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चंदनबाला

गर्भ में आने से पूर्व कुबेर नगर भर में बहुरत्न लुटावे
जन्म समय धर नेत्र हज़ार निहारे तउ सुर पार न पावे
जा की उठाने को पालकी देव मनुष्य न होने का सोग मनावे
ताहि सती इक बेड़िन में बंधी कारा में सूखा आहार करावे
✍️ चिराग़ जैन

भगवान महावीर

जो क़ामयाब हो जाए ज़रा, वो बदगुमान हो जाता है
जो फूल गया सत्तामद में, मूरख समान हो जाता है
जो लक्ष्मी के पीछे भागे, वो अर्थवान हो जाता है
लक्ष्मी जिसके पीछे भागे वो वर्द्धमान हो जाता है

✍️ चिराग़ जैन

अहिंसा

बारूदों के ढेर पर दुनिया खड़ी है देखो
ज़ख़्मों का एक ही इलाज है अहिंसा
धाँय-धाँय, धड़-धड़, धूम-धूम की ध्वनि में
वीणा के सुरों-सा एक साज है अहिंसा
तोप-टैंक-बम-परमाणुओं की कुण्डली में
साढ़ेसाती जैसी एक गाज है अहिंसा
ऐरों-गैरों-नत्थूखैरों-कायरों का काम नहीं
वीर-महावीरों की आवाज़ है अहिंसा
✍️ चिराग़ जैन

आयात-निर्यात

जंगल के सभागार में
बहुत बड़ा आयोजन हुआ
जिसमें सर्वप्रथम
भारत माँ के चित्र के सम्मुख
दीप-प्रज्वलन
और फिर
मेंढ़क जी का स्वागत भाषण हुआ।

भाषण में
अजीव ‘प्वाइंट ऑफ व्यू’ था
भाषण का सार कुछ यूँ था-
“भैंसा दल के अध्यक्ष
श्री कालूूप्रसाद जी!
टबासीन मछलियो!
रंग-बिरंगी तितलियो!
खूँटों से बंधी गायो!
और अन्य देशभक्त चौपायो!
हम लोग
लम्बे समय से
देश की ख़ातिर
प्राण न्योछावर करते रहे हैं
विदेशियों की थालियों में सजने के लिये
मरते रहे हैं।
जितना अधिक हमारा मांस
विदेशी भट्ठियों में चढ़ता है
उतना ही हमारे वित्तभण्डार में
विदेशी धन बढ़ता है।
इस तरह
हम अपने देश के वित्त का
पोषण कर रहे हैं
देश की प्रगति की राह पर
सूखे पत्तों की तरह
झर रहे हैं।
लेकिन पिछले दिनों
‘बाज तक’ चैनल का
एक संवाददाता बता रहा था
कि देश के वित्तमंत्री ने
संसद में गहरी चिंता जतायी है
क्योंकि विदेशों से आनेवाली
भारतीय पशुओं की मांग में
भारी कमी आयी है।
भाइयो,
इस समस्या को लेकर
सभी देशभक्त पशु चिंतित हैं
आज सदन में
इस समस्या के निदानार्थ
आपके विचार आमंत्रित हैं।”

अब महान वैज्ञानिक
मुर्गा जी ने बताया,
“सभी पशुओं के मांस का
क्वालिटी टेस्ट
हमारी लेबोरेट्री में करवाया गया है
लेकिन हमारी
और हमारे पूर्वजों की गुणवत्ता में
कोई अन्तर नहीं पाया गया है।
महोदय,
मेंढ़कों के पैर के जालों में
फर पशुओं की खालों में
मछलियों के तेल में
मंकियों की टेल में
चिड़िया की जीभवाली ट्रीट में
और हम मुर्गों के मीट में
आज भी वही स्वाद है
श्रीमान्
मुझे तो लगता है
इस सारे षड्यंत्र में
पड़ोसी गधों का हाथ है।”

इतना सुनकर
श्रीमती मछली
टब में से उछली
टेबल पर रखे गिलास में डोली
और अन्दर की बात बोली-
“मान्यवर
हमारी गुप्तचर एजेंसियों ने
इस समस्या का
सही कारण ढूंढ़ निकाला है
दरअस्ल, विदेशियों ने
अपने जीने का ढंग बदल डाला है
ख़बर मिली है
कि कृष्ण की गायों का मांस खानेवाले विदेशी
अब कृष्ण के पुजारी बन गये हैं
और इस प्रकार
सभ्य संस्कारों के सच्चे अधिकारी बन गये हैं।
जब से उन्होंने
सूती धोती
और काठ-खड़ाऊ को अपनाया है
तब से चमड़े और फ़र को
हाथ भी नहीं लगाया है।
अब उन्हें केवल शाकाहारी व्यंजन भाते हैं
और तो और
अब वे पढ़े-लिखे लोग
इलाज भी
भारतीय चिकित्सा पद्धतियों से ही करवाते हैं।
श्रीमान्
आजकल पश्चिम के जंगल में
अजीब-सी ख़ुमारी है
यहाँ तक कि इराक़ का नाश्ता
और अफ़गानी लंच करनेवाले
अमरीकी भेड़िये भी शाकाहारी हैं।”

यह सब सुनकर
गौमाता ने प्रश्न उठाया-
“यदि सभी विदेशी लोग
भारतीय सभ्यता का अनुसरण कर रहे हैं
तो फिर हम पशुगण
थोड़ी संख्या में भी क्यों मर रहे हैं?”

अब भैंसादल के अध्यक्ष
कालूप्रसाद जी ने शंका-निवारण किया
और गाय के प्रश्न का
बेहद तर्कपूर्ण उत्तर दिया-
“ईका कारण
हमका एही समझ में आया है
कि भारतवासियों ने
पाश्चात्यता के संदर्भ में
अपना
अतिथिसत्कार-धर्म निभाया है
ए ही कारण
घर से बेघर हुई
पाश्चात्यता को
अपने घर में ला बसाया है
जब से ई संस्कृतिवा का
आयात-निर्यात हुआ है
तब से ही
ई देसवा की धरती पर
जुरदार कुठाराघात हुआ है
जब भारत की सड़कों पर
नंगेपन और हिंसा से भरी
पाश्चात्यता का
भद्दा रंग दिखने लगा है
और चाहिए तो
हमरे साथी दल से पूछ न लीजियेगा
कि ई विदेसवा का
रिजेक्टेड माल
भारत में धड़ल्ले से बिकने लगा है।”

यह सब सुनकर
पीछे रखी
भारत माँ की तस्वीर से
ख़ून के आँसू बहने लगे
और दबी आवाज़ में
चीख-चीखकर कहने लगे-
“ऐ भारत के लोगो,
मेरी संस्कृति का ऐसा विस्तार न करो
ग़ैरों को शरण देने के लिये
अपनों का तिरस्कार न करो।
यदि तुम अपनी सभ्यता से बिछड़ जाओगे
तो ध्यान रखना विकास की होड़ में
बुरी तरह पिछड़ जाओगे।
यदि अमर होना चाहते हो
सफलता की सेज पर सोना चाहते हो
तो अपनी ओर लौट आओ
क्योंकि सभी जानते हैं
कि संस्कृति का मानस
अपमान का तमाचा नहीं सह सकता है
ठीक ही तो है
जो बाप को बाप न कहे
वो पड़ोसी को चाचा कैसे कह सकता है।“

✍️ चिराग़ जैन

महावीर वंदना

महावीर स्वामी बनें तेरे अनुगामी; सारी
दुनिया के प्र्राणी नाथ ऐसा वर दीजिए
बंद हो समर बहे प्रेम-निर्झर; मिटे
चेहरों से डर कुछ ऐसा कर दीजिए
आसुरी प्र्रयास पर बाँसुरी विजयी बने
अधरों पे मीठी मुस्कान धर दीजिए
पाँच अणुव्रत, दश धर्मों की गूँज उठे
भारत को फिर से महान कर दीजिए

त्रिशला के लाल तेरा कैसा है कमाल; नहीं
तन पे रुमाल फिर भी तू महाराज है
जीत लिया काल, काट कर्मों का जाल; नोच
दिए सब बाल तेरे वीरता के काज हैं
तप का धमाल तेरे त्याग का धमाल; तेरी
सधी हुई चाल तेरा दुनिया पे राज है
धरती निहाल तो पे आसमां निहाल; सारी
जगती निहाल तू त्रिलोक सरताज है
✍️ चिराग़ जैन

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