ज़िंदगी है चार पहरों की तरह
कुल मिलाकर ज़िंदगी है चार पहरों की तरह
हर किसी का वक़्त चढ़ता है दुपहरों की तरह
सांझ को दुल्हन सी सजती है सभी की ज़िंदगी
और फिर सूरज ढलक जाता है चेहरों की तरह
✍️ चिराग़ जैन
कुल मिलाकर ज़िंदगी है चार पहरों की तरह
हर किसी का वक़्त चढ़ता है दुपहरों की तरह
सांझ को दुल्हन सी सजती है सभी की ज़िंदगी
और फिर सूरज ढलक जाता है चेहरों की तरह
✍️ चिराग़ जैन
सादगी के आँगन में
चहकी है, खेली है
हाव-भाव बदले तो
ज़िंदगी अकेली है
ओढ़ी हुई बातों से
कष्ट में धकेली है
सहजता सफलता की
पक्की सहेली है
एक तरफ़ जकड़न है
क़ातिल शिकंजा है
नाख़ूनी रंजिश है
नफ़रत है, पंजा है
उसी के ज़रा पीछे
प्यार की हवेली है
सहजता से खुली हुई
गुदगुदी हथेली है
बचपन से सीखा है
उत्तर उन्हीं में है
जिन शब्दों से मिलकर
बनती पहेली है
✍️ चिराग़ जैन
लो मान लिया ये राजनीति छल-छद्मों की इक मंडी है
लो मान लिया इस महफ़िल की हर सूरत बहुत घमंडी है
लेकिन हमने भी कब पुरख़ों के सपनों का सम्मान किया
70 वर्षों में कहीं कभी क्या 100 प्रतिशत मतदान किया
ये लोकतंत्र जनप्रतिनिधियों की करनी का हरकारा है
हम चुन कर प्रत्याशी भेजें इतना तो काम हमारा है
आज़ादी की परवाज़ों में सीमाओं के कन्ने भी हैं
अधिकारों की बातें हैं तो, कर्तव्यों के पन्ने भी हैं
कुछ लोग वोट की ताक़त को हल्के में लेते रहते हैं
फिर सत्ता, सिस्टम, शासन को ही गाली देते रहते हैं
उंगली पर स्याही लगी नहीं, सत्ता पर कीचड़ डाल रहे
कर लोकतंत्र की अनदेखी, शासन में दोष निकाल रहे
वोटिंग के दिन पिकनिक जाने वाले भी क्या ग़द्दार नहीं
ऐसे लोगों को शासन की निंदा तक का अधिकार नहीं
हम खाएं क़सम इस बार कोई मत व्यर्थ नहीं जाने देंगे
जनता की मर्ज़ी के बिन अब ना सत्ता हथियाने देंगे
जनता की निष्क्रियता को उनकी ताक़त क्यों बन जाने दें
अपनी मेहनत से सींची फसलें टिड्डों को चर जाने दें
जनता का प्रतिनिधि कैसा हो ये हम सबको तय करना है
अबकी पूरे माहौल को फिर से लोकतंत्रमय करना है
बस एक वोट भी सत्ता की जड़ में मट्ठा भर सकता है
बस एक वोट आकाओं का जबड़ा खट्टा कर सकता है
बस एक वोट सच के रथ का पहला घोड़ा बन सकता है
बस एक वोट झूठों के पथ पर बाधा बन तन सकता है
जो सीना छलनी करता है, उसके सीने पर चोट तो दें
इसको, उसको, चाहे जिसको, हम जाकर अपना वोट तो दें
इस बार फरवरी सात गढ़ेगी नई इबारत दिल्ली में
जब सौ प्रतिशत मतदान से गर्वित होगा भारत दिल्ली में
इस बार वोट की ताक़त का जलवा देखेंगे दिल्ली में
इस बार सही जनमत का इक बलवा देखेंगे दिल्ली में
जिस दिन मेरी इन बातों का सम्पूर्ण असर हो जाएगा
उस दिन समझो इस भारत का गणतंत्र अमर हो जाएगा
✍️ चिराग़ जैन
लो चलो आज निश्चित मानो
मुझको मंज़िल मिलनी तय है
अब ये तुम निर्धारित कर लो
उस क्षण मेरी आँखों में तुम क्या चित्र देखना चाहोगे
अपनत्व भरा इक तरल प्यार
या फिर इक जलता तिरस्कार
संघर्षों के तपते पथ पर, झुलसाती धूप बनोगे तुम
या फिर तरुओं की छाया का दुलराता रूप बनोगे तुम
तुम पर छोड़ा तुम क्या दोगे, मुझको कुछ भी है हेय नहीं
जो तुम दोगे लौटा दूंगा, मुझ पर अपना कुछ देय नहीं
मेरी गति को निर्बाध किये, पथ छोड़ा भी जा सकता है
कुहनी से पसली घायल कर, रथ तोड़ा भी जा सकता है
तुमसे ये निर्धारण होगा, जिस क्षण ये सफ़र ख़तम होगा
उस क्षण मेरी आँखों में तुम क्या चित्र देखना चाहोगे
अपनत्व भरा इक तरल प्यार
या फिर इक जलता तिरस्कार
संघर्षों के उस पार जहाँ, उत्सव का मंच बना होगा
मेरी अनुशंसा में शोभित उन्नत ध्वजदंड तना होगा
उस पर सब कुछ ताज़ा होगा, किससे-कैसा अनुबंध रहा
दो आँखें उनको ढूंढेंगी, जिनसे मेरा संबंध रहा
मेरे मन के कोलाहल में, अपनों की गूंज भरी होगी
जिसने मेरा पथ रोका उस, कुहनी की टीस हरी होगी
जब धूसर काया दमकेगी, जब मेरी क़िस्मत चमकेगी
उस क्षण मेरी आँखों में तुम क्या चित्र देखना चाहोगे
अपनत्व भरा इक तरल प्यार
या फिर इक जलता तिरस्कार
✍️ चिराग़ जैन
फिर से बीता इक और साल
कुछ दीवारों पर बदल गया
टेबल पे कैलेण्डर बदल गया
ऑफिस का रजिस्टर बदल गया
लेकिन ऐसे बदलावों से
कब तन बदला कब मन बदला
ना सुख बदले ना दुःख बदले
ना मानव का जीवन बदला
इस बार नई उम्मीद जगे
इस बार जगत सारा बदले
आशाओं के उजियारे में
अन्तस का अँधियारा बदले
✍️ चिराग़ जैन