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शोर शराबा क्यों है

रे सागर! सच-सच बतला दे
इतना शोर शराबा क्यों है
भीतर तो चुप-चुप रहता है
तट पर मार दिखावा क्यों है

मीठी नदिया के पानी को, तू है इतना प्यारा सागर
वो तो तुझमें डूब गई पर, तू ख़ारा का ख़ारा सागर
इन लहरों में इक नदिया की कलकल का परछावा क्यों है

दिन भर सूरज की गर्मी का चुप-चुप तूने भार उठाया
चंदा शीतल था तो तूने कितना भीषण ज्वार उठाया
उद्दण्डों से भय कैसा है, भद्रजनों पर धावा क्यों है

तू जग में सर्वाधिक विस्तृत, तू जग में सर्वाधिक गहरा
तू ही दुनिया भर के मोती-मूंगों का भी स्वामी ठहरा
इतना सब वैभव पाकर भी, सबसे अधिक अभागा क्यों है

✍️ चिराग़ जैन

कुछ ग़लत भी नहीं

कुछ सही भी नहीं, कुछ ग़लत भी नहीं
प्रेम फंसता नहीं ज्ञान-अज्ञान में
प्राण तो सृष्टि भर से अधर हो गए
देह उलझी रही मान-अपमान में

प्रेम ने जब हृदय को सहज कर दिया
कोई सीमा बची ही नहीं लाज की
श्याम के बालपन पर सलोनी लगी
नग्नता और निर्लज्जता आज की
लाज दो हालतों में सताती नहीं
एक अपनत्व में एक अज्ञान में

जब कभी भी समर्पण की नौका चढ़ा
प्यार बैकुंठ की देहरी पा गया
फँस गया जब कभी स्वार्थ के जाल में
बस तभी वासना का धुआं छा गया
कुछ समस्याओं में ही फँसे रह गए
कुछ मगन हो रहे हैं समाधान में

✍️ चिराग़ जैन

अतिवादी

गुरमेहर कौर वाले मुद्दे पर जिस तरह की चर्चाएँ उठी हैं उससे यह तो स्पष्ट है कि इस देश में अतिवादी लोग पूरी तरह सक्रिय हैं। युद्ध के विरुद्ध एक तख़्ती उठा लेने पर लड़की का जीना हराम कर डाला है हमने। “बॉर्डर” फिल्म के अंत में जब युद्ध की विभीषिका के विरुद्ध पाकिस्तान को “मेरे भाई” और “मेरे दोस्त” जैसे संबोधनों से नवाज़ा गया था तब माहौल इतना ख़राब नहीं था।
हद्द हो गई है। किसी ने चूल्हा जलाने के लिए माचिस उठाई तो उसे आगज़नी का अपराधी सिद्ध करने पर तुल गए। किसी ने सब्जी बिनारने के लिए चाकू उठाया तो उसे हत्या की साज़िश के आरोप में पथराना शुरू कर दिया। इतने भयभीत क्यों हो गए हैं कि पाकिस्तान का नाम आते ही हम चर्चा छोड़ कर नाम लेने वाले को लतियाने लगते हैं।
और अगर यह मान भी लिया जाए कि गुरमेहर ने अपराध किया ही है तो क्या बीस साल की बिटिया को समझाने का इस मुल्क में यही उपाय बचा था कि उसे बलात्कार की धमकी दे दी जाए। किसी ने फिल्म में कुछ दिखाया तो जनता उसे पीटने पहुँच गई। किसी ने तख़्ती पर कुछ लिखा तो जनता ने उसके बलात्कार की तैयारी कर ली।
क्या है ये सब। घृणा नहीं होती इस कल्पना से कि एक बीस साल की लड़की को किसी भूल अथवा अपराध की सज़ा देने के लिए चार देशभक्तों के उसका बलात्कार किया। चुल्लू भर पानी नहीं है किसी के पास इस देश की व्यवस्थाओं में पनप रही नपुंसकता के लिए? क्या हम एक अराजक समाज की निर्मिति नहीं कर रहे हैं।
अभी किसी ने गुरमेहर का एक वीडियो व्हाट्स एप्प पर भेजा है जिसमें वह लड़की कार में एक गाने पर उल्लास में नाच रही है। वीडियो के साथ यह लिखा गया है कि जिसके पिता शहीद हुए हों उसे इतना खुश होने का समय कैसे मिल गया? …कितने अमानवीय हो गए हैं हम। कल को किसी शहीद की बेटी या बीवी किसी ठेले पर गोलगप्पे खाती दिख गई तो हम उसे चरित्रहीन मान लेंगे। किसी शहीद का बेटा दोस्तों के साथ स्कूल पिकनिक पर चला गया तो हम उसे आवारा सिद्ध कर देंगे। इतने निष्ठुर कैसे हो सकते हैं हम? क्या शहीदों के परिवारों को हँसते-खेलते देखना हमारे लिए असह्य हो गया।
सोशल मीडिया के इस दौर में बेसिर-पैर के सन्देश भरे हुए हैं। चुटकुले, अश्लीलता, बेमतलब ज्ञान और वैद्यजी के नुस्खे भेड़चाल में अग्रेषित किये जा रहे हैं। लेकिन किसी बच्ची के चरित्र, किसी परिवार की खुशियों, किसी इंसान की ज़िंदगी और किसी दिल की धड़कनों पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाली पोस्ट अग्रेषित करने से पूर्व इतना ज़रूर विचार लेना चाहिए कि आग की लपटें जब भड़क जाती हैं तो वे उन्हें भड़काने वाले की झोंपड़ी को बचकर नहीं निकलतीं।

✍️ चिराग़ जैन

व्यंग्यकार और व्यंग्य

व्यंग्यकारों के लिए ये जानना बेहद आवश्यक है कि व्यंग्य में बात टेढ़ी होनी जरूरी है, मुँह नहीं। व्यंग्यकार की बात श्रोता को थोड़ी देर से समझ आए तो यह व्यंग्य की गुणवत्ता है लेकिन व्यंग्यकार अपनी बात खुद भी बमुश्किल समझ पा रहा हो तो यह व्यंग्यकार की आत्ममुग्धता है।
किसी चर्चा में से व्यंग्य निकालने के लिए आवश्यक है कि मौन रहकर चर्चाकारों के शब्द और उससे भी अधिक उनके मनोभाव को सुना जाए। कई बार व्यंग्यकार चर्चा में इतना वाचाल हो उठता है कि चर्चाकार बोल भी नहीं पाते। ऐसे में व्यंग्य निकालने के प्रयास व्यंग्यकार को निकालने की स्थिति के रूप में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
मैंने अनेक वरिष्ठ व्यंग्यकारों को सीधे-सादे विषय के भीतर से इस प्रकार व्यंग्योक्ति निकालने का प्रयास करते देखा है जैसे कोई प्यासा कौआ पुरानी कहानी से प्रेरित होकर घड़े में कंकर डाल डाल कर प्यास बुझाने की तपस्या कर रहा हो। लेकिन इस प्रयास में काक यह भूल जाता है कि जिस घड़े में कंकर डाले जाएं उसकी तली में इतना जल होना आवश्यक है जो कंकरों का बदन तर करने के बाद चोंच के भीतर आ सकने को पूरा पड़े।
जबरन व्यंग्यकार बनने की चेष्टा में अक्सर कुछ लोग भरी महफिल में कोई जुमला उछालते हैं। जुमला उछालने की प्रक्रिया पूर्ण होते ही वे सदन को मुस्कुरा कर यह भी बताते हैं कि मेरे इस जुमले पर आप सबको इस प्रकार मुस्कुराना चाहिए था। इस सोपान के उपरान्त वे एक एक सदस्य की आँखों में इस भाव से देखते हैं कि इतने सारे मूढ़ों में एक आप तो मुस्कुरा कर मेरी श्रेष्ठ व्यंग्योक्ति समझने की क्षमता सिद्ध करें। अंतिम सदस्य तक पहुँचते-पहुँचते उनकी दृष्टि रिरियाने लगती है। लेकिन इस अपमान से वे हतोत्साहित नहीं होते। बल्कि अपने मुखमंडल पर अजीब सी इतराहत लाकर यह बताते हैं कि अगर तुम अल्पज्ञों में एक भी समझदार मेरे व्यंग्य को समझ लेता तो अब मैं इस प्रकार इतरा रहा होता।
व्यंग्य समाज को आइना दिखा सकता है लेकिन कई व्यंग्यकार उस आईने में चोंच मार मर कर उसे मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ते।
एक समय के बाद वे ये अपेक्षा रखने लगते हैं कि उनके बोलने, हंसने, मुस्कुराने, देखने और यहां तक कि उठने-बैठने तक को व्यंग्य समझ कर लोग खींस निपोरते रहें। यदि उनकी एकाध उक्ति प्रचलित हो जाए तो वे आदमी को आदमी क्या शब्द को शब्द नहीं समझते। उनकी सहजता में बैठा व्यंग्यकार उनकी चेष्टाओं में फूलते बदजुबान के आगे धराशायी हो जाता है। इस स्थिति में व्यंग्यकार आनंद कम और कष्ट अधिक देता है। पत्थर को तराश कर मूर्ति बनाने वाली छैनी भौंथरी होकर कला, कृति और कलाकार तीनों को नष्ट कर डालती है।
✍️ चिराग़ जैन

केदारनाथ धाम का उलाहना

देखकर तुमको
पुलककर खोल दूंगा द्वार
इस भ्रम में नहीं रहना!

याद रखना, सर्द बर्फीली हवा से भागकर
तुम मधुर मनुहार के हर इक नियम को त्यागकर
छोड़ जाते हो कड़कती ठण्ड से बन स्वार्थी
बर्फ़ के वीरान जंगल में अकेला, बेसहारा
ये सभी कुछ भूलकर तुमसे मिलूंगा; मैं निरा ईश्वर नहीं हूँ।
फिर मिलेगा भक्ति का अधिकार
इस भ्रम में नहीं रहना!

जिन धमनियों और शिराओं की उफनती वीथियों में
तुम रवां करते रहे हो, रोज़ मंत्रोच्चार के संग
प्रेम के, अपनत्व के औ आस्था के दीप अनगिन
वे नसें जमने लगी हैं, बर्फ के नीचे सिमटकर
इस दफ़ा उनका पिघलना भी असंभव जान पड़ता है।
फिर उठेगा इन रगों में ज्वार
इस भ्रम में नहीं रहना!

सच कहो, यह प्रेम क्या बस स्वार्थ का दर्पण नहीं है
क्या तुम्हारा प्राथमिक उद्देश्य पर्यटन नहीं है
रोज़ इन दुर्गम पहाड़ों में
हवा जब इस घिनौने प्रेम का आकाश तक उपहास करती है
मैं अकेला सिर झुकाए, ढोंग के संबंध का बोझा उठाता हूँ
फिर छलोगे तुम मुझे इस बार
इस भ्रम में नहीं रहना!

✍️ चिराग़ जैन

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