Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
सादगी के आँगन में
चहकी है, खेली है
हाव-भाव बदले तो
ज़िंदगी अकेली है
ओढ़ी हुई बातों से
कष्ट में धकेली है
सहजता सफलता की
पक्की सहेली है
एक तरफ़ जकड़न है
क़ातिल शिकंजा है
नाख़ूनी रंजिश है
नफ़रत है, पंजा है
उसी के ज़रा पीछे
प्यार की हवेली है
सहजता से खुली हुई
गुदगुदी हथेली है
बचपन से सीखा है
उत्तर उन्हीं में है
जिन शब्दों से मिलकर
बनती पहेली है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
तुझको सबसे मलाल है, सच्ची
यार तू भी कमाल है, सच्ची
इश्क़ वालों का हाल मत पूछो
बस कि जीना मुहाल है सच्ची
उम्र भर मुंतज़िर रही नज़रें
एक पल का सवाल है सच्ची
जाने कब कैसा रूप धर लेगी
ज़िन्दगानी छिनाल है सच्ची
मुझसे ज़्यादा मुझे तबाह करे
इतनी किसकी मज़ाल है सच्ची
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
उम्र भर मौत से भागते जो रहे
मौत आई तो बस मौत के हो गए
मेरे हर रोम में अपना अहसास भर
एक पल में पिया सौत के हो गए
एक ही पल में ये क्या से क्या हो गया
एक पल ज़िन्दगी से बड़ा हो गया
मौत को देखकर तुम पिघल से गए
और रुख़ ज़िन्दगी पर कड़ा हो गया
मौत ने छल किया? अपहरण कर लिया?
या सफल मौत के टोटके हो गए?
मौत ने कौन सा रस पिलाया कि फिर
ज़िन्दगी की तुम्हें याद आई नहीं
हाल तक पूछने की न कोशिश हुई
इतनी भी दुनियादारी निभाई नहीं
पीढ़ियाँ तुमको थाली चढ़ाती रही
और तुम मौत के गोत के हो गए
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
भावना की डगर भी सहज तो नहीं
इस डगर पर स्वयं का तिरस्कार है
प्रेम जिससे किया वो परेशान है
और जिसने किया प्रेम, लाचार हैै
मन हुआ मुग्ध जिस पर, उसी शख़्स के
हर कथन को कथानक बनाता रहा
प्रियतमा के नयन की चमक को सदा
कर्म का एक मानक बनाता रहा
स्वार्थ की क्यारियों में समर्पण खिला
अब यहाँ तर्क की बात बेकार है
राह चलते हुए प्रेम का हादसा
कौन जाने, कहाँ, कब घटित हो गया
एक पावन लम्हा ज़िन्दगी से जुड़ा
तन निखरता गया, मन व्यथित हो गया
बस वही इक लम्हा, बस वही हादसा
बस उसी से सुखों का सरोकार है
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
मैंने एक गोला बनाया
और फिर
उसे चार हिस्सों में बाँट दिया
तभी किसी ने कहा-
“इन चारों हिस्सों में
अलग-अलग रंग भरो”
…तब मुझे अहसास हुआ
कि नए रंग का
अपनी मर्यादा में रहना
तभी संभव है
जब पुराना रंग
अपनी सीमाओं में
पूरी तरह जम जाए!
✍️ चिराग़ जैन