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आयात-निर्यात

जंगल के सभागार में
बहुत बड़ा आयोजन हुआ
जिसमें सर्वप्रथम
भारत माँ के चित्र के सम्मुख
दीप-प्रज्वलन
और फिर
मेंढ़क जी का स्वागत भाषण हुआ।

भाषण में
अजीव ‘प्वाइंट ऑफ व्यू’ था
भाषण का सार कुछ यूँ था-
“भैंसा दल के अध्यक्ष
श्री कालूूप्रसाद जी!
टबासीन मछलियो!
रंग-बिरंगी तितलियो!
खूँटों से बंधी गायो!
और अन्य देशभक्त चौपायो!
हम लोग
लम्बे समय से
देश की ख़ातिर
प्राण न्योछावर करते रहे हैं
विदेशियों की थालियों में सजने के लिये
मरते रहे हैं।
जितना अधिक हमारा मांस
विदेशी भट्ठियों में चढ़ता है
उतना ही हमारे वित्तभण्डार में
विदेशी धन बढ़ता है।
इस तरह
हम अपने देश के वित्त का
पोषण कर रहे हैं
देश की प्रगति की राह पर
सूखे पत्तों की तरह
झर रहे हैं।
लेकिन पिछले दिनों
‘बाज तक’ चैनल का
एक संवाददाता बता रहा था
कि देश के वित्तमंत्री ने
संसद में गहरी चिंता जतायी है
क्योंकि विदेशों से आनेवाली
भारतीय पशुओं की मांग में
भारी कमी आयी है।
भाइयो,
इस समस्या को लेकर
सभी देशभक्त पशु चिंतित हैं
आज सदन में
इस समस्या के निदानार्थ
आपके विचार आमंत्रित हैं।”

अब महान वैज्ञानिक
मुर्गा जी ने बताया,
“सभी पशुओं के मांस का
क्वालिटी टेस्ट
हमारी लेबोरेट्री में करवाया गया है
लेकिन हमारी
और हमारे पूर्वजों की गुणवत्ता में
कोई अन्तर नहीं पाया गया है।
महोदय,
मेंढ़कों के पैर के जालों में
फर पशुओं की खालों में
मछलियों के तेल में
मंकियों की टेल में
चिड़िया की जीभवाली ट्रीट में
और हम मुर्गों के मीट में
आज भी वही स्वाद है
श्रीमान्
मुझे तो लगता है
इस सारे षड्यंत्र में
पड़ोसी गधों का हाथ है।”

इतना सुनकर
श्रीमती मछली
टब में से उछली
टेबल पर रखे गिलास में डोली
और अन्दर की बात बोली-
“मान्यवर
हमारी गुप्तचर एजेंसियों ने
इस समस्या का
सही कारण ढूंढ़ निकाला है
दरअस्ल, विदेशियों ने
अपने जीने का ढंग बदल डाला है
ख़बर मिली है
कि कृष्ण की गायों का मांस खानेवाले विदेशी
अब कृष्ण के पुजारी बन गये हैं
और इस प्रकार
सभ्य संस्कारों के सच्चे अधिकारी बन गये हैं।
जब से उन्होंने
सूती धोती
और काठ-खड़ाऊ को अपनाया है
तब से चमड़े और फ़र को
हाथ भी नहीं लगाया है।
अब उन्हें केवल शाकाहारी व्यंजन भाते हैं
और तो और
अब वे पढ़े-लिखे लोग
इलाज भी
भारतीय चिकित्सा पद्धतियों से ही करवाते हैं।
श्रीमान्
आजकल पश्चिम के जंगल में
अजीब-सी ख़ुमारी है
यहाँ तक कि इराक़ का नाश्ता
और अफ़गानी लंच करनेवाले
अमरीकी भेड़िये भी शाकाहारी हैं।”

यह सब सुनकर
गौमाता ने प्रश्न उठाया-
“यदि सभी विदेशी लोग
भारतीय सभ्यता का अनुसरण कर रहे हैं
तो फिर हम पशुगण
थोड़ी संख्या में भी क्यों मर रहे हैं?”

अब भैंसादल के अध्यक्ष
कालूप्रसाद जी ने शंका-निवारण किया
और गाय के प्रश्न का
बेहद तर्कपूर्ण उत्तर दिया-
“ईका कारण
हमका एही समझ में आया है
कि भारतवासियों ने
पाश्चात्यता के संदर्भ में
अपना
अतिथिसत्कार-धर्म निभाया है
ए ही कारण
घर से बेघर हुई
पाश्चात्यता को
अपने घर में ला बसाया है
जब से ई संस्कृतिवा का
आयात-निर्यात हुआ है
तब से ही
ई देसवा की धरती पर
जुरदार कुठाराघात हुआ है
जब भारत की सड़कों पर
नंगेपन और हिंसा से भरी
पाश्चात्यता का
भद्दा रंग दिखने लगा है
और चाहिए तो
हमरे साथी दल से पूछ न लीजियेगा
कि ई विदेसवा का
रिजेक्टेड माल
भारत में धड़ल्ले से बिकने लगा है।”

यह सब सुनकर
पीछे रखी
भारत माँ की तस्वीर से
ख़ून के आँसू बहने लगे
और दबी आवाज़ में
चीख-चीखकर कहने लगे-
“ऐ भारत के लोगो,
मेरी संस्कृति का ऐसा विस्तार न करो
ग़ैरों को शरण देने के लिये
अपनों का तिरस्कार न करो।
यदि तुम अपनी सभ्यता से बिछड़ जाओगे
तो ध्यान रखना विकास की होड़ में
बुरी तरह पिछड़ जाओगे।
यदि अमर होना चाहते हो
सफलता की सेज पर सोना चाहते हो
तो अपनी ओर लौट आओ
क्योंकि सभी जानते हैं
कि संस्कृति का मानस
अपमान का तमाचा नहीं सह सकता है
ठीक ही तो है
जो बाप को बाप न कहे
वो पड़ोसी को चाचा कैसे कह सकता है।“

✍️ चिराग़ जैन

महावीर वंदना

महावीर स्वामी बनें तेरे अनुगामी; सारी
दुनिया के प्र्राणी नाथ ऐसा वर दीजिए
बंद हो समर बहे प्रेम-निर्झर; मिटे
चेहरों से डर कुछ ऐसा कर दीजिए
आसुरी प्र्रयास पर बाँसुरी विजयी बने
अधरों पे मीठी मुस्कान धर दीजिए
पाँच अणुव्रत, दश धर्मों की गूँज उठे
भारत को फिर से महान कर दीजिए

त्रिशला के लाल तेरा कैसा है कमाल; नहीं
तन पे रुमाल फिर भी तू महाराज है
जीत लिया काल, काट कर्मों का जाल; नोच
दिए सब बाल तेरे वीरता के काज हैं
तप का धमाल तेरे त्याग का धमाल; तेरी
सधी हुई चाल तेरा दुनिया पे राज है
धरती निहाल तो पे आसमां निहाल; सारी
जगती निहाल तू त्रिलोक सरताज है
✍️ चिराग़ जैन

जैन

राष्ट्र के निमित्त बलिदान कैसे करते हैं
भामाशाह वाली वो कहानी मत भूलना
आस्था के बल से जो कर्मों से जीत गई
महासती मैना जैसी रानी मत भूलना
सत्य के लिए जिन्होंने प्राण तक त्याग दिए
अकलंक जैसे महादानी मत भूलना
राजुल ने जहाँ धोई मेहंदी सुहागवाली
गिरनार का वो लाल पानी मत भूलना

जियो और जीने दो की बात करते हैं हम
कहीं और ऐसा उपदेश नहीं मिलता
मृत्यु के क्षणों को भी महोत्सव-सा मानते हैं
धरती पे ऐसा परिवेश नहीं मिलता
सारा सुख-वैभव जो जीत के भी त्याग आये
ऐसा कोई और गोमटेश नहीं मिलता
तप-त्याग से यहाँ परमपद मिलते हैं
हाथी-घोड़े वालों को प्रवेश नहीं मिलता

पंथ हैं अनेक जिनमत में भले ही पर
मोक्षमार्ग वाला सुविचार बस एक है
सैंकड़ों हों वाद औ विवाद किंतु सत्य है कि
अहिंसा पे सबका विचार बस एक है
मान्यताएं सबकी भले हीं हों विभिन्न किन्तु
पाँच पदवाला नवकार बस एक है
कैसे नरकों से निर्वाण पहुँचेगा जीव
पूरे जिन-आगम का सार बस एक है

जैन वो नहीं कि बस नाम में लिखा हो जैन
जैन वो है जिसके विचार जैन हो गए
जाति भले कोई भी हो, आप जैन ही रहेंगे
आत्मा के यदि संस्कार जैन हो गए
जीवदया और शाकाहार के हैं प्रतिबिंब
सत्य औ अहिंसा के आधार जैन हो गए
किन्तु मातृभूमि पे पड़ा है कभी संकट तो
ख़ुशी-ख़ुशी राष्ट्र पे निसार जैन हो गए
✍️ चिराग़ जैन

जिनस्य अनुयायी इति जैनः

महावीर मुसलमान थे।
क्योंकि उनके पास मुकम्मल ईमान थे।

महावीर सिख थे।
क्योंकि वे सितम करने से ख़बरदार करते थे।

महावीर हिन्दू थे।
क्योंकि वे हिंसा से दूर थे
और सब जीवों से प्यार करते थे।

महावीर पारसी थे।
क्योंकि उनमें
संसार के पार देखने की क्षमता थी।

महावीर आर्यसमाजी थे।
क्योंकि उनमें सत्य के प्रति ममता थी।

हाँ, महावीर बुद्ध थे।
क्योंकि उनके उसूल दुर्बुद्धि के विरुद्ध थे।

…और हाँ!
महावीर ईसाई भी थे
क्योंकि वे इंसानियत के साईं भी थे।

लेकिन, महावीर जैन नहीं थे।
…क्योंकि उनकी वाणी में
हमारी जिव्हा की तरह कटु बैन नहीं थे;
उनके हृदय में
श्वेताम्बर-दिगम्बर का झगड़ा न था;
उनके अन्तस् में
बीस और तेरह का रगड़ा न था;
वे नियम थोपते नहीं थे;
वे हिंसा रोपते नहीं थे;
वे नित नए धर्म गढ़ते नहीं थे;
वे लकीर के फ़क़ीर बनकर
लड़ते नहीं थे;
वे हमारी तरह ढोंगी नहीं थे;
वे दिन के जोगी
रात के भोगी नहीं थे;
वे तो आडम्बरों के बिन थे
सचमुच……..
मेरे महावीर जैन नहीं थे
….’जिन’ थे।

✍️ चिराग़ जैन

देव-शास्त्र-गुरु

ज्ञानसिंधु वीतरागी हित-उपदेषी हैं जो
ता की करो पूजा नित प्रति अष्ट द्रव्य से
पंच-महाव्रतों का जो बाना पहन के चलें
ऐसे गुरुओं की सेवा करो जीव भव्य रे
जिन की जो वाणी जिनवाणी का मनन करो
संयम का पालन बनाओ बस लक्ष्य रे
व्रत-उपवास करो नितप्रति दान करो
तब ही चिराग कहलाओगे सुसभ्य रे
✍️ चिराग़ जैन

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