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प्रेस पर प्रतिबन्ध

प्रेस लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। इस पर प्रतिबन्ध भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को जड़ करने जैसा है। लोकतंत्र जब तानाशाही में तब्दील होने लगता है तब मीडिया को चाटुकार बनाने की अपेक्षा रख बैठता है। -ऐसे अनेक सुगढ़ वाक्य मीडिया के समर्थन में सरकार को लानत भेज रहे हैं।
मैं सरकारी कार्रवाई के पक्ष में नहीं हूँ। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह लग गया तो लोकतंत्र में श्वास लेना दूभर हो जाएगा। किन्तु एक बार हमें इस बात पर भी पुनर्विचार करना चाहिए कि क्या मीडिया वास्तव में जनहित और लोकतान्त्रिक मूल्यों को सर्वोपरि रखकर कार्य कर रहा है। कई बार तो ऐसा लगता है कि जिन सिद्धांतों को सर्वोपरि रखना था उन्हें ताक पर रख दिया गया है। टीआरपी और सबसे तेज़ की होड़ ने तथ्यों के गाम्भीर्य और पुष्टि की अवधारणा को तार-तार कर दिया है।
उत्तरदायित्व और नैतिकता को व्यावसायिक स्वार्थों ने लील लिया है। आयकर में 30 प्रतिशत की कर सीमा में भी जो पत्रकार शामिल नहीं हैं उनकी कोठियाँ कैसे बन गईं, जो स्ट्रिंगर चैनल की आईडी लेकर रियल एस्टेट में घुसता है वो ऐसा क्या कमाल करता है कि उसे फ़्लैट की चाबी अलॉट हो जाती है, ऐसा क्यों होता है कि अचानक एयर इण्डिया के खिलाफ रोज़ ख़बरें प्रकाशित होने लगती हैं (फ्लाइट डिले की नार्मल घटना को भी बुलेट मिलता है) और फिर अचानक एक दिन एयर इंडिया की ख़बरें छपनी बंद हो जाती हैं; पॉवर हाउस में कोयला ख़त्म हो जाता है, सभी चैनल्स कोयले की कमी का हंगामा बरपा देते हैं और फिर अचानक बिना लाइट गुल हुए खबर ग़ायब हो जाती है; गौहत्या और गौरक्षक जैसे मुद्दे मीडिया पर रम्भाने लगते हैं फिर बिहार चुनाव संपन्न होते ही सभी गायों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है; मोदी जी की नेपाल यात्रा से पहले कोसी में बाढ़ का हड़कंप मचता है फिर मोदी जी नेपाल जाकर लिटमस कागज़ की भूमिका निभा आते हैं; अंतरिक्ष से कोई उल्कापिंड गिरता है तो हंगामा खड़ा होता है फिर मीडिया उसे कैच करके धरती को तबाही से बचा लेता है। -इन सब प्रश्नों पर कोई सवाल उठाने वाला नहीं है।
जो चैनल सरकार के चाटुकार हैं उनको कहीं भी कुछ भी शूट करने की इजाज़त है लेकिन जिनमे सरकारी आलोचना की प्रवृत्ति है उनको प्रसारण की भी आज्ञा नहीं है। हम किस व्यवस्था में जी रहे हैं भाई? जज फैसलों की दिशा मोड़ने केलिए रिश्वत लेते पकडे जा रहे हैं, राजनीति ढिठाई और सत्तासुख की अंधी होड़ में किसी भी सीमा तक जाने को तैयार है, पुलिस चौराहों पर सर-ए-आम जनता की जेब में हाथ डाल कर वसूली कर रही है, मीडिया ख़बरों की दलाली कर रहा है। इस नपुंसक व्यवस्था में राष्ट्रप्रेम और राष्ट्र के शक्तिबोध जैसी बातें करनेवाले भौंडे लगते हैं।
एक NDTV को प्रतिबंधित करना सरकारी तानाशाही का प्रमाणपत्र है। नैतिकता का मापदंड हो तो भूत-प्रेत, अन्धविश्वास, अराजकता, असत्य और गैर-ज़िम्मेदाराना ख़बरें चलाने के ज़ुर्म में लगभग सभी चैनल सीखचों के पीछे हो जाएं।
न्यायालय में विचाराधीन किसी मुआमले पर चर्चा करने का अधिकार मीडिया को किसने दिया? अधकचरे ज्ञानी एंकर बनकर देश की संज़ीदा विषयों पर फैसला सुनाने लग गए हैं। जनता को चैनल पर खुली धमकी दी जाती है कि अगर हमारे पत्रकार को कुछ कहा तो हम तुम्हारी ज़रूरत के मुद्दे दबा देंगे। किस व्यवस्था की बात की जाय साहब।
पूरे कुँए में भांग पड़ी है। माखनलाल चतुर्वेदी, जुगल किशोर, गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रभाष जोशी और सुरेन्द्र प्रताप सिंह अपने सींचे पौधों पर दलाली के फल लगते देखकर दुआ मांगते होंगे कि हे ईश्वर इन मीडिया संस्थानों को बंद करवा दो।

✍️ चिराग़ जैन

गाली-गलौज का स्वर्णकाल

देश में गाली-गलौज का स्वर्णकाल चल रहा है। उत्तर प्रदेश के चुनावी दंगल का आगाज़ उत्तर प्रदेश की विविध सांस्कृतिक गालियों के साथ हुआ। भारतीय जनता पार्टी, जिसने ख़ुद ही अपने सिर पर सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा का सेहरा लपेट रखा है, उसने पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से लुप्त हो रही गालियों के संरक्षण के उद्देश्य से एक ‘पुरावैदिक कालीन गाली’ सुश्री मायावती को भेंट की। उससे प्रभावित होकर दलित समर्थकों ने ‘पौराणिक युग’ की याद दिलाई और शूर्पणखा की नाक काटने और द्रौपदी का चीरहरण करने की धमकी दे डाली। फिर वही हुआ, जो होना था। मास-सिम्पैथी का रुख सुग्रीव की ओर मुड़ गया और सुग्रीव किष्किन्धा का सिंहासन छोड़कर ऋष्यमूक पर्वत की कंदराओं में मूक होकर बैठ गया।
मायावती ने द्रौपदी को जंघा पर बैठाने की पेशकश को ‘सबक सिखाने के लिए किया गया कृत्य’ घोषित करते हुए अपनी आँखों पर पट्टी बांधकर स्वयं को गांधारी सिद्ध कर दिया। इस बीच कुछ अर्जुनों ने गाली बकनेवाले जयद्रथ की ज़ुबान काटने की इनामी प्रतिज्ञा कर ली।
राजनीति की इस महाभारत में कांग्रेस के दो लीडरों ने मिलकर बड़ी मेहनत से केंद्र सरकार के लिए ‘कचरा’ जैसा शब्द प्रयोग किया और गालियों के इस सेतुनिर्माण में गिलहरी की भूमिका अदा कर दी। कांग्रेस के इस कृत्य से आभास हुआ कि यदि कांग्रेस ने राजीव जी द्वारा दिए गए कम्प्यूटर का प्रयोग किया होता तो आज उन्हें एक-47 के युग में खुखरी से काम न चलाना पड़ता। मीडिया ने शकुनि बनकर इस महासमर में शांति की संभावनाओं को प्राइम टाइम बुलेटिन की चौसर पर ध्वस्त कर दिया और कानून ने धृतराष्ट्र की भूमिका प्राप्त करने के लिए अपनी आँखें फोड़ लीं।
इस दौर का एक बड़ा लाभ यह हो रहा है कि जो नई पीढ़ी फिल्मों से सीखकर ‘शिट’; ‘फ़क’; ‘एस्सहोल’ और ‘बुलशिट’ जैसे पाश्चात्य शब्दों को भाषा का स्टेटस सिम्बल समझने लगी थी उसको कम से कम यह तो पता चल रहा है कि भाषाई अलंकरण में हमसे आगे दुनिया में कोई नहीं हो सकता।
हमने ऐसे-ऐसे शब्दों से अपनी भाषा को समृद्ध किया है, जिनका सौंदर्य देखते ही बनता है। हमने किसी को अपमानित करने के लिए कभी भी अपनी जिव्हा पर ‘शिट’ जैसी गन्दी चीज़ नहीं रखी। ‘कमीन’; ‘नीच’; ‘चाण्डाल’; ‘कुत्ता’ और ‘सूअर’ जैसे शब्दों को गाली के रूप में मान्यता देकर हमने कई पीढ़ियों तक प्रेम-प्रदर्शन का मार्ग प्रशस्त किया है। ‘हराम’ जैसा शब्द तो हर आम आदमी के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है।
इस देश के प्राथमिक स्कूलों के विद्यार्थी आज भी आधी छुट्टी में इस विषय पर संगोष्ठी करते मिलते हैं कि ‘साला’ गाली है या नहीं। वे अबोध समझते हैं कि जिन शब्दों को मास्टरजी और पापा सामान्य व्यव्हार में प्रयोग करते हैं, वे गाली कैसे हो सकते हैं। अब उन्हें कौन समझाए कि इस शब्द में मौजूद अन्योक्ति अलंकार ने कितनी सरलता से हमारी सामाजिक मर्यादा के बावजूद दिल की बात ज़ुबान पर लाने का जरिया किया है।
माँ, बेटी और बहन से शुरू होनेवाले शब्द युग्मों ने अपनी लयात्मकता के सहारे आम बोलचाल की भाषा में ख़ुद को खपा लिया है। हाँ इधर कुछ लोग पुरुष देहयष्टि को स्त्री अंगों के साथ गड्ड-मड्ड कर कुछ अपभ्रंश शब्दयुग्मों का प्रयोग करने लगे हैं। इस प्रवृत्ति ने विश्व को ट्रांसजेंडर नाम के एक नए समुदाय की सौगात दी।
मानवता का विकास लिखने से पहले गालियों के विकास का गहन अध्ययन आवश्यक है। शिशुपाल ने कुल सौ गालियों से कृष्ण के जाम पड़े चक्र को गति दी थी। आज भी जब इस देश में चक्काजाम की स्थिति आती है तो जनता गालियों की ग्रीसिंग करके ही उसे गति देती है।
उत्तर प्रदेश के वर्तमान राजनैतिक माहौल ने हमारा ध्यान इस पुरातन परम्परा की ओर आकृष्ट किया है। मैं मन ही मन गाली बकते हुए उनका आभार व्यक्त करता हूँ।

✍️ चिराग़ जैन

ख़बर का असर

जेब में दस का नोट लेकर भीखू छोले-कुल्चे के ठेले पर पहुँचा और बोला- “दस रुपये के छोले कुल्चे दे दो।”
ठेले वाला मुस्कुराकर बोला – “दस रुपये में छोले कुल्चे नहीं आते।”
भीखू उदास होकर पान की दुकान तक आया और टीवी पर चल रहा न्यूज़ बुलेटिन देखने लगा। पत्रकार बता रहा था कि भारत की विदेशमंत्री तीन दिन के दौरे पर जापान जा रहे हैं। ख़बर पढ़ते हुए समाचार वाचक के चेहरे पर जो ख़ुशी थी उससे भीखू को लगा कि अब शायद बात बन जाएगी। वह दौड़कर खोमचे पर पहुँचा और बोला – “लो भैया, विदेश मंत्री देश के विकास पर चर्चा करने जापान गई हैं, अब तो दस रुपये के छोले-कुल्चे आ जाएंगे?”
“अबे पगला गया है क्या?” …खोमचे वाला झल्ला उठा। …”उसके जापान जाने से मेरे ठेले का क्या लेना देना?”
भीखू अपना सा मुंह लिए वापस बुलेटिन देखने लगा। एक संवाददाता चीख-चीख कर उत्तेजना में बोल रहा था कि फलाने मंत्री के बयान पर विपक्ष ने दो दिन संसद का कामकाज नहीं होने दिया, लेकिन अभी-अभी ख़बर मिली है कि उस मंत्री ने अपने बयान पर खेद प्रकट कर दिया है और विपक्ष ने संसद चलने देने का आश्वासन दिया है।”
भीखू ख़ुश होकर फिर से ठेले तक पहुँचा और दुखी होते हुए फिर से वापस लौट आया।
बुलेटिन अभी भी चालू था। काफ़ी कुछ हुआ उस बुलेटिन में। एक नई फ़िल्म का ट्रेलर रिलीज़ हुआ; एक निजी चैनल के सर्वे से ये पता चला कि केंद्र सरकार की लोकप्रियता बढ़ रही है; यह भी पता चला कि रामायण युग की किष्किन्धा में आज भी सुग्रीव और बाली के सिंहासन सुरक्षित रखे हैं; एक अभिनेता को कोर्ट ने बरी भी कर दिया; एक समुदाय को सामूहिक रूप से अपना त्यौहार मनाने की इजाज़त भी मिल गई; एक विधायक ने रिजॉर्ट में प्राणायाम भी किया; एक संत को राममंदिर के शिलान्यास में शामिल होने का न्यौता भी मिल गया और एकाध अफ़सरों के तबादले भी हो गए।
इतना सब कुछ होने के बावजूद भीखू की जेब में पड़े दस के नोट की पहुँच में भूखा पेट भरने की जुगत न आ सकी। शाम हो गई। भूख ने भीखू की ऊर्जा पचा ली। अंतड़ियां सिकुड़ गईं। दिमाग़ थक गया।
छोले कुल्चे वाला अपना खोमचा समेट कर जा चुका था। भीखू ने सड़क किनारे पड़ा अख़बार का एक टुकड़ा उठाया और खा गया। मैंने उसे अख़बार चबाते देखा और पूछा – “क्यों भई, अख़बार में भी कोई स्वाद है क्या?”
भीखू अख़बार पर लिसड़ा हुआ मसाला दिखाते हुए बोला – “अख़बार तो बेस्वाद है भाईसाहब, लेकिन मसाले में मज़ा आ गया।”
जो अख़बार भीखू खा रहा था उसी के तीन दिन बाद के संस्करण में छोटा सा समाचार छपा था – “राजधानी दिल्ली के अमुक इलाके में एक चालीस-बयालीस वर्ष के विकलांग की लावारिस लाश मिली है। उसकी जेब में दस रुपये का एक नोट बरामद हुआ है। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में इस शख़्स की मौत की वजह भूख बताई गई है।”
जब पुलिस भीखू का पंचनामा कर रही थी तब पनवाड़ी की दुकान पर रखे टीवी पर समाचार चल रहा था कि विदेश मंत्री ने जापान के साथ अनेक महत्वपूर्ण डील्स पर हस्ताक्षर किये।

✍️ चिराग़ जैन

आग की ख़बर

अगर इस आग को बढ़ने से रोकना चाहे
तो अपने मुल्क़ को इस आग की ख़बर से बचा

मीडिया की ख़बरों की भूख किस हद तक इस देश की रीढ़ में दीमक की भूमिका अदा कर रही है; इसका अगला उदाहरण है कन्हैया कुमार। कोई भी शख़्स अराजकता के उदाहरण प्रस्तुत करके सुर्ख़ियाँ बटोरे, राष्ट्रीय अस्मिता की लाश पर पाँव रखकर लाइम लाइट में आए और मीडिया द्वारा बने जन समर्थन के आधार पर “बेचारा” अथवा “पीडित” बनकर जेल से बाहर आकर देशभक्ति की जुमलेबाज़ी करे और हीरो बन जाए। और सफ़र सिर्फ़ यहीं ख़त्म नहीं होगा। अचानक से मिली पब्लिसिटी से फूल कर जब यह सद्यजात देशभक्त मीडिया को गाली बके तो यही मीडिया पाला बदल कर उसके पीछे पड़ जाए।
ऐसा क्या हो गया इस देश में कि अख़बार के बैनर से लेकर प्राइम टाइम तक सिवाय कन्हैया कुमार कुछ बचा ही नहीं। और कन्हैया भी वो जो अपने भाषण के दौरान जब मीडिया का धन्यवाद ज्ञापन करता है तो उसमें प्राइमटाइम पर छा जाने की गर्वोक्ति व्यंग्य की शक्ल लेकर उभरती है, जिसे सुनकर वहाँ बैठे अन्य देशभक्त ठहाका लगाते हैं। पूरे देश की मीडिया एक विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष की पीसी कवर करने के लिये ओबी लेकर रिरियाने लगेगी तो कौन स्थितप्रज्ञ रह सकेगा।
“वो बहुत अच्छा बोलताहै”; “वो सबको धो देता है”; वो नया लीडर है” आदि आदि… इन जुमलों को वे समाचार प्रस्तोता और पत्रकार मंत्र की तरह जप रहे हैं, जिन्हें हमने इस देश में सूचनाएँ पहुँचाने का दायित्व सौंपा है।
वो कैसा बोलता है, इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण होना चाहिये कि वो क्या बोलता है। एक तरफ़ वह कहता है कि उसे असमानता से आज़ादी चाहिये। दूसरी तरफ़ वह कहता है कि उसे संघवाद से एलर्जी है। एक तरफ़ उसे बोलने की आज़ादी चाहिये दूसरी तरफ़ वह दक्षिणपंथियों को ख़ामोश कर देना चाहता है। एक तरफ़ वह जातिवाद और लिंगभेद से मुक्ति चाहता है, दूसरी तरफ़ वह जातीय आधार पर सुनिश्चित दलितों को प्राथमिकता देना चाहता है।
क्यों भई, समानता की कौन सी सार्वभौमिक परिभाषा में किसी को भी विशेष मानने की वक़ालत मिलती है। कहाँ लिखा है कि दक्षिणपंथी विचारधारा का कोई भी शख़्स किसी भी स्थिति में कोई सही बात बोल ही नहीं सकता।
एक तरफ़ तुम स्वयं को इस देश के हितों का वक़ील घोषित करते हो दूसरी तरफ़ आप आँखो पर पट्टी बांध कर कहते हो कि उमर और अनिर्वाण पर देश द्रोह का मुक़द्दमा इसलिये नहीं चलाया जाना चाहिये क्योंकि जेएनयू का कोई भी विद्यार्थी देशद्रोह होही नहीं सकता। एक तरफ़ आपको इस देश के क़ानून में विश्वास है, दूसरी तरफ़ आप न्यायालय को लगभग चेतावनी देते हुए कहते हैं कि देशद्रोह क़ानून का ग़लत इस्तेमाल नहीं होना चाहिये। अगर तुम्हें इस देश के क़ानून में विश्वास है तो गिरफ़्तारी के बाद तुम्हारी परछाई पकड़ कर लोकप्रियता का बैकुण्ठ तलाशते कुर्ताधारकों को सड़कों पर उतरने की क्या ज़रूरत थी।
तुम इस देश कीराजनीति से निराश नहीं हो कन्हैया। तुम भाजपा, संघ, एवीबीपी और पूरी दक्षिणपंथी विचारधारा के ख़िलाफ़ हो। तुम तथ्य उद्घटित करो, उसमें कोई किसी भी विचारधारा का व्यक्ति अपराधी सिद्ध होकर शीशे में उतरता हो तो स्वीकार है, लेकिन किसी को सिर्फ़ इसलिये अपराधी कहकर उसका मख़ौल नहीं उड़ाने दिया जा सकता कि वह राष्ट्रवादी है।
ये तुम्हारी सोच होगी मिस्टर कन्हैया कुमार, कि जेएनयू का कोई विद्यार्थी देशद्रोही हो ही नहीं सकता। हम इस देश की मूल आत्मा के पक्षधर हैं। हम उन उदाहरणों का अनुकरण करते हैं कि सगा भाई भी अपराधी हो तो उसका विरोध करना हमारा धर्म है।
तुम कहते हो कि स्मृति ईरानी जेएनयू को फ़ैलोशिप देती रहतीं तो उनके ख़िलाफ़ मुर्दाबाद के नारे नहीं लगते। इस बात को खुली धमकी न माना जाए तो और क्या कहा जाएगा। मतलब जो तुम्हें पैसे देगा, वो ज़िंदाबाद और जो नहीं देगा वो मुर्दाबाद। शर्म करो मिस्टर कन्हैया कुमार्। चंद पैसों के लिये किसी की ख़िलाफ़त करने वाले लोग इस मुल्क़ के ख़िलाफ़ कितनी आसानी से खड़े हो सकते हैं; इसकी पोल तुम ख़ुद खोल रहे हो। ख़ैरातों को अधिकार मानने की आदत डाल तो ली है तुमने, इस आदत से बच कर रहना। इन आदतों की नींव पर खड़े किलों की दीवारों का खोखलापन अक्सर ख़ुद ही चीख़-चीख़ कर बता देता है कि हमारे सहारे मत खड़े होना, हम बहुत जल्दी ढह जाएंगे।

✍️ चिराग़ जैन

हर त्योहार हर रोज़

आज एक टीवी चैनल पर समाचार प्रस्तोता टाइम पास करने के लिए बोल रहा था कि ये दुर्भाग्य की बात है कि हम लोग साल में कुछ ही दिन देशभक्ति के गीत गाते हैं। हम साल में एक ही दिन शहीदों को याद करते हैं। मुझे उसकी बात सुनकर लगा कि सचमुच करते तो हम ग़लत ही हैं। यह परंपरा बंद होनी चाहिए।
मैं प्रधानमंत्री जी को एक पत्र लिखकर अनुरोध करूँगा कि वे अपनी दिनचर्या बदलें। उन्हें चाहिए कि वे रोज़ सुबह उठकर सबसे पहले अमर जवान ज्योति, राजघाट, विजयघाट, शक्तिस्थल और शांतिवन पर पुष्प चढ़ाते हुए लालकिले जाएं। वहाँ झंडारोहण करके राष्ट्र को संबोधित करें। उसके बाद सीधे विजय चौक पहुँचकर गणतंत्र परेड में सम्मिलित हों। उसके बाद देश को ईद-उल-फ़ित्र, ईद-उल-जुहा, ईद-ए-मिलाद, मिलाद-उल-नबी, शब्-ए-बारात, मुहर्रम, होली, दीवाली, बिहू, ओणम, पोंगल, रक्षाबंधन, हरियाली तीज, मकर संक्रांति, लोहड़ी, महावीर जयंती, रामनवमी, गुरुपर्व, बुद्ध पूर्णिमा, वसंत पंचमी, वाल्मीकि जयंती, जन्माष्टमी, दुर्गापूजा, गणेश चतुर्थी, पर्यूषण, विश्वकर्मा जयंती, ईस्टर, गुड फ्राइडे, रविदास जयंती, बैसाखी, अहोई अष्टमी, सकट चौथ जैसे सभी पर्वों की शुभकामनाएं दें। इसके बाद दोपहर का भोजन करें और फिर विवेकानंद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष, तिलक, अशफ़ाक़ुल्लाह खान, रामप्रसाद बिस्मिल, बिनोवा भावे, विपिनचंद्र पाल, लाला लाजपत राय, महाराणा प्रताप, वीर सावरकर, राजाराममोहन राय, पन्ना धाय, सम्राट अशोक, रणजीत सिंह, बिरसा मुंडा, कुँवर सिंह, खुदीराम बोस, स्वामी श्रद्धानंद, छत्रपति शिवाजी, और जो जो भी महान हैं उन सबके बलिदानों को याद कर गमगीन होकर बैठे रहें। वहां से निवृत्त होकर रामलीला मैदान पहुंचें और हवा में तीर छोड़कर बुराई पर अच्छाई की विजय के पर्व को याद करें। वहां से जामा मस्जिद पहुँच कर दावत-इ-इफ़्तार में शामिल हों। और उसके बाद किसी गिरिजा में जाकर जीसस को जन्मदिन की बधाई देते हुए संता के कपड़े पहन कर बच्चों को उपहार बाँटने निकल पड़ें। रात भर उपहार बांटने के बाद सुबह फिर से फूल लेकर राजघाट की ओर निकल लें।
यदि हमारे प्रधानमंत्री जी रोज़ इस दिनचर्या का पालन करें तो कोई आहत होकर यह न कह पाएगा कि हम साल भर में सिर्फ़ एक दिन शहीदों को याद करते हैं, या हमें बुद्ध, महावीर, देश या समाज की याद साल में एकाध दिन ही आती है। और ऐसा करते हुए इस बात की बिल्कुल फ़िक्र न करें कि लोग रोज़ मेरी एक जैसी दिनचर्या देख कर बोर हो जाएंगे, क्योकि एक महीने बाद कोई दूसरा प्रधानमंत्री इस दिनचर्या को करता दिखेगा। उसके एक महीने बाद कोई और… और फिर कोई और और इन सब प्रधानमंत्रियों का योगदान भी रोज़ याद किया जाएगा।

✍️ चिराग़ जैन

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