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परिंदों का सिहर जाना अचानक
किसी आहट से डर जाना अचानक

तुम्हारा लौट कर जाना अचानक
नई ख़ुशियों का मर जाना अचानक

कई दिन से जो मन में उठ रही थी
उस आंधी का गुज़र जाना अचानक

अचानक ज़िन्दगी से जा रहे हो
कभी हो पाए तो आना, अचानक

✍️ चिराग़ जैन

कहानी

शब्दशः याद है मुझे
डाकू खड्गसिंह
घोड़ा सुल्तान
बाबा भारती
घोड़ा चुराने की धमकी
बाबा का भय
खड्गसिंह की चाल
ग़रीब का वेष बनाना
घोड़ा छीनना
बाबा का उसे टोकना…

सुनो! इस घटना का ज़िक्र
किसी से मत करना
वरना लोग छोड़ देंगे
मजबूरों की सहायता करना।

यहाँ तक की कहानी
रोज़ देखता हूँ अपने आसपास
कभी खड्गसिंह बनकर
कभी बाबा भारती बनकर।

लेकिन इसके आगे
न तो कभी
कोई खड्गसिंह आया
मेरे अस्तबल में घोड़ा बांधने
न मैं ही जा पाया
किसी बाबा भारती का
सुल्तान लौटाने।

✍️ चिराग़ जैन

भावना की डगर

भावना की डगर भी सहज तो नहीं
इस डगर पर स्वयं का तिरस्कार है
प्रेम जिससे किया वो परेशान है
और जिसने किया प्रेम, लाचार हैै

मन हुआ मुग्ध जिस पर, उसी शख़्स के
हर कथन को कथानक बनाता रहा
प्रियतमा के नयन की चमक को सदा
कर्म का एक मानक बनाता रहा
स्वार्थ की क्यारियों में समर्पण खिला
अब यहाँ तर्क की बात बेकार है

राह चलते हुए प्रेम का हादसा
कौन जाने, कहाँ, कब घटित हो गया
एक पावन लम्हा ज़िन्दगी से जुड़ा
तन निखरता गया, मन व्यथित हो गया
बस वही इक लम्हा, बस वही हादसा
बस उसी से सुखों का सरोकार है
✍️ चिराग़ जैन

दिल टूट गया

आस का दामन छूट गया
लगा मुक़द्दर फूट गया
फिर से पलकें भीग गईं
लो फिर से दिल टूट गया

पहले भी कई बार हुआ
मन में ग़ज़ब ख़ुमार हुआ
नैनों में सपने उभरे
और ये दिल लाचार हुआ
अब फिर वही कहानी है
हालत वही पुरानी है
अमृत पीना चाहा तो
भीतर कड़वा घूंट गया

प्यार हुआ तो पीर मिली
सबको ये तक़दीर मिली
कब लैला को क़ैस मिला
कब रांझे को हीर मिली
सबका ये अफ़साना है
क़िस्सा वही पुराना है
कहीं ज़माने की ज़िद थी
किसी से दिलबर रूठ गया

जीवन एक कहानी है
दुनिया आनी-जानी है
फिर भी गर दिल रोए तो
ये इसकी नादानी है
नादानी क्यों करता है
क्यों सपनों पर मरता है
जीवन भर का सच बाक़ी
पल दो पल का झूठ गया
✍️ चिराग़ जैन

अब तो ख़ुश हो!

जिस सपने से डर लगता था
उसको ही साकार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!

मैं कहता हूँ- ‘तुम चाहो तो अब भी परिवर्तन संभव है
स्थितियों का अपने हित में फिर से संयोजन संभव है’
तुम कहती हो- ‘छोड़ो भी अब, सारा सोच-विचार कर लिया’
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!

तुम कहती हो- ‘इतना समझो, ऐसा ही ये जीवन मग है
अपना साथ यहीं तक का था, आगे अपनी राह अलग है’
इतनी आसानी से तुमने जब ख़ुद को तैयार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!

‘अपना क़िस्सा ख़ास नहीं है, ऐसा तो सौ बार हुआ है
जब संवेदी मन पर हालातों का निष्ठुर वार हुआ है’
आज तुम्हारी इन बातों का मन ही मन सत्कार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!

करता हूँ मनुहार अगर मैं तो तुम झुंझलाने लगती हो
स्वर ऊँचा करके मन की सच्चाई झुठलाने लगती हो
ज्ञात मुझे है, तुमने ऐसा क्यों अपना व्यवहार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!

तुम पर मैं अधिकार जताऊँ, ऐसे तो हालात नहीं हैं
मेरे गीतों में तुम उतरो, अब ये अच्छी बात नहीं है
मन के अहसासों का मैंने, सीमित अब संसार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!

‘व्यवहारिकता की चैखट पर, भावुक होने से क्या होगा
दिल में पीर भरी है लेकिन, नयन भिगोने से क्या होगा’
-इन कड़वे तर्कों को मैंने जीवन का आधार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!

वैसे तुम व्यवहारिक हो तो आँखों में गीलापन क्यों है
मेरे दुख को देख तुम्हारे मन में इतनी तड़पन क्यों है
अब तक सच के साथी थे, अब पर्दा भी इकसार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!

✍️ चिराग़ जैन

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