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भ्रष्टाचार की परंपरा

कोरोना विश्व भर में महामारी की तरह फैल रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इस संकट से उबरने के उपाय खोज रहे हैं। ‘जान है तो जहान है’ के सिद्धांत पर चलते हुए जान बचाने के लिए काम-धंधे, आवागमन, मेलजोल आदि सब बन्द कर दिए गए हैं। दुनिया भर के शेयर बाज़ार औंधे मुँह गिर रहे हैं। लेकिन दुनिया, शेयरों के गिरने की परवाह छोड़कर कोरोना की चपेट में आए लोगों की संख्या का हिसाब रखने में व्यस्त है। अमरीका, इटली, चीन जैसे देशों में आपातकाल घोषित हो गया है। सरकारें अपने बजट का बड़ा हिस्सा इस आफत से निपटने में ख़र्च कर रही हैं। विद्यालयों में परीक्षाएँ महत्वपूर्ण नहीं रह गईं; स्टेडियम के लिए खेल महत्वहीन हो गए; बाज़ार के लिए व्यापार द्वितीयक हो गया; सीमाओं ने आग उगलना बन्द कर दिया; यहाँ तक कि कोई ख़ास आतंकी घटना भी सुखिऱ्यों में नहीं आ रही।
लेकिन इस स्थिति में भी भारतीय जनमानस के रक्त में प्रवाहित बेईमानी पर कोरोना का कोई असर नहीं दिखाई दिया। बात-बात में संस्कृत के श्लोक उध्दृत करनेवाले हम भारतीय इस आपातकाल में भी मास्क पर दस-दस गुना मुनाफ़ा बटोरने में लगे हैं। ‘तुम क्या लाए थे, और क्या ले जाओगे’ के उपदेश देने वाले हम भारतीय सेनिटाइजर में मिलावट करके लोगों के जीवन से खेल रहे हैं क्योंकि हम जानते हैं कि ‘आत्मा न कभी पैदा होती है, न कभी मरती है।’
हरिश्चंद्र, राजा शिवि, भामाशाह, विक्रमादित्य और अशोक के वंशज हम भारतीय प्रयोग किये हुए मास्क को दोबारा ‘पॉलीथिन’ में पैक करके संक्रमण के प्रसार में सहयोग कर रहे हैं ताकि संविधान में उल्लिखित ‘समानता के अधिकार’ के तहत कोई नागरिक कोरोना के स्पर्श से वंचित न रह जाए। जब सौ-पचास लोग मर लेंगे तब गोदाम में भरे मास्क और सेनिटाइजर महंगे दामों पर बेचे जाएंगे क्योंकि हम जानते हैं कि यदि आज मास्क को तीन सौ रुपये में बेचने का लोभ छोड़ दिया जाए तो परमपिता परमात्मा इस त्याग से प्रसन्न होकर ऐसी परिस्थिति का वरदान देंगे कि वही मास्क हज़ार रुपये में बिक सकेगा।
कितने महान हैं हम। महामारी फैलती है तो हम दवाइयों की कालाबाज़ारी करने लगते हैं। प्यार फैलता है तो हम वेलेंटाइन डे पर गुलाब की कालाबाज़ारी करने लगते हैं। दरगाहों और तीर्थों पर मेले लगते हैं तो जेब काटने के टेंडर भरे जाते हैं। बाढ़ और भूकम्प आता है तो पीड़ितों की सहायता के लिए चंदा उगाकर खा जानेवाले समाजसेवी अवतरित हो जाते हैं।
बीमारी आती है तो हमें ज्ञात होता है कि केमिस्ट बेईमान हैं। दंगे होते हैं तो हमें पता चलता है कि पुलिस बेईमान है। नोटबन्दी होती है तो सरकार बताती है कि बैंकर बेईमान हैं। ऑडिट होता है तो पता चलता है कि पूरा दफ्तर बेईमान है। न्यायपीठ बैठती है तो पता चलता है कि जिन दफ्तरों को ईमानदारी की क्लीन चिट मिली है उनका ऑडिटर बेईमान है। नई सरकार बनती है तो पता चलता है कि पिछली सरकार बेईमान थी।
हम किताबों में पढ़ते आए हैं कि भारत विविधता में एकता वाला देश है। किंतु जब ज़िन्दगी पढ़ी तो देखा कि यहाँ विविधता ही विविधता है। एकता ढूंढने निकले तो ज्ञात हुआ कि कोई भारतीय चाहे कोई भी व्यवसाय करे, वह अवसर मिलने पर उसमें बेईमानी ज़रूर करेगा। एकता ढूंढने निकले तो ज्ञात हुआ कि हर व्यवसाय के पास अपने आपको सबसे ज़रूरी, सबसे जनहितकारी और सबसे आध्यात्मिक बताने के लिए जुमले मौजूद हैं। यह भारत का सौंदर्य है कि यहाँ हर नागरिक यह चाहता है कि गुनाहों के बहीखाते में किसी और का नाम लिखा जाए और मुनाफ़े की पंक्ति में पहला नम्बर हमारा हो।
जिला अस्पताल के शवगृह में शव-सुपुर्दगी की पर्ची काटनेवाला बाबू भी रोते-बिलखते परिजनों से सौ रुपैये ऐंठते हुए सरकार के भ्रष्टाचार को गाली देता है क्योंकि ऐसा करने से उसके अपराध की फोकस लाइट फैलकर पूरे परिवेश के धब्बे दिखाने लगती है।
संस्कार, अध्यात्म और परंपरा का फटा ढोल पीटनेवाला हमारा समाज इस योग्य भी नहीं बचा है कि किसी को बेईमान कह सके। यह पूरे समाज की बीमारी है। इसमें कोई एक जाति, कोई एक सम्प्रदाय, कोई एक धर्म, कोई एक विचारधारा, कोई एक वाद, कोई एक भाषा, कोई एक क्षेत्र, कोई एक वर्ण, कोई एक लिंग, कोई एक व्यवसाय या कोई एक पीढ़ी अलहदा नहीं है। बेईमानी ने पूरे देश को एकसूत्र में बांध रखा है।
कोरोना को भारत में प्रवेश किये दो सप्ताह से अधिक हो चुके हैं। एक बार इस वायरस की शिराओं में यहाँ की आबो-हवा घुल जाने की देर है, फिर यह वायरस भी कुछ ले-दे के लोगों को बीमार करना बंद कर देगा।

*नोट : इस लेख को गणपति भाव से पढ़ें और पूरा अर्थ ग्रहण करने के उपरांत ही प्रतिक्रिया दें। यदि द्रोणाचार्य की तरह आधा पढ़कर बुद्धि के कपाट बंद कर लिए तो युधिष्ठिर के सिर तो केवल अर्द्धसत्यभाषण का पाप आएगा किन्तु आधी बात से निर्णय पर पहुँचने वालों की हानि अधिक होगी।

✍️ चिराग़ जैन

ओ कोरोना

ओ कोरोना
हम पर पहले ही है काफ़ी रोना-धोना
तुम जीवन दुश्वार करो ना!

तुमको क्या लगता है, क्यों बे
हम खाँसी से डर जाएंगे
ऐसी खाँसी करने वाले तो भारत में
सीएम बने फिरा करते हैं

हाथ मिलाने से बढ़ते हो
ताप बढ़े तो मर जाते हो
भारत में टेम्प्रेचर
अड़तालीस डिग्री तक चढ़ जाता है
राख तलक भी नहीं मिलेगी

राजनीति के हाथ अगर तुम चढ़ जाओगे
नामो-निशां नहीं बचने का
ये वज्रोदर
पुल, चारा, शौचालय सब कुछ खा जाते हैं
इनकी महाक्षुधा के आगे
तुम बिन सैनेटाइज़र के ही मिट जाओगे
इन्हें नहीं आता कुछ भी जीवन भर ढोना
ओ कोरोना!

अगर किसी दिन
किसी मीडिया के चैनल में धरे गए तो
प्रश्नों का तूफ़ान उठेगा
उत्तर देने तक का अवसर नहीं मिलेगा
इनके लिए तुम्हारी कोई
चार बुलेटिन से ज़्यादा औक़ात नहीं है
अगली बड़ी ख़बर आने तक
तुम हो इनका खेल-खिलौना
ओ कोरोना!

उत्सव सारे मंद हो गए
खेल-तमाशे बंद हो गए
आना-जाना बंद हुआ है
हँसना-गाना बंद हुआ है
ओ सन्नाटै के उद्घोषक
शर्म नहीं आती क्या तुमको
काफ़ी आफ़त मचा चुके हो
अब तुम जाकर किसी कुँए में डूब मरो ना!
ओ कोरोना!

✍️ चिराग़ जैन

दिल्ली के चुनाव परिणाम

चुनाव आयोग इस बात पर एक्शन ले कि केजरीवाल ने यह बात छुपाए रखी कि मुहल्ला क्लीनिकों में बीजेपी का इलाज किया जा रहा है

झाड़ू को धुआँदार सफ़ाई की बधाई
कमल को कुछ नई पाँखुरियाँ खुलने की बधाई
और हाथ को हाथ न हिलाने की बधाई

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Delhi Election Result

जनसंख्या

सैंया पूछने लगी है सरकार
कलैण्डर कब तक छापोगे
अब संभालने दो मोहे घर बार
कलैंडर कब तक छापोगे

कमरों की हालत ख़स्ता है
आंगन पड़ गया छोटा
चौका बोला हो जावेगा
दो रोटी का टोटा
मेरी देह भी करे है इनकार
कलैंडर कब तक छापोगे

संसाधन नाराज़ हुए हैं
रूठी हैं सुविधाएँ
कहीं हमारी लापरवाही
भारी ना पड़ जाएँ
छिन जाएंगे तुम्हारे अधिकार
कलैंडर कब तक छापोगे

✍️ चिराग़ जैन

समस्या और समाधान

वर्ष 2004 की घटना है। अटल जी की सरकार चली गई थी। उन दिनों अटल जी कुछ अस्वस्थ रहने लगे थे। उन्हीं दिनों नानाजी देशमुख भी अस्वस्थ थे और दिल्ली स्थित दीनदयाल उपाध्याय शोध संस्थान में प्रवास कर रहे थे। एक शाम अटल जी नानाजी से मिलने पहुँच गए।
नानाजी ने उन्हें डाँटते हुए कहा – “अटलजी! आप स्वयं अस्वस्थ हो, ऐसे में मेरा हाल जानने के लिए स्वयं आने की क्या आवश्यकता थी?”
अटल जी ने तपाक से उत्तर दिया – “मैं आपसे मिलने नहीं आया हूँ नानाजी! एक कनिष्ठ रोग एक वरिष्ठ रोग से मिलने आया है।”
उत्तर सुनते ही वहाँ उपस्थित सभी लोगों के चेहरे खिलखिला उठे। नानाजी भी मुस्कुराए और सहज होते हुए पूछा – “आप अस्वस्थ हैं अटलजी! मेरा स्वास्थ्य ख़राब है। आपकी सरकार चली गई है। देश नेतृत्व के संकट से जूझ रहा है। इन तनावपूर्ण परिस्थितियों में तुम मुस्कुरा कैसे लेते हो?”
अटल जी ने उसी सहजता से उत्तर दिया – “नानाजी! तनाव से केवल समस्याएं जन्म ले सकती हैं, समाधान खोजने हैं तो मुस्कुराना ही पड़ेगा।”

✍️ चिराग़ जैन

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