Chirag Jain Writings, Prose, Purushottam, Quotation
रामजी ने जिस मुहूर्त में कोई शुभकार्य किया, ग्रहों के उसी संयोग को हम शुभ मुहूर्त मानते थे। आज राजनीति ने हमें इस कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है कि रामजी के मंदिर के लिए शुभ मुहूर्त का टंटा पड़ रहा है।
अरे, उनका नाम लेकर तो जिस मुहूर्त में ईंट रख दो, वही शुभ है मूढ़ो! भूल गए क्या, उनके नाम से तो पत्थर तिर गए थे! पर उस समय राम जी के सब कारज इसलिए सिद्ध हो जाते थे, क्योंकि तब नल-नील की पूरी ऊर्जा पुल बनाने में केंद्रित थी, यदि वे भी राजनीति कर रहे होते तो चार सीटें फालतू मिलने पर रावण के हाथों बिक जाते और राम जी के आगे नाटक करते रहते कि ‘पुल वहीं बनाएंगे’!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
एक जीवन में हमें संसार जितना दिख रहा है
वह गगन के एक कण बादल से ज़्यादा कुछ नहीं है
चांद, मंगल तक सफर की ख्वाहिशें और कोशिशें सब
बालपन के मूढ़ कौतूहल से ज़्यादा कुछ नहीं है
जो तुम्हारी दृष्टि को बस टिमटिमाते दिख रहे हैं
वे सभी तारे तुम्हारी सोच से बेहद बड़े हैं
क्षेत्रफल, ऊँचाइयाँ जो नापकर रटते रहे हो
वे महज इंसान के कुछ मनलुभावन आँकड़े हैं
लहलहाता दिख रहा है जो तुम्हें सागर, धरा पर
फर्श पर इक बून्द की हलचल से ज़्यादा कुछ नहीं है
बाँह के विस्तार से ही विश्व की गणना करो मत
पाँव से मत इस ज़मीं को नापने की डींग मारो
सिर्फ़ अपनी देह के आकार से तुलना करो मत
हो सके तो दृष्टि को ऊँचाई पर लाकर निहारो
तुम जिसे आकाशचुम्बी कह रहे गर्दन उठाकर
वह शिखर भी खुरदुरे भूतल से ज़्यादा कुछ नहीं है
उम्र केवल एक ज़र्रा है समय की अंजुमन का
इस जगत् की एक सिहरन मात्र ये जीवन समर है
जिस धरा के एक टुकड़े पर बसी दुनिया तुम्हारी
ये धरा ही इस महाब्रह्मांड में बस बून्द भर है
तुम जिसे दुनिया समझकर जीत लेना चाहते हो
यूँ समझ लो, एक टिड्डीदल से ज़्यादा कुछ नहीं है
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
कोरोना वायरस लॉन्च होते ही साबुनों के विज्ञापन की भाषा बदल गई। हमें बताया गया कि ‘कोरोना वायरस से बचाव के लिए अमुक साबुन से बीस सेकेंड तक हाथ धोएँ।’ च्यवनप्राश कम्पनियों ने बताया कि ‘कोरोना वायरस से बचाव के लिए इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए अमुक च्यवनप्राश खाएँ।’ डिजिटल फाइनेंस कम्पनियों ने बताया कि ‘डिजिटल पेमेंट अपनाएँ, ख़ुद को कोरोना के ख़तरे से बचाएँ।’ रिटेल होम डिलीवरी सर्विसेज ने बताया कि ‘घर से बाहर निकलकर कोरोना को आमंत्रित न करें, हम आपका सामान आपके घर पहुँचा देंगे।’ दवाई कम्पनियाँ भी ठीक इसी तर्ज पर ‘पहले से उपलब्ध दवाइयों को बेचने के लिए’ कोरोना की परिस्थितियों का लाभ उठा रही हैं।
मज़े की बात यह है कि इनमें से एक भी कम्पनी अपने विज्ञापन में शत प्रतिशत झूठ नहीं बोल रही। यह बाज़ार की सामान्य प्रवृत्ति है कि वह कोई भी चोगा पहन ले, लेकिन उसका प्राथमिक उद्देश्य व्यापार ही होगा।
बाज़ार हमारे भय का लाभ उठाता है। उसे पता है कि इस समय हम कोरोना से भयभीत हैं, इसलिए इस भय का नाम लेकर जो कुछ बेचा जाएगा, वह बिक जाएगा। इसी भय का लाभ अधकचरे ज्योतिष, पोंगा पंडित, नीम हकीम, तंत्र-मंत्रवाले बाबा, झाड़-फूँक वाले मौलवी भी उठाते हैं।
बाज़ार पहले मांग पैदा करता है, फिर माल बेचता है। और अगर किसी प्राकृतिक कारण से कोई मांग स्वतः उत्पन्न हो जाए तो अपने माल की पैकेजिंग उसकी पूर्ति के अनुरूप कर लेता है।
भूकम्प, बाढ़, महामारी, भुखमरी, अकाल जैसी परिस्थितियों में ऐसी नई पैकेजिंग अक्सर दिखाई देती है। जब कोई बड़ा भूकम्प आ जाए तो सरिया, सीमेंट और फ्लैटबेचने वाले तुरन्त चिल्लाने लगते हैं- ‘भूकम्परोधी सरिया ले लो; भूकम्परोधी सीमेंट ले लो; भूकम्परोधी फ्लैट ले लो!’ कोई आश्चर्य नहीं कि किसी दिन कोई साबुन कम्पनी यह दावा कर दे कि जो हमारी साबुन से नहाएगा उसकी खूबसूरती भूकम्प के मलवे से ख़राब नहीं होगी। और कोई आश्चर्य नहीं कि हम इसको सच मान लें, क्योंकि हम पानी में डूबी कुर्सी देखकर फेविकोल के मजबूत जोड़ की बात को सच मानते ही आए हैं।
बाज़ार चाहे मजहब का चोगा पहन ले, चाहे समाजसेवा का; चाहे अस्पताल का चेहरा लगा ले, चाहे मीडिया का; चाहे कविता के मंच पर सवार हो, चाहे राजनीति के गलियारों में; उसका प्राथमिक उद्देश्य मुनाफ़ा ही होगा। उसकी नीतियाँ भी बाज़ारू ही होंगी। वह जनता की अभिरुचियों का अध्ययन करते हुए उसके अनुरूप अपने प्रोडक्ट की पैकेजिंग करेगा। ध्यान रहे, वह प्रोडक्ट नहीं बदलता सिर्फ़ पैकेजिंग बदलता है। विज्ञापन का शरीर लोककल्याण की भाषा बोलता है लेकिन उसकी आत्मा बाज़ार की फड़ पर खड़ी होकर माल बेचने में संलग्न होती है।
जो लोग बाज़ार तलाशते हुए साहित्यकार या कवि बने फिरते हैं, वे समाज को न तो कोई नया विचार दे पाते हैं, न ही कोई नई बात। यदि समाज उद्वेलित हो तो वे भड़काऊ लेखन से उनके उद्वेलन में वृद्धि करने लगते हैं। वे अपने लेखन के दम पर समाज का मूड बदलने का कोई उपक्रम नहीं करते, वरन समाज का मूड देखकर अपने लेखन की भाषा बदल लेते हैं।
इस सबसे ज़्यादा भयावह यह है कि अब राजनीति भी बाज़ार के सिद्धांतों पर चलने लगी है। वही डर का सिद्धांत। पहले तंत्र की अनियमितताओं को उजागर किया जाता है। वर्तमान सरकार के प्रति असंतोष को बढ़ावा दिया जाता है। और जैसे ही जनता असंतोष से भर जाती है, तो बेनक़ाब करनेवाले ख़ुद वोट मांगने के लिए झोली पसार देते हैं।
यह कथन किसी भाजपा, किसी कांग्रेस, किसी वामपंथ, किसी समाजवाद पर ही नहीं अपितु वर्तमान राजनीति की पूरे चरित्र पर लागू होता है।
ऐसे में सही राजनेता, सही साहित्यकार, सही दवा विक्रेता, सही मीडिया और सही मजहब की पहचान करने का तरीका क्या है। हो सकता है मेरा मत शत प्रतिशत सटीक न सिद्ध हो, किन्तु यदि गम्भीरता से विचार करें तो सम्भवतः हम वर्तमान बाज़ारवाद के शिकंजे को कुछ तो ढीला कर सकेंगे।
‘समाज की सामान्य सोच के विपरीत बात कहनेवाला व्यक्ति इस बात की पुष्टि करता है कि वह व्यक्तिगत रूप से हानि उठाकर भी अपनी बात कहने के लिए कटिबद्ध है। ऐसे व्यक्ति की बात को भी यदि हम आँख बंद करके सुनने की बजाय थोड़ा-सा विवेक लागू करके सुनें/समझें तो बाज़ार के हो-हल्ले में शायद सच की हल्की-सी आवाज़ हमारे कानों तक पहुँच सके।’
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जो कथाओं की दिशाएं मोड़कर ओझल हुए हैं
उन अभागे अनकहों का मन नहीं जाना किसी ने
दोष सारा जो लिए बैठे रहे अपने सिरों पर
उन चरित्रों का अकेलापन न पहचाना किसी ने
कैकयी की सोच में जो क्षोभ था, वो बाहर आया
लोभ रानी का जगा, तब राम ने वनवास पाया
कैकयी ने कर लिया वरदान को अभिशाप ख़ुद ही
मंथरा के भाग्य में अपयश रहा, वो भी पराया
राजपरिवारों की झूठी प्रीत का जिसमें दिखा सच
मंथरा तो थी वही दर्पण, नहीं जाना किसी ने
पुत्र का संबंध लेकर भीष्म ख़ुद गंधार आए
दम्भ में इक बालिका के स्वप्न सारे मार आए
जिस अंधेरे को तुम्हीं ने राज्य से वंचित किया था
उस अंधेरे पर किसी की राजकन्या वार आए
कौन से अन्याय की ज्वाला में शकुनि जल रहा था
हाल उसका पूछने कब लौटकर आना किसी ने
नाव का जीवन बचाने क्या सहेगी पाल पूछो
धार से घायल हुआ है चप्पुओं का भाल पूछो
आम के मीठे फलों पर मुग्ध रहते हो, रहो पर
हो सके तो आम्रवन की कोयलों का हाल पूछो
भूमिका अपनी निभाकर खो गए नेपथ्य में जो
उन अबोलों का भला गुणगान कब गाना किसी ने
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जिसको सुख का उत्सव समझा,
वो दुख का आयोजन निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे,
उसका नाम विभीषण निकला
जीवन भर विश्रांत रहा जो, हमने उसको शांतनु माना
जिसने हर अनुशासन तोड़ा, उसका नाम सुशासन जाना
जिसका जीवन लाचारी था, उसका परिचय भीष्म बताया
अपशकुनों का मूल रहा जो, वह जग में शकुनी कहलाया
कृष्ण कहा जिसको दुनिया ने, वह जग का आभूषण निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे, उसका नाम विभीषण निकला
नाम श्रवण था जिसका, उसने आहट नहीं सुनी दशरथ की
एक मंथरा क्षण भर में ही इति बन गई हर सुख के अथ की
मानी को समझाने अंगद बनकर बुद्धि स्वयं आई थी
कुम्भकर्ण तक जाग गया पर रावण पर तंद्रा छाई थी
मुख दिखलाने योग्य नहीं जो, वह कुल्हन्त दशानन निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे, उसका नाम विभीषण निकला
जिस वेला में राजतिलक होता उसमें वनवास हुआ है
उत्सव की चौसर पर कुल की लज्जा का उपहास हुआ है
कंचन मृग लाने निकले थे, घर की मृगनयनी खो बैठे
खाण्डव वन को स्वर्ग किया था, ख़ुद ही वनवासी हो बैठे
जिस अवसर पर मेल लिखा था, उसका अंत विभाजन निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे, उसका नाम विभीषण निकला
✍️ चिराग़ जैन