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समझौता

अपने स्वर्ण सरीखे शब्दों में मैं अगर मिलावट कर लूँ
तो चमकीले पत्थर मेरे भी जीवन में जड़ जाएंगे
कुंदन जैसे शुद्ध विचारों में कुछ समझौता घुल जाए
तो मेरे हित नित्य सफलता के आभूषण गढ़ जाएंगे

चंदन कहकर कीकर बेचूँ -लाभ यही है, मंत्र यही है
लोभ प्रपंचों की दुनिया में धर्म यही है, तंत्र यही है
लेकिन ऐसी विजय पताका किन हाथों से फहराऊंगा
दर्पण के सम्मुख आया तो मैं कैसे मुख दिखलाऊँगा
जिस दिन मेरा पेट विवश कर देगा गर्दन के झुकने को
उस दिन मेरी ख़ुद्दारी के दावे झूठे पड़ जाएंगे

नैतिक शिक्षा की पुस्तक का ज्ञान भुलाना आवश्यक है
अपने आदर्शों के शव का कुचला जाना आवश्यक है
भौतिक सुख की नीरस आँखों में काजल शोभा पाएगा
लेकिन अपने अंतर्मन की भस्म बनाना आवश्यक है
मानव का तन कोरा शव है, शेष न हो यदि लाज ज़रा भी
दैहिक सुख तो यहाँ धरा पर पड़े-पड़े ही सड़ जाएंगे

महल-दुमहलों की रंगत से, नेह भरा छप्पर बेहतर है
रेशम के महंगे चोगों से कबिरा की चादर बेहतर है
भीष्म पितामह के सीने पर बाण चलाते अर्जुन से तो
पुत्रविरह में कट कर गिरता द्रोण तुम्हारा सिर बेहतर है
आश्रम में रहकर संन्यासी संबंधों की लाज रखेंगे
महलों में रहकर दो भाई आपस में ही लड़ जाएंगे

✍️ चिराग़ जैन

अवसान

सुबह उगे सूरज का ढलना निश्चित है हर शाम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे

जिनका जीवन ग्रंथ हुआ था
जिनका कीना पंथ हुआ था
जो रावण का काल बन गए
मानवता का भाल बन गए
जिनने दीन अहिल्या तारी
जिनने युग की भूल सुधारी
जिनके चिन्ह क्षितिज पर ठहरे
जिनके तप से पत्थर तैरे
सरयू की लहरों में उतरे वो पुरुषोत्तम राम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे

जिनकी कीर्ति युगों से ऊँची
आभारी थी सृष्टि समूची
गीता के उद्घोषक थे जो
पाण्डव दल के पोषक थे जो
यौवन पर उपकार रहे जो
कष्टों का उपचार रहे जो
भीषण रण के नायक थे जो
द्वापर के अधिनायक थे जो
केवल भ्रम की भेंट चढ़े थे वो माधव घनश्याम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे

अपना क्या अस्तित्व यहाँ पर
जंगल में इक कीट बराबर
हम कितने भोले-भाले हैं
दायित्वों का भ्रम पाले हैं
कितने आए, कितने बीते
जग के कीर्ति कलश कब रीते
छिटका कर कुछ दिन को छींटे
थोड़े हारे, थोड़े जीते
हम भी छोड़ चले जाएंगे जीवन का संग्राम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे

✍️ चिराग़ जैन

प्रतीक्षा

ओ मथुरा के राजा सुन ले, वैभव से फुरसत पाए तो
गोकुल की गलियों में अब भी फाग प्रतीक्षारत बैठा है
दरबारों के जयकारों से जब भी मन उकता जाए तो
राधा की पलकों में इक अनुराग प्रतीक्षारत बैठा है

राजमहल का स्वांग रचाकर मन भर जावे तो आ जाना
द्यूतभवन की घटना से जब जी घबरावे तो आ जाना
खाण्डववन के तक्षक का विषदंश सतावे तो आ जाना
जमुना तट पर कुंज-लता का बाग प्रतीक्षारत बैठा है

सोने के बर्तन में केवल षड्यंत्रों का द्वंद मिलेगा
पत्तल की सूखी रोटी में जग भर का आनंद मिलेगा
राजमहल के छप्पन भोगों में फंसकर बिसरा मत देना
विदुरों की पावन कुटिया में साग प्रतीक्षारत बैठा है

छींके पर माखन की मटकी अब भी राह निहार रही है
वृद्ध जसोदा आस लगाए आंगन-द्वार बुहार रही है
रण के शोर-शराबे से तुम यह कहकर उठकर चल देना
जसुमति मैया के घर में सौभाग प्रतीक्षारत बैठा है

✍️ चिराग़ जैन

द्यूतक्रीड़ा

फिर से द्यूत सजा बैठा है
फिर बदले शकुनि ने पासे
फिर से चूक हुई विदुरों से
फिर हैं पाण्डव मौन-रुआंसे
मानवता की मर्यादा का फिर से आज क्षरण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है

प्रलय-समर फिर द्वार खड़ा है, पूरी है तैयारी रण की
फिर पांचाली चीख रही है, भीष्म निभाते निष्ठा प्रण की
गुरुओं की गर्दन नीची है, कुल की लज्जा अर्द्धनग्न है
दुर्योधन की जय सुन-सुनकर इक अंधा आनंदमग्न हैं
नीति-नियम की हर परिपाटी का अनवरत मरण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है

पौरुष दास हुआ बैठा है, अवसरवादी ढीठ रहा है
अपमानित कुण्ठित हठधर्मी अपनी जंघा पीट रहा है
हर पापी ने इस घटना को क्रीड़ा की मदहोशी समझा
जिसने प्रश्न उठाया उसको राष्ट्रद्रोह का दोषी समझा
मातम के बादल घिर आए, यम का आमंत्रण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है

यह इक पल ही समरांगण में प्रलयंकर भूचाल बनेगा
यह अपमानित भीम अधम का ध्वंस करेगा काल बनेगा
अब नीचे झुक जाने वाली हर गर्दन कटनी है रण में
केश पकड़ने वाले हाथों की छाती फटनी है रण में
ज्वार रुधिर का आज धमनियों के भीतर हर क्षण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है

दुर्योधन की शठता की अनदेखी के परिणाम मिलेंगे
सौ पुत्रों के शव पर रोना, आँसू आठों याम मिलेंगे
आँखों पर पट्टी बांधी है, मधुसूदन को दोष न देना
ममता के आँचल में युग के अभिशापों को पोस न देना
अनुचित हठ के इस पोषण में अपनों का तर्पण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है

✍️ चिराग़ जैन

शांति का अवसर

भाग जाने दो कन्हैया
युद्ध भू से अर्जुनों को
यह पलायन ध्वंस के जयघोष से कितना बड़ा है
मत मनाओ
यूँ समझ लो शांति का अवसर खड़ा है

मोहवश कोई धनंजय कीर्ति को तजने लगे तो
छोड़कर गाण्डीव जो हरिनाम ही भजने लगे तो
उस समय उस त्याग की अनुगूंज का सम्मान कर लो
इस पराभव से बचेगा क्या तनिक अनुमान कर लो
उत्तरा का तेज कुछ दिन और जीवित रह सकेगा
भीष्म को कुरुकुल कई दिन तक पितामह कह सकेगा
कर्ण की जननी के सारे पुत्र जीवित रह सकेंगे
गर्भ में पलते सहस्रों भ्रूण विकसित रह सकेंगे
अग्नि का उपयोग भोजन हेतु ही होता रहेगा
अन्यथा श्मशान युग की अस्थियाँ ढोता रहेगा
मृत्यु का विकराल वैभव चैन से सोता रहे तो
मत उठाओ,
यूँ समझ लो काल पर पर्दा पड़ा है

द्रौपदी के केश तो इक दिन समय भी बांध देगा
पर सुभद्रा की उजड़ती गोद का रक्षक न कोई
सैंकड़ों अक्षौहिणी सेना सुसज्जित हैं प्रतीक्षित
डस सके इनको निजी प्रतिशोध का तक्षक न कोई
तर्क की सारी हवाएँ शांति पथ की ओर मोड़ो
हो सके तो कृष्ण पल भर के लिए हठमार्ग छोड़ो
हो सके तो यह समर प्रारम्भ होने से बचा लो
हो सके तो एक पूरा कल्प रोने से बचा लो
हो सके तो बाँसुरी की तान से झखझोर डालो
युद्ध के हर पात्र की हर इक प्रतिज्ञा तोड़ डालो
हैं सभी योद्धा किसी अपमान से आहत यहाँ; पर
मत लड़ाओ,
जो लड़ा है वो स्वयं से ही लड़ा है

इस समर से भी बड़ा इक युद्ध अर्जुन लड़ रहा है
मोह के वश आज उसका शौर्य फीका पड़ रहा है
छोड़ देना चाहता है वह सुयोधन से लड़ाई
वह न चाहेगा शवों को रौंदकर हासिल कमाई
वह न अनदेखा करेगा जननियों के आँसुओं को
वह न शोणित से भरेगा लोभ के अंधे कुओं को
ओट ले कर्तव्य की इस बार वह निर्मम न होगा
उठ चुका है ज्वार जो वैराग्य का अब कम न होगा
इस समर से प्राप्त जय का भ्रम न पालेगा धनंजय
त्याग पथ पर यश-पिपासा तोड़ डालेगा धनंजय
तर्क के मत बाण छोड़ो, और इस-उस रूप से अब
मत डराओ,
इस पलायन में समय का सुख गड़ा है

✍️ चिराग़ जैन

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