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हंस की चाल

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। कृष्ण, अर्जुन को लेकर बर्बरीक के पास गए और उनसे पूछा कि युद्ध का परिणाम क्या रहा? बर्बरीक ने उत्तर दिया कि पाण्डव परास्त हो गए। उत्तर सुनकर अर्जुन चकित हो गए और बोले- ‘सारा संसार जानता है कि युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो चुका है। सुयोधन वीरगति को प्राप्त हो चुका है। फिर आपको क्यों लगता है कि पाण्डव परास्त हो गए?’
बर्बरीक बोले- ‘कौरव तो प्रारम्भ से कौरव ही थे और अंत तक कौरव ही रहे। किन्तु पाण्डवों को युद्ध जीतने के लिए कई बार कौरव बनना पड़ा। और जो व्यक्ति अपना मूल स्वभाव छोड़ दे उसको परास्त ही माना जाता है।’
यह कथा भारतीय समाज के सांस्कृतिक मूल्यों पर भी अक्षरशः सही सिद्ध होती है। पाश्चात्य संस्कृति के आक्रमणों से घबराकर पिछड़ जाने के भय से हमने अपने परिवारों का मूल स्वभाव बिसरा दिया है। कट्टरता से भयभीय होकर हमने अपने धार्मिक परिवेश की सहजता को समाप्त कर डाला है। जिस मानसिक ग़ुलामी का रोना रोकर हम पश्चिमी परंपराओं को कोसते हैं उसके प्रथम अपराधी हम स्वयं हैं।
टेलिविज़न, मोबाइल, इंटरनेट या दूसरा कोई भी तकनीकी माध्यम हमारे सांस्कृतिक परिवेश को क्षति नहीं पहुँचा सकता था यदि हम भीतर से भयभीत न हुए होते। प्राप्त को सस्ता और अनुपलब्ध को महंगा समझने की हमारी प्रवृत्ति ने हमें अपने तूणीर में रखे अस्त्र चलाने की सामर्थ्य से वंचित कर दिया और हम प्रतिद्वंदी के चमकीले कमज़ोर तीरों से बिंधते चले गए।
भाषा से लेकर चाल-चलन तक हम अनवरत दूसरों की थाली के घी पर निगाहें गड़ाकर बैठे रहे और अपने पत्तल में रखे चूरमे की अनदेखी करते रहे। यदि हम इस स्थिति को सांस्कृतिक युद्ध मान लें तो यह भी स्वीकार करना होगा कि योद्धा का पहला अस्त्र उसका हौसला होता है। हम टूटी हुई हिम्मत लेकर रण में उतर तो गए किन्तु अपने देसी भाले को उनकी देखादेखी बंदूक की तरह चलाने के प्रयास में परास्त होते चले गए।
हम अपने विद्यालयों में भारतीय नागरिक तैयार करने चले किन्तु शिक्षा का माध्यम उनका अपना बैठे। हम यह भी न समझ सके कि थाली में परोसी गई खीर न तो रसना को तृप्त कर सकती है न क्षुधा ही शांत कर सकती है। खीर खानी है तो कटोरी ही उपयुक्त पात्र है।
यही व्यवहार हमने अपनी कलाओं के साथ भी किया। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में वर्णित मण्डप पर भरोसा न कर सके और विदेश से आयातित ऑडिटोरियम बनाकर इतराते फिरे। स्वांग और नौटंकी की प्रस्तुति इन विदेशी सभागारों में समा न सकी और धीरे-धीरे इन सभागारों की कृत्रिमता हमारी कलाओं की सहजता को लील गई।
हम आधुनिक दिखने की होड़ में कविताओं के बिम्ब बदलने लगे। माखन-मिश्री और कुंजवन की किलोल के बिम्ब भारतीयता में रचे-पगे बिम्ब थे, जिन्हें हठपूर्वक चॉकलेट और साइबेरिया के जंगलों में बदलने की कोशिश में हम कविता की लोक-ग्राह्यता नष्ट कर बैठे।
कृष्ण और राम की कथाएँ पढ़नेवाले बच्चे कब शिनचैन और नोबिता के चरित्र बाँचने लगे, हमें पता ही न लगा। आर्दश चरित्रों की कथाओं में व्याप्त परिहास के रस को अपमान समझकर हमने अनजाने में उन चरित्रों से पीढ़ियों को विमुख कर दिया। हम भूल गए कि चौपालों के ठहाके और मेलों की ठिठोली में बसी भारतीय संस्कृति परिहास और चर्चा से आहत नहीं होती, अपितु बल पाती है।
जब यह सब कुछ घटित हो रहा था ठीक उसी समय हमारी संस्कृति पर एक और आक्रमण हुआ। इस बार हमारा सामना विज्ञापनों से था। व्यावसायिक हितों की अंधी होड़ में हमारे औद्यौगिक घरानों ने हमारी प्रचलित जीवनशैली को ‘पुराना’; ‘बासी’; ‘पिछड़ा’ और ‘घिसा-पिटा’ बोल-बोलकर अपने उत्पाद बेचे। दंतमंजन से लेकर डिटर्जेंट तक के विज्ञापनों ने भारतीय संस्कृति को अपमानित किया और हम चुपचाप देखते रहे। ‘अब आ गया नए ज़माने का….’ -इस एक जुमले ने भारतीय संस्कृति की जो छवि हमारे मानस पटल पर अंकित की, उसने हमारी सोच को प्रभावित किया। अब हम अपने बच्चों को अंग्रेजी न बोलने पर डाँटने लगे।
टेलिविज़न के इसी व्यामोह में हमने मुहल्ला संस्कृति का पूरी तरह पटाक्षेप कर डाला और अपने-अपने घरों की दीवारों में क़ैद हो गए। सिमटने का क्रम इस हद तक बढ़ा कि घर सिकुड़ कर कमरे बन गए और उत्सवधर्मी भारतीय मनुष्य एकाकी जीवन की चौखट पर नाक रगड़ने लगा।
इन छोटे-छोटे फ्लैट्स में न तो रंगोली के लिए देहरी की जगह बन सकी न ही तुलसी चौरा पूजने के लिए आंगन की। सुक़ून और संतुष्टि के महामंत्र भूलकर हम आपाधापी में इतने व्यस्त हुए कि संध्या वंदन के लिए गौधूलि वेला कब आकर गुज़र गई हमें संज्ञान ही न रहा।
गुडलने चलते बचपन को संस्कारों का ककहरा पढ़ानेवाला मातृत्व अर्थतंत्र की उहापोह में विलीन हो गया और हमने अपने नौनिहालों को क्रेच और प्ले स्कूल के भरोसे छोड़ दिया। शहरी जीवन की विवशताओं और स्त्री-सशक्तिकरण की मुहिम ने भारतीय परिवारों की वैज्ञानिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दिया और केवल आर्थिक स्वावलम्बन को नारी-मुक्ति का नाम दे दिया गया। समाज में स्त्री की भूमिका के महती योगदान को उजागर करने के स्थान पर हमने पाश्चात्य प्रचलन का अंधानुकरण किया और स्त्री के द्वारा पारिवारिक तथा सामाजिक स्तर पर निर्वाह किये जा रहे दायित्वों की उपेक्षा कर दी। भारतीय समाज में स्त्री की भूमिका के आधार पर संस्कारों की पाठशाला बन्द हो गईं और हमारी पीढ़ियाँ ट्यूशन या कॉन्वेंट में डिग्रियाँ बटोरने को शिक्षा समझने लगीं।
इसके अतिरिक्त सिनेमा, जो कि राजा हरिश्चन्द्र की कहानी लेकर भारत में प्रविष्ट हुआ था, उसने बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों को सर्वाेपरि मानकर अनैतिक यौन संबंधों और हिंसक अपराधी प्रवृत्तियों की वक़ालत शुरू कर दी। जुआरी, ठग, अपराधी, व्यसनी और स्मगलर्स फिल्मों के नायक बनने लगे। मुजरा और कैबरे फ़िल्म की सफलता की गारंटी बन गए और हमारे फ़िल्म निर्माताओं ने आइटम डांस के भड़कीले संगीत में भारतीय सुगम संगीत की सरगम ख़ामोश कर दी।
हमने संस्कृति को बचाने के लिए सरकार की ओर देखा तो सरकार ने योजनाओं का झुनझुना थमा दिया। संस्कृति के ठेकेदार उस झुनझुने के सहारे समय व्यतीत करते रहे और संस्कृति अपनी जर्जर होती देह को लुकाते-छिपाते समय काटती रही।
धागे से नाड़ी की गति मापनेवाला देश आँख फड़कने पर पेन किलर खाने लगा और जड़ी-बूटियों के रसायन विज्ञान से हमारा भरोसा उठ गया। लट्टू से खेलते बच्चे हमें आवारा लगने लगे और बेब्लेड चलाते बच्चे सभ्य।
भारतीय संस्कृति के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती यही है कि हम युद्ध जीतने के लिए कौरव बनते रहे और अपने मूल स्वभाव की उपेक्षा करते रहे। हमें यह समझना होगा कि ऊँट रेगिस्तान का जहाज है। उसे प्रकृति ने रेत पर दौड़ने की शक्ति दी है। यदि कोई कार उसे स्पर्धा के लिए ललकार बैठे तो उस कार को रेत में दौड़ने के लिए आमंत्रित करो, न कि स्वयं हाइवे पर जाकर कार की तरह दौड़ने की होड़ करो।

© चिराग़ जैन

सत्य के निशान

जब घिरे सवाल तो निदान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे

लोग जो परोपकार की मिसाल हो गए
दूसरों का दर्द ओढ़कर निहाल हो गए
उन प्रजातियों का ख़ानदान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे

प्रीति की प्रतीतियों में लीन राधिका हुई
प्रेम की हवाओं में विलीन साधिका हुई
ज्ञानवान प्रीति के प्रमाण खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे

गौण हो गईं तमाम नीतियाँ ज़मीन पर
सत्य का असर हुआ न न्याय की मशीन पर
सुर्ख़ियों में रोज़ संविधान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे

कर्मशील, भाग्यवान से परास्त हो गया
योग युद्ध का बना, तभी नसीब सो गया
तीर हाथ में रहा, कमान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे

✍️ चिराग़ जैन

समय का बारदाना

जब समय फंदा कसेगा
भूमि में पहिया धँसेगा
शाप सब पिछले डसेंगे
पार्थ नैतिकता तजेंगे
उस घड़ी तक जूझने का भ्रम निभाना है
सब समय का बारदाना है
नीतियों का ढोंग करतीं, सब सभाएँ मौन होंगी
न्याय की बातें बनातीं मन्त्रणाएँ मौन होंगी
जब प्रणय को भूलकर राघव निरे राजा बनेंगे
तब सिया के गीत गातीं प्रार्थनाएँ मौन होंगी
जो सदा रक्षक रहा हो
पुत्रवत सेवक रहा हो
उस लखन ने ही वनों में छोड़ आना है
सब समय का बारदाना है
द्यूत के उपरांत लज्जित शौर्य का वैभव रहेगा
श्वास ज्वाला में दहकता वीरता का शव रहेगा
व्यूह की रचना करेंगे द्रोण जब भीषण समर में
व्यूह भेदन का पुरोधा पार्थ तब ग़ायब रहेगा
आँख से आँसू झरेंगे
घात सब अपने करेंगे
अर्जुनों को बाद में बदला चुकाना है
सब समय का बारदाना है
ज़िन्दगी के हर मिलन का, हर विरह का क्रम नियत है
बाण की शैया मिलेगी या मधुर रेशम, नियत है
सब नियत है कब कहाँ किसको दबोचेगी पराजय
कब कहाँ उत्सव मनेगा, कब कहाँ मातम नियत है
न्याय का उपहास तय है
राम का वनवास तय है
कैकयी का कोप तो कोरा बहाना है
सब समय का बारदाना है
✍️ चिराग़ जैन

आशाओं पर आघात

पतझर का आना निश्चित था
पत्ते झर जाना निश्चित था
हरियाली की आशाओं पर, बादल ने आघात करा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है

दुःशासन ने चीर हरा तो ठीक समय आ पहुँचे माधव
भीष्म काल बनकर बरसे तो तोड़ प्रतिज्ञा पहुँचे माधव
एकाकी होकर जूझा अभिमन्यु अकेला षड्यंत्रों से
आस रही होगी उसको भी, माधव के अभिनव तंत्रों से
उसका घिर जाना निश्चित था
भू पर गिर जाना निश्चित था
पर उस दिन जो वीर मरा है, उम्मीदों के साथ मरा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है

जिस रानी ने जर्जर रथ की कील बना दी अपनी उंगली
दशरथ के रथ के पहिये के बीच फँसा दी अपनी उंगली
अंतर कभी नहीं रखती हो जो सौतन की संतानों में
ऐसी रानी रूठ गई तो क्या मांगेगी वरदानों में
राघव को वनवास; असंभव
रघुकुल को संत्रास; असंभव
पहले यह विश्वास मरा है, दशरथ उसके बाद मरा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है

✍️ चिराग़ जैन

वृंदावन की याद

दुनिया का सारा वैभव है राजमहल की सुविधाओं में
फिर भी कान्हा को रह-रह कर वृंदावन की याद आती है
सोने-चांदी में भरकर जब इत्र बरसता है राहों में
मन को गोकुल के सीधे-सादे सावन की याद आती है

जब राजा के सैनिक घर से सारा माखन ले जाते थे
हम पानी के साथ चने खाकर तकते ही रह जाते थे
मजबूरी के तूफ़ानों में सारी मेहनत खो जाती थी
सारे घर की रोटी पोकर, माँ भूखी ही सो जाती थी
जब मक्खन की पूरी टिकिया फिंकने लगती है जूठन में
छींके की हाण्डी में पसरे रीतेपन की याद आती है

अनुशासन की याद दिलाने, बाबा की आहट काफ़ी थी
मर्यादा का पाठ पढ़ाने को घर की चैखट काफ़ी थी
औरों के दिल घायल कर दें, ऐसे जुमले याद नहीं थे
रास रचाते थे जी भर कर पर मन में अपराध नहीं थे
जब चैसर पर मर्यादा की सब सीमाएँ लाँघी जाएँ
गुल्ली-डण्डे से बहलाते उस बचपन की याद आती है

इस महफ़िल में ऐसे कपड़े, उस महफ़िल में वैसे कपड़े
आँखों से लज्जा ग़ायब है, तन पर कैसे-कैसे कपड़े
मन पर चिन्ताएँ हावी हों पर फिर भी मुस्काना होगा
हर जलसे में, हर महफ़िल में रस्म निभाने जाना होगा
जब नियमों की सीमाओं में इच्छाएँ घुँटने लगती हैं
बचपन के सँग पीछे छूटे पागलपन की याद आती है

✍️ चिराग़ जैन

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