Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
मौसम विभाग की भविष्यवाणी कमज़ोर साबित हुई। तूफान की गति और प्रचंडता बताने में मौसम विभाग निष्फल सिद्ध हुआ। ज्ञात हो कि मौसम विभाग के बताए गए समय से दो दिन पूर्व ही देश भर के मीडिया में तूफान कहर बरपाने लगा था।
टेलीविज़न चैनलों के संवाददाताओं और प्रस्तोताओं के चेहरे की बदहवासी से स्पष्ट हो रहा था कि तूफान भयंकर है और संवाददाता के ठीक पीछे दुबका हुआ है। चैनल के ग्राफिक आर्टिस्ट्स के दिलो-दिमाग़ में तूफान ने हंगामा मचाया कि उड़ती हुई धूल को गूगल से डाउनलोड करके भारतीय टच कैसे दिया जाए।
सोशल मीडिया पर भी तूफान की गति भयंकर थी। व्हाट्सएप्प पर ताज़ा अपडेट के टेक्सट तथा वीडियोज़ के ऊँचे बवंडर आवश्यक संदेशों को उड़ा ले गए। फेसबुक पर तूफानी चुटकुलों ने देश के अन्य मुद्दों के हज़ारों पेड़ गिरा दिए।
महानगरों में किसी के टकराने से भी यदि किसी पेड़ में कुछ स्पंदन हुआ तो उसे रिकॉर्ड करके उतावलों ने तूफान सिद्ध कर दिया। कहीं-कहीं तो पेड़ के न हिलने की स्थिति में कैमरे को हिला-हिलाकर शूटिंग करके भी तूफान के वीडियो वायरल किये गए। रेडियो प्रस्तोताओं ने भी अपने श्रोताओं को फोन कर करके उनके घर के पर्दों का हिल्लन जँचवाया।
इस भयंकर अप्रकृतिक आपदा में कई सौ मीटर फुटेज बर्बाद हो गई। अड़तालीस से ज़्यादा घण्टों के मारे जाने की सरकार ने पुष्टि की है। सरकार ने चेतावनी जारी करते हुए सभी नागरिकों को किसी भी वास्तविक मुद्दे के सिर उठाने की स्थिति में ऐसे तूफान के प्रति सतर्क रहने को कहा है।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
कई बार ऐसा लगता है कि इस देश की स्थिति किसी कम्प्यूटर जैसी है। आप जो फाइल खोलते हो, पूरी स्क्रीन पर वही दिखाई देती है। फिर आप उसे क्लोज़ या मिनिमाइज़ करके दूसरी फाइल खोल लेते हो, तो पिछली फाइल की छाया तक नहीं बचती स्क्रीन पर।
इस कम्प्यूटर का ऑपरेटर दलित आंदोलन की फाइल खोल के बैठ गया तो पूरा देश फूंक दिया गया। कम्प्यूटर का प्रोसेसर जवाब दे गया। देश की रैम जाम हो गई। देश के हर राजनेता को दलितों की बेचारगी दिखने लगी। दो दिन तक यही फाइल खुली रही। जब फाइल में काम करने को कुछ न बचा, तो अगली फाइल खुलने के इंतज़ार में उसे खोले रखा गया।
तभी अचानक एक फिल्म अभिनेता को जेल हो गई। कम्प्यूटर स्क्रीन अभिनेता के वॉलपेपर्स से भर गई। जमानत याचिका पर सुनवाई न हो सकने के कारण बेचारे अभिनेता को कम से कम एक रात तो जेल में काटनी ही पड़ेगी। अब देश को लगा फिल्मस्टार का दर्द दलितों के दर्द से बड़ा है। हमने जोधपुर जेल का चप्पा-चप्पा छान मारा। इस अनुसंधान में वहाँ पहले से बंद एक बाबाजी मिल गए। हमने फिल्मस्टार और बाबाजी पर सेमी अश्लील चुटकुले गढ़े और अभिनेता के ज़ख़्मों पर मरहम लगाया।
यदि अभिनेता को जमानत मिल गई तो यही फाइल लम्बी चलेगी और जमानत नहीं मिली तो और लम्बी चलेगी।
नीरव मोदी, डाटा लीक, बुलेट ट्रेन, लिंगायत, पद्मावत, करणी सेना, पटेल आंदोलन, गुर्जर आंदोलन, जाट आंदोलन, श्रीदेवी की मृत्यु, बॉल टेम्परिंग, विजय माल्या, केजरीवाल की माफी, रोमियो स्क्वेड, राम मंदिर, तोगड़िया, राज्यसभा चुनाव, नरेश अग्रवाल, शमी की हसीना और मणिशंकर की गाली जैसी हज़ारों फाइलें हैं जो स्क्रीन कैप्चर करती रहीं और फिर अचानक ग़ायब हो गईं। कुछ फाइलें अपनी क्षमता से स्क्रीन पर छा जाती हैं तो कुछ को ऑपरेटर जान-बूझकर देर तक खोले रखता है।
ऑपरेटर जानता है कि यदि ये सारी फाइलें बन्द या मिनिमाइज़ कर दी गईं तो डेस्कटॉप का वॉलपेपर दिखने लगेगा जिस पर ‘प्रियोरिटीज़’ लिखी हुई हैं- रोटी…. कपड़ा… मकान… स्वास्थ्य… शिक्षा…. न्याय…. यातायात…. क़ानून…. सुरक्षा…. साफ़ हवा…. साफ पानी…!
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
हिंदी कवि-सम्मेलन भारतीय समाज में एक परंपरागत संचार माध्यम के रूप में प्रतिष्ठापित है। आधुनिक और अत्याधुनिक माध्यमों के प्रचलन से पूर्व ही कवि-सम्मेलनों ने भारतीय जनमानस में गहरी पैंठ बना ली थी। समय के साथ काव्यमंचों पर रासानुपत में परिवर्तन अवश्य हुए किन्तु ये सब परिवर्तन कवि-सम्मेलन के मूल स्वरूप के इर्द-गिर्द ही बने रहे।
प्रारम्भ में साहित्य और पत्रकारिता के हस्ताक्षर अलग-अलग नहीं थे किंतु समय के साथ ये दोनों ही क्षेत्र अलग चिह्नित किये जाने लगे। हिंदी की पत्रकारिता का तो उद्भव ही साहित्य के साधकों ने किया। माखनलाल चतुर्वेदी, गणेशशंकर विद्यार्थी, भारतेंदु हरिश्चंद्र, धर्मवीर भारती और अन्य तमाम ऐसे साहित्यकार हुए जिन्होंने भारत में पत्रकारिता की आधारशिला रखी। यह वह समय था जब साहित्य और पत्रकारिता को अलग करना असंभव जान पड़ता था।
बाद में “साहित्यिक पत्रकारिता” पत्रकारिता के बड़े क्षितिज का छोटा-सा अंश बनकर रह गई। इस कालखंड में प्रतिष्ठित साहित्यकारों को समाचार-पत्र के संपादन-मंडल में इसलिए स्थान मिलता था क्योंकि पत्र में नियमित प्रकाशित होने वाली कहानियां, कविताएं, संपादकीय, व्यंग्य और भाषा का स्तर पत्र की गरिमा तय करता था। धीरे-धीरे समाचार-पत्रों में साहित्य एक कोना मात्र बनकर रह गया। अधिकतर समाचार-पत्रों में यदा-कदा कोई कविता छापकर साहित्य की हाज़िरी लगा दी जाती थी और कुछ समूहों ने तो यह हाज़िरी भी बंद कर दी।
इसके बाद एक दौर ऐसा भी आया जब साहित्य, कविता, कहानी, नाटक और उपन्यास की कड़ियाँ समाचार-पत्रों में बाक़ायदा “बैन” हो गईं। कुछ संपादकीय मंडलों ने तो साहित्यिक गोष्ठियों, कवि-सम्मेलनों आदि की ख़बर तक प्रकाशित करने से परहेज किया। अंततः इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक की शुरुआत होते-होते देश के प्रमुख हिंदी दैनिक पत्रों से साहित्य-बीट ही समाप्त हो गई।
मीडिया की अनदेखी के इस दौर में दूरदर्शन एकमात्र ऐसा माध्यम बचा था जिससे प्रसारित होनेवाली काव्य-गोष्ठियों में साहित्य जीवित था। नववर्ष की पूर्वसंध्या पर प्रसारित होनेवाले रंगारंग कार्यक्रमों में हुल्लड़ मुरादाबादी, सुरेन्द्र शर्मा और शैल चतुर्वेदी जैसे चेहरे अक्सर दिखाई देते थे। अशोक चक्रधर और गोविंद व्यास ने दूरदर्शन की इन काव्य-गोष्ठियों में विविध प्रयोग किये। हर दूसरे मंगलवार को प्रसारित होने वाले ‘कहकहे’ कार्यक्रम में अशोक चक्रधर, सुरेश नीरव और सरोजिनी प्रीतम ने हास्य-कविता का नया अध्याय प्रारम्भ किया। अनेक कवियों की वर्तमान लोकप्रियता की नाल दूरदर्शन की इन्हीं गोष्ठियों में गड़ी हुई है। युवा काव्य-गोष्ठी, फुलझड़ी एक्सप्रेस और अन्य काव्य आधारित कार्यक्रम टेलीविज़न पर कवियों की हाज़िरी लगवाते रहे। दृश्य-श्रव्य संचार माध्यम पर यह उपस्थिति साहित्यिक अनुष्ठानों के मनोबल की दृष्टि से “डूबते को तिनके का सहारा” सिद्ध हुई।
बाद में सेटेलाइट टेलीविज़न की अतिवृष्टि में जैसे-जैसे दूरदर्शन के रंग फीके पड़े, वैसे-वैसे ही काव्य गोष्ठियों और अन्य साहित्यिक अनुष्ठानों के प्रचार-प्रसार का कारवां भी थम गया। शुद्ध व्यावसायिकता और ग्लैमर की तेज़ रौशनी में मसनद पर विराजित बिना संगीत-साज के कवि-सम्मेलन को मिसफिट करार दे दिया गया। देश भर में कवि-सम्मेलन होते रहे किन्तु मीडिया की फोकस लाईट का छोटा-सा घेरा कवि-सम्मेलन तक पहुँचने से कतराता रहा। NDTV ने कुमार संजोय सिंह के संचालन में “अर्ज़ किया है” शीर्षक से एक कवि-सम्मेलन की सर्जना की भी थी किन्तु इस प्रयास की यात्रा बहुत लम्बी न हो सकी। इसके तुरंत बाद डॉ अशोक चक्रधर ने SAB TV पर “वाह-वाह” प्रारम्भ किया। कवि सम्मेलन की परंपरागत छवि की तर्ज़ पर तैयार यह कवि-सम्मेलन एक नए भवन की नींव मजबूत कर गया।
इसी समय में STAR ONE पर द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज नामक एक कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ जिसने TRP के सभी रेकॉर्ड तोड़ डाले। इस कार्यक्रम में लतीफों और भाव-भंगिमा से लोगों को हँसाने की एक अपेक्षाकृत नवीन विधा की प्रतियोगिता का संयोजन था। इस कार्यक्रम को जब मीडिया के पुराने लोगों ने देखा तो वह साथी याद आया जिसे वे मसनद पर बैठा छोड़ आए थे।
“आउट ऑफ साइट, आउट ऑफ माइंड” में यक़ीन करनेवाले मीडिया ने कवि-सम्मेलन को लुप्त मान लिया था। इसलिए जब पीछे जाकर उसने कवि-सम्मेलन के सिर पर लगी फोकस-लाइट का स्विच ऑन किया तो वहाँ सब कुछ बदल चुका था। मसनद के गोल तकियों ने सोफे का रूप ले लिया था। कवियों का कुर्ता-पायजामा सूट-बूट में तब्दील हो चुका था। टैंट हाउस के माइक सिस्टम अब ग्लैमरस माइक्रोफोन और लेपल के आकार में ढल गए थे, दरी पर बैठे श्रोताओं की दरियां] कुर्सियां बन चुकी थीं और लोकल टैंटहाउस की व्यवस्थाएं भव्य ऑडिटोरियम में सुव्यवस्थित हो चली थीं।
इस दौर तक SAB TV पर अशोक चक्रधर द्वारा संचालित “वाह-वाह” का दर्शक वर्ग TRP के आंकड़ों में अपनी सम्मानजनक पहचान बना चुका था। उधर “जनमत” टीवी के माध्यम से दीपक गुप्ता और नीरज पुरी; टीवी इंडिया और दबंग टीवी से शैलेश लोढ़ा; तथा अन्यान्य चैनल्स से अरुण जैमिनी भी सेतुनिर्माण में गिलहरी के योगदान की कथा लिख रहे थे। विवेक गौतम के संचालन में “जैन टीवी” पर चल रहा “इंडिया कॉलिंग” लम्बा चला किंतु अपनी पहचान क़ायम करने में विफल रहा। साधना टीवी पर प्रवीण आर्य के संयोजन में चल रहे “कवियों की चौपाल” कार्यक्रम का उपक्रम भी बहुत फलदायी सिद्ध न हो सका।
इसी उठापटक के बीच सब टीवी को सोनी एंटरटेनमेंट जैसे बड़े समूह ने ख़रीद लिया और अशोक चक्रधर का “वाह-वाह” सुभाष काबरा के हाथों से होता हुआ शैलेष लोढ़ा के हाथों में आ गया। अनेक प्रयोग करने के बाद शैलेष जी ने इसे “वाह-वाह क्या बात है” शीर्षक से बिल्कुल नए प्रारूप में प्रारम्भ किया। ठीक इसी कालखण्ड में लाफ्टर चैम्पियन की अचानक से उभरी मांग का जादू धीमा पड़ने लगा था। और इसी दौर में नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर अन्ना आंदोलन में डॉ कुमार विश्वास की अग्रणी भूमिका ने उन्हें लोकप्रियता के शीर्ष पर ला खड़ा किया था।
वाह-वाह क्या बात है ने TRP के मोर्चे पर कवि सम्मेलन की महती उपस्थिति दर्ज की और कुमार विश्वास ने कवि सम्मेलनों को उस तबके तक पहुंचा दिया जिसको कविता से कोई ख़ास लेना-देना नहीं था।” वाह-वाह क्या बात है” के संचालक शैलेश लोढ़ा भी लोकप्रिय धारावाहिक “तारक मेहता का उल्टा चश्मा” के मुख्य पात्र के रूप में लोकप्रियता के प्रतिमान स्थापित कर चुके थे।
ऐसे संयोगों के बल पर SAB TV का “वाह-वाह क्या बात है” कवि सम्मेलनों के खोए हुए ग्लैमर का लॉन्चिंग पैड साबित हुआ। नए रूप-रंग और ग्लैमर के साथ प्रसारित होता परंपरागत कवि-सम्मेलन कॉर्पोरेट और मल्टी नेशनल्स को भी आकृष्ट करने लगा। उधर कुमार विश्वास की ख्याति भी कवि-सम्मेलनों की सिल्वर स्क्रीन प्रेजेंस के लिए प्रायोजक जुटाने में सहायक सिद्ध हुई।
इधर “वाह-वाह क्या बात है” के सौ से अधिक एपिसोड प्रसारित हो चुके थे, उधर धूमिल होते लाफ्टर शो के एक सादा से नुमाइंदे कपिल शर्मा ने एक कॉमेडी शो लांच करके भारतीय टेलीविज़न जगत के TRP अन्वेषकों को चौंका दिया। चूँकि कवि-सम्मेलन और लाफ्टर शो के स्वरूप में बहुत सी समानताएं हैं इसलिए इन दोनों प्रकार के कार्यक्रमों के श्रोतावर्ग का भी एक बड़ा हिस्सा समान ही है।
कपिल शर्मा के शो की टीआरपी के चलते कोई नया कार्यक्रम तो टेलीविज़न पर नहीं शुरू हुआ किन्तु कवि-सम्मेलन के प्रति उदासीन मीडिया का बर्ताव पूरी तरह बदल गया। टीवी न्यूज़-चैनल्स ने कवि-सम्मेलनों को अनियमित प्रसारण के लिए प्रयोग करना शुरू कर दिया। एकाध वर्ष में ही प्रत्येक न्यूज़ चैनल में होली के अवसर पर कवि-सम्मेलन अनिवार्य-सा हो गया। इसी बीच न्यूज़-नेशन ने “चुनावी-चकल्लस” शीर्षक से कवियों का एक ऐसा कार्यक्रम प्रारम्भ किया जिसमें राजनैतिक चुनावी घटनाक्रम पर कवियों की चुटकियां कार्यक्रम की सफलता का माध्यम बनी। 16वीं लोकसभा के चुनाव में यह कार्यक्रम ख़ासा लोकप्रिय हुआ। चुनाव सम्पन्न होने के बाद इसे “चकल्लस” शीर्षक से संजय झाला ने संचालित किया।
उधर कुमार विश्वास ने दो कदम और आगे बढ़कर “महाकवि” शीर्षक से दिवंगत कवियों के जीवनवृत्त की एक श्रृंखला ABP NEWS पर प्रारम्भ की। इस कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार ने कवियों के ग्लैमर को और ऊपर उठाने में सहायता की।
कुछ समय बाद NEWS 18 INDIA ने “लपेटे में नेताजी” शीर्षक से एक ऐसा कार्यक्रम प्रारम्भ किया जिसमें राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों को स्टूडियो में कवियों के सामने बैठाया जाता था और कवि अपने चुटीले अंदाज़ में उनसे प्रश्न पूछते थे। इस कार्यक्रम में पहली बार कविता और राजनीति का ON AIR आमना सामना हुआ।
न्यूज़ मीडिया में कवि-सम्मेलन अब पूरी तरह चस्पा हो चुका है। किसी भी मुद्दे पर कवियों को बुलाकर एक एपिसोड शूट कर लेना प्रोग्रामिंग हेड के लिए आसान भी होता है और इस कार्यक्रम की सफलता की गारंटी भी पूरी होती है। कई लाख रुपये ख़र्च करके प्रोग्रामिंग कोटे का एक बुलेटिन तैयार करने की बजाय मौलिक कंटेंट, सरल समन्वय और अपेक्षाकृत कम व्यय में शानदार कवि-सम्मेलन शूट करने में प्रोडक्शन की अधिक रुचि दिखने लगी है। आज तक, एबीपी, न्यूज़ नेशन, ज़ीन्यूज़, ज़ी बिज़नेस, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ 24 और अन्य सभी न्यूज़ चैनल्स पर समय-समय पर कवि-सम्मेलनों की उपस्थिति यह घोषणा करती है कि साहित्य और मीडिया का जो बिछोह प्रिंट मीडिया के मेले में प्रारम्भ हुआ था वह अब इलैक्ट्रोनिक मीडिया की गलियों में समाप्त हो गया है। मीडिया के पास नए कंटेंट का टोटा था और कवि-सम्मेलनों के पास उचित प्रचार तकनीकों का। दोनों ने आपस में हाथ मिलाकर एक नए युग की शुरुआत की है।
✍️ चिराग़ जैन
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सरकार चाहती है कि दिल्ली की जनता सड़क पर पार्किंग न करे। जनता भी चाहती है कि उसे अपनी गाड़ी अनाधिकृत स्थान पर खड़ी न करनी पड़े। लेकिन सरकार गाड़ी के लिए पार्किंग का स्थान मुहैया नहीं करवा पाती। वह जनता से कहती है कि अपने घर के भीतर गाड़ी खड़ी करो। जनता हाथ जोड़ कर कहती है कि छोटे-छोटे फ्लैट्स और बिल्डर फ्लोर्स में रहनेवाला शख़्स गाड़ी घर में कैसे खड़ी करे।
उत्तर सुनते ही सरकार तुरंत नहले पे दहला मारते हुए कहती है- ‘इत्ते छोटे घर में रहनेवाला आदमी गाड़ी ख़रीदता ही क्यों है?’
जनता रुआंसी होकर कहती है- ‘माई बाप! हम डीटीसी की बस में दफ्तर जाना चाहते हैं लेकिन बस में पैर रखना तो दूर, लटकने की भी जगह नहीं होती। ऊपर से सरकारी चेतावनी और लिखी होती है कि पायदान पर यात्रा न करें। …पायदान पर कर नहीं सकते, भीतर जगह नहीं है और लटकने का सामर्थ्य नहीं है। ऑटो-टैक्सीवाले खाल उतार लेते हैं। उनकी शिकायत करो तो पुलिसवाला ऑटोवाले के प्रति नमकहलाल बनकर तब तक नहीं पहुँचता, जब तक ऑटोवाला हमें मारपीट के फरार न हो जाए। ओला-ऊबर में इतना सरचार्ज लगता है कि तीन कर्मचारियों की तनख़्वाह मिला ली जाए तो भी एक कर्मचारी दफ्तर नहीं पहुँच सकता। मेट्रो में ऑफिस टाइम पर इतनी भीड़ होती है कि जब तक मेट्रो में घुस पाते हैं तब तक बायोमेट्रिक की मशीन हमें लेटलतीफ घोषित करके हमारी आधी दिहाड़ी चट कर जाती है। गाड़ी पूल करने की सोचें, तो उसके लिए गाड़ी होना ज़रूरी है और चार दिन में एक दिन नम्बर आवे तो बाकी तीन दिन गाड़ी खड़ी करने के लिए पार्किंग की जगह चाहिए।’
इतनी सारी कहानी सुनकर सरकार थोड़ी देर मौन रहती है। अचानक उसे ध्यान आता है कि दो महीने बाद राजस्थान में चुनाव है। सरकार मन ही मन स्वयं को कोसती है- ‘मूढ़मति, दिल्ली के लोगों की समस्याएँ कभी ख़त्म नहीं होंगी। ये थैंकलैस लोग एक नम्बर के आलसी हैं। इनके चक्कर में पड़ोगे तो राजस्थान हाथ से निकल जाएगा।’
सोच-विचार करके, सरकार जनता को आश्वासन देती है कि हमने एनसीआर कमेटी को बोलकर दिल्ली का विस्तार शामली तक करवा दिया है। लगभग सौ किलोमीटर दायर बढ़ जाएगा तो पार्किंग की समस्या हल हो जाएगी। फिर आप आराम से अपनी गाड़ी पार्क करना।
इससे पहले कि जनता इस आश्वासन को सुनकर सम्भल पाए, सरकार राजस्थान के दौरे पर निकल लेती है। जनता अपने घर पहुँचकर घर के बाहर गाड़ी पार्क करती है और टीवी पर सरकार की चुनावी रैली देखने लगती है। रैली के आश्वासनों को सुनकर जनता ठहाका मारती है और न्यूज़ चैनल का मनोरंजन त्याग कर पोगो चौनल के समाचार लगा लेती है।
✍️ चिराग़ जैन
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मीडिया “वाच डॉग” के रूप में जन्मा था लेकिन “पैट पप्पी” बन कर मर रहा है।
✍️ चिराग़ जैन