Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
कुछ पुरानी बहसें देख रहा था यूट्यूब पर। चुनावी माहौल में मुँह में तिनके दबाये कई भेड़िये रंगे सियारों के समर्थन से स्वयं को महान सिद्ध करते नज़र आये। “जनता”, “लोकतंत्र”, “ईमानदारी”, “राष्ट्रहित”, “जनसेवा” और “भारत माता” जैसे शब्दों को बोलकर अपना वाक्युद्ध जीतने पर जब वे कुटिल मुस्कान मुस्काते थे तो ऐसा जान पड़ता था कि जिस्म का धंधा करने वाली कोई त्रिया, सावित्री और अनुसूया से अपनी तुलना कर पावनता के मुख पर तमाचे मार रही हो।
मैं लोगों के मुख पर मुस्कान पिरोने वाला एक अदना सा कलाकार हूँ। सामान्य स्थितियों से हास्य जुटाना मेरा काम है। शब्दजाल बुनना और वाक्पटुता से सम्मोहन करने की कला मुझे और मेरे सहकर्मियों को माँ सरस्वती ने जन्म के समय सौगात में दे दी थी। ऐसे में किसी प्रकार की लच्छेदारी में से झाँक रही रंगदारी को पहचानना मेरे लिये कठिन कार्य न था।
हर चैनल की हर बहस में अनवरत एक-दूसरे की कुत्ता-फजीहत और खिखियाती हँसी का जब बहावानुवाद किया तो ये स्वर सुनाई पड़े- “तुम सब मूर्ख हो सालो! हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे। हम ऐसे ही चैनलों पर टाइम पास करके चले जायेंगे और तुम अपने-अपने टीवी के सामने बैठे ये देखकर ख़ुश होते रहना कि फ़लां ने फ़लां को बढ़िया जवाब दे दिया। ये न्यूज़ चैनल भी हमारे ही चमचे हैं।”
वे जानते हैं कि हम इस बात से कोई सरोकार नहीं रखते कि जिन सवालों के जवाब इन बहसों में तलाशने का ढोंग किया जा रहा है, वे दरअसल हमारे हैं ही नहीं। वे ये भी जानते हैं कि इन बहसों को जनता ऐसे ही सुनती है जैसे बालिका वधु देख रही हो। सास-बहू पर विज्ञापन आ गये तो एनडीटीवी लगा लिया, थोड़ा मज़ा रवीश का ले लिया, फिर वहाँ विज्ञापन आये तो डिस्कवरी लगा लिया, तेंदुए और तेंदुई का संभोग देख लिया, वहाँ से कहीं और, और वहाँ से कहीं और।
हम रिमोट पर उंगलियाँ टिकाये लगातार अपने आप को बेवक़ूफ़ बनाये जा रहे हैं। हर पार्टी के अपने स्पोक्सपर्सन हैं, ये वो लोग हैं जो बहस बहुत अच्छी कर लेते हैं। ये वो टेस्ट खिलाड़ी हैं जो हारे हुए मैच को ड्रॉ की ओर ले जाने का हुनर जानते हैं। ये वो लोग हैं जो बहुत कम, य बहुत ज़्यादा बोल कर बहस का टाइम पास करना जानते हैं। ये वो लोग हैं जिनके किसी भी बयान को “उनकी निजी सोच” बताकर पार्टी अपना पल्ला झाड़ सकती है। यदि देश सेवा का हित है तो प्रवक्ताओं की क्या ज़रूरत? (मेरी इस बात पर कुछ लोग मेरा राजनैतिक बचकानापन कहकर खिल्ली उड़ासकते हैं) लेकिन उनको मैं पहले ही बता दूँ कि संगीन राजनैतिक अपराधों के इस दौर में राजनीति इसी बात का लाभ उठा रही है कि उन्होंने जनता को आपस में लड़ना सिखा दिया है।
किसी ने कोई बयान दे दिया, किसी ने उसका खंडन कर दिया, किसी ने स्याही फेंक दी, किसी ने चप्पल फेंक दी… हम देश की राजधानी में जीवन यापन कर रहे हैं। राजनीति जहाँ श्वास लेती है उस वातावरण से हम भी सिंचित हो रहे हैं। देश भर को प्रभावित करने वाली बौद्धिक तरंगें जब उद्घटित होती हैं तो सर्वप्रथम हमसे टकराती हैं। जब इस दौर से इतिहास प्रश्न करने खड़ा होगा तो उस समय दिल्ली की आम जनता से भी यह पूछा जायेगा कि तुमने क्यों इन सपोलियों को अपने आस-पास पनपने दिया। मैं जानता हूँ कि आप कहेंगे कि हम क्या कर सकते हैं? प्रश्न ये नहीं है कि हम क्या कर सकते हैं; प्रश्न ये है कि हमारी कुछ करने की इच्छाशक्ति कहाँ चली गयी।
चुनाव हो चुका है, 4 दिसम्बर से पहले मैं ये बातें करता तो लोग इसमें किसी पार्टी की महक ढूंढने लगते। इंदिराजी ने सबसे पहले मीडीया की ताक़त को समझा और आपातकाल के दौरान सर्वप्रथम मीडिया को पंगु बना दिया गया। सरकारी मीडिया आज तक उन सरकारी इंगितों का उल्लंघन करने का साहस नहीं जुटा पाया। तब से आज तक टीवी हमें बेवक़ूफ़ बनाता जा रहा है। अब तो राजनैतिक पार्टियों ने बाक़ायदा मीडिया प्रबंधन के लिये प्रकोष्ठ बना दिये हैं। साइबर मैनेजमेंट के लिये कार्यालय खोल दिये हैं। ठीक चुनाव के दिन जबकि चुनाव प्रचार बंद हो चुका है, सुबह-सुबह आपके घर पर एक अख़बार आता है और उसका मुखप्पृष्ठ एक पार्टी विशेष का विज्ञापन कर रहा होता है।
मैं ये नहीं कहता कि इन सब बातों को पढ़कर क्रांति की मशाल उठा लो। इस दौर में क्रांति के लिये घर-बार फूँकना कदाचित् कठिन न हो, लेकिन एक काम तो हम कर ही सकते हैं कि जब इस प्रकार के ढोंगी चैनलों पर राजनेताओं को बिठाकर एक-एक घंटे के बुलेटिन बनाये जा रहे हों तो उस वक़्त अपना चैनल बदल दो। जिस टीआरपी के दम पर ये लोग हमको बेचे जा रहे हैं, उसी टीआरपी को अपनी ताक़त बनाओ। जब इस तरह की बहसों की टीआरपी घटेगी तो कम से कम इन चैनल्स से मिलने वाली फ़ुटेज के दम पर राजनीति करने वाले लोग तो कम होंगे।
किसने क्या बयान दिया, या दिल्ली में किसकी सरकार आयेगी इस पर किस नेता की क्या राय है… इस प्रकार की बहसों से अगर हमने चैनल बदलना सीख लिया तो कम से कम लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की दरारों को भरने में हम कुछ कर सकेंगे।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Prose, Quotation, Unpublished
कमाल का देश है
कोई ‘कुछ भी’ बोलता है
और कोई ‘कुछ भी नहीं बोलता।
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Poetry, Unpublished
दीवाली, दशहरा, रक्षाबंधन
ये सब हमारे लिए त्यौहार हैं
लेकिन कुछ लोगों के लिए सिर्फ व्यापार हैं
हर साल की तरह
इस साल भी दीवाली आई,
इस साल भी हुआ
लक्ष्मी जी का पूजन
आतिशबाज़ी और घरों की सफ़ाई,
लेकिन इस साल हमने मिठाई नहीं खाई।
बचपन में इतनी मिठाई आती थी
इतनी मिठाई आती थी
कि पेट अफ़र जाता था
रोटी तो माँ के डर से खानी पड़ती थी
वरना पेट तो मिठाई से ही भर जाता था।
खोये में मिलावट की बात को
ये टीवी चैनल कुछ ज़्यादा नहीं खेंच रहे हैं
मुझे तो लगता है
कि बेचारे खोए को बदनाम करके
ये अपनी चाॅकलेट बेच रहे हैं।
युगों-युगों से चले आ रहे त्यौहारों मे
ये अपनी राय क्यों झोंकते हैं
हमें हमारी ही परम्पराओं के पालन से रोकते हैं
बाज़ार की हवाएं कैसी कैसी बातें बनाती हैं
और तो और
डाॅक्टर कहता है
काजल लगाने से आंखें ख़राब हो जाती हैं।
पहले की माँए
दीवाली की रात
कच्ची पाली में काजल बनाती थी
पूरे साल बच्चों की आँखों में लगाती थी
काजल से आँख ख़राब होना तो दूर
चश्मे का नम्बर तक नहीं बढ़ा
ये काजल का ही करिश्मा था
कि लालटेन की रौशनी में पढ़कर
कलाम साहब राष्ट्रपति बन गए
लेकिन कभी चश्मा नहीं लगाना पड़ा
और अगर काजल लगाने से
इतना ही अधिक होता है आंखों का नुकसान
तो फिर आई लाइनर
और आई पैन्सिल पर
आप मौन क्यों हैं श्रीमान्!
लोभ की आरी में बाज़ार का हत्था लगाकर
आप काट नहीं पाएंगे
हमारी संस्कृति की शाखें
अरे हमारे तो सौंदर्य का प्रतिमान है
रतनारे नैन और कजरारी आँखें!
हमारे यहाँ
प्यासे को पानी पिलाना पुण्य का काम था
किसी का भी गेट खटखटाकर
पानी मांग लेना इस देश में आम था
फिर आया एक ख़ास किस्म की ख़बरों का दौर
पानी पीने के बहाने माल साफ कर गए चोर
पानी पीने के बहाने लूट लिया
पानी पीने के बहाने मार दिया
पानी, प्यास और लूट का ऐसा मचा शोर
प्यासों की दहशत के चर्चे हो गए हर ओर
जैसे ही पानी मांगने वालों पर
लोगों ने नज़रें तरेरी
फौरन मार्किट में लांच हो गई
एक-एक लीटर की बिस्लेरी
कृष्ण के देश में
जहां दूध नदियों में बहा
वहाँ एक न्यूज़ चैनल ने कहा
कि आपके घर में आने वाला दूध
ज़हर हो सकता है
बताइए जनाब क्या इससे भी अधिक
कोई कहर हो सकता है
आप साबुन के विज्ञापन में
माॅडल को दूध से नहाते दिखाते हो
अगर सारा ही दूध ज़हर है
तो आप साबुन के लिए
शुद्ध दूध कहाँ से लाते हो?
इन हालों आने वाली पीढ़ियों को
कृष्ण की कथा कैसे सुनाई जाएगी
क्या शुद्ध दूध का स्वाद चखने के लिए
बच्चों को साबुन खिलाई जाएगी।
पत्ता गोभी में एक कीड़ा पाया जाता है
जिसके कारण ब्रेन में होल होता है
काजू में कोलेस्ट्रोल होता है
दातुन करने से कमज़ोर होते हैं दाँत
मिठाई खाने से ख़राब होती हैं आँत
देशी घी से फेल हो सकता है हार्ट
इन्हीं बातों के दम पर तो चल रहे हैं
बड़े बड़े वाॅलमार्ट
यदि वो हमारी सुराही को ख़राब नहीं बताते
तो अपना वाटर कूलर कैसे बेच पाते
यदि इंडियन आदमी यूँ ही दीवाना रहता
आम और नीबू के अचार का
तो भट्टा ही बैठ जाता
जैम और जैली के व्यापार का
पाँच रुपए प्लेट के छोले कुल्चे से
यदि हमें नहीं डराया जाता
तो उनका डेढ़ सौ रुपए का पिज़्जा कौन खाने जाता
एक्चुअली हमारी जिस-जिस परंपरा में बाज़ार है
वो-वो परंपरा उन्हें स्वीकार है
और जिसमें संस्कृति की गंध है
मुहब्बत का घोंसला है
वो-वो उनके लिए ढकोसला है
इंडियन पब्लिक
पूरी दुनिया के व्यापारियों की एकमात्र होप है
इंडिया में मार्किट का बहुत बड़ा स्कोप है
इस स्कोप को ढूंढते हुए
जब कालीकट की बंदरगाह पर
तुमने उतारे थे काॅफी के जहाज
तब हमने तो नहीं किया था ऐतराज
आपका तो ये स्टाइल रहा है जनाब
पहले मुफ्त बाँट-बाँट के लगाते हो चाव
और फिर बढ़ा देते हो भाव
हम सदियों से
झाड़-फूस और जड़ी-बूटियों में
ढूंढते रहे हैं इलाज
लेकिन एलोपैथी ने सब कुछ बदल डाला है आज
ज़रा सा पेन हुआ नहीं
कि तुरंत कैप्सूल खाएंगी
एंटी बायोटिक और पेनकिलर पर
ज़िंदा रहने वाली बेटियाँ
प्रसव का दर्द सहना कैसे सीख पाएंगी
जब कोई काॅलेज का लड़का
इंडियन कल्चर को वेस्टर्न विकास से
कम तोल रहा होता है
तो उस समय वो नहीं बोलता
उसके पेट में पड़ा
बर्गर बोल रहा होता है
अब तो हमारे रहन-सहन पर
असर करने लगा है
लालच का कारोबार
हमें दो पल ठहर कर करना होगा विचार
आख़िर क्यों विदेशी कैक्टसों ने उखाड़ फेंके हैं
आंगन में लगे तुलसी और नीम
ये हमें निर्धारित करना होगा
कि हमें अपने बच्चों को
अंडरटेकर बनाना है
या महाबली भीम
नई पीढ़ी को जकड़ रहा
मानसिक ग़ुलामी का संकट
यूँ ही नहीं टलेगा
इसे भगाना भी होगा
केवल भारतीय गौरव
की बातें करने से काम नहीं चलेगा
भारतीय परंपरा को अपनाना भी होगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Hasya Kavita, Poetry
खाली बैठे पक गए हैं यार, कुछ लफड़ा करो
ज़िन्दगी लगने लगी बेकार, कुछ लफड़ा करो
इस कदर सूखा पड़ा है, देश भर के क्राइम में
भजन टेलीकास्ट होंगे, अब क्या प्राइम टाइम में
क्या रिपोर्टर सीख लें, ठुमरी, ग़ज़ल, कव्वालियाँ
एंकरों का नूर सारा पी गईं खुशहालियाँ
ओ बड़े लोगों के बरखुरदार, कुछ लफड़ा करो
बात तो छेड़ो, बतंगड़ हम बना देंगे जनाब
फूक मारो, उसको अंधड़ हम बना देंगे जनाब
कोई नेता बेवजह की बात क्यों बकता नहीं
क्या कोई मंत्री यहां, घोटाला कर सकता नहीं
मीडिया से डर गई सरकार, कुछ लफड़ा करो
जातिवादी आग वाला एक दंगा ही सही
या किसी बिल पर बिना मतलब अड़ंगा ही सही
प्याज की कीमत बढ़ा दो, तेल को मंदा करो
शेयरों का खेल खेलो, गोल्ड का धंधा करो
हाय स्टेबल हो गया बाज़ार, कुछ लफड़ा करो
सबको सेटिस्फाई क्यों करने लगा बाज़ार भी
बिन बहस बढ़ता नहीं, टीआरपी का ग्राफ भी
सनसनी के फेस पर मनहूसियत सी छा गई
पूज्य भ्रष्टाचार जी को कौन डायन खा गई
मर गए क्या देश के गद्दार, कुछ लफड़ा करो
हाय रे फैशन जगत् कैसा रिसाला पढ़ गया
सुंदरी के पब्लिकल चुंबन पे ताला जड़ गया
कोई कास्टिंग काउच का मसला-मसाला भी नहीं
कोई एमएमएस किसी ने क्यों उछाला भी नहीं
बोर सा लगने लगा अख़बार, कुछ लफड़ा करो
एक तो लफड़े बिना, ख़बरें ख़तम होने लगीं
और कमर्शियल ब्रेक की इनकम भी कम होने लगी
आंकड़ों के खेल की पुड़िया असर करती नहीं
मीडिया विश्लेषकों की दाल अब गलती नहीं
पत्रकारों का चले घर बार, कुछ लफड़ा करो
जब से पूरे मुल्क में फैला हुआ आनंद है
आउटपुट एडीटरों की आउटगोइंग बंद है
हम समझते थे कि बस हम ही यहां चंगेज़ हैं
हम बताते थे कि हम दुनिया में सबसे तेज़ हैं
आज अपनी रुक गई रफ्तार, कुछ लफड़ा करो
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
पिछले दिनों फैशन टीवी पर यह कहकर प्रतिबंध लगाया गया कि उस पर फैशन कार्यक्रमों की आड़ में अश्लीलता परोसी जा रही है। प्रतिबंध लगा और हट भी गया; लेकिन इससे किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। क्योंकि अब हमारे देश का दर्शक वर्ग उत्तेजक दृश्यों के लिए कुछ गिने-चुने अंग्रेज़ी चैनल्स पर ही निर्भर नहीं रह गया है। न्यूज़ मीडिया ने अंग्रेज़ी चैनल्स के एकाधिकार को समाप्त कर दिया है। अपराध बुलेटिनों के नाम पर रोज़ रात को सोने से पहले किसी के यौन-शोषण, अश्लील एमएमएस, बलात्कार, अवैध सम्बन्ध, देह व्यापार और बार डांस की घटनाओं का जो परत-दर-परत विश्लेषण दिखाया जाता है वह देश में वीटीवी, एमटीवी, एफटीवी और इस प्रकार के अन्य विदेशी चैनल्स के महत्व को कम करने के लिए पर्याप्त है।
जो कुछ क़सर इस क्षेत्र में बाक़ी थी भी उसको पूरा करने के लिए देश भर के सिने कलाकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रसेवा की भावना से भर कर मीडिया का साथ देने का निश्चय किया है। जिस दिन दुर्भाग्यवश उक्त क़िस्म की कोई घटना प्रकाश में आने को तैयार नहीं होती उस दिन कोई न कोई सेलिब्रिटी किसी न किसी कार्यक्रम में किसी न किसी सेलिब्रिटी को चूम लेती है, और हो जाता है संकट का समाधान। इस प्रकार यौन-विषयों पर शोध कर रहे आधुनिक वात्स्यायनों की भीष्म प्रतिज्ञा खंडित होने से बाल-बाल बच जाती है। यदा यदा हि यौनस्य, ग्लानिर्भवति चैनलः…….
कुल दस सेकेण्ड के चुम्बन कांड को 13-14 घंटे तक कैसे दिखाना है इस कार्य में हमारे मीडिया ने वीरगाथा काल के कवियों से विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया है। पहले डेढ़-दो घंटे तक चुम्बन दृश्य का रीप्ले होता है और पीछे से एंकर की आवाज़ रनिंग कमेंट्री की तर्ज पर निरंतर सुनाई देती है- ”आप देख सकते हैं कि किस प्रकार ‘सरेआम’ शिल्पा शेट्टी को अअअ….. आलिंगन में भरते हुए ‘किस्स्स’ किया रिचर्ड ने। (रीप्ले) ….एक बार फिर हम अपने दर्शकों को दिखा रहे हैं ताज़ा तस्वीरें पूरे घटनाक्रम की….. एड्स अवेअरनेस का कार्यक्रम था जिसमें रिचर्ड ने मंच पर ही ‘सरेआम’ शिल्पा शेट्टी को किस किया। (रीप्ले) …..एक बार फिर से देखिए वो तस्वीरें जिसमें मुस्कुराते हुए रिचर्ड गेरे बिना किसी हिचकिचाहट के ‘सरेआम’ शिल्पा शेट्टी को चूम रहे हैं…………….. किसी भी तरह की कोई झिझक या तनाव नहीं दिखाई दे रहा है शिल्पा के चेहरे पर।“
इस प्रकार जब उस दृश्य को देखकर बोले जा सकने वाले तमाम वाक्य दर्शकों को कंठस्थ हो जाते हैं तब तक गैस्टगण स्टूडियो में पहुँच चुके होते हैं। फिर इस मुद्दे पर ज़बरदस्त बहस होती है। फिर उन लोगों से सम्पर्क किया जाता है जो बुद्धिजीवी होते हुए भी कुछ विशेष आर्थिक कारणों से स्टूडियो तक नहीं पहुँच सके। उसके बाद सीन पर मौजूद हस्तियों से सम्पर्क साधा जाता है। और ख़बर के सभी पक्षों का मत जानने के लिए घटनास्थल पर मौजूद पत्रकार कार्यक्रम मंे मौजूद दर्शकों से बातचीत करता है-
“आप उस समय कार्यक्रम में मौजूद थे जब रिचर्ड ने शिल्पा को किस किया?”
“जी हाँ। मैं उस समय आगे से दूसरी पंक्ति में आठवीं कुर्सी पर पैर ऊपर करके बैठा था। और उस समय मेरी गर्दन…….”
“तो आप यह बताइये कि कैसे हुआ ये सारा घटनाक्रम?”
“…..बस शिल्पा शेट्टी ने रिचर्ड गेरे को मंच पर बुलाया और फिर रिचर्ड गेरे ने आकर शिल्पा शेट्टी का हाथ पकड़ लिया और फिर उसको अपनी ओर खींच लिया और गले लगा लिया जी। अजी शिल्पा शेट्टी चाहती तो उस अंग्रेज को थप्पड़ मार सकती थी लेकिन जी उसको तो इस सबकी आदत है जी।”
इसके बाद पत्रकार और एंकर के बीच कुछ अध्यक्षीय स्तर की बातचीत होती है। इस प्रकार 12-13 घंटे के कठोर परिश्रम के बाद पत्रकारों का पूरा दल प्रदत्त विषय पर पूरा शोधग्रंथ तैयार कर देता है।
ऐसा ही एक अन्य उदाहरण पिछले दिनों एक दक्षिण भारतीय अभिनेत्री के अश्लील एमएमएस का हो सकता है। किसी मसाज पार्लर में बने इस एमएमएस का शालीनीकरण कर सभी न्यूज़ चैनल्स ने प्रसारित किया। इस के साथ ही सनद स्वरूप उक्त अभिनेत्री के किसी पुराने एमएमएस की भी झलक दिखाई गई जिसमें उसको नहाते हुए दिखाया गया था। इन दोनों ही कार्यक्रमों को प्रसारित करते समय स्क्रीन के कुछ हिस्सोें को अर्द्धपारदर्शी पट्टी से ढँक दिया गया था और साथ ही हैडर और फूटर में उन वेबसाईट का नाम दिया गया था जहाँ से न्यूज़ चैनल्स ने उक्त क्लिप्स ‘साभार’ प्राप्त की थी।
यह तो था प्रदर्शित सत्य। लेकिन इन दृश्यों के साथ वेबसाइट्स का नाम देने के पीछे एक मूक संदेश था- “प्रिय दर्शको! कुछ अनर्गल कानूनों की वजह से हम आपको ये दृश्य पूरी तरह नहीं दिखा पा रहे हैं। इसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। लेकिन आपकी सुविधाओं और रुचियों का ध्यान रखते हुए हमने इस कार्यक्रम का प्रसारण ऐसे समय पर किया है जब सभी सरकारी कार्यालय बन्द हो चुके हैं। सो इससे पहले कि हमारे चैनल पर प्रसारित होने के कारण इस ख़बर पर कोई कार्रवाई हो और सरकार उक्त वेबसाइट को बैन कर दे, आप तुरन्त अपना इन्टरनेट खोलिए और इन क्लिप्स को डाउनलोड कर लीजिए। आपके पास पूरे 12 घंटे का समय है। आपका समय शुरू होता है अब…… काल करै सो आज कर, आज करै सो अब, पल में एक्शन होएगा, लाॅगिन करेगा कब।“
राखी सावंत, मल्लिका शेरावत, नेहा धूपिया, बिपाशा बासु, करीना कपूर, इमरान हाशमी, मिक्का, शाहिद कपूर, शक्ति कपूर, अनारा गुप्ता और अन्य समाज सेवक जब तक मौजूद हैं तब तक मीडिया का यह शोध अनवरत ज़ारी रहेगा।
दरअसल ऐसी की ख़बरों में समाचार चैनल्स की विशेष रुचि का कारण यह है कि इस क़िस्म की एक ही ख़बर मीडिया के तीनों लक्ष्यों (शिक्षा, सूचना और मनोरंजन) को लक्ष्य करती है। समाचार जगत की अन्य किसी विधा में इतना बूता नहीं है।
इस सारी समीक्षा का लब्बोलुआब यह है कि हमारा मीडिया पूरी तरह जागृत है और मैच्योर हो गया है। यही कारण है कि अपने बचपन के दौर में भारतीय पत्रकारिता देशभक्ति के गीत गाती थी, और यौवन आते ही मीडिया काॅलेज लाइफ को एन्ज्वाय करने लगा है सो देशभक्ति की बोर और बचकानी बातों की संकीर्ण मानसिकता से बाहर आकर ग्लोबल वे में उन विषयों पर खुलकर चर्चा करने लगा है जिन्हें छूना बच्चों के लिए निषेध होता है। शरीर विज्ञान की भाषा में कहें तो मीडिया में अब हार्मोनल चेंज आ गए हैं।
✍️ चिराग़ जैन