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कला की क़ीमत

कलाएँ, समाज की वन्दनवार हैं। ये इस्तेमाल की जाती हैं, समाज के उत्सवों को श्वास देने के लिए। ये काम आती हैं, समाज की उदासी में मुस्कान भरने के लिए। इन्हें निमंत्रित किया जाता है, समाज का सिंगार करने के लिए। लेकिन जब कोई आपदा आती है तब इन वन्दनवारों को कोई नहीं बचाता। किसी को ध्यान ही नहीं रहता कि जिन तोरणद्वारों से आते-जाते शुभाशीष लिया है, उनका जीवन भी संकट में है।
वन्दनवार भागते-दौड़ते लोगों के माथे चूम-चूमकर अपने अस्तित्व की याद दिलाती हैं, आपदा से लड़ने के लिए भागते हुए समाज को आशीष देने का कर्तव्य निभाती रहती हैं। समाज को, यह मस्तक चूमकर आशीष देना, अखरने लगता है। वन्दनवार माथे चूम-चूमकर टूट जाती हैं और समाज इस जर्जर शुभकामना को छोड़कर स्वयं को सुरक्षित करने में व्यस्त हो जाता है।
आपातकाल व्यतीत करने के बाद, जब तक समाज लौटता है, तब तक उसके मंगल की कामना करते-करते वन्दनवार प्राण त्याग चुकी होती है।
समाज सामान्य होने लगता है और वन्दनवारों की नई पीढियाँ उनके द्वार-देहरियों को आशीष देने के लिए इस्तेमाल होने लगती हैं। इसी प्रक्रिया में कुछ वन्दनवारों के वंश समाप्त हो गए। कठपुतली, नौटंकी, तमाशा, क़व्वाली, नट और न जाने कितने वंश लुप्तप्रायः हैं।
सुना है, ‘सब कुछ सामान्य होने के बाद’ समाज इन वंशों के अवशेषों को महंगे दाम पर बेचता है। सुना है, कला की क़ीमत तब बढ़ती है, जब वह मर जाती है।

✍️ चिराग़ जैन

फिर नई शुरुआत

थम गया संसार सारा
हो रहा ओझल किनारा
साँस डर कर ले रहे हैं
विष घुला है हर नज़ारा
किन्तु हम ख़ुद को पुनः सुकरात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे

मानते हैं, आदमी से भूल भारी हो रही थी
एक अंधी दौड़ की सब पर ख़ुमारी हो रही थी
इस हवस का अंत होगा, होड़ का अवसान होगा
फिर नई दुनिया बसेगी, फिर सृजन का गान होगा
खेत, वन सबका सही अनुपात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे

देख लेना इस नए जग की सुरीली तान होगी
श्वास में विश्वास होगा, आँख में मुस्कान होगी
प्रेम का व्यवहार होगा, प्रीत का सत्कार होगा
फिर नए बिरवे उगेंगे, फिर नया संसार होगा
हर तरफ़ उल्लास को तैनात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे

लोभ का प्रतिकार करना जानता हो, वो बचेगा
सत्य को स्वीकार करना जानता हो, वो बचेगा
जो बचेगा, वो मनुजता के लिए वरदान होगा
जो बचेगा, वो नए युग का नवल उत्थान होगा
साथ मिलकर फिर वही हालात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे

धड़कनें इस बात की पहचान है, जीवन अमर है
ज़िन्दगी क्या है, शिराओं में लहू का वेग भर है
श्वास में संगीत होगा
धड़कनों में ताल होगी
तन समूचा स्वस्थ होगा
ज़िन्दगी ख़ुशहाल होगी
देह को उपचार में निष्णात कर लेंगे
फिर नई शुरुआत कर लेंगे

✍️ चिराग़ जैन

पीछे-पीछे आता है सुख

सुख, कुछ ढूंढने में नहीं है। कुछ ढूंढने के लिये तो एषणा का आधार चाहिए, कुछ ढूंढने का अर्थ है कि इच्छाओं की विषबेल पोषित हो रही है। सुख और इच्छा बिल्कुल विपरीत तत्व हैं। इच्छाओं की पगडंडी सुख के आगार तक पहुँच ही नहीं सकती।
सुख तो स्वीकार्यता से जन्मता है। अपने वर्तमान को स्वीकार कर लेना, सुख के शिखर का पहला सोपान है। अपनी परिस्थितियों से एकाकार हो जाना न्यूनतम अर्हता है सुखी होने की।
तथागत के नयन निमीलित इसीलिए हैं कि वे बहुत दूर दिखनेवाली मरीचिका को देखने से निषिद्ध हैं। वे ऊतनी भर पलकें खोले हैं, जिनसे वर्तमान पल को देखा जा सके। वर्तमान के सौंदर्य को निहारा जा सके। भविष्य की तलाश वर्तमान के सौंदर्य को अनदेखा कर देती है।
हम न जाने क्या ढूंढते-ढूंढते कहीं खो गए हैं। हम किसी कल्पना की आस में वास्तविकता का अपमान किये चले जा रहे हैं। इसलिए तलाशो मत, जो हाथ में है उसे जी लो। अगर हाथ ख़ाली हों, तो इस ख़ालीपन को ही जी लो। यह रिक्तता किसी पूर्ति की आशा से कहीं अधिक आनंददायी है।
उपलब्ध को अनदेखा करके अभीष्ट के लिए कसमसाना, अतिक्रमणवादी का चलन है। कोई महावीर इसकी अनुशंसा नहीं करता, कोई बुद्ध इसका समर्थन नहीं करता, किसी जीसस के आचरण से ऐसी प्रेरणा नहीं मिलती। गीता में जिसे स्थितप्रज्ञ कहा गया है, वह इस प्रवृत्ति की विलोम मनोदशा है।
कृष्ण अपने वर्तमान को जीते रहे। उन्होंने जिस पल को जिया उसी में रम गए। वृंदावन में गैया चराते कान्हा को देखकर यह अनुमान कर पाना कठिन था कि यही व्यक्ति एक दिन राजनैतिक महाभारत का केंद्र बिंदु होगा। वृंदावन में रास रचाते कन्हैया को देखकर यह कल्पना नहीं की जा सकती थी कि यही किशोर इंद्रप्रस्थ और द्वारका जैसे नगर बसाएगा। इसलिए वर्तमान को देखकर भविष्य का अनुमान लगाने में ऊर्जा नष्ट न करो। कृष्ण ने वृंदावन में महाभारत नहीं किया। वह पल रास का पल था। वह क्षण बाँसुरी का क्षण था। तब भरपूर रास रचाया गया। तब भरपूर बंसी बजाई गई। और इतना रास रचा लिया कि जब मथुरा-गमन हुआ तो रास की कोई आकांक्षा उनके पैर न पकड़ पाई। जब कुरुक्षेत्र के मौदान में रथ हाँका तब बंसी के स्वरों ने उनकी स्मृतियों में व्यवधान उत्पन्न नहीं किया।
वर्तमान को जीनेवाला भविष्य की चिंताओं से तो मुक्त होता ही है, अतीत की स्मृतियों से भी अछूता रहता है।
जिसने बचपन पूरा जी लिया, उसका यौवन तृप्त होता है, और जिसने यौवन भरपूर जी लिया उसका बुढ़ापा भव्य होता है। भरपूर बचपन जीकर युवा होनेवाला व्यक्ति बचपन के अभावों से दुःखी नहीं रहता।
जब आप भरपेट भोजन करते हो, एक-एक कौर का स्वाद लेकर भोजन करते हो, तो फिर भोजन का वह क्षण आपकी स्मृतियों का स्थान नहीं घेरता। लेकिन जब आपको भरपेट भोजन न मिल सका हो, जब आपकी थाली आपकी क्षुधा को पूर्ण न कर पाई हो, या जब आपने दूसरे की पत्तल में झाँकते हुए भोजन किया हो; तब वह कष्ट आपको ज़रूर याद रह जाता है। इसलिए वर्तमान को भरपूर जीना ही एकमात्र उपाय है। इसमें कुछ सकारात्मक और नकारात्मक है ही नहीं। जो है वह सच है। सत्य केवल सत्य है। उसमें कुछ अच्छा या बुरा नहीं है। उसमें कोई सौभाग्य या दुर्भाग्य नहीं हो सकता।
हर वर्तमान को एक दिन कथा हो जाना है। इस कथा में हम अपने क़िरदार में पूरी तरह पगे हुए दिखने चाहियें। जो अभिनेता अभी के दृश्य में आगेवाले दृश्य के संवाद बोलेगा, उसे मंच से उतार दिया जाएगा।
कोई नायक या खलनायक है ही नहीं। सब केवल अभिनेता हैं। नायक और खलनायक तो किरदार के नाम हैं। जो अपना क़िरदार ईमानदारी से निभाएगा, वह सुखी रहेगा। नायक से खलनायक के चरित्र की तुलना करनेवाले नादान लोग हैं। तुलना अभिनय की हो सकती है, किरदार की नहीं। किरदार तो दोनों ही महत्वपूर्ण हैं।
अपने किरदार के प्रति ईमानदार रहना ज़रूरी है, अन्यथा अपनी भूमिका सही से न निभा पाने की बेचैनी से नींद की खड़ी फ़सल को करवटों का पाला मार जाता है। सुख हमको ढूंढना तब शुरू करता है, जब हम सुख को ढूंढना बन्द कर देते हैं।

✍️ चिराग़ जैन

कविग्राम की कार्यशाला में

कविग्राम की कार्यशाला में प्रवेश करने के बाद दिन कब बीत जाता है, पता ही नहीं चलता। कवि-सम्मेलन के पुराने वीडियो सुबह से ही मेरी कम्प्यूटर स्क्रीन पर बहार ले आते हैं। एक-एक वीडियो की लॉग शीट बनाना, फिर उसमें पढ़ी गई कविताओं को लिपिबद्ध करना, फिर उन्हें वीडियो एडिटर में संपादित करना, उनके लिए थम्बनेल डिज़ाइन करना, थम्बनेल के लिए फ़ोटो तलाशना, लिप्यन्तरण में कोई शब्द समझ न आए तो किसी वरिष्ठ कवि से पूछना… पूरा दिन मेहनत करके तीन या चार वीडियो ही तैयार कर पाता हूँ।
समय की क़ैद से अभी-अभी बाहर निकली इस सामग्री में कहीं ऑडियो क्वालिटी बहुत ख़राब है तो कहीं वीडियो क्वालिटी… जितनी मुझे तकनीक की जानकारी है, उसके मुताबिक़ उसे हर सीमा तक बेहतर बनाता चल रहा हूँ। मुझे तकनीक की जानकारी कम है, लेकिन अपने वरिष्ठ कवियों के प्रति श्रद्धा भरपूर है।
एक वीडियो में देवराज दिनेश जी कविता पढ़ रहे हैं, वीडियो और साउंड दोनों की ही क्वालिटी बहुत ख़राब है, लेकिन मैंने एक शब्द कविता भी व्यर्थ नहीं होने दी। एक-एक शब्द लिख लिया और अन्य श्रोताओं को समझने में दिक्कत न हो, इसके लिए एक-एक पंक्ति को वीडियो के साथ लिखकर नत्थी कर दिया। इस वीडियो को तैयार करते समय मुझे उस ऑडियो रिकॉर्ड की याद आ गई, जिसमें गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर की आवाज़ में जन-गण-मन गीत सहेजा गया है। उसकी क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं है, किंतु वह टैगोर की एकमात्र उपलब्ध ऑडियो क्लिप है। ऐसे ही कुछ दीवाने लोगों ने विवेकानन्द, महात्मा गांधी, सर सैयद अहमद खां, जवाहरलाल नेहरू आदि की ऑडियो भी सहेज लीं थीं; वही क्लिप्स आज तक इन आवाज़ों के दरदरे दुलार की अनुभूति करवा देती हैं।
शुरुआती फिल्मों की क्वालिटी भी बहुत अच्छी नहीं मिलती, लेकिन जिन्हें रस लेना आता है, उनके लिए ये ख़राब तकनीकों की मारी हुई सामग्री अनमोल है।
ताड़पत्रों की जटिल देखरेख आज की प्रकाशन तकनीकों के आगे अनावश्यक जान पड़ती है, किन्तु जिनके पास ताड़पत्रों पर लिखे ये ग्रन्थ सुरक्षित हैं वे जानते हैं कि इन पत्रों की लाख प्रतियाँ ऑफसेट पर छप सकती हैं लेकिन फिर भी वे उन जर्जर ताड़पत्रों से कमतर ही रहेंगी।
कवि सम्मेलन की इस धरोहर को व्यवस्थित करते हुए मुझे लगातार इस बात की संतोषानुभूति हो रही है कि जैसे हम निराला, पंत, महादेवी, प्रसाद, स्नेही, हरिऔध, दिनकर, गुप्त आदि महानुभावों की आवाज़ सुनने से वंचित हैं वैसे हमारी आनेवाली पीढ़ियाँ शंभूनाथ सिंह, बरसानेलाल चतुर्वेदी, गोपालदास नीरज, किशन सरोज, भारत भूषण, रमानाथ अवस्थी, बेकल उत्साही, शिशुपाल सिंह निर्धन, बृजेन्द्र अवस्थी, शैल चतुर्वेदी, उर्मिलेश शंखधर, मधुर शास्त्री, माणिक वर्मा, निर्भय हाथरसी, राधेश्याम प्रगल्भ, वीरेंद्र मिश्र, ओमप्रकाश आदित्य जैसे कवियों की आवाज़ तलाशने चलेंगी, तो निराश नहीं होंगी।
इस कार्य को करते हुए मुझे इस बात की कतई परवाह नहीं है कि इसकी क्वालिटी के कारण ‘यूट्यूब और फेसबुक की लाइक्स और शेयर की अंधी होड़’ में मैं पिछड़ सकता हूँ।
मैं बस इतना जानता हूँ कि इस कार्य को करते हुए मुझे थकान नहीं हो रही, क्योंकि मुझे संतुष्टि है कि आज से दस-बीस साल बाद भी जब कोई काव्य प्रेमी इनमें से किसी कवि को तलाशने चलेगा तो मेरा आज का श्रम उस समय उसकी आँखों में चमक उठेगा!

✍️ चिराग़ जैन

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