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एकाकी

सिर्फ दिखावे भर के सारे उत्सव मेले हैं
सब अपने-अपने जीवन में निपट अकेले हैं

अपनेपन का नाम सुना है, शक्ल नहीं देखी
रिश्तों पर मिटने वालों की नस्ल नहीं देखी
बाहर से ख़ुश हैं पर भीतर बहुत झमेले हैं

वैभवशाली दिखने की इक होड़ लगी है रे
जर्जरता भी बाहर से बेजोड़ लगी है रे
हीरे बनकर घूम रहे मिट्टी के ढेले हैं

बेमतलब की प्रीत, ठिठोली पीछे छूट गई
मन से मन तक जाने वाली डोरी टूट गई
कौन बताए किसको किसने क्या दुःख झेले हैं

जिनसे अपनापन चाहा उनसे सम्मान मिला
संबंधों की नब्ज़ छुई तो मन बेजान मिला
वाणी पर है शहद दिलों में सिर्फ करेले हैं

क्या संबंधों वाले सारे किस्से झूठे थे
या सचमुच पिछली पीढ़ी के लोग अनूठे थे
क्या अब भी दुनिया में वैसे कुछ अलबेले हैं

✍️ चिराग़ जैन

नया पड़ोसी

पिछले महीने
नया पड़ोसी आया है।
दुश्मन लगता है
पिछले जन्म का।
कमबख्त
पुराने गानों का शौक़ीन है।
रोज़ रात
दुनिया भर के सोने के बाद
युद्ध शुरू करता है।
कभी रफ़ी, कभी हेमंत, कभी लता।
ख़ुद तो सो जाता है
आध-पौन घंटे में
लेकिन उसे क्या पता
क्या क्या गँवा बैठता हूँ मैं
रोज़ रात।

बदला भी लूँ तो कैसे
उसके लिए तो ये सब
सिर्फ़ लोरी के काम आता है
उसे क्या पता
क्या होता है
जब रेकॉर्ड पर बजता है-
“मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है”

✍️ चिराग़ जैन

बुलंदी

क्या हुआ हासिल बुलंदी पर पहुँच कर ऐ ख़ुदा
जश्ने-दिल यां जश्ने अब्रां, जश्ने-रूह, जश्ने-सबा

✍️ चिराग़ जैन

तलाश

रेल की खिड़की में बैठी तुम
अपनी हथेलियों में
तलाशती रह गईं मुझको
और प्रेम
सरसों सा फूलता रहा
धरती की हथेलियों में पड़ी
लोहे की लम्बी लकीरों के
दोनों ओर
दूर तक
…बहुत दूर तक।

✍️ चिराग़ जैन

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