दीपोत्सव
दीपोत्सव केवल पर्व नहीं अंधियारे को झुठलाने का
ये दिव्य अलौकिक अवसर है, अंतस के दीप जलाने का
भीतर के गहन अंधेरे में जब आशा दीप जलायेगी
जीवन में उजियारा होगा, दीवाली शुभ हो जाएगी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
दीपोत्सव केवल पर्व नहीं अंधियारे को झुठलाने का
ये दिव्य अलौकिक अवसर है, अंतस के दीप जलाने का
भीतर के गहन अंधेरे में जब आशा दीप जलायेगी
जीवन में उजियारा होगा, दीवाली शुभ हो जाएगी
✍️ चिराग़ जैन
Doha, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
एक संग आकर कहें, कातिक औ’ रमज़ान
एक जिल्द में बांध दो, गीता और कुरान
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
जब से हम करने लगे बात-बात में जंग
तब से फीके पड़ गए त्यौहारों के रंग
धुआँ-धुआँ सा रह गया दीपों का त्यौहार
शोर-शराबा बन गया होली का हुड़दंग
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Doha, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
जीवन बाती से जुड़े, पुरुषार्थों की आग।
हर आंगन संदीप्त हो, जाय अंधेरा भाग ॥
दिव्य-दिव्य हों कल्पना, दिव्य-दिव्य हों रंग।
दिव्य अल्पनाएँ बनें, हों सब दिव्य प्रसंग ॥
पावन पुष्पों से गुँथें, ऐसे बन्धनवार।
जिन्हें लगाकर सज उठें, सबके तोरणद्वार ॥
भोर समीरों में घुलें, गेंदे के मकरंद।
सांझ ढले कर्पूर की, हर दिसि भरे सुगन्ध ॥
लक्ष्मी का अवतार हो, हाथ लिए संतोष।
जिससे खाली हो सकें, सभी लालसा कोष॥
पथ पर हो दीपावली, मन में हो मकरंद।
वाणी में मिष्ठान्न हो, जीवन में आनंद॥
मन दशरथ, केकैयी कुमति, देह अयोध्या धाम।
तृष्णा इक वनवास है, सुख के क्षण श्रीराम॥
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
अमावस के आकाश में रौशनी का खेल
माटी के दीपकों में फुँकता हुआ तेल
चौराहों पर बिखरी बंगाली मिठाई
और आग में जलती देश की कमाई
मेरे मन में कुछ प्रश्न भर जाती है
और मुझे सोचने पर विवश कर जाती है
क्या ग़रीब के घर से ज़्यादा अंधकारमय है आकाश?
क्या निर्धनकाया से ज़्यादा रूखापन है दीपकों के पास?
क्या सड़क को भूखों से ज़्यादा भूख लगती है?
क्या मेरे देश में फूँकने के लिये भी कमाई बचती है?
काश,
ये सारे प्रश्न
हमारी राहों से सदा-सदा के लिये मिट जायें
इसी कामना के साथ संभव हैं
दीपावली की शुभकामनाएँ।
✍️ चिराग़ जैन
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