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भारत-पाकिस्तान संबंध

मोदी जी – “नवाज़ साहब, आप ये बार बार सीमा की शांति क्यों भंग करते हो?”
नवाज़ – “अरे मोदी जी, हमारे यहाँ 8 राज्य हैं, उनमें चुनाव होते हैं तो जनता का समर्थन जुटाने के लिए हमें भारत से छेड़ छाड़ करनी पड़ती है।”
मोदी जी – “ऐसा करके क्या सचमुच चुनाव जीता जा सकता है?”
नवाज़ – “100℅”
मोदी जी – “तो बेट्टा, अब तू देख। हमारे यहां 29 तो राज्य हैं, फिर 7 केंद्र शासित प्रदेश, फिर राज्यसभा के चुनाव, फिर नगर निगम …और हम तो यूनिवर्सिटी इलेक्शन तक को सीरियसली लेते हैं। तुम छेड़छाड़ की बात कर रहे हो हम तो छू छू कर ही मार डालेंगे।”

✍️ चिराग़ जैन

अहो! शिक्षक-शिष्य सम्बन्ध

सारांश : शिक्षकों की ट्यूशन-लोलुपता ने भारतीय शिक्षा-व्यवस्था को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की हैं। युग-युग से योग्य शिष्य ढूंढ़ने में रत शिक्षकों ने अब ग्राहक ढूंढ़कर आत्मकल्याण की राह पकड़ ली है। शिष्य-शिक्षक परम्परा के इस महती परिवर्तन की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया की सूक्ष्म कथा है यह लेख :

स्वाधीन भारत में शिक्षकों का काफी विकास हुआ है। आज़ादी से पहले हमारे देश में शिक्षकों का इतना विकास नहीं हो सका था। इसका प्रमुख कारण यह था, कि आज़ादी से पहले हम ग़ुलाम थे, अतएव शिक्षकों को अपनी बहुआयामी प्रतिभा दिखाने का अवसर नहीं मिल पाता था। शिक्षक जानते थे कि जो विद्यार्थी स्वयं तैरकर नदी पार कर रहा हो, वह गुरुजी की नैया को कैसे पार लगा पाएगा? जब तक पाठशाला पहुँचने वाले छात्रों के कपड़ों में नदी का जल विद्यमान रहा तब तक शिक्षकों की आँखों में भी जल पाया जाता था अतः वे अपने निजी स्वार्थों को विस्मृत करके, विद्यार्थियों को योग्य मनुष्य बनाने में संलग्न रहते थे। किन्तु अब शिक्षक जान गए हैं कि एक टुच्ची-सी तनख़्वाह के लालच में बेचारे विद्यार्थियों को कूट-पीटकर संस्कारवान मनुष्य बनाने का यत्न कोरा अत्याचार है। पहाड़ों और वर्णमाला जैसी जटिलताओं से हँसता-खेलता बचपन मर जाता है। किताबों के बोझ तले उनकी शरारतें दब जाती हैं। इसलिए आज़ादी के बाद शिक्षकों ने विद्यार्थियों को पढ़ाना बंद कर दिया।
धीरे-धीरे विद्यालयों में एक ऐसा सौहार्दपूर्ण वातावरण विकसित हो गया कि विद्यालय जाने के नाम पर कतराने वाले विद्यार्थी अब बड़े चाव से विद्यालय जाने लगे हैं। शिक्षकों और शिक्षार्थियों के मध्य एक ऐसा अनकहा समझौता हो गया है कि शिक्षकों ने विद्यार्थियों से सम्मान की उम्मीद समाप्त कर दी और विद्यार्थियों ने शिक्षकों से ज्ञान की।
शिक्षक अब जान गए हैं कि मनुष्य के सर्वांगीण विकास के ताले खोलने के लिए कुंजी की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए वे विद्यार्थियों को बताते हैं कि नन्दलाल दयाराम की कुंजी में ही सफलता के सूत्र ‘छपे’ हुए हैं। तुम इन कुंजियों से पढ़कर अवश्य उत्तीर्ण हो जाओगे, क्योंकि हम इन्हीं कुंजियों के मुताबिक़ सफलता की राह पर परीक्षा-पत्र के ताले जड़ेंगे।
शिक्षक जान गए हैं कि विद्यालय के शोरगुल में अध्ययन संभव नहीं है। इसलिए वे छात्रों को शांत स्थान पर शिक्षा अध्ययन हेतु प्रेरित करते हैं। शांत स्थान अर्थात् मास्टर जी का घर। छात्र अपने अभिभावकों से गुरु-दक्षिणा की रक़म लेकर मास्टर जी के चरणों में अर्पित कर देते हैं। इस नवधा भक्ति से मास्टर जी के भीतर का दिव्य पुरुष प्रसन्न हो जाता है। वह छात्रों को बिना कुछ किए परीक्षा उत्तीर्ण करने का आशीर्वाद देते हैं। और इसके तुरंत बाद छात्र अन्तर्धान हो जाते हैं। शिक्षक जानते हैं कि छात्र घर से एकांत अध्ययन हेतु निकला है किन्तु वह पथभ्रष्ट होकर सिनेमा की ओर जा रहा है। यह सब जानते हुए भी शिक्षक मौन रहता है क्योंकि वह यह भी जानता है कि उसके घर के रसोईघर में नमक का डिब्बा उसी छात्र के द्वारा प्रदत्त गुरु-दक्षिणा की कृपा से भरा हुआ है। नमक के प्रति कृतज्ञता के भाव से भरा हुआ शिक्षक जानता है कि अपने भरतार के कृत्यों की आलोचना महापाप है।
शिक्षक बच्चों को प्रताड़ित करने में नष्ट होने वाले समय को अब स्टाफ रूम में बैठकर देश और समाज की समस्याओं पर चिंतन करने में उपयोग करने लगे हैं। सरकार द्वारा मिलने वाला बोनस कितना बनेगा; इसकी पाई-पाई कैलकुलेशन गणित के अध्यापक कर देते हैं। सभी शिक्षक काग़ज़ पर गणित के अध्यापक द्वारा लिखी गई आंकड़ों की इबारत पढ़कर धन्य हो जाते हैं। अर्थशास्त्र के अध्यापक बता देते हैं कि बाज़ार में कौन से शेयर का भाव बढ़ने वाला है। इस ज्ञान को प्राप्त करते ही सभी शिक्षकों के अंतर्मन से साधु-साधु की दिव्य ध्वनि निकलने लगती है।
सामान्य ज्ञान के अध्यापक बताते हैं कि अमुक कक्षा में अमुक बिल्डर का बेटा शिक्षाध्ययन कर रहा है। उसे प्रसन्न रखने से टू बीएचके फ़्लैट कम मूल्य पर प्राप्त किया जा सकता है। सभी शिक्षकों के हृदय में उस छात्र के प्रति प्रेम और आदर घुमड़ने लगता है। यकायक उमड़े इस स्नेह को देखकर छात्र डर जाता है। वह अपने बिल्डर पिता से शिक्षकों के इस विचित्र रवैये की शिक़ायत करता है। चिंतित पिता अपने मित्र अर्थात् विद्यालय के सामान्य ज्ञान के अध्यापक को फोन मिलाते हैं। मित्र समस्या को गंभीरतापूर्वक सुनता है और चिंतित स्वर में बिल्डर को मास्टरों की मंशा बता देता है। बिल्डर, मित्र की सहायता से बेटे का दाख़िला किसी अन्य विद्यालय में करवा देता है और मित्र की सहृदयता से प्रसन्न होकर उसे एक थ्री बीएचके फ़्लैट का उपहार दे देता है। सभी शिक्षकों का हृदय अचानक सामान्य ज्ञान के अध्यापक के प्रति घृणा से भर उठता है।
विद्यार्थी, जी तोड़कर परिश्रम करते हैं। शिक्षक भी जी तोड़कर मेहनत करते हैं। किन्तु किसी एक वर्ग का परिश्रम किसी भी स्थिति में दूसरे वर्ग के परिश्रम का मार्ग अवरुद्ध नहीं करता। शिक्षक महोदय परिश्रम करते-करते एक दिन विद्यालय छोड़ देते हैं। छात्रों का परिश्रम एक दिन उनसे विद्यालय छुड़वा देता है। दोनों अचानक एक दिन सब्ज़ी मंडी में लौकी के ठेले पर मिलते हैं। छात्र अभिभूत होकर मास्टर साहब के पैर छू लेता है। मास्टर जी गुरुभक्ति से प्रसन्न होकर लौकी छाँटने में छात्र की सहायता करते हैं। छात्र गुरुकृपा से अनुग्रहीत होकर दाम चुकाने में मास्टर साहब की सहायता करता है।
फिर दोनों अपना-अपना झोला लटकाए जूतियां चटखाते हुए अपनी-अपनी राह पर चल देते हैं। दोनों की आँखें नम हो जाती हैं। दोनों के हृदय में एक जुमला गूंजने लगता है, ‘अहो! शिक्षक-शिष्य सम्बन्ध।’

✍️ चिराग़ जैन

भारतीय सेना और पाकिस्तान

भारतीय सेना दैदीप्यमान सूरज है। उसे घूर कर देखोगे तो उसके बाद एक दिन क्या पूरा जीवन ही काला दिखाई देगा।

हमें क्या पता था कि कश्मीरियों ने जो पत्थर भारतीय सेना पर फेंके थे वो पाकिस्तान की अक्ल पर जा पड़ेंगे।

जिस सिस्टम से हम जीवन की मूलभूत ज़रूरतों की मांग करते हैं, वो मरने की व्यवस्था भी ठीक से कर देता तो गनीमत थी।

पाकिस्तान को तो देवी मैया ने बचा रखा है। अगर नवरात्रों ने “लाहौरी नमक” न खाया होता तो भारत माता इस ससुरे को कबका महिषासुर बना चुकी होती।

✍️ चिराग़ जैन

थाने में फिर कभी न आना

चुन्नू-मुन्नू थे दो भाई
प्रॉपर्टी पर हुई लड़ाई
चुन्नू बोला मैं भी लूंगा
मुन्नू बोला कभी न दूंगा

झगड़ा सुनकर जिप्सी आई
दोनों को थाने ले आई

थोड़ा तू दे चुन्नू बेटा
थोड़ा तू दे मुन्नू बेटा
थाने में फिर कभी न आना
अपना झगड़ा खुद निपटाना

✍️ चिराग़ जैन

साहित्य को कालजयी बनाने में व्यवस्था का योगदान

जो लोग इस देश में व्यवस्था की शिक़ायत करते नहीं थकते, मैं उन्हें साफ़-साफ़ कह देना चाहता हूँ कि इस देश की व्यवस्था पूरी तरह कला और साहित्य के पक्ष में है। यह व्यवस्था की ही मेहरबानी है कि हमारी हर फ़िल्म, हर उपन्यास, हर कहानी और हर व्यंग्य कविता कालजयी हो जाती है। सुधारवादी और विकासवादी व्यवस्थाओं में इसकी संभावना शून्यप्रायः होती है।
अंग्रेजी में कोई लेखक यदि अपने समाज में व्याप्त किसी समस्या पर कहानी लिख दे, तो सरकार तुरंत उस समस्या को ठीक करने में लग जाती है और समस्या के ठीक होते ही वह कहानी सन्दर्भविहीन होकर काल के गाल में समा जाती है। हमारे देश में साहित्य के साथ ऐसा दुर्व्यवहार न हो, इसीलिए हमने एक ऐसे सिस्टम को बढ़ावा दिया है जिसमें कोई भी लेखक किसी भी समस्या पर अपनी क़लम चलाए तो कम से कम अपने जीते जी वह उस कृति को मरते हुए न देखे।
पुलिसिया भ्रष्टाचार को समाप्त करना हमारे लिए बाएँ हाथ का काम है। सरकार आज चाहे तो अपने पुलिस महकमे को बोल सकती है कि अब हमारा पेट भर गया है और घर भी। हमारे पास रिश्वत की कमीशन का धन रखने को तिल भर भी स्थान शेष नहीं है। इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए कृपया सभी पुलिसवाले सुधर जाएँ और जनता को प्रताड़ित करना बंद करके जनता की सेवा हेतु समर्पित हो जाएँ। …कितना आसान तरीक़ा है। लेकिन सरकार ऐसा करती नहीं है। क्योंकि कुछ लाख रुपये की कमीशन के बोझ से अपना पीछा छुड़ाकर वह अमूल्य साहित्य की हत्या नहीं कर सकती। इसलिए हमारी ब्यूरोक्रेसी और राजनीति अपने घरों में, दीवारों में, नींव में, छतों पर और यहाँ तक कि टॉयलेट में भी धन भरे जा रहे हैं, लेकिन साहित्य की अविरल धारा पर आँच नहीं आने दे रहे।
ज़रा सोचो, यदि पुलिस-वकील-अदालतें और सरकारी दफ्तर सुधरकर जनता की सेवा में जुट गए, तो मुंशी प्रेमचंद, सआदत अली मंटो, मोहन राकेश, महाश्वेता देवी और ऐसे ही हज़ारों लोगों को ऊपर जाकर क्या मुँह दिखाएंगे इस देश के कर्णधार? यदि भारत पुनः सोने की चिड़िया बन गया तो भारतेंदु की ‘भारत दुर्दशा’ की क्या दुर्गति होवेगी। यदि घरेलू हिंसा में लड़कियों का मारा जाना बंद हो गया तो निराला की ‘सरोज स्मृति’ पढ़कर किसे सिहरन होगी। यदि मुसलमानों का जीवन स्तर पूरी तरह से विकास के पथ पर बढ़ निकले तो राही मासूम रज़ा का ‘आधा गाँव’ किस मुहर्रम में जाकर अपना ताज़िया निकालेगा। यदि हिन्दू मान्यताओं में बढ़ते आडम्बर को समाप्त कर दिया गया तो गाय की पूँछ पकड़कर वैतरणी पार करता होरी, प्रेमचंद की खिल्ली नहीं उड़ाएगा!
साहित्य और कला के प्रति अनुराग ने हमारी व्यवस्था को न कभी बदलने के लिए प्रेरित होने दिया, और न ही कभी किसी प्रकार के भ्रष्टाचरण पर शर्म महसूस होने दी। इससे एक लाभ और है कि हमें अपनी बात में कविता और शेर उद्धृत करने के लिए हर दो साल बाद किताबें नहीं पलटनी पड़तीं। चार-पाँच शेर याद करके ख़ुद पर ‘हाज़िरजवाबी’ का तमगा लगवाने की सुविधा इसी व्यवस्था ने हमें दी है। कुछ लोग तो दुष्यंत के एक शेर के भरोसे पूरा जीवन बिता लेते हैं-

कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो

सब जानते हैं कि अव्वल तो कोई पत्थर उछालनेवाला ही नहीं है और अगर कहीं उछल भी गया तो मुल्क़ की तबीयत इतनी ख़राब कर के छोड़ दी गई है कि कोई भी उछला हुआ पत्थर उछालनेवाले की ख़ुद की खोपड़ी में सूराख़ करने से अधिक कमाल नहीं दिखा सकता।
अंत में, दुष्यंत कुमार का एक ऐसा ही शेर मैं भी उद्धृत कर देता हूँ, जिससे इस देश के सत्तर प्रतिशत चिंतित लेख पिछले तीस साल से प्रारम्भ या अंत करते रहे हैं-

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

✍️ चिराग़ जैन

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