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अनपढ़ माँ

चूल्हे-चौके में व्यस्त
और पाठशाला से
दूर रही माँ
नहीं बता सकती
कि ”नौ-बाई-चार” की
कितनी ईंटें लगेंगी
दस फीट ऊँची दीवार में
…लेकिन अच्छी तरह जानती है
कि कब, कितना प्यार ज़रूरी है
एक हँसते-खेलते परिवार में।

त्रिभुज का क्षेत्रफल
और घन का घनत्व निकालना
उसके शब्दों में ‘स्यापा’ है
…क्योंकि उसने मेरी छाती को
ऊनी धागे के फन्दों
और सिलाइयों की
मोटाई से नापा है

वह नहीं समझ सकती
कि ‘ए’ को
‘सी’ बनाने के लिए
क्या जोड़ना
या घटाना होता है
…लेकिन
अच्छी तरह समझती है
कि भाजी वाले से
आलू के दाम
कम करवाने के लिए
कौन सा फॉर्मूला
अपनाना होता है।

मुद्दतों से
खाना बनाती आई माँ ने
कभी पदार्थों का तापमान नहीं मापा
तरकारी के लिए
सब्ज़ियाँ नहीं तौलीं
और नाप-तौल कर
ईंधन नहीं झोंका
चूल्हे या सिगड़ी में
…उसने तो
केवल ख़ुश्बू सूंघकर बता दिया है
कि कितनी क़सर बाकी है
बाजरे की खिचड़ी में।

घर की
कुल आमदनी के हिसाब से
उसने हर महीने
राशन की लिस्ट बनाई है
ख़र्च और बचत के
अनुपात निकाले हैं
रसोईघर के डिब्बों
घर की आमदनी
और पन्सारी की
रेट-लिस्ट में
हमेशा सामन्जस्य बैठाया है
…लेकिन
अर्थशास्त्र का
एक भी सिद्धान्त
कभी उसकी समझ में
नहीं आया है।

वह नहीं जानती
सुर-ताल का संगम
कर्कश, मृदु और पंचम
सरगम के सात स्वर
स्थाई और अन्तरे का अन्तर
….स्वर साधना के लिए
वह संगीत का
कोई शास्त्री भी नहीं बुलाती थी
…लेकिन फिर भी मुझे
उसकी लल्ला-लल्ला लोरी सुनकर
बड़ी मीठी नींद आती थी।

नहीं मालूम उसे
कि भारत पर
कब, किसने आक्रमण किया
और कैसे ज़ुल्म ढाए थे
आर्य, मुग़ल और मंगोल कौन थे,
कहाँ से आए थे?
उसने नहीं जाना
कि कौन-सी जाति
भारत में
अपने साथ
क्या लाई थी
लेकिन
हमेशा याद रखती है
कि नागपुर वाली बुआ
हमारे यहाँ
कितना ख़र्चा करके आई थी।

वह कभी नहीं समझ पाई
कि चुनाव में
किस पार्टी के निशान पर
मुहर लगानी है
लेकिन इसका निर्णय
हमेशा वही करती है
कि जोधपुर वाली दीदी के यहाँ
दीपावली पर
कौन-सी साड़ी जानी है।

बेशक़ माँ को नहीं आता
सीधा स्वास्तिक बनाना
पर स्वास्तिक को ख़ूब आता है
माँ के हाथ से बनकर
शुभ हो जाना।

मेरी अनपढ़ माँ
वास्तव में अनपढ़ नहीं है
वह बातचीत के दौरान
पिताजी का
चेहरा पढ़ लेती है

काल-पात्र-स्थान के अनुरूप
बात की दिशा
मोड़ सकती है
झगड़े की सम्भावनाओं को
भाँप कर
कोई भी बात
ख़ूबसूरत मोड़ पर लाकर
छोड़ सकती है

दर्द होने पर
हल्दी के साथ दूध पिला
पूरे देह का पीड़ा को
मार देती है
और नज़र लगने पर
सरसों के तेल में
रूई की बाती भिगो
नज़र भी उतार देती है

अगरबत्ती की ख़ुश्बू से
सुबह-शाम
सारा घर महकाती है
बिना काम किए भी
परिवार तो रात को
थक कर सो जाता है
लेकिन वो
सारा दिन काम करके भी
परिवार की चिन्ता में
रात भर सो नहीं पाती है।

सच!
कोई भी माँ
अनपढ़ नहीं होती
सयानी होती है
क्योंकि
ढेर सारी डिग्रियाँ
बटोरने के बावजूद
बेटियों को
उसी से सीखना पड़ता है
कि गृहस्थी
कैसे चलानी होती है।

✍️ चिराग़ जैन

लफ्ज़ों के शोर में

हालात ने जब-जब भी माजरा बढ़ा दिया
जीने की हसरतों ने हौसला बढ़ा दिया

लफ्ज़ों के शोर में ये समन्दर ख़मोश थे
चुप्पी ने शाइरी का दायरा बढ़ा दिया

यूँ ख़त्म हो चुका था रात को ही मसअला
सुब्ह की सुर्ख़ियों ने मामला बढ़ा दिया

कुछ पहले ही लज़ीज़ थीं चूल्हे की रोटियाँ
फिर माँ की उंगलियों ने ज़ायक़ा बढ़ा दिया

मंज़िल थी मिरे रू-ब-रू, रस्ता था दो क़दम
अपनों की क़ोशिशों ने फासला बढ़ा दिया

✍️ चिराग़ जैन

सियासत का ज़हर

सच के मंतर से सियासत का ज़हर काट दिया
हाँ, ज़रा रास्ता मुश्क़िल था, मगर काट दिया

वक्ते-रुख़सत तिरी ऑंखों की तरफ़ देखा था
फिर तो बस तेरे तख़य्युल में सफ़र काट दिया

फिर से कल रात मिरी मुफ़लिसी के ख़ंज़र ने
मिरे बच्चों की तमन्नाओं का पर काट दिया

सिर्फ़ शोपीस से कमरे को सजाने के लिए
हाय ख़ुदगर्ज़ ने खरगोश का सर काट दिया

एक छोटा-सा दिठौना मिरे माथे पे लगा
बद्दुआओं का मिरी माँ ने असर काट दिया

✍️ चिराग़ जैन

गुड्डी

गुड्डी के पापा
लन्च में टिफ़िन खोलते समय
मूंद लेते हैं आँखों को
क्योंकि देख नहीं पाते हैं
रोटियों से झाँकते
तवे के सुराखों को।

ईमानदार क्लर्क
समझ नहीं सकता है
क़िस्मत की गोटियों को
इसलिए चुपचाप निगल लेता है
बोलती हुई रोटियों को।

गुड्डी अक्सर लेट पहुँचती है स्कूल
नहीं करती कोई भूल
क्योंकि स्कूल का नियम है
कि लेट-स्टूडेंट्स के लिए
दो डन्डे ही काफ़ी हैं
और डर्टी-यूनिफ़ॉर्मर्स के लिए
चार भी कम हैं;

..इस प्रकार
अपनी बुध्दिमत्ता का प्रयोग कर
छोटी बच्ची
बोनस पिटाई से बच निकलती है
क्योंकि स्कूल की यूनिफॉर्म-सुपरवाइज़र
लेट-स्टूडेंट्स की
ड्रेस-चेकिंग नहीं करती है।

गुड्डी की माँ
अक्सर चिड़चिड़ाती है
सारा दिन बड़बड़ाती है
छोटी-छोटी चीजों के लिए
मन को मसोसती है
और जब कहीं वश नहीं चलता
तो गुड्डी और उसके पापा को कोसती है-

”…भगवान ऐसी औलाद
किसी को न दे
…अरी! मुझे कहीं से
थोड़ा-सा ज़हर ला दे
…कम से कम सारा दिन चीखने से बचूँगी
..इस परिवार के पीछे झींखने से बचूँगी
जीना हराम कर दिया है
..दो-हज़ार रुपल्ली घर में देकर समझते हैं
कि बहुत बड़ा काम कर दिया है।
….हफ्ते भर में ही
कपड़ों का जोड़ा बदलते हैं
..शान तो ऐसी है
जैसे बाप-दादों के कारखाने चलते हैं।

..ऐसी ही औलाद है
इसे भी हमेशा भूतनी-सी चढ़ती है
….जब बर्तन माँझती है
तो तवे को ईंट से रगड़ती है
..रगड़-रगड़ कर
तवे में सुराख़ कर डाला है
….समझती ही नहीं
तवा तो तवा है
…अपना तो भाग्य ही काला है।”

……दूर खड़ा हो देखता हँ
तो पाता हूँ
कि ग़रीबी की सुरसा
माँ की ममता को लील गई है
भोली बच्ची के बचपन को
मजबूरी की कीलों से कील गई है।

….गुड्डी
माँ के डर से
चुन्नी के फटेपन को
सिलवटों में छिपा लेती है।

….माँ
घर की ग़रीबी को
उधड़े आँचल में दबा लेती है।

और गुड्डी का बाप
ये सब कुछ देख
फूट-फूट कर रो पड़ता है
..क्योंकि एक ईमानदार क्लर्क
ईमानदारी के ज़ुर्म में
रोने के सिवाय
और कर भी क्या सकता है….!!

✍️ चिराग़ जैन

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