Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
भारत में समाज सुधारकों की भरमार रही है लेकिन समाज सुधर न सका। इसका यह अर्थ नहीं है कि समाज सुधारकों के मन में कोई बेईमानी थी। इसका कारण यह है कि हमारी ग्राह्यता और उनकी सम्प्रेषणीयता में तारतम्य नहीं था। यदि ऐसा न होता तो एक नानक ही पर्याप्त थे समूची मानवता के लिए। एक महावीर ही बहुत थे प्राणिमात्र के चित्त में अहिंसा की प्रतिष्ठापना के लिए। एक तथागत के बाद अन्य किसी की आवश्यकता ही न होती। ये सब निष्ठा और ऊर्जा के चरम पर पहुँचे हुए लोग थे।
किन्तु हमारी ग्राह्यता इतनी क्षमतावान न हो सकी। हम समझने में चूक कर गए। हम वह सुन ही न सके जो इन सुधारकों ने कहा। हम उनके तत्पर्यों से दाएँ-बाएँ होते रहे। हमने अपने-अपने अर्थ गढ़ लिए।
उन्होंने कहा- ‘कन्या भ्रूण हत्या न करो’। हमने सुना- ‘कन्या के अतिरिक्त सबकी भ्रूण हत्या कर दो।’ उन्होंने कहा- ‘स्त्री को कमज़ोर मत समझो।’ हमने सुना- ‘कमज़ोर तो पुरुष है, उसे कुचल दो।’ उन्होंने कहा- ‘मज़हब के नाम पर मत लड़ो।’ हमने सुना- ‘अन्य किसी भी कारण से लड़ते रहो।’ उन्होंने कहा- ‘दहेज के लिए वधू को मत मारो।’ हमने सुना- ‘दहेज के ऐसे क़ानून बना दो कि वर को मारा जा सके।’
हमने वो सुना ही नहीं, जो वे कहना चाहते थे। उन्होंने सती प्रथा की कुरीति का विरोध किया। किसी जीते जागते प्राणी को चिता में झोंक देने की परंपरा का विरोध किया। उन्होंने विधवा स्त्रियों पर किये जाने वाले अत्याचारों के विरोध किया। लेकिन उन्होंने ऐसा कदापि नहीं कहा कि किसी विधवा स्त्री को उच्छृंखल होने दिया जाय। उन्होंने यह कतई नहीं कहा कि वैधव्य सहानुभूति अर्जित करने का ज़रिया बना दिया जाय।
उन्होंने जाति प्रथा का विरोध किया। मनुष्य को मनुष्य समझने की वक़ालत की। किन्तु हमने उनके इस प्रयास को पलट दिया। हमने पूर्व में शोषित होते रहे मनुष्यों के वंशजों को पूर्व के सवर्ण समुदाय की संतानों से बदला लेने के मार्ग खोल दिये। जिन्हें संभ्रांत बनाना था, उन्हें अराजक बनाने पर तुल गए हम।
नारियों को क़ानून के तराजू पर समानांतर रखने को कहा गया तो हमने क़ानून का तराजू ही झुका दिया। हमने नारी को इतनी हिम्मत न दी कि वह उचककर न्याय तंत्र को छू सके बल्कि हमने न्याय का संतुलित वृक्ष ही नारी के क़दमों में झुका डाला। अब अन्याय उलट गया। एक ही ओर झुकी-झुकी न्याय प्रक्रिया कुबड़ी हो गई है। हम समस्याओं का समाधान ढूंढते-ढूंढते समाधान को समस्या बना बैठे।
हम समझ ही न सके कि धरती पर न होने का अर्थ आकाश में होना नहीं है। लेकिन हम युगों-युगों से धरती से अनुपस्थित लोगों को तारों में ढूंढने की प्रक्रिया में व्यस्त हैं। हम मान बैठे हैं कि यदि कोई आस्तिक नहीं है तो वह नास्तिक ही होगा। हमने धारणा बना ली है कि जो इस्लाम को नहीं मानता वह क़ाफ़िर ही होगा। हम आश्वस्त हो गए हैं कि जो सत्य नहीं बोलता वह असत्य अवश्य बोलेगा।
कैसी मूर्खतापूर्ण मान्यता है। किसी ने कहा कि फलां धर्म का सम्मान करो, और हमने सुना कि बाकी सब धर्मों का अपमान करो। किसी ने कहा कि फलां धर्मग्रंथ में सब सच लिखा है और हम मान बैठे कि बाकी सब ग्रंथ झूठे हैं।
चूक सुधारकों से भी हुई है। उन्होंने प्रापक के स्तर को समझे बिना, उसकी समझ की फ्रीक्वेंसी को मापे बिना ही संदेश भेज दिया। यह समझा ही नहीं कि हवाई जहाज से जाने वाली डाक उस स्थान पर नहीं भेजनी चाहिए जहाँ हवाई अड्डा ही न बना है। संदेश का माध्यम क्या है यह कतई महत्वपूर्ण नहीं होना चाहिए, बल्कि संदेश का प्रभाव कितना है इसको मापदंड बनाना चाहिए।
विशेषणों ने बड़े विचारों की हत्या कर दी। सीधे कहना चाहिए था कि भ्रूण हत्या न करो। बस, बात यहीं सम्पन्न हो जाती। इसमें कन्या या कुमार का प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए था। आपको स्पष्ट बोलना था कि न्याय निष्पक्ष होना चाहिए। इसमें स्त्री, पुरुष, दलित, सवर्ण, गोरा, काला जैसे शब्द जोड़ने की आवश्यकता ही नहीं थी। साफ-साफ कह देते कि मांसाहार न करो। इसमें गाय, सूअर, बकरा, कुत्ता न जोड़ते तो संदेश समाधान बन जाता।
ज्ञान की सजावट के चक्कर में आपने समाधान को समस्या बना दिया। आज तक हमने इस ढर्रे को बदला नहीं है। हम अभी तक विशेषणों की लुटिया में समाधान का सागर भरने की होड़ कर रहे हैं और यही कारण है कि हर सामाजिक आंदोलन की लुटिया डूबती जा रही है।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
भारतीय राजनैतिक परिप्रेक्ष्य एक अस्थिर युग की ओर बढ़ रहा है। मोदी सरकार के विरुद्ध एकजुट हो रहे क्षेत्रीय दलों का उद्देश्य यदि देश का विकास करना रहा होता तो सम्भवतः आशा की किरण फूट सकती थी, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है। शासन के लोभ में विचारधारा तक को दरकिनार कर देने वाले सत्ता-लोलुप देश और समाज का कितना भला कर सकते हैं, यह स्पष्ट है। भारत का संविधान कहता है कि धर्म के आधार पर बने किसी संगठन को राजनैतिक दल की मान्यता नहीं दी जा सकती किन्तु अंधा भी देख सकता है कि भारतीय राजनीति की धुरि धर्म, सम्प्रदाय, जाति जैसे शब्दों से ही संचालित है। यदि देश के विकास और आम नागरिक के हितों की चिंता किसी की दृष्टि में चमक उठे तो फिर जनता का समर्थन जुटाना मुश्किल न होगा। यह सत्य है कि राजनैतिक मक्कारियों और ढिठाई से इस देश का मतदाता लोकतंत्र से ऊब गया है इसीलिए राजनैतिक दलों को अपने नैतिक चरित्र में सुधार करना होगा। फुटेज कैप्चर की ड्रामेबाज़ी और जनता के हितों का नाम लेकर बहाए जा रहे मगरमच्छी आँसू बेअसर होते जा रहे हैं। सबसे शर्मनाक स्थिति यह है कि राजनैतिक भ्रष्टाचार और झूठ-धोखाधड़ी की ख़बरें अब जनमानस को आश्चर्यग्रस्त नहीं करतीं। यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र के लिए भयावह है। इसी स्थिति का दुष्परिणाम है कि जंतर-मंतर पर जब अन्ना ने जनता का आह्वान किया तो पूरा देश उमड़ पड़ा। अन्ना आंदोलन भारतीय राजनैतिक रवैये को जनता का प्रत्युत्तर था। यह और बात है कि जनता में अरमानों पर पैर रखकर वह आंदोलन भी राजनीति की अट्टालिकाओं पर क़ाबिज़ हो जाने का जरिया बन कर नष्ट हो गया। हम भाजपा से दवाई मांगते हैं तो वो कहती है कि सत्तर साल से कांग्रेस ने दवाई नहीं दी। अब हम क्या चार साल में ही दवा दे दें। जाओ कुछ दिन और कोढ़ से मवाद बहने दो। कांग्रेस से दवाई मांगते हैं तो वह कहती है कि आरएसएस देश को बाँट रहा है। इसलिए पहले मोदी को हटाएंगे तब आना। फुटपाथों पर सोने वाले अभी भी छहों ऋतुएं फुटपाथ पर बिता रहे हैं। सरकार गैस सब्सिडी छोड़ने की अपील में जितना रुपया फ्लैक्स प्रिंटिंग में लुटा रही है उतने से यदि फुटपाथों को छप्पर दे दिया जाता तो जनता के मन में पसरा अंधकार कुछ कम होता। सरकारी योजनाएँ मख़ौल बन कर रह गई हैं। जनता अपने भाग्य का अंधकार स्वीकार कर चुकी है। सिद्धू के पाकिस्तान दौरे पर एक सप्ताह हंगामा होता है और जनता की मूलभूत समस्याएं केरल की बाढ़ में जलसमाधि ले लेती हैं। सरकार हर साल बरसात में बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में हेलीकॉप्टर का दौरा करके वोट के बीज बिखेर आती है। नदियों का पानी ज़हर हो गया है, हम साँस लेने के लिए हवा खींचते हैं और फेफड़ों तक दमे का संचार हो जाता है। प्रश्न मोदी, राहुल, माया, अखिलेश, लालू, नीतीश, उद्धव, ओवैसी, महबूबा, केजरीवाल, ममता या अन्य किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत इच्छाशक्ति का नहीं बल्कि भारतीय राजनैतिक परिदृश्य से उठ रही सड़ांध का है। बलात्कार, लूटमार, अपहरण, ठगी, कालाबाज़ारी और भ्रष्टाचार की ख़बरें संसद की निष्ठा पर प्रश्न उठाती हैं। अराजक भीड़ कानून हाथ में लेकर लोकतंत्र की न्यायव्यवस्था को ठेंगा दिखा देती है। राजनैतिक संरक्षण के दम पर कोई भी ऐरा-ग़ैरा तंत्र को लताड़ सकता है। …क्या है ये सब? देश की जनता सोशल मीडिया की अफ़वाहों को भी गंभीरता से ले लेती है साहिबों! भावुक भारतीयों को बरगलाना बहुत आसान है। यदि यह भावुकता आपके चरित्र के विरुद्ध एकजुट हो गई तो जो स्थिति उत्पन्न होगी वह संभाली न जा सकेगी। इसलिए आपसे विनम्र निवेदन है कि जनता के हितों को अपनी वास्तविक वरीयता सूची में स्थान दीजिये, चुनाव की जीत तो झख मार के ख़ुद आपके पीछे आएगी!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry, Unpublished
भारत की पूर्णता का भान करने के लिए
वेद की ऋचाओं का सुज्ञान भी ज़रूरी है
मंदिरों की संध्या आरती के सुर मुख्य हैं तो
मस्जिदों से उठती अजान भी ज़रूरी है
कातिक, असौज, माघ, सावन भी अहम हैं
मीठी ईद वाला रमज़ान भी ज़रूरी है
नानक, कबीर, बुद्ध, महावीर, ईसामसीह
राम भी ज़रूरी, रहमान भी ज़रूरी है
मीरा का मुरारी, जसोदा का नंदलाल और
राधिका के सांवरे से कंत भी समान हैं
जन्म से मरण तक कोई-सा भी पंथ रहे
आदि भी समान और अंत भी समान हैं
बैरागी, फ़क़ीर, ब्रह्मचारी, त्यागी, पीर, बाबा
सिद्ध, ऋषि-मुनि, साधु-संत भी समान हैं
यंत्र भी समान, तंत्र-मंत्र भी समान और
भीतर से सारे धर्मग्रंथ भी समान हैं
झाड़-फूंक वाले टोने-टोटके भी अपने हैं
जड़ी-बूटी वाला वो इलाज भी हमारा है
शंख फूंकने से बाँसुरी की तान तक दक्ष
शस्त्र भी हमारा और साज भी हमारा है
शोणित के पान की परंपरा हमारी ही है
क्षमादान करता रिवाज़ भी हमारा है
गंगा जी का तट मणिकर्णिका हमारा ही है
जमुना किनारे बना ताज भी हमारा है
युध्द से विरक्त हो के संत जो बना था वीर
मौर्यवंशी शासक महान भी हमारा है
भोज, अकबर, शेरशाह, रणजीत, हर्ष,
महाराणा, पौरुष, चौहान भी हमारा है
भारतीय दर्शन जान के सुदर्शन
शून्य पे जो बोला था वो ज्ञान भी हमारा है
भारत हमारा, आर्यावर्त भी हमारा ही है
इंडिया हमारा, हिंदुस्तान भी हमारा है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
ओ मगरमच्छ के भ्रष्ट रूप, ओ दानव के कल्पित स्वरूप
इतिहास हमें बतलाता है, बड़बोला हानि उठाता है
बासठ की याद दिलाते भी, क्या बिल्कुल लाज नहीं आई
तब तेरे पुरखे भजते थे, हिंदी-चीनी भाई-भाई
ऊपर-ऊपर मीठा बनता, भीतर से खड़े सरौते सा
कहने भर को चीनी है पर, कड़वा है सड़े चिरौते सा
तिब्बत को आँख दिखाता है, लतियाता है शरणागत को
छल-द्वेष-धूर्तता ओढ़-ओढ़, शर्मिंदा किया तथागत को
क्या पता कौन सा दाँव कहाँ, कब कैसा मंज़र ले आए
ये सड़क बनाने का चस्का, कब तुझे सड़क पर ले आए
ओ चीनी मिट्टी से चिकने, ओ ड्रैगन से अस्तित्वहीन
ये बात भलाई की सुन ले, मत अहंकार में फूल चीन
तुझसे बातें करने में भी, नज़रें नीची करता भारत
ये बासठ वाला दौर नहीं, लड़ने से कब डरता भारत
ये समय विश्व-बंधुत्व का है, अब झगड़ा-वगड़ा ठीक नहीं
मानवता के उन्नति पथ पर, आपस का रगड़ा ठीक नहीं
भारत के सिंह दहाड़े तो, तेरा ड्रैगन डर जाएगा
दिल्ली शॉपिंग बंद कर दे तो, पीकिंग भूखा मर जाएगा
फिर भी मन बना चुका है तो तू देख लड़ाके भारत के
तू बस माचिस को हाथ लगा, फिर झेल धमाके भारत के
हम अनुनय भी कर सकते हैं, हम तीर चलाना भी जानें
सागर पूजन करते-करते, सागर लंघ जाना भी जानें
सागरमाथा फिर देखेगा बल-पौरुष कंचनजंगा का
फिर से गौरव गुंजित होगा दुनिया में अमर तिरंगा का
हम संख्या में हैं न्यून किन्तु हिम्मत में तुझसे न्यारे हैं
पाण्डव हर युग में जीते हैं कौरव हर युग में हारे हैं
है शांतिपर्व अंतिम अवसर समझौते वाली बोली का
इसके उपरांत महोत्सव है माँ रणचण्डी की डोली का
आमंत्रण मत दे मातम को ओ हठधर्मी दो पल डट जा
तेरा हित सिर्फ़ इसी में है सेना लेकर पीछे हट जा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
आदमी की तरह
जन्मते ही बँट जाते हैं
भाव भी
अलग-अलग जातियों में
अलग-अलग धर्मों में।
प्रसव की पीड़ा
भावों की दुनिया में भी
एक जैसी है।
और वहां भी
आ चुकी है
कवि का पेट चीरकर
सर्जिकल डिलीवरी की प्रक्रिया।
बढ़िया ही है
इस तकनीक में दर्द नहीं सहना पड़ता!
देवनागरी की देह में क़ैद भावों को
कई बार देखा है
फ़ारस और रोमन के डीएनए से मैच होते।
भावों में भी देखे गए हैं
अनैतिक सम्बन्ध
आदमी की तरह।
भाव भी मरते हैं
आदमी की तरह।
भावों ने बहुत कुछ सीखा है
आदमी से।
लेकिन आदमी
कभी नहीं सीख पाया
एक भाषा में रहते हुए
कई भाषाओं में
अनुवाद हो जाने की कला।
हम फैलाना चाहते हैं
बाइबल को
गीता को
कुरआन को
जातक को
आगम को।
लेकिन समेट लेना चाहते हैं
अपने ईसा
अपने कृष्ण
अपने पैगम्बर
अपने बुद्ध
अपने महावीर।
हमने शास्त्र बना दिया है
किताबों को
विस्तृत करके।
और इंसान बना दिया है
भगवान को
संकुचित कर के।
✍️ चिराग़ जैन