Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
जहाँ तुमको बस एक पत्थर मिला है
वहाँ हमको जन्नत का मंज़र मिला है
उसे भी ग़ज़ब का मुक़द्दर मिला है
मुक़द्दर में जिसको तिरा दर मिला है
कहाँ कोई ऐसा क़लन्दर मिला है
जिसे मन मुताबिक़ मुक़द्दर मिला है
हुआ एक अरसे के बाद आज तनहा
लगा, जैसे कोई बिछड़कर मिला है
भले चोट की जिस्म पर दोस्तों ने
मगर ज़ख़्म उसका ज़ेह्न पर मिला है
कोई तेरी रहमत को माने न माने
तिरा नाम सबकी ज़ुबां पर मिला है
ज़माना भले उसको समझे न समझे
मगर इक इशारा बराबर मिला है
जिसे जो मिला है वो उसका मुक़द्दर
मुझे जो मिला है वो बेहतर मिला है
कोई उनसे पूछे मुक़द्दर के मानी
जिन्हें तिश्नगी में समन्दर मिला है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
मन के आंगन में मुस्कानों की जागीर बनानी है
अपने ही हाथों से ख़ुद अपनी तक़दीर बनानी है
हम कुछ रंग चुरा लाए हैं ख़ुशियों के गुलदस्ते से
इन रंगों से हमको जीवन की तस्वीर बनानी है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Muktak, Poetry
पलक गिरते ही पल में खेल सारे देख लेता हूँ
मैं इनसे आँख को ढँक कर सितारे देख लेता हूँ
मेरी ये बन्द पलकें दूरबीनों से कहाँ कम हैं
मैं इनमें ज़िन्दगी भर के नज़ारे देख लेता हूँ
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
सिर्फ़ मतलब के लिए हर चाल चलना पाप है
हर दफ़ा दर देखकर मजहब बदलना पाप है
शाइरी, दीवानगी, नेकी, इबादत, मयक़शी
और राहे-इश्क़ में गिर कर संभलना पाप है
काश बच्चों की तरह हालात भी ये जान लें
ख़्वाहिशों की तितलियों के पर मसलना पाप है
दौर इक ऐसा भी था, जब झूठ कहना मौत था
और अब ये हाल, सच की राह चलना पाप है
किस डरौने दौर में हम जी रहे हैं या ख़ुदा
घर में रहना ऐब है, घर से निकलना पाप है
पाप का दिल से निकल हरक़त में आना ज़ुर्म है
ज़ुर्म का भीतर ही भीतर दिल में पलना पाप है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Doha, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
ख़ुशी की लाश उठती है ख़ुशी की चाह के नीचे
बहुत से ज़ख्म होते हैं ज़रा-सी आह के नीचे
हमारे दिल की बातें दिल में ऐसे दब के रहती हैं
कि जैसे पीर सोता हो कोई दरगाह के नीचे
✍️ चिराग़ जैन