हम
कहीं और ऐसा उपदेश नहीं मिलता
मृत्यु के क्षणों को भी महोत्सव-सा मानते हैं
धरती पे ऐसा परिवेश नहीं मिलता
सारा सुख-वैभव जो जीत के भी त्याग आये
ऐसा कोई और गोमटेश नहीं मिलता
तप-त्याग से यहाँ परमपद मिलते हैं
हाथी-घोड़े वालों को प्रवेश नहीं मिलता
पंथ हैं अनेक जिनमत में भले ही पर
मोक्षमार्ग वाला सुविचार बस एक है
सैंकड़ों हों वाद औ विवाद किंतु सत्य है कि
अहिंसा पे सबका विचार बस एक है
मान्यताएं सबकी भले हीं हों विभिन्न किन्तु
पाँच पदवाला नवकार बस एक है
कैसे नरकों से निर्वाण पहुँचेगा जीव
पूरे जिन-आगम का सार बस एक है
जैन वो नहीं कि बस नाम में लिखा हो जैन
जैन वो है जिसके विचार जैन हो गए
जाति भले कोई भी हो, आप जैन ही रहेंगे
आत्मा के यदि संस्कार जैन हो गए
जीवदया और शाकाहार के हैं प्रतिबिंब
सत्य औ अहिंसा के आधार जैन हो गए
किन्तु मातृभूमि पे पड़ा है कभी संकट तो
ख़ुशी-ख़ुशी राष्ट्र पे निसार जैन हो गए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry, Unpublished
महावीर मुसलमान थे।
क्योंकि उनके पास मुकम्मल ईमान थे।
महावीर सिख थे।
क्योंकि वे सितम करने से ख़बरदार करते थे।
महावीर हिन्दू थे।
क्योंकि वे हिंसा से दूर थे
और सब जीवों से प्यार करते थे।
महावीर पारसी थे।
क्योंकि उनमें
संसार के पार देखने की क्षमता थी।
महावीर आर्यसमाजी थे।
क्योंकि उनमें सत्य के प्रति ममता थी।
हाँ, महावीर बुद्ध थे।
क्योंकि उनके उसूल दुर्बुद्धि के विरुद्ध थे।
…और हाँ!
महावीर ईसाई भी थे
क्योंकि वे इंसानियत के साईं भी थे।
लेकिन, महावीर जैन नहीं थे।
…क्योंकि उनकी वाणी में
हमारी जिव्हा की तरह कटु बैन नहीं थे;
उनके हृदय में
श्वेताम्बर-दिगम्बर का झगड़ा न था;
उनके अन्तस् में
बीस और तेरह का रगड़ा न था;
वे नियम थोपते नहीं थे;
वे हिंसा रोपते नहीं थे;
वे नित नए धर्म गढ़ते नहीं थे;
वे लकीर के फ़क़ीर बनकर
लड़ते नहीं थे;
वे हमारी तरह ढोंगी नहीं थे;
वे दिन के जोगी
रात के भोगी नहीं थे;
वे तो आडम्बरों के बिन थे
सचमुच……..
मेरे महावीर जैन नहीं थे
….’जिन’ थे।
✍️ चिराग़ जैन