Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
दहशत का आलम हो रा है, अब तो नैन लड़ाने में
खाकी वर्दी वाले मिल गए, कुट गए छोरे थाने में
कपड़ों पे ख़ुश्बू लगा के निकले हुजूर
बाल-वाल काढ़-कूढ़ के चहकने लगे
छोरियों के काॅलेज के बाहर लगा के घात
खड़े-खड़े बड़ी-बड़ी बात करने लगे
काॅलेज की कोई लड़की वहाँ से गुज़री तो
घूर-घूर कर टोंट पास करने लगे
तभी एक पुलिसिया जीप आती दीख पड़ी
गधो के सिरों से सींग से सरकने लगे
बापू घबराता है इनको चश्मा नया दिलाने में
खाकी वर्दी वाले मिल गए, कुट गए छोरे थाने में
लैला ने बुलाया मजनू को डेट पे चलेंगे
मजनू ने कहा मुझे माफ़ कर दो बहन
हीर ने कहा कि रांझे लांग ड्राइव पे चलूंगी
रांझा बोला मेरा इन्साफ कर दो बहन
रोमियो को जूलियट ने कहा कि प्यार करो
बोला पहले मेरा इंतज़ाम कर दो बहन
माहीवाल सोहनी के घर जा के फैल गया
ऐसा करो ज़िन्दगी हराम कर दो बहन
छोरों की आवाज़ खो गई, दिल का हाल बताने में
खाकी वर्दी वाले मिल गए, कुट गए छोरे थाने में
जिन ज़ुल्फों को लहरा के सुख मिलता था
उनमें भी तेल वाला हाथ फिरने लगा
जिस लड़के को थी लफंडरी की आदत वो
हर घड़ी दादाजी के साथ फिरने लगा
जिसे चाऊमीन और पिज़्ज़ा अच्छा लगता था
घर पे ही खा के दाल-भात फिरने लगा
आशिक़ी की चैसर पे नीतियों ने दांव चला
आशिकों का राजा खा के मात फिरने लगा
डर सा बैठ गया छोरों में दाढ़ी-मूछ बढ़ाने मे
खाकी वर्दी वाले मिल गए, कुट गए छोरे थाने में
धूप से बचाव को जो चश्मा लगाया काला
देखा थानेदार जी ने और काण्ड हो गया
ट्रैफिक के जाम से निकलने को ज़रा तेज
कट मारा कार जी ने और काण्ड हो गया
नर्स सामने थी पर दर्द से कराह के ली
सिसकी बीमार जी ने और काण्ड हो गया
जींस ट्रैक्टर में अटक के फटी थी पर
पूछा सरकार जी ने और काण्ड हो गया
दर्जी के घर लाइन लगी है, चिथड़ी जींस सिलाने में
खाकी वर्दी वाले मिल गए, कुट गए छोरे थाने में
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
जबसे कुर्सी पाई जी, मोदी कैसे खेलें होली
ऐसी आफ़त आई जी, मोदी कैसे खेलें होली
फ्यूज़ उड़ा कर गए केजरी दिल्ली ली हथियाई
उधर जाट सब फेल कर गए पानी की सप्लाई
धोती ना धुल पाई जी
मोदी कैसे खेलें होली
रास चल रहा जेएनयू में बिना डरे बिन सहमे
उधर कूद गए रविशंकर जी स्वयं कालिया दह में
रोई जमुना माई जी
मोदी कैसे खेलें होली
ड्रीम गर्ल तो साफ कर रही मथुरा वाला पानी
और मिनिस्टर बन बैठी है गुजरातन ईरानी
ख़ुद की दूर लुगाई जी
मोदी कैसे खेलें होली
बचपन बीता हाथ उठाए केतलिया का हत्था
और बुढ़ापे में निरखत हैं जेटलिया का मत्था
यूँ ही उमर गंवाई जी
मोदी कैसे खेलें होली
तीन राज्य तो गँवा चुका है अमित शाह का फंडा
अब डंके की चोट बज रहा आरएसएस का डंडा
लुटिया रहे डुबाई जी
मोदी कैसे खेलें होली
गठबंधन ने बीजेपी से पटना हथिया लीना
धीरे धीरे सिकुड़ रहा है छप्पन इंची सीना
गैया काम न आई जी
मोदी कैसे खेलें होली
दिल्ली वाले वोट बैंक पर पड़ा विपक्षी डाका
हरियाणा को ले बैठेंगे इक दिन खट्टर काका
घाटी ले गई ताई जी
मोदी कैसे खेलें होली
विजय माल्या लेकर भागे पैसा नंबर वन का
अब भी सपना देख रहे हो क्या तुम काले धन का
कैसे करें उगाही जी
मोदी कैसे खेलें होली
धर्म कर्म की बाजारों में ऐसी तैसी हैगी
रविशंकर जी कल्चर बेचें, रामदेव जी मैगी
फैशन राधा माई जी
मोदी कैसे खेलें होली
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Prose, Quotation
यही हाल रहा तो कुछ दिन बाद अरविन्द भैया अपने मफलर को साड़ी के पल्लू की तरह पतलून में खोंस कर हाथ हिला हिला कर बोलेंगे- “हाय या के कीड़े पड़ें…..याको नास जाय… मेरौ जीनौ हराम कार्राखो है। जाय आफत पररई है। जे ना मानैगा …छोरा दामोदर का। हाय लगेगी मेरी हाय… मेरी आत्मान तैं हाय निकलेगी रे….!”
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
सत्ता से चूक गए राजनेता की ईमानदारी उस चरित्रवती जवान विधवा की तरह है जिससे लताड़ खाने के बाद हर लौंडा कहता फिरता है- “खेत में हाथ पकड़ कर मो ते लिपट रही हती छिनाल, मैं धक्का दई के भाज आयो।”
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Hasya Kavita, Poetry
कम्मो मिल गई बीच बाज़ार
बीवी लड़ने कू तैयार
कम्मो ने मुस्का कर देखा, बीवी हो गई ढोल
चार दिनां से बोल रही ना हमसे मीठो बोल
कम्मो ही बढ़िया थी यार
कम्मो मिली मगर की हमने एक न मन की बात
एक तरफ बीवी लतियाये एक तरफ जज़्बात
फिर से जागा सोया प्यार
ऐसी मिली घड़ी भर कम्मो खड़ी हो गई खाट
बीवी मुँह फेरे लेटी है, घर के रहे न घाट
हमपे पड़ी दुतरफ़ा मार
हालचाल तक पूछ न पाए, मुफ्त हुए बदनाम
कम्मो छूटी, बीवी रूठी, माया मिली न राम
उल्टे गले पड़ गई राड़
कर-कर हार गए मनुहार, कम्मो मिल गई बीच बाज़ार
अब तो डाल दिए हथियार, कम्मो मिल गई बीच बाज़ार
✍️ चिराग़ जैन