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इक नया रास्ता

ज़िन्दगी जब भी आज़माती है
इक नया रास्ता दिखाती है

न तो पिंजरे में चहचहाती है
न ही अब पंख फड़फड़ाती है

जब कभी माँ की याद आती है
ये हवा लोरियाँ सुनाती है

वो मरासिम को यूँ निभाती है
मिरा हर काम भूल जाती है

मेरे ख़्वाबों में यूँ वो आती है
जैसे पाजेब छनछनाती है

लफ़्ज़ मिल पाए तो सुनाऊंगा
इक ग़ज़ल मुझमें छटपटाती है

जब भी जाता है चांद महफ़िल से
रात की जान सूख जाती है

दिल को मिलती है जब ख़ुशी कोई
अक़्ल कुछ दर्द भूल जाती है

✍️ चिराग़ जैन

रिस्क

मेरे भीतर
दौड़ना चाहती है
इक नदी
दरदरे रेगिस्तान की ओर।

मस्तिष्क ने कहा-
“रिस्क है इसमें।”

मन बोला-
“जुआ ही तो है
या तो लहलहा उठेगा
रेगिस्तान
या दरदरा जाएगी
नदी!”

संकल्प

मैं ये दावा नहीं करता कि दुनिया को बदल दूंगा
मगर जो रास्ता सच का हो, उस रस्ते पे चल दूंगा
मेरा अधिकार है चिंतन पे, संकल्पों पे, कर्मों पे
मैं ये संकल्प लेता हूँ कि सत्कर्मों पे बल दूंगा

© चिराग़ जैन

इरादा

तेरे मन में भी इक इरादा है
मेरे मन में भी इक इरादा है
वक्त क़ी आंधियाँ बताएंगीं
कौन मजबूत कितना ज्यादा है
✍️ चिराग़ जैन

राम ने खोया बहुत श्रीराम बनने के लिए

त्याग दी हर कामना निष्काम बनने के लिए
तीन पहरों तक तपा दिन, शाम बनने के लिए
घर, नगर, परिवार, ममता, प्रेम, अपनापन, दुलार
राम ने खोया बहुत श्रीराम बनने के लिए
✍️ चिराग़ जैन

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