Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
‘राजनीति महत्वाकांक्षी मस्तिष्कों का क्रीड़ाक्षेत्र है।’ -यह एक सूक्ति मात्र नहीं बल्कि मतदाताओं की उम्मीदों पर वज्रपात भी है। समाजसेवा और देशप्रेम का क्रीम-पाऊडर लगाकर कोई व्यक्ति जनता को मुँह दिखाने क़ाबिल बनता है। निरंतर ब्यूटी पार्लर भ्रमण करने के फलस्वरूप जनता एक दिन यह यक़ीन कर बैठती है कि चेहरे की यह चमक वास्तविक है। जैसे ही जनता को यह यक़ीन होता है उसी क्षण नया नेता भागकर किसी पार्टी के दफ़्तर में जाता है और अपने मेकअप पर हुए ख़र्चे की बोली लगाने का उपक्रम शुरू करता है।
पार्टी में बैठे पुराने घाघ नेता, फाउंडेशन के दम पर बनी उसकी पब्लिक फाउंडेशन का पार्टी के हित में आकलन करते हैं और एक कुशल गृहिणी की तरह आलू-प्याज की शैली में उससे उसकी औक़ात का मोलभाव करने लगते हैं। उचित मूल्य लग जाने के बाद नवनिर्मित नेताजी का चेहरा दो भागों में बाँट दिया जाता है। पार्टी कार्यालय के भीतर उनका आचरण ठीक वैसा होता है जैसा ग्राहक जुटा लेने के बाद किसी गणिका का अन्य गणिकाओं से होता है। पार्टी कार्यालय के बाहर वही गणिका अन्य ग्राहकों के सामने चरित्रवती बनकर लानत भेजने लगती है।
प्रत्येक गणिका के जीवन में एक समय ऐसा अवश्य आता है जब उसका आसामी उससे ऊब जाता है और उसे ग़ैरत की क़ीमत चुकाने में आनाकानी करने लगता है। इस परिस्थिति में हर गणिका यह समझ जाती है कि उसका ग्राहक अब ज़्यादा दिन उसे नहीं झेलेगा। मूर्ख गणिकाएँ ऐसी स्थिति को दिल से लगाकर आसामी को नपुंसक कहने लगती हैं और बिस्तर पर की गई उसकी हरक़तों को सार्वजनिक करके उसकी चरित्र हत्या का प्रयास करती हैं। किन्तु प्राणहीन की हत्या संभव कहाँ है?
समझदार और अनुभवी गणिकाएँ ऐसा नहीं करतीं। वे ग्राहक की ऊब को भाँपकर अतिरिक्त विनम्र हो उठती हैं। अन्यान्य उपायों से भरसक प्रयास करती हैं कि उसका आसामी उससे ख़ुश रह सके। किन्तु जब कोई उपाय नहीं दिखता तो वे एक दिन ग्राहक के भोजन में विष मिला देती हैं और उसकी लाश का अंगूठा कोरे काग़ज़ पर लगाकर उसकी संपत्ति का हरण कर लेती हैं। ये गणिकाएँ सर्वाेच्च पदों तक पहुँचने की क्षमता रखती हैं।
विभीषण जब रावण से अपमानित हुआ तो उसे राम याद आए। उसने राम को बताया कि मैं तो लंका में रहकर भी आप ही के नाम की उपासना करता था। सुनकर राम प्रसन्न हो गए और विभीषण को राज्यसभा भेजने का वचन दे दिया। अपनी राज्यसभा की सीट पक्की होते देख महात्मा विभीषण ने रावण की लंका, भाई-बहन और यहाँ तक कि अपने राष्ट्र से भी मुख़ालफ़त करने में हिचक न की। विभीषण के इस समर्पण से राम बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें भक्त-शिरोमणि की उपाधि दी।
उधर सुग्रीव का भाई उसकी बदतमीज़ीयों से उकताकर उसे घर-निकाला दे चुका था। सुग्रीव में इतनी हिम्मत न थी कि भाई के कान पर दो टिका दे। दुःखी सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत पर बैठे सीताहरण लाइव देख रहे थे। उन्होंने रावण को ऐसा पाप करने से रोकना चाहा किन्तु उन्हें लगा कि सीता का पता बताने के बदले में मैं राम से सौदेबाज़ी कर सकता हूँ। उन्होंने सीताहरण होने दिया। राम जब विकल होकर पहुँचे तो सुग्रीव उतने ही प्रसन्न हुए जितने संजीव कुमार के हाथ काटकर गब्बर सिंह जी हुए थे। उन्होंने राम से कहा कि मैं आपकी केस स्टडी तो करना चाहता हूँ लेकिन ‘फोर्स्ड बैचलर’ होने के कारण कंसन्ट्रेट नहीं कर पा रहा हूँ। राम अब तक फोर्स्ड बैचलर की पीड़ा जान चुके थे। लक्ष्मण तो इस फील्ड में सीनियर फैलो थे ही। दोनों भाइयों ने मिलकर पीएसी की मीटिंग में बाली को धूल चटाने की योजना बनाई। इसके लिए सबसे पहले सुग्रीव को पार्टी से निलंबित किया गया। उसने बाली को गालियाँ देने का अधिकृत लाइसेंस पा लिया। कुछ दिन गालियों से अभिषेक करने के बाद सुग्रीव को वापस पार्टी की सदस्यता दे दी गई। इस स्टेप से बाली बौखला गया। उसकी बौखलाहट का लाभ उठाकर उसे पार्टीविरोधी सिद्ध करते हुए राम ने बाली की हत्या कर दी।
अंगद सबसे समझदार रहा। उसने चाचा को पटाए रखा। क्योंकि वह जानता था कि राजनीति में पासा कहीं भी पड़ सकता है। यदि चाचा जीता तो अंगद की स्वामिभक्ति उसकी राज्यसभा सीट का ग्राउंड बना देगी और अगर चाचा निबट गया तो इकलौता पुत्र होने के कारण उसका अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार रहेगा ही रहेगा।
अब प्रश्न यह है कि इस सबके बीच जनता क्या करे। अरे भई, हरि का गुन गाओ…. राम का नाम भजो और अपनी दो जून की रोटी की चिंता करो। क्योंकि भूखे पेट न भजन गोपाला!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Hasya Kavita, Muktak, Poetry
चाह पूनम की थी तो अमा दे गए
रौशनी से रहित चन्द्रमा दे गए
फॉग बनकर जिन्होंने बुलाया निकट
स्मॉग बनकर वही अस्थमा दे गए
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
झलक नहीं मिलती इनके पैरों के छालों की
काँटों पर कटती हैं रातें हँसने वालों की
सब जैसी ही देह, जरा का डर इनका भी है
आयु बढ़े तो तन निश्चित जर्जर इनका भी है
भूख-तृषा की व्याधि इन्हें भी घेरे रहती है
ख़ुद से हैं बेहोश, पीर ही इनको सहती है
स्वार्थ गलाकर कुंजी गढ़ लीं ग़म के तालों की
काँटों पर कटती हैं रातें हँसने वालों की
घर-परिवार-समाज-ललक-आशा-हसरत-सपने
रिश्ते-नाते-मित्र-विरोधी-अनजाने-अपने
जन्म-मरण-अपनत्व-परायापन-संयोग-वियोग
अगिन ठहाके इन शब्दों की भट्ठी में तपने
फ़िक्र नहीं है अपने जीवन के भूचालों की
काँटों पर कटती हैं रातें हँसने वालों की
दर्द मिला; करुणा लिख डाली इसमें क्या है ख़ास
बात तभी, जब पीर पचाकर उपजा जाए हास
आँसू के गीतों से अंतर्मन धुल जाता है
किंतु हँसी से महके भीतर दिव्य पवित्र सुवास
टीस नहीं सुनती दुनिया मदिरा के प्यालों की
काँटों पर कटती हैं रातें हँसने वालों की
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Hasya Kavita, Poetry
कन्या एक कुँवारी थी
छू लो तो चिंगारी थी
वैसे तेज कटारी थी
लेकिन मन की प्यारी थी
सखियों से बतियाती थी
शोहदों से घबराती थी
मुझसे कुछ शर्माती थी
बस से कॉलेज आती थी
गोरी नर्म रुई थी वो
मानो छुईमुई थी वो
लड़की एक जादुई थी वो
बिल्कुल ऊई-ऊई थी वो
अंतर्मन डिस्क्लोज किया
इक दिन उसे प्रपोज किया
तबीयत सी नासाज हुई
वो पहले नाराज हुई
फिर बोली ये ठीक नहीं
अपनी ऐसी लीक नहीं
पढ़ने-लिखने के दिन हैं
आगे बढ़ने के दिन है
ये बातें फिर कर लेंगे
इश्क-मुहब्बत पढ़ लेंगे
अभी न मन को हीट करो
एमए तो कंप्लीट करो
उसने यूँ रिस्पांड किया
प्रोपोजल पोस्टपोंड किया
हमसे हिम्मत नहीं हरी
मन में ऊर्जा नई भरी
रात-रात भर पढ़ पढ़ के
नई इबारत गढ़ गढ़ के
ऐसा सबको शॉक दिया
मैंने कॉलेज टॉप किया
अब तो मूड सुहाना था
अब उसने मन जाना था
लेकिन राग पुराना था
फिर एक नया बहाना था
जॉब करो कोई ढंग की
फिर स्टेटस की नौटंकी
कभी कास्ट का पेंच फँसा
कभी बाप को नहीं जँचा
थककर रोज झमेले में
नौचंदी के मेले में
इक दिन जी कैड़ा करके
कहा उसे यूँ जाकर के
जो कह दोगी कर लूंगा
कहो हिमालय चढ़ लूंगा
लेकिन किलियर बात करो
ऐसे ना जज्बात हरो
या तो अब तुम हाँ कर दो
या फिर साफ मना कर दो
सुनकर कन्या मौन हुई
हर चालाकी गौण हुई
तभी नया छल कर लाई
आँख में आँसू भर लाई
हिम्मत को कर ढेर गई
प्रण पर आँसू फेर गई
पुनः प्रपोजल बीट हुआ
नखरा नया रिपीट हुआ
थोड़ा सा तो वेट करो
पहले पतला पेट करो
जॉइन कोई जिम कर लो
तोंद जरा सी डिम कर लो
खुश्बू सी खिल जाऊंगी
मैं तुमको मिल जाऊंगी
तीन साल का वादा कर
निज क्षमता से ज्यादा कर
हीरो जैसी बॉडी से
डैशिंग वाले रोडी से
बेहतर फिजिक बना ना लूँ
छः छः पैक्स बना ना लूँ
तुझको नहीं सताऊंगा
सूरत नहीं दिखाऊंगा
रात और दिन श्रम करके
खाना-पीना कम करके
रूखी-सूखी खा कर के
सरपट दौड़ लगा करके
सोने सी काया कर ली
फिर मन में ऊर्जा भर ली
उसे ढूंढने निकल पड़ा
किन्तु प्रेम में खलल पड़ा
किसी और के छल्ले में
चुन्नी बांध पुछल्ले में
वो जूही की कली गई
किसी और की गली गई
शादी करके चली गई
हाय री किस्मत छली गई
थका-थका हारा हारा
मैं बदकिस्मत बेचारा
पल में दुनिया घूम लिया
हर फंदे पर लूम लिया
अपने आँसू पोछूँगा
कभी मिली तो पूछूंगा
क्यों मेरा दिल तोड़ गई
प्यार जता कर छोड़ गई
कुछ दिन बाद दिखाई दी
वो आवाज सुनाई दी
छोड़ा था नौचंदी में
पाई सब्जी मंडी में
कैसा घूमा लूप सुनो
उसका अनुपम रूप सुनो
वो जो एक छरहरी थी
कंचन देह सुनहरी थी
अब दो की महतारी थी
तीजे की तैयारी थी
फूले-फूले गाल हुए
उलझे-बिखरे बाल हुए
इन बेढंगे हालों ने
दिल के फूटे छालों ने
सपनों में विष घोला था
एक हाथ में झोला था
एक हाथ में मूली थी
खुद भी फूली फूली थी
सब सुंदरता लूली थी
आशा फाँसी झूली थी
वो जो चहका करती थी
हर पल महका करती थी
हिरनी बनी विचरती थी
खुल्ला खर्चा करती थी
वो कितनी लिजलिजी मिली
बारगेनिंग में बिजी मिली
धड़कन थाम निराशा से
गिरकर धाम हताशा से
विधिना के ये खेल कड़े
देख रहा था खड़े खड़े
तभी अचानक सधे हुए
दो बच्चों से लदे हुए
चिकचिक से कुछ थके हुए
बाल वाल भी पके हुए
इक अंकल जी प्रकट हुए
दर्शन इतने विकट हुए
बावन इंची कमरा था
इसी कली का भ्रमरा था
तूफानों ने पाला था
मुझसे ज्यादा काला था
मुझसे अधिक उदास था वो
केवल दसवीं पास था वो
ठगा हुआ सा ठिठक गया
खून के आंसू छिटक गया
रानी साथ मदारी के
फूटे भाग बिचारी के
घूरे मेला लूट गए
तितली के पर टूट गए
रचा स्वयंवर वीरों का
मंडप मांडा जीरो का
गरम तवे पर फैल गई
किस खूसट की गैल गई
बिना मिले वापस आया
कई दिनों तक पछताया
अब भी अक्सर रातों में
कुछ गहरे जज्बातों में
पिछली यादें ढोता हूँ
सबसे छुपकर रोता हूँ
मुझमें क्या कम था ईश्वर
किस्मत में गम था ईश्वर
भाग्य इसी को कहते हैं
अब भी आँसू बहते हैं
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
भीष्म ने प्रतिज्ञा ली थी कि जो सिंहासन पर बैठेगा उसमें अपने पिता की छवि देखूंगा। भीष्म लकी थे कि उस दौर में कांग्रेसी और भाजपाई लोग नहीं थे। वरना कोई भी चैनल अपने प्राइम टाइम में विरोधी पार्टी वाले किसी बड़बोले को बुलवाकर भीष्म की प्रतिज्ञा का ऐसा हश्र करता कि भीष्म उसका एक्सप्लेनेशन देने की बजाय इच्छामृत्यु का ऑप्शन सेलेक्ट करना ज़्यादा ईज़ी समझते।
भीष्म की इस प्रतिज्ञा को अवसरवाद का उदाहरण बताकर यह कहा जा सकता था कि यह तो सरासर ओछापन है। चापलूसी की हद है कि जो भी सिंहासन पर बैठेगा उसी को बाप बना लेगा। कोई पात्रा टाइप का प्रवक्ता कहता कि ये तो इनकी पुरानी परंपरा है। इनके पिता ने भी गधे को बाप बनाया था। इनकी दादी ने भी गधे को बाप बनाया था। इनके नाना तो गधे थे ही। …कैसा दोहरा मापदंड है। गधे को बाप बना सकते हो लेकिन गाय को माता नहीं मान सकते। वाह जी वाह… ये सब नहीं चलेगा।
पूनावाला टाइप कोई प्रवक्ता कह सकता था कि बायलॉजिकली यह पॉसिबल तभी है जब डीएनए सेम हो। भीष्म ने इनडायरेक्टली यह कहा है कि जो सिंहासन पर बैठेगा उसकी शक्ल मेरे पापा से मिलती होगी। यह शुद्ध भाई-भतीजावाद है। बीजेपी हमेशा कांग्रेस को एक परिवार की पार्टी कहती रही है लेकिन बीजेपी में बेटे-बहुओं को आउट ऑफ टर्न आगे लाया जाता रहा है।
सिन्हा साहब संभाले हुए स्वर के साथ कहते महाभारत में ऐसी कोई प्रतिज्ञा का ज़िक्र ही नहीं मिलता। यह प्रतिज्ञा तो मुग़ल काल में बाबर ने ली थी कि वे रामलला के मंदिर में मस्जिद की छवि देखेंगे। इस तथ्य के ठोस प्रमाण मैगस्थनीज़ के यात्रा वृत्तांत में मिलते हैं कि जब वे बुलेट ट्रेन से दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन पर उतरे तो उन्हें प्लेटफॉर्म नंबर 7 से अयोध्या के भव्य राममंदिर का स्वर्ण शिखर दिखाई दिया।
उधर ओवैसी इस प्रतिज्ञा पर बोलते हुए बताते कि हिन्दू मैरिज एक्ट में अपनी फेयोंसी से अपने वालिद की शादी कराना ग़ैरक़ानूनी है। इसलिए जनाब भीष्म को और उनके वालिद साहब को इस जुर्म के लिए सज़ा होनी चाहिए। मुस्लिम पर्सनल लॉ में इस मुद्दे पर तफसील से साफ किया गया है लेकिन भीष्म क्योंकि हिन्दू हैं इसलिए उन पर मुस्लिम पर्सनल लॉ इम्पलीमेंट नहीं होता।
इन चारों के बयान के बाद बॉय कट हेयर स्टाइल को झटकते हुए एंकर अपना फैसला सुनाती – मतलब साफ है कि भीष्म को सिंहासन पर प्रतिज्ञा नहीं लेनी चाहिए थी। पिता की छवि सिंहासन से सुंदर है। मतलब भीष्म पिता हैं और पितामह भी। इस बुलेटिन में फिलहाल इतना ही देखते रहिये टाइम पास।
✍️ चिराग़ जैन