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सरस्वती वंदना

वाणी, विद्या, वीणा, विमर्श
लालित्य, लास्य, लय, लोमहर्ष
व्याकरण, वर्ण, वैभव, विचार
अभिव्यक्ति, अल्पना, अलंकार
भाषा, भूषण, भाषण, भविष्य
दर्शन, दीपक, दादरा, दृश्य
नवरस, नाटक, नूपुर, निनाद
सरगम, संस्कृति, साधना, साध
तूलिका, ताल, ताण्डव, तुरंग
मुद्रा, मृदुता, मंचन, मृदंग
कल्पना, कण्ठ, कविता, कहास
रूपक, रचना, रस, रंग, रास
गायन, गीता, गंधर्व, गीत
पूजा, पुराण, पद, प्रेम-प्रीत
संगीत, सृजन, सुर, स्वर, सुगंध
वंशी, वनिता, विद्वत, वसंत

इन सब शब्दों का एक सार
माँ हंसवाहिनी का सिंगार
हो शोक, हर्ष, आनंद, खेद
है नहीं सृजनपथ रंच भेद
स्तंभित अतीत है मूर्तिमान
चित्रों में आगत की उड़ान
अनुभव पर है इतिहास शेष
कल्पना खोजती भविष देश
करती कविता युग का बखान
तब दर्पण देखे वर्तमान
हर काल-देश की व्यक्त शक्ति
हर सृजन साधना आप भक्ति
वाणी को कर दो दिव्य धाम
स्वाकार करो मेरा प्रणाम

✍️ चिराग़ जैन

बंद कपाटों पर तुम आए

इस जीवन में चूक हुई है, बंद कपाटों पर तुम आए
आँखों तक अँधियारा पैंठा, तब तुमने कुछ दीप जलाए
अब इन दीपों के ईंधन से, केवल ऊष्मा ग्रहण करूंगा
अगले जन्म अगर आया तो, उजियारों का वरण करूंगा

शास्त्र बनाते मोक्षपथिक पर, प्यास मुझे इक और जन्म की
बहुत जटिल लगती हैं मुझको, नीरस बातें ज्ञान-धर्म की
पुण्य बढ़े तो स्वर्ग-सुखों में, मुझको निश्चित ला पटकेंगे
मैं उस लोक रहूंगा व्याकुल, मन के भाव यहाँ भटकेंगे
तुमको छूकर बच सकता हूँ, तुमको निश-दिन स्मरण करूंगा
जिसको जगत् अनैतिक कहता, मैं वैसा आचरण करूंगा

बचपन में दादी कहती थी, पिछला अगला सब होता है
आँखें जस की तस रहती हैं, कुछ मिलता सा ढब होता है
आँखों की पहचान बनाना, आदत स्वयं गवाही देंगी
मुझको देखोगे तो तुमको, धड़कन ख़ूब सुनाई देंगी
तुम उस पल चैकन्नी रहना, यादों का अवतरण करूंगा
उस पल मैं धरती से नभ तक, अब का वातावरण भरूंगा

जब भी तुमको बिन कारण ही, कोई जगह बहुत भाती हो
अगर हवा की गंध तुम्हारा, हाथ पकड़ खींचे लाती हो
तुम उस जगह प्रतीक्षा करना, मैं इक रोज़ वहीं आऊंगा
देख तुम्हें निःशब्द रहूंगा, तुमको छूकर जम जाऊंगा
भाषा अधरों पर थिर होगी, पलकों पर व्याकरण धरूंगा
पूर्ण हुए संकल्पों का मैं, आँसू से आचमन करूंगा

✍️ चिराग़ जैन

दिगम्बरत्व

प्रश्न उठा है जैन धर्म के संत नग्न क्यों रहते हैं
प्रश्न उठा है जग में रहकर आत्ममग्न क्यों रहते हैं
प्रश्न उठा है जैन धर्म में बिल्कुल ढील नहीं है क्या
सभ्य जगत् में नग्न विचरना; ये अश्लील नहीं है क्या
सच समझे बिन बकबक करना, थोथा मान तुम्हारा है
त्याग वेश पर नाक चढ़ाना ये अज्ञान तुम्हारा है
काम अगर सर चढ़ जाए तो जीव व्यथित हो जाता है
मन भीतर से निश्छल हो तो त्याग घटित हो जाता है
वस्त्र त्यागना क्या कोई करतब फ़िल्मी हीरो का है
काम विजित कर नग्न विचरना; ये टेवा वीरों का है
शुद्ध आचरण की बातें, अभिमानी नहीं सुनी तुमने
संतों का बस बाना देखा, बानी नहीं सुनी तुमने
चखने वाले ने जूठे बेरों में मीठा प्रेम चखा
जिसके मन में जो मूरत थी उसने वैसा रूप लखा
सच बतलाओ, बचपन में जब नंगे डोला करते थे
तब भी क्या तुम ऐसी ओछी भाषा बोला करते थे
बचपन में हर नारी तुमको क्या केवल तन लगती थी
माँ का दूध पिया तब भी क्या कामवासना जगती थी
कह सकते हो तब तुमको इन बातों का आभास न था
कह सकते हो तब अन्तस् में कोई कामविलास न था
मन का पाप उजागर ना हो इस हित साधन जोड़ लिए
जब मन में कालिख आई तो उजले कपडे ओढ़ लिए
तुमको भय है काम भावना पर तुम पार न पाओगे
मन में पाप उठेगा तो तुम उसे मार ना पाओगे
लेकिन नग्न विचरने वाले संतों को ये फ़िक्र नहीं
धर्मध्यान से सिक्त ह्रदय में, काम-पाप का ज़िक्र नहीं
आत्मसाधना में बाधक अभिशाप भस्म हो जाएगा
तप की ज्वाला में जलकर हर पाप भस्म हो जाएगा
तुम क्या जानो जैन धर्म का क्या इतिहास सुनहरा है
तुम क्या समझो पंचेद्रियों पर धर्मध्यान का पहरा है
केशलोच पर वो बोले जो खुद को नोच नहीं सकते
कितनी कठिन तपश्चर्या है, तुम ये सोच नहीं सकते
हम वो नहीं जिन्होंने केवल धन वैभव ही जोड़ा है
हम उनके वंशज हैं जिनने जीत-जीत कर छोड़ा है
तोरण पर पशुकष्ट देखकर हममें करुणा जागी है
हमने चक्रवर्ती की सब संपत्ति जीत कर त्यागी है
जैन धर्म का साधक केवल क्षमा सुधा ही पीता है
हमने कमठ सरीखा दानव आचरणों से जीता है
हमको अपने मुनिराजों से क्षमाधर्म का ज्ञान मिला
हमें कठिन उपसर्ग समय में संयम का वरदान मिला
हम हिंसक हो जाते तो तुम इतना बोल नहीं पाते
हम बदला लेने लगते तो मुंह तक खोल नहीं पाते
हम भी तुमको गाली दें तो तुम जैसे हो जाएंगे
हम तुम जैसे होकर अपने कुल को नहीं लजायेंगे
तुम इक बार विचारो फिर से अहंकार ही चूका है
उसका चेहरा घृणित हो गया, जिसने नभ पर थूका है
हाथी निकला, श्वान बौराये; कहो लफंगा कौन हुआ
दर्पण में जाकर तो देखो सचमुच नंगा कौन हुआ

✍️ चिराग़ जैन

दुर्बुद्धि

दुर्योधन को समझाने वाले उस युग के सर्वाधिक प्रज्ञाशील लोग थे। स्वयम् श्रीकृष्ण, महात्मा विदुर, गंगापुत्र भीष्म, आचार्य द्रोण, कृपाचार्य और गांधारी जैसी मेधाओं का समवेत प्रयास भी उस एक युवक को हठ त्यागने के लिए राजी न कर सके। इसी प्रकार केकैयी को समझाने वालों में महाराज दशरथ, कौशल्या, आर्यसुमंत, महर्षि वशिष्ठ, धर्म प्रतीक भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और श्रीराम जैसी प्रखर प्रतिभाएँ थीं। रावण को सद्बुद्धि देने के लिए विभीषण, सुमाली, कैकसी, कुम्भकर्ण, मेघनाद, अंगद, मंदोदरी, सीता, सुलोचना और हनुमान जैसे विद्वानों ने हर संभव प्रयास किया किन्तु निष्फल रहे।
एक शकुनि, एक मंथरा या एक शूर्पणखा की दुर्बुद्धि, दर्जनों सद्बुद्धियों से अधिक प्रभावी सिद्ध होती है। दुर्योधन को अपनी भूल तब समझ आई जब वह मरणासन्न था। केकैयी को अपनी ग़लती का एहसास जब हुआ तब तक उल्लास के रंगों को वैधव्य के श्वेत परिधानों से ढँका जा चुका था। रावण जब तक संभला तब तक वह अपने कुल का घात करवा कर धराशायी हो चुका था।
कुज्ञान कानों के मार्ग से बुद्धि में प्रवेश करता है किन्तु सद्ज्ञान को हासिल करने के लिए कई जीवन अर्पित करने पड़ते हैं।
यह भी सत्य है कि कोई शूर्पणखा, कोई केकैयी या कोई दुर्योधन यदि हठ पकड़ ले तो न केवल अपनी बल्कि अपने आभामंडल और आसपास के प्रत्येक व्यक्ति का जीवन नर्क बना देती है।
समझ तो नहीं आता, लेकिन यह सत्य है कि साफ़ सुथरा जीवन जीने के लिए अपने इर्द-गिर्द नकारात्मक ऊर्जा से संचालित होने वाला एक भी व्यक्ति चुनौती बन सकता है।

✍️ चिराग़ जैन

हर ख़ुशी वनवास में है

कोई तो मंथरा रनिवास में है
अवध की हर ख़ुशी वनवास में है

अवध वालो हृदय को वज्र कर लो
कोई पत्थर छुअन की आस में है

कोई हठ पर अड़ा कोई नियम पर
मगर दशरथ गहन संत्रास में है

विवादों में तो कठिनाई बहुत है
क्या उससे भी अधिक उल्लास में है

दिलों में राम बसते हैं हमारे
मगर रावण हमारी श्वास में है

✍️ चिराग़ जैन

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