+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

दीया आज़ादी का

दीपक जलते दीवाली के, दीपक जलते हैं यादों के
रौशनी बिखरती कातिक में, उत्सव मनते हैं भादो के
घर भर में ज्योति पसरती है, शादी-ब्याहों में टेलों में
जमकर आतिशबाज़ी होती, गर विजय मिली हो खेलों में
लेकिन हम मौन बिताते हैं, उत्सव अपनी आज़ादी का
आँगन में नहीं लगाते हैं इक दिव्य तिरंगा खादी का
दुनिया भर को मालूम चले मतलब अपनी आबादी का
हर आँगन में इस बार जले इक दीया अगर आज़ादी का

✍️ चिराग़ जैन

फ्रेंडशिप

“भाई नी है… दिखा दे ना।” उसने मेरे ठीक पीछे वाले बेंच पर से फुसफुसा कर कहा। मैं थोड़ा सा सरक गया।
“साले ढंग से दिखा वरना रहने दे।”
“अबे तो मैं अपना न लिखूँ।”
“अच्छा बस एक मिनिट।”
“एक बार में देख ले, फिर नहीं दिखाऊंगा। इत्ता लम्बा पेपर है, तेरे कारण मेरा भी रह जाएगा।”
“अबे मैं फेल हो गया तो तुझे अच्छा लगेगा।”
मेरी शीट उसके पास थी और मैं एक्स्ट्रा शीट पर अगला आन्स्वर लिखने लगा।

ये मेरी स्मृतियों में मौज़ूद दोस्ती का पहला एहसास है। जिसने मुझे अपनत्व के अधिकार का सुख महसूस करना सिखाया।
दोस्ती अद्भुत रिश्ता है। अपने लिए जीने की तमाम व्यवहारिक-नैतिक शिक्षा के बीच दोस्ती का अध्याय हमें दूसरों की संवेदनाओं का सम्मान करना सिखाता है। मेरे पास इस रिश्ते का भरपूर एहसास है।
दो-दो रुपयों के लिए लड़ते हुए शुरू हुई दोस्तियाँ आज बीस-बीस हज़ार की बेहिसाबी तक पहुँच गयी है। नोटबुक मांगने का अधिकार आज गाड़ी मांगने तक पहुँच गया है। सफ़र ज़ारी है। बड़ी ज़ोरदार ग्रिप है इस रिश्ते की। तेज़ दौड़ते रास्तों पर कई झटकों ने हाथ छुड़वाने की कोशिश की; पर….. सफ़र ज़ारी है।

✍️ चिराग़ जैन

चाँद को नहीं पता

कहीं भी तो अंतर नहीं है यार! चांद को नहीं पता कि उसे देखकर कोई रोज़ा, ईद की ख़ुशी में तब्दील होगा या कोई उपवास, महाशिवरात्रि के उल्लास का रूप धरेगा। गाय को भी नहीं पता कि उसके थनों में जो धार उतरी है, वो सेवइयों की मिठास में घुलेगी या शिवलिंग पर ढलक कर पावन होवेगी। यहाँ तक कि सड़क किनारे पट्टा बिछाकर बैठे मेहंदीवाले को भी नहीं पता कि वह अपने सामने पसरा जो हाथ, मेहंदी के बूटों से सिंगार रहा है, वो किसी दुआ को महकायेगा या किसी अर्पण को।
देहरी ने कब पूछा किसी पायल से कि वो अपनी रुनझुन ईद के मेले में बाँटने जायेगी या हरियाली तीज के झूलों में! फिर हमें किसने बता दिया ये सब? उत्सवों की चौपाल में नफ़रतों की सुगबुगाहट फैलानेवाली हवा कौन दिसा से आई रे बटोही। सेवइयाँ खाओ बाबू, अम्मी ने भेजी हैं। और ये भी कहा है, बेर लेता अइयो लौटती बेर, पण्डित जी से।

✍️ चिराग़ जैन

गुरूपूर्णिमा

एक महान आदमी में सीखने की प्रवृत्ति इतनी अधिक थी कि उसने गधे को भी गुरू बना लिया। लेकिन आजकल लोग गुरु को गधा बनाने पर तुले रहते हैं। इसका कारण ये नहीं है कि नयी पीढ़ी उद्दंड है बल्कि सुभद्रा मैया जब पिताजी की डींगों का इम्प्रेशन अभिमन्यु पर झाड़ रही थी तो अभिमन्यु माँ के पेट पर पेट के बल लेटा था।
गुरु पूर्णिमा का पर्व बढ़िया पर्व है। लेकिन गुरू का आकार इतना विशाल है कि पूर्णिमा को गुरु अपने पीछे छिपा लेता है। चेले पूर्णिमा को देख ही नहीं पाते। गुरुर्ब्रह्मा…… टाइप के श्लोक या गुरु गोविन्द दोउ खड़े….. टाइप के दोहे दोहराने में ही उनकी अमावस हो जाती है और पूर्णिमा गुरू के आभामंडल में समा जाती है।

✍️ चिराग़ जैन

मेला बरसात में

उठ जा रे
देख सुबह से बरस रहा है रामजी।
….बेमौसम
….झमाझम।

मुझे चिंता हुई
रामलीलाओं का क्या होगा?
और अधबने रावण के पुतले…
…वो तो भीग गए होंगे।

देखने गया
तो पाया
सब कुछ भीग गया था
रामलीला का मंच
रावण का दरबार
ऋष्यमूक पर्वत
दंडक वन
पर्णकुटी
पुष्पक विमान।

…ये क्या किया रामजी
अपनी ही लीला पर
पानी फेर दिया।

और वो अधबना रावण
पानी-पानी…

चीथड़े बन गए थे
उसके नीले, पीले परिधान
छाती तक काली हो गई थी
मूँछों के रंग से
और आँखों को ढँक लिया था
सोने के मुकुट ने बहकर।

वाह रे रावण
त्रेता से कलयुग तक आ गया
लेकिन आँखों पर आज भी
सोने का पर्दा!

लटक गया था रावण का चेहरा
लीला कमेटी के
पदाधिकारियों की तरह।

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!