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दिल्ली की व्यवस्था

वैसे दिल्ली दिलवाले मरीजों की राजधानी मानी जाती थी, लेकिन आजकल प्रदूषण ने इसे फेफड़ेवाले मरीजों की फैक्ट्री बना दिया है।
स्मार्टफोन के कैमरे और यूट्यूब से कमाई की ख़बरों ने जिस कौम का सबसे ज़्यादा नुक़सान किया है वह है आशिक़। सफदरजंग मक़बरा, पुराना किला, लोदी गार्डन, कुदसिया पार्क, कालिंदी कुंज, गार्डन ऑफ फाइव सेंसेज़, इंडिया गेट और इंद्रप्रस्थ पार्क जैसे सैंकडों तीर्थस्थल अपने चेहरे पर वीराना लपेटे माहौल सुधरने का इंतज़ार कर रहे हैं। मुहब्बत के रूहानी किस्सों को शरारत की चटपटी कहानियों में तब्दील करने के लिए जिन बगीचों का निर्माण दूरदर्शी राजाओं ने करवाया था वे सवेरे मॉर्निंग वॉक वालों, दोपहर में किन्नरों और शाम को स्मैकियों से भरे रहते हैं। झाड़ियाँ आशिक़ों के इंतज़ार में हरी होती जा रही हैं और आशिक़ मौके की तलाश में मुरझाते जा रहे हैं।
बाज़ार फुटपाथ पर आ गए हैं और लोग बाज़ार में। सरकारी ठेकेदार सड़क बनाते समय दोनों किनारों की चार-छह फुट जगह अनदेखी कर देता है ताकि बरसात का पानी जब भूमिगत होने की चेष्टा करे तो उसे डूब मरने की जगह मिल जाए। बरसात न होने की स्थिति में यही छूटी हुई जगह स्वच्छता के सरकारी दावों पर धूल उड़ाने का काम करती है।
गाड़ियों ने सड़कों पर हमला बोल रखा है और सड़कों ने स्पीड पर। चालीस फुट की सड़क को हमने बहुत बेहतरीन तरीके से विभाजित कर रखा है। दोनों तरफ़ चार-चार फीट उस फुटपाथ के लिए जो किसी को दिखता नहीं, फुटपाथ पर नो पार्किंग के बोर्ड से टो-अवे ज़ोन तक के बोर्ड की दस-दस फीट जगह गाड़ी पार्किंग के लिए, सड़क के बीचोंबीच चार फीट का डिवाइडर, शेष चार-चार फीट जगह वाहनों के लिए बचती है। ऐसी सड़क व्यवस्था देखकर सरकार गर्व कर सकती है कि वाहन चल पाएँ या न चल पाएँ पर हमारी सड़कों पर एलिमेंट सारे मौजूद हैं।
मुहल्लों में लोगों ने पार्किंग की जगह घेरने के लिए पर्यावरण से प्यार करना सीखा। कच्ची कॉलोनियों में घर के बाहर ईंटें भिड़ा-भिड़ाकर किचन गार्डन का शगल किया जाता है जहाँ दिन भर घर की नालियों का पानी सड़ांध मारता है ताकि कोई असामाजिक तत्व उस सुंदर उद्यान को हानि पहुँचाने के लिए खड़ा न हो सके, और रात को वहाँ घर के मालिक का दुपहिया या चौपहिया वाहन स्थापित हो जाता है। फ्लैट्स में रहने वाले लोग पुराने स्कूटर सहेजकर रखते हैं ताकि उन्हें आड़ा खड़ा करके गाड़ी की जगह घेरी जा सके।
सरकार के काग़ज़ों में जो पन्द्रह साल पुराने दुपहिये कंडम हो गए हैं, हमारे शहर में बिना कोई सरकारी नियम तोड़े ही उनका प्रयोग किया जा रहा है। उसे कहते हैं कचरे से बिजली बनाने का हुनर। यह और बात है कि इतनी बढ़िया पार्किंग व्यवस्था के बावजूद हमारे शहर के थानों में गाड़ी पार्किंग से जुड़े मुहल्ले के झगड़ों की कोई कमी नहीं हो सकी है। रात के समय किसी पॉश कॉलोनी में जाकर देखो तो ऐसा लगेगा कि आप किसी बहुत बड़ी पार्किंग ग्राउंड में आ गए हैं, जहाँ बीच-बीच में दस-पाँच घर भी पार्क कर दिए गए हैं।
सरकार ने विदेशों की नक़ल करके एक बीआरटी गलियारा बनवाया। जब यह गलियारा बन रहा था तो मूलचन्द चौक से लेकर चिराग़ दिल्ली वाली पूरी सड़क पर ज़ोरदार जाम लगता था। उस समय हम दिल्लीवाले एक-दूसरे को यह कहकर दिलासा देते थे कि बीआरटी की कंस्ट्रक्शन के कारण जाम लग रहा है। फिर कुछ वर्ष बाद गलियारा बन गया। सड़क के बीच में उगे हुए बँटवारों ने हमें सुख कम, दुःख ज़्यादा दिया। अलग-अलग लेन में चलने की व्यवस्था देखकर हम समझ गए कि सरकार हमें बाँटना चाहती है। सो हमने सरकारी मनसूबों पर ऐसा पानी फेरा कि नयी सरकार को आकर वह कॉरिडोर तुड़वाने का टेंडर निकालना पड़ा। यह है हमारी मिलकर चलने की प्रवृत्ति।
बरसों से काली-पीली टैक्सियों से ऊब कर हमने ऊबर-ओला का हाथ थाम लिया। एयर कंडीशन्ड टैक्सियों में बाइज़्ज़त सवारी करके हम इतने प्रसन्न हो गए कि काली-पीली टैक्सी चालकों के दुर्व्यवहार को सुधारने के सभी प्रयास ध्वस्त कर दिए। जब सबने ऊबर-ओला की एप्लिकेशन डाउनलोड कर ली तो अचानक उतनी ही दूरी के लिए उसी टैक्सी का किराया कम-ज़्यादा होने लगा। ईमानदार कंपनियों ने कहकर हमसे डेढ़ गुना से लेकर तीन गुना तक किराया वसूलना शुरू कर दिया। कैब बुक करने पर ड्राइवर आपका इंटरव्यू लेता है। आपको कहाँ जाना है? पेमेंट कैश है कि नहीं? आपसे पूरी जानकारी लेने के बाद वह बिना कोई जवाब दिए फोन काट देता है। आप इंटरव्यू का रिज़ल्ट आने की प्रतीक्षा करने लगते हैं। सामान्यतया दस-पंद्रह मिनिट में आपका आवेदन निरस्त कर दिया जाता है। और कई बार बीस-बाइस मिनिट प्रतीक्षा करने के बाद आप अपने हाथों से कैंसिलेशन कर देते हैं। कैब कंपनी आपकी इस धृष्टता के लिए आप पर जुर्माना लगा देती है। इन सब स्थितियों की शिकायत करने में आप समय नष्ट न करें इसलिये इन कंपनियों ने अपना कोई फोन नंबर सार्वजनिक नहीं किया है।
परिवहन की एक अन्य शानदार सवारी के रूप में हमारे पास ई-रिक्शा का विकल्प है। जब ई-रिक्शा की शुरुआत हुई थी तब इनका किराया सामान्य रिक्शा से कम था, क्योंकि यह बिजली से चलती है। अब जब सभी सामान्य रिक्शा वाले ई-रिक्शा धारक हो गए तो इनके किराए सामान्य रिक्शा से लगभग ढाई गुना हैं क्योंकि अब जनता के पास कोई विकल्प नहीं है।
हम ओला, ऊबर, ई-रिक्शा की समस्याओं को लेकर सरकार के पास जाते हैं तो सरकार बताती है कि वह अभी प्रदूषण से निबटने में व्यस्त है। कोरोना के कारण मेट्रो और डीटीसी में कम लोगों को भेजा जाएगा ताकि सोशल डिस्टेन्स मेंटेन किया जा सके। पैट्रोल-डीजल की गाड़ियों पर ईवन-ऑड लागू होगा ताकि प्रदूषण कम हो। ओला-ऊबर में दो से अधिक सवारी नहीं बैठेगी ताकि कोरोना न फैले।
हम सरकार से पूछते हैं कि पूरी परिवहन व्यवस्था चरमरा रही है। सरकार बताती है कि यह सरासर आरोप है। परिवहन व्यवस्था चरमरा रही होती तो सरकार कैसे चलती?
हम अपनी शिकायतें और अपना-सा मुँह लिए खड़े रह जाते हैं और मन ही मन धन्यवाद देते हैं उन कंपनियों को जिन्होंने शिक़ायत करने के लिए कोई नम्बर ही जारी नहीं किया है।

✍️ चिराग़ जैन

दिल्ली के मुख्यमंत्री के नाम एक खुला पत्र

श्री मान अरविंद केजरीवाल जी
मुख्यमंत्री
दिल्ली सरकार

सरजी!
हमें इस बात का भान है कि आप जब से सरकार में आए हैं, तब से पूरी क़ायनात आपके खि़लाफ़ हो गई है। पूरे देश की राजनीति, नौकरशाही और व्यवस्था सिर्फ इसी प्रयास में है कि आपको कुर्सी से कैसे हटाया जाए।
स्वयं प्रधानमंत्री आपके पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। उधर राज्यपाल ने आपके सुख-चैन की सुपारी दे रखी है। यहाँ तक कि ईश्वर भी आप ही से चिढ़कर स्मॉग भेजने लगा है। और तो और आपकी ईमानदारी और लोकप्रियता से जलकर किरण बेदी, प्रशांत भूषण, शांति भूषण, योगेंद्र यादव, शाज़िया इल्मी, कुमार विश्वास, कपिल मिश्रा और ख़ुद अन्ना हज़ारे तक अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं के पूरा न होने पर आपको अकेला छोड़ गए हैं।
दिल्ली पुलिस, डीडीए जैसे महत्वपूर्ण विभाग साज़िशन आपके नियंत्रण से बाहर रखे गए हैं। महत्वपूर्ण सरकारी आयोजनों में आपको निमंत्रित न करके अपमानित किया जाता है। आपकी सरकार के आयोजनों को सुरक्षा का अड़ंगा लगाकर अनुमति नहीं दी जाती। मीडिया के सारे बेईमान मिलकर आपके खि़लाफ़ हो गए हैं। और रही-सही कसर आपका स्वास्थ्य पूरी कर देता है। कभी मानसिक तो कभी शारीरिक स्वास्थ्य की सुरक्षा में भी आपका खासा समय व्यतीत हो जाता है।
इन सारी परिस्थितियों को देखते हुए हिम्मत तो नहीं हो रही किन्तु एक मतदाता होने के नाते मैं आपको सूचित करना अपना अधिकार समझता हूँ कि जिस केंद्रशासित प्रदेश के मुख्यमंत्री होने का आप लुत्फ़ उठा रहे हैं, वह दिल्ली इन दिनों बहुत समस्याओं से घिरी हुई है।
आपकी गाड़ियों का क़ाफ़िला जिन चौराहों से दनादन दौड़ता हुआ निकलता है, उन चौराहों पर किन्नरों की उपस्थिति आपकी सरकार की नपुंसकता का मज़ाक उड़ाते हुए आपके मतदाताओं को सरेआम लूटती है। पुलिसवाले यह नंगा नाच देखते हैं और ख़ामोशी से स्टॉप लाइन क्रॉस करनेवालों से पैसे वसूलते रहते हैं।
डीटीसी के ड्राइवर ढिठाई से यातायात नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए अपनी लम्बी-चौड़ी बस से आम आदमी को खदेड़कर यह संदेश देते हैं कि सरकार ने आम आदमी को कीड़ा-मकौड़ा समझ लिया है, जिसकी जान की किसी को कोई परवाह नहीं है।
पार्किंग वाले 20 रुपये घंटे को पचास रुपये करने पर आमादा हैं और अनधिकृत पार्किंग में धड़ल्ले से गाड़ियों की वसूली की जा रही है। कानूनी निष्क्रियता का इतना अंधेरा छा गया है कि सिग्नल पर लालबत्ती का रंग लोगों को दिखना बंद हो गया है।
रेहड़ी-पटरीवाले आपके संरक्षण में घटोत्कच्छ की भाँति पूरी सड़क घेरने लगे हैं और रोड टैक्स चुकानेवाले वाहन चालक रोड ढूंढ रहे हैं। टूटी हुई सड़कें और टूटती जा रही हैं।
आपको झुग्गी-झोंपड़ियों में अपने राजनैतिक भविष्य का सूर्य दिखाई देता है और मध्यमवर्गीय दिल्ली अपनी ख़ामोशी का परिणाम झेलती जा रही है। सरकारी विज्ञापन आपकी सरकार को रामराज्य घोषित करना चाहते हैं किंतु उन विज्ञापनों को पढ़नेवाला दिल्लीवासी उनमें सिस्टम की बेशर्मी और ढिठाई पढ़ता है।
अगले वर्ष चुनाव है सरजी! दिल्ली की क़ानून व्यवस्था और यातायात व्यवस्था चरमरा चुकी है। यदि इन खंडहरों पर ढंग से लीपापोती नहीं की गई तो पोलिंग बूथ जाने के लिए घर से निकला आपका वोटर ट्रैफिक जाम में फँसकर रह जाएगा।

-आपका दिल्लीवासी
✍️ चिराग़ जैन

स्मॉग

चाह पूनम की थी तो अमा दे गए
रौशनी से रहित चन्द्रमा दे गए
फॉग बनकर जिन्होंने बुलाया निकट
स्मॉग बनकर वही अस्थमा दे गए

✍️ चिराग़ जैन

दिल्ली महापुराण

कलयुग में आपिये और भाजपाइयों के दो समूह थे। दिल्ली नगरी में संसदपुरी और विधानसभापुरी पर शासन करने हेतु दोनों परस्पर दूसरे को असुर और स्वयं को सुर सिद्ध करने में निमग्न रहते थे। मीडिया माइलेज के संघर्ष में वे जनहित तथा राष्ट्रहित के अस्त्र एक-दूसरे पर चलाते रहते थे। इन अस्त्रों के आघात से इनके सरकारी सिक्योरिटी गार्ड इन्हें बचा लेते थे और अपनी विशेष सिद्धि के बल पर इनकी दिशा आम आदमी की ओर मोड़ देते थे। एक दिन दोनों दल मीडिया नामक त्रिदेव के पास गए। मीडिया ने उन्हें राजनीति के सागर का मंथन करने का उपाय सुझाया। दिल्ली की राजनीति के सागर में मुद्दों का सुमेरु स्थापित किया गया जिसे मीडिया ने कश्यपावतार लेकर अपनी पीठ पर धारण किया। भाजपाइयों ने ज़ी न्यूज़, इण्डिया टीवी और दूरदर्शन जैसे चैनल्स की पूँछ पकड़ी। आपियों के हिस्से एबीपी, एनडीटीवी और आईबीएन 7 जैसे फन आए इस कारन मंथन के दौरान बेचारे आपियों को ज़हरीले डंक का भी सामना करना पड़ता था।
मंथन प्रारम्भ हुआ तो सबसे पहले उसमें से एक एलजी निकले। मीडिया ने वे एलजी टाइम पास के लिए दिल्ली में नियुक्त करवा दिए। उसके बाद दिल्ली पुलिस का अवतरण हुआ। उसे भाजपाइयों को दे दिया गया। फिर डीडीए निकली। उसे भी भाजपाई ले उड़े। आपियों के सरदार ने मीडिया प्रभु से शिकायत की कि मंथन से निकलने वाले सभी रत्न भाजपाई हड़प रहे हैं। यह अन्याय है।
मीडिया प्रभु ने उन्हें आश्वस्त किया कि अब जो भी कुछ निकलेगा उसे आपियों को सौंपा जाएगा। पुनः मंथन आरम्भ हुआ। अबकी बार सागर में से एक सीडी निकली। मीडिया प्रभु ने अपने हाथों से वह सीडी आपिये दल के एक मंत्री के नाम लिख दी।
मंथन आगे बढ़ा। सागर में से अचानक हालाहल निकलने लगा। पूरी दिल्ली ज़हरीले धुंए से घिर गई। प्राणिमात्र का श्वास लेना दूभर हो गया। न्यायालय, NGT और प्रशासन; तीनों से इस धुएँ को ग्रहण करने की अनुनय की गई किन्तु तीनों ने “I DONT SMOKE” बोलकर अपना पल्ला झाड़ लिया।
सभी आपिये और भाजपाई अपनी-अपनी वातानुकूलित गाड़ियों में जा घुसे। शेषनाग का दम घुँटने लगा। उधर सागर विष उगल रहा था, इधर आपिये और भाजपाई परस्पर विषवमन कर रहे थे।
धुएँ से मीडिया की आँखें लाल होने लगी। खाँसी कर-कर के पूरी जनता स्वयं को मुख्यमंत्री समझने लगी थी। चुनाव् आयोग के महादेव ने धूम्रपान करने की बजाय पंजाब चुनाव का बिगुल बजाने का निर्णय लिया। इससे मीडिया प्रभु का ध्यान दिल्ली के धूम्रपान से पंजाब के विषपान की ओर मोड़ दिया। और दिल्ली की जनता को धुएँ के साथ अपनेहाल पर छोड़ दिया।

✍️ चिराग़ जैन

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