+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

अनकहे

जो कथाओं की दिशाएं मोड़कर ओझल हुए हैं
उन अभागे अनकहों का मन नहीं जाना किसी ने
दोष सारा जो लिए बैठे रहे अपने सिरों पर
उन चरित्रों का अकेलापन न पहचाना किसी ने

कैकयी की सोच में जो क्षोभ था, वो बाहर आया
लोभ रानी का जगा, तब राम ने वनवास पाया
कैकयी ने कर लिया वरदान को अभिशाप ख़ुद ही
मंथरा के भाग्य में अपयश रहा, वो भी पराया
राजपरिवारों की झूठी प्रीत का जिसमें दिखा सच
मंथरा तो थी वही दर्पण, नहीं जाना किसी ने

पुत्र का संबंध लेकर भीष्म ख़ुद गंधार आए
दम्भ में इक बालिका के स्वप्न सारे मार आए
जिस अंधेरे को तुम्हीं ने राज्य से वंचित किया था
उस अंधेरे पर किसी की राजकन्या वार आए
कौन से अन्याय की ज्वाला में शकुनि जल रहा था
हाल उसका पूछने कब लौटकर आना किसी ने

नाव का जीवन बचाने क्या सहेगी पाल पूछो
धार से घायल हुआ है चप्पुओं का भाल पूछो
आम के मीठे फलों पर मुग्ध रहते हो, रहो पर
हो सके तो आम्रवन की कोयलों का हाल पूछो
भूमिका अपनी निभाकर खो गए नेपथ्य में जो
उन अबोलों का भला गुणगान कब गाना किसी ने

✍️ चिराग़ जैन

विरोधाभास

जिसको सुख का उत्सव समझा,
वो दुख का आयोजन निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे,
उसका नाम विभीषण निकला

जीवन भर विश्रांत रहा जो, हमने उसको शांतनु माना
जिसने हर अनुशासन तोड़ा, उसका नाम सुशासन जाना
जिसका जीवन लाचारी था, उसका परिचय भीष्म बताया
अपशकुनों का मूल रहा जो, वह जग में शकुनी कहलाया
कृष्ण कहा जिसको दुनिया ने, वह जग का आभूषण निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे, उसका नाम विभीषण निकला

नाम श्रवण था जिसका, उसने आहट नहीं सुनी दशरथ की
एक मंथरा क्षण भर में ही इति बन गई हर सुख के अथ की
मानी को समझाने अंगद बनकर बुद्धि स्वयं आई थी
कुम्भकर्ण तक जाग गया पर रावण पर तंद्रा छाई थी
मुख दिखलाने योग्य नहीं जो, वह कुल्हन्त दशानन निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे, उसका नाम विभीषण निकला

जिस वेला में राजतिलक होता उसमें वनवास हुआ है
उत्सव की चौसर पर कुल की लज्जा का उपहास हुआ है
कंचन मृग लाने निकले थे, घर की मृगनयनी खो बैठे
खाण्डव वन को स्वर्ग किया था, ख़ुद ही वनवासी हो बैठे
जिस अवसर पर मेल लिखा था, उसका अंत विभाजन निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे, उसका नाम विभीषण निकला

✍️ चिराग़ जैन

कला की क़ीमत

कलाएँ, समाज की वन्दनवार हैं। ये इस्तेमाल की जाती हैं, समाज के उत्सवों को श्वास देने के लिए। ये काम आती हैं, समाज की उदासी में मुस्कान भरने के लिए। इन्हें निमंत्रित किया जाता है, समाज का सिंगार करने के लिए। लेकिन जब कोई आपदा आती है तब इन वन्दनवारों को कोई नहीं बचाता। किसी को ध्यान ही नहीं रहता कि जिन तोरणद्वारों से आते-जाते शुभाशीष लिया है, उनका जीवन भी संकट में है।
वन्दनवार भागते-दौड़ते लोगों के माथे चूम-चूमकर अपने अस्तित्व की याद दिलाती हैं, आपदा से लड़ने के लिए भागते हुए समाज को आशीष देने का कर्तव्य निभाती रहती हैं। समाज को, यह मस्तक चूमकर आशीष देना, अखरने लगता है। वन्दनवार माथे चूम-चूमकर टूट जाती हैं और समाज इस जर्जर शुभकामना को छोड़कर स्वयं को सुरक्षित करने में व्यस्त हो जाता है।
आपातकाल व्यतीत करने के बाद, जब तक समाज लौटता है, तब तक उसके मंगल की कामना करते-करते वन्दनवार प्राण त्याग चुकी होती है।
समाज सामान्य होने लगता है और वन्दनवारों की नई पीढियाँ उनके द्वार-देहरियों को आशीष देने के लिए इस्तेमाल होने लगती हैं। इसी प्रक्रिया में कुछ वन्दनवारों के वंश समाप्त हो गए। कठपुतली, नौटंकी, तमाशा, क़व्वाली, नट और न जाने कितने वंश लुप्तप्रायः हैं।
सुना है, ‘सब कुछ सामान्य होने के बाद’ समाज इन वंशों के अवशेषों को महंगे दाम पर बेचता है। सुना है, कला की क़ीमत तब बढ़ती है, जब वह मर जाती है।

✍️ चिराग़ जैन

फिर नई शुरुआत

थम गया संसार सारा
हो रहा ओझल किनारा
साँस डर कर ले रहे हैं
विष घुला है हर नज़ारा
किन्तु हम ख़ुद को पुनः सुकरात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे

मानते हैं, आदमी से भूल भारी हो रही थी
एक अंधी दौड़ की सब पर ख़ुमारी हो रही थी
इस हवस का अंत होगा, होड़ का अवसान होगा
फिर नई दुनिया बसेगी, फिर सृजन का गान होगा
खेत, वन सबका सही अनुपात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे

देख लेना इस नए जग की सुरीली तान होगी
श्वास में विश्वास होगा, आँख में मुस्कान होगी
प्रेम का व्यवहार होगा, प्रीत का सत्कार होगा
फिर नए बिरवे उगेंगे, फिर नया संसार होगा
हर तरफ़ उल्लास को तैनात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे

लोभ का प्रतिकार करना जानता हो, वो बचेगा
सत्य को स्वीकार करना जानता हो, वो बचेगा
जो बचेगा, वो मनुजता के लिए वरदान होगा
जो बचेगा, वो नए युग का नवल उत्थान होगा
साथ मिलकर फिर वही हालात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे

धड़कनें इस बात की पहचान है, जीवन अमर है
ज़िन्दगी क्या है, शिराओं में लहू का वेग भर है
श्वास में संगीत होगा
धड़कनों में ताल होगी
तन समूचा स्वस्थ होगा
ज़िन्दगी ख़ुशहाल होगी
देह को उपचार में निष्णात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!