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विनाशकाले

जिनकी जाँच नहीं हो पा रही
उनको ख़ामोश कर देना।
जिनको इलाज नहीं मिल पा रहा
उनकी ज़ुबान सी देना।
जो अस्पतालों के बाहर दम तोड़ रहे हैं
उन पर पर्दा डाल लेना।
जो श्मशान में
अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं
उनसे नज़रें फेर लेना।

…लेकिन एक क़िस्सा
अपने आलीशान बैडरूम में
ठीक अपनी आँखों के सामने लिखवा लेना
कि जब चिताएँ भी
हिरण्यकश्यप की महत्वाकांक्षा का
साधन बन जाती हैं
तब
उसके अपने ही महल के खंभे
उसके विनाश का उद्भव बन जाते हैं।

✍️ चिराग़ जैन

लोकतंत्रात्मक गणराज्य

उनकी अदालतें आपकी ज़िन्दगी घिस देंगी
फिर भी वे सामाजिक न्याय पर इतराएँगे
उनके थाने आपको नोच डालेंगे
फिर भी वे आंतरिक सुरक्षा पर फ़ख़्र करेंगे
देश के कुछ हिस्सों में संविधान लागू नहीं होगा
फिर भी वे प्रभुसत्ता सम्पन्न होने का दम्भ भरेंगे

वे अतिक्रमण करने वालों के हाथ जोड़ेंगे
वे समय पर टैक्स देने वालों की कमर तोड़ेंगे
पर हम यह सब चुपचाप देखते रहेंगे

क्योंकि हमें दिन-रात पिस-पिसकर
वो टैक्स का पैसा जुटाना है
जिसका हिसाब मांगने का अधिकार
हमें नहीं दिया जाएगा

लोकतंत्रात्मक गणराज्य के
इस फूहड़ नाटक से
पर्दा या प्रश्न उठाने वाले को
राष्ट्रद्रोह, न्यायालय की अवमानना और
संसद के विशेषाधिकार उल्लंघन का
दोषी मान लिया जाएगा।

राष्ट्रवादियों की सरकार हो
और मैंने आवाज़ उठाई
तो मुझे वामपंथी कहकर
नकार दिया जाएगा।

सेक्युलरों की सरकार हो
और मैंने बोलना चाहा
तो मुझे साम्प्रदायिक कहकर
मेरा तिरस्कार किया जाएगा!

वामपंथी सरकार हो और मैं बोला
तो मुझे पूंजीपति मान लिया जाएगा।

हर दल ने
अपने ऊपर उठने वाले प्रश्नों से
बचने के लिए
कोई न कोई शब्द गढ़ रखा है
ताकि जनता के सवालों से
उलझे बिना
आगे बढ़ा जा सके

ताकि जब कोई ‘नागरिक’
सवाल पूछे ‘अपनी सरकार से’
तो उसकी ज़ुबान पर
उस एक शब्द का ताला जड़ा जा सके।
✍️ चिराग़ जैन

सामाजिक जीवन के लोग

सामान्य जीवन के सुगम रास्ते को छोड़कर कुछ अलग करने का पागलपन मनुष्य को विशेष बनाता है, लेकिन इस विशेष जीवन का चुनाव करने वाले लोग (चाहे जिस भी क्षेत्र में हों) जो क़ीमत चुकाते हैं, उस पर कभी किसी का ध्यान नहीं जाता। बनी-बनाई राह छोड़कर अपनी पगडण्डी स्वयं बनानेवाले ये दीवाने अगर विफल हो जाएँ तो समाज इन्हें मूर्ख कहकर छोड़ देता है। लेकिन यदि ये लोग सफल हो जाएँ तो वही समाज इनकी बनाई पगडण्डी पर चलने लगता है।
जोखि़म उठाने की हिम्मत और पगडण्डी बनाने के लिए झाड़-झंखाड़ से जूझने का जज़्बा विफल होनेवाले में भी उतना ही होता है, जितना सफल होनेवाले में होता है। राजनीति, अध्यात्म, साहित्य, कला, उद्योग, खेल और ऐसे प्रत्येक असामान्य क्षेत्र में काम करनेवाले हर व्यक्ति के भीतर एक ‘मनुष्य’ ज़रूर होता है, जो समाज की साधारण आँखों को कभी दिखाई नहीं देता।
✍️ चिराग़ जैन

काश हम समझ सकें!

हर इक मर्यादा के उस पार न हो जाएँ
इक रोज़ कहीं हम सब, बीमार न हो जाएँ

लाइक्स और कमेंट्स बटोरने की ललक सोशल मीडिया यूज़र्स से जो न करवा दे, वही कम है। इस होड़ में किसी की चरित्र हत्या होती हो, तो होती रहे; किसी की जीवन भर की साधना पर कालिख़ पुतती हो तो पुत जाये; किसी का जीवन बर्बाद होता हो तो हो जाये; किसी का परिवार नष्ट होता हो तो हो जाये; हमें तो बस इससे मतलब है कि हमारी पोस्ट की रीच कितनी हुई!
और पढ़नेवाले भी इतनी जल्दबाज़ी में रहते हैं कि लिखनेवाले की बात का पूर्णार्थ और भावार्थ ग्रहण किये बिना ही लाइक ठोककर आगे बढ़ जाते हैं। कुछ लोग तो पढ़ने की जेहमत भी नहीं उठाते और हर पोस्ट को लाइक करते हुए अभियान की तरह फेसबुक का दौरा करते हैं। इस प्रवृत्ति के कारण सोशल मीडिया की विश्वसनीयता और नैतिकता लगभग ध्वंस हो चली है।
इण्डियन आइडियल नामक एक रिएलिटी शो में श्री संतोष आनन्द जी को अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया तो संतोष जी के अनुभव तथा जीवन यात्रा को सुनकर लोगों की आँखें भर आईं। इस भावुकता में नेहा कक्कड़ ने संतोष जी को पाँच लाख रुपये की राशि ‘भेंट’ करने की पेशकश की तो संतोष जी ने यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि ‘मैं बहुत स्वाभिमानी व्यक्ति हूँ इसलिए यह राशि स्वीकार नहीं कर सकता।’ इस पर नेहा ने रुंधे हुए गले से कहा कि मैं आपकी पोती हूँ और आप मेरी ख़ुशी के लिए यह राशि स्वीकार करें।
इस घटना को कुछ लाइक-लोलुपों ने यह कहकर फेसबुक पर पोस्ट किया कि ‘इतना मशहूर गीतकार भीख मांगकर गुज़ारा कर रहा है।’
उफ़, इस एक शब्द ने नेहा कक्कड़ के वात्सल्य और संतोष आनंद जी के स्वाभिमान; दोनों को गाली दी। हमें याद है जब संतोष जी के परिवार पर सबसे बड़ा दुःख टूटा था तब भी हमने संतोष जी को टूटते हुए नहीं देखा। अपने जवान बेटे की श्रद्धांजलि सभा में जब संतोष जी ने माइक थामा तो उनके बूढ़े जिस्म के सम्मुख उनका आत्मविश्वास तथा उनका जीवट सूर्य की तरह दमक रहा था। जिन संतोष आनंद का जीवन हिम्मत और स्वाभिमान के लिए अलंकृत होना चाहिए उनके जीवन को दया की कहानी बनाने का कुप्रयास किसी पाप से कम नहीं है।
कलाकार समाज की धरोहर भी होता है और उत्तरदायित्व भी। कलाकार समाज के एकाकी क्षणों का सम्बल होता है। कलाकार किसी व्यक्ति के भीतर चल रहे घमासान में उसके आत्मबल की ढाल होता है। न जाने कब, कौन-सी कविता, किसी मनुष्य को आत्मघात से बचा लाती है। न जाने कब कौन-सी पंक्ति किसी मनुष्य को अपराधी होने से रोक लेती है। न जाने कब कौन-सा संगीत भीतर ही भीतर घुट रहे मनुष्य को अभिव्यक्त होने में सहायता कर देता है।
कला की यह सामाजिक उपयोगिता समझनेवाले लोग कलाकारों का सम्मान करते हैं। इन अनुभवों से गुज़रे हुए लोग जब अपने प्रिय कलाकार को कोई राशि अर्पित करते हैं तो वह ‘भीख’ नहीं, ‘भेंट’ कहलाती है। सड़क किनारे ठण्ड में ठिठुर रहे किसी निर्धन के प्रति करुणा से भरकर उसे चादर या कम्बल ओढ़ाने में और अपने पिता को दुःशाला ओढ़ाने में जो अन्तर है; वही अन्तर ‘भीख’ और ‘भेंट’ में है।
सोशल मीडिया की जल्दबाज़ प्रवृत्ति से किसी के स्वाभिमान पर कैसा वज्रपात होता है; काश यह बात लोग समझ सकें।
किसी की निजता को बदनाम करके अपने पेज की रीच बढ़ाना कितना घातक चलन है; काश यह बात लोग समझ सकें।
काश यह बात लोग समझ सकें कि शब्दों के घाव कभी नहीं भरते। काश, कुछ भी लिख देने से पहले यह बात लोग समझ सकें कि संन्यास लेकर भी सम्राट अशोक अपने हाथों मारे गये लोगों को जीवित नहीं कर सके थे।

✍️ चिराग़ जैन

नफ़रतें

आइये, मिलकर बढ़ायें नफ़रतें
चप्पे-चप्पे पर उगायें नफ़रतें

धर्म अपना यूँ निभायें नफ़रतें
एक दिन हमको ही खायें नफ़रतें

प्यार, माफ़ी,अम्न और इंसानियत
इन सभी को काट आयें नफ़रतें

गर मुहब्बत की कोई बातें करे
तो उसे ज़िन्दा जलायें नफ़रतें

जिसने ये दुनिया बनाई प्यार से
आओ, उसको भी सिखायें नफ़रतें

✍️ चिराग़ जैन

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