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चयन

दुःख का अभाव
सुख नहीं है।
मुश्किल की अनुपस्थिति
आसानी नहीं है।

दरअस्ल
आसान तो
कुछ है ही नहीं

जीवन एक अवसर है
कम मुश्किल का
चयन करने के लिए।

मुझे चुनना था
दो में से एक वाक्यांश-
“काश ये न होता!”
या
“काश वो होता!”

मैंने दूसरा विकल्प चुना।
सुखी हूँ या नहीं
कह नहीं सकता

लेकिन
दुःखी बिल्कुल नहीं हूँ।

✍️ चिराग़ जैन

पूजा के हक़दार

जिस डाली का काटा जाना आज अखर जाता है तुमको
उस डाली के कटने से ही कल को तुम फलदार बनोगे
जिस छैनी के छूने भर से चीख़ निकलती है पत्थर की
उस छैनी की चोटों से तुम पूजा के हक़दार बनोगे

अनुभव के दो हाथ समूचे माटी-माटी सन जाएंगे
तब जाकर मिट्टी के ढेले को किंचित आकार मिलेगा
मिट्टी से पहले हाथों की भाग्य लकीरें घिस जाएंगी
तब बर्तन कहला पाने का मिट्टी को अधिकार मिलेगा
जिन जलते शोलों से तन-मन सब कुछ झुलसेगा भीतर तक
उनके कारण ही तुम प्यासे ओंठों पर बौछार बनोगे

गंगा बनकर पुजना है तो, गोमुख से झरना ही होगा
बूंदों को बारिश बनना है, बादल को मरना ही होगा
रामशरण स्वीकार नहीं हो, और मुक्ति की इच्छा हो तो
कंचन मृग का स्वांग रचा कर, सीता को हरना ही होगा
अपने सारे सुख को अपने हाथों वनवासी कर दोगे
तब सम्भव है तुम जीते जी धरती पर अवतार बनोगे

✍️ चिराग़ जैन

ठहाकों का दौर

ग़मों का दौर है आफत में जान है लेकिन
कुछ ऐसी बात चले रंग और हो जाए
फिर एक बार फुर्सतों पे नूर आया है
चलो कि फिर से ठहाकों का दौर हो जाए

✍️ चिराग़ जैन

उत्सव रूठ जाएगा

अगर व्यवधान होगा तो ये उत्सव रूठ जाएगा
कोई इक पल कई रातों की मेहनत लूट जाएगा
ये तनहाई की बातें आई हैं महफ़िल में हिम्मत से
हुई अनदेखी तो इनका मनोबल टूट जाएगा

✍️ चिराग़ जैन

पुरवा

एक बादल ने सरे-शाम भिगोई पुरवा
सुब्ह फूलों से लिपट फूट के रोई पुरवा

उसने ओढ़ा हुआ होगा कोई ग़म का बादल
यूँ ही मदमस्त नहीं होती है कोई पुरवा

हाय ये शहर बहुत रूखा हुआ जाता है
अबकी गाँवों ने क्या सरसों नहीं बोई पुरवा

तेरे दामन से क्यों उठती है महक ममता की
छू के आई है क्या अम्मा की रसोई पुरवा

आज उन लोगों के आंगन में बसी है पछुआ
जिनके पुरखों ने कलेजे में संजोई पुरवा

✍️ चिराग़ जैन

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