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मास्टरजी की ऐसी-तैसी

‘मनसुख’ अपने खेत के एक कोने में पक्षियों के लिए चुग्गा डाल रहा था। उसे ऐसा करते देख गाँव के मास्टरजी ने उसे रोकना चाहा। मनसुख ने मास्टरजी को निष्ठुर, निर्दयी और चिड़िया-विरोधी कहकर अपमानित किया और सारे गाँव में कहता फिरा कि ”मास्टर ‘चुग्गा विरोधी गैंग’ का सरगना है। खाली पड़े खेत में चिड़ियों को चुग्गा डालता हूँ, बेचारी चिड़ियों का पेट भर जाता है। इसमें इस मास्टर का क्या जाता है!”
किसान ने यह बात इतने ज़ोर-शोर से प्रसारित की कि गाँव के कुछ लड़कों ने ‘पंछी करुणा दल’ बनाकर बात को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया।
किसी ने कहा, मास्टर चाहता है कि चुग्गे का अन्न मास्टर को दे दिया जाए। किसी ने कहा कि मास्टर चिड़ियों को समाप्त करके, ख़ुद पूरे आकाश में उड़ना चाहता है। किसी ने कहा कि मास्टर किसान के खेत हड़पने का षड्यंत्र कर रहा है।
मास्टर को देखते ही ‘पंछी करुणा दल’ के लड़के नारा लगाने लगे- ‘हम चिड़ियों के ख़ास हितैषी, मास्टरजी की ऐसी-तैसी।’
इन सब बातों से आहत होकर मास्टरजी ने चुप्पी ओढ़ ली। किसान और गाँव के लड़के मास्टर को जलाने के लिए जेब से पैसा ख़र्च करके मनसुख के खेत में चुग्गा डालने लगे। पंछियो के झुंड के झुंड खेतों पर मंडराने लगे।
बुआई का समय आया तो मनसुख ने चुग्गा डालना बन्द कर दिया और खेत में बीज बोए। पंछियों ने बुआई का एक-एक बीज चुग्गा समझकर चुग लिया। मनसुख को दुःख तो हुआ लेकिन उसे इस बात की ख़ुशी ज़्यादा थी कि मास्टर के बच्चे की हेकड़ी निकल गयी और चुग्गा डालने की परंपरा स्थापित हो गयी।
अगले दिन मनसुख ने फिर बीज बोए। लेकिन अब तक उसकी स्थापित की हुई परम्परा जड़ पकड़ चुकी थी। एक सप्ताह तक किसान रोज़ बुआई करता रहा लेकिन पंछियों को खेत से उड़ाने का साहस न जुटा सका, क्योंकि परम्परा उसी की बोई हुई थी।
अब मनसुख को पंछियों पर क्रोध आने लगा लेकिन ज्यों ही उसने पंछी भगाने के लिए उठने लगा तो देखा कि सामने से ‘पंछी करुणा दल’ के लड़के बोरी भर मक्का लिए चले आ रहे थे। पास आकर बोले, आओ मनसुख भाई, खेत में चुग्गा डालें।
मनसुख निरुत्तर बैठा रहा। लड़के नारा लगाते हुए उसके खेत में चुग्गा डालने लगे। मनसुख का गला रुंध गया, आँखें डबडबा आईं लेकिन कानों में लड़कों की आवाज़ लगातार आ रही थी- ‘…मास्टरजी की ऐसी-तैसी।’

✍️ चिराग़ जैन

हरिया और आमबाग़

किसी गाँव में आम का एक पुराना बाग़ था। बाग़ में आम के सैंकड़ों पेड़ थे। लेकिन बाग़ पर किसी की कोई मिल्कियत नहीं थी। जब आम की ऋतु आती थी तो इन पेड़ों पर ख़ूब आम लगते। गाँव के शरारती लड़के, आम से लदी डालियों को बेरहमी से नोच डालते।
जिसका एक पिता नहीं होता, उसकी सफलता पर उसके अनेक बाप पैदा जाते हैं। यही इस आमबाग़ की स्थिति थी। फल लगने पर पूरा गाँव इस बाग़ के फल खाता, लेकिन इसकी देखभाल करने कभी कोई नहीं आता।
मुद्दतों से बेचारा बाग़ स्वयं ही अपनी देखरेख कर रहा था। फल के मौसम में जो आम स्वतः धरती पर गिर जाते, वे अपने आप ही बरसात के पानी के भरोसे पनप जाते थे। इस तरह बाग़ में नये वृक्ष उगते रहते थे। हाँ, यदि कभी कोई वृक्ष बीमार हुआ तो वह भी इलाज न मिलने के कारण अपने आप ही ठूठ में तब्दील हो गया।
निराई और सफाई के अभाव में बाग़ में उगी खरपतवार भी स्वयं को वृक्ष समझने लगी थी। एक दिन गाँव के एक युवक, हरिया ने इस बाग़ के प्रति कृतज्ञताज्ञापन करने की सोची। उसने स्वतः सिंचित इस बाग़ में सिंचाई के लिए ट्यूबवेल लगवाया। दिन-रात परिश्रम करके निराई, सफाई और छँटाई शुरू की।
लावारिस आम के पेड़ों को इस तरह सँवारते देखा तो गाँववालों ने हरिया पर यह आरोप लगाना शुरू किया कि यह बाग़ पर कब्ज़ा करना चाहता है। इस आरोप की परवाह न करते हुए कर्मठ हरिया खरपतवार हटाते हुए आम के पेड़ों की दशा सुधारने में रत रहा।
कभी किसी ने सरकारी दफ़्तर में जाकर उसकी शिक़ायत की, तो वह कलेक्टर ऑफिस में जाकर अपनी नीयत का स्पष्टीकरण दे आया। किसी ने गाँव के बुजुर्गों को उसके खि़लाफ़ भड़काने का प्रयास किया तो बुज़ुर्ग बाग़ पर आ पहुँचे, लेकिन उसकी लगन और मेहनत देखकर उसे चेतावनी की बजाय शाबासी देकर लौट गये।
हरिया इतने बड़े बाग़ में अकेला जुटा रहा। ज्यों-ज्यों बाग़ की दशा सुधरने लगी, त्यों-त्यों गाँव का एक तबका हरिया की प्रशंसा भी करने लगा। लेकिन बाग़ की डालियाँ नोचनेवाले शरारती लड़कों का अब बाग़ में मनमाना प्रवेश अवरुद्ध हो गया। उधर जो खरपतवार स्वयं को बाग़ का हिस्सा समझने लगी थी, उसे हरिया ने जड़ से उखाड़कर बाग़ से बाहर फेंकना शुरू कर दिया।
आजकल खरपतवार और शरारती लड़कों ने हरिया के विरुद्ध अभियान छेड़ रखा है। मालिकाना हक़ की अफ़वाह झूठ साबित हो जाने के बाद गाँव के लड़के गाँववालों को यह कहकर भड़का रहे हैं …कि हरिया ने बाग़ के आम खाने के लिए यह सब काम शुरू किया है। …कि हरिया बाग़ की देखभाल करने के बहाने धंधा कर रहा है।
उधर, बाहर पड़ी खरपतवार उन पेड़ों के कान भर रही है, जो अभी हरिया की साफ-सफाई के दायरे में नहीं आ सके हैं।
गाँव के बुजुर्ग हरिया के अनवरत श्रम में बाग़ का सुव्यवस्थित भविष्य देख पा रहे हैं, लेकिन ज़मीन का शोषण करनेवाली खरपतवार और डालियों को नोचनेवाले अमानुष, हरिया से नाराज़ हैं। उन्हें यह बात समझ ही नहीं आ रही कि आम खाने के लिए किसी को बाग़ में पसीना बहाने की ज़रूरत नहीं थी। यदि हरिया यह सफाई अभियान न छेड़ता, तब भी वह बाग़ के फल तो खा ही रहा था।
हरिया ने बचपन से सुना है कि भले का अंत भला ही होता है, उपद्रवियों ने सुन रखा है कि बार-बार बोला गया झूठ, एक दिन सच साबित हो जाता है। इन दोनों तथ्यों के बीच, हरिया अनवरत आम के पेड़ों को दुलार रहा है। बाग़ हरिया के प्रति कृतज्ञ तो है, लेकिन उस खरपतवार से निगाह नहीं हटा पा रहा है, जो रह-रहकर जड़ों के रास्ते बाग़ में घुसने की जुगत लगाती रहती है।
✍️ चिराग़ जैन

रोटी का स्वाद

एक फ़कीर किसी गाँव में प्रवास कर रहे थे। प्रवास के दौरान उन्हें पता चला कि गाँव से कुछ दूर जंगली मनुष्यों की एक बस्ती है, जिन्होंने कभी रोटी नहीं खाई। वे आज भी कंद-मूल और जानवरों को खाकर जीवनयापन कर रहे हैं।
फ़क़ीर ने आठ-दस रोटियाँ बनवाकर अपने झोले में रखीं और उस बस्ती की ओर चल पड़े। एक भक्त ने टोका – ‘महाराज, वहाँ कम-से कम साठ-सत्तर जंगली रहते हैं। उनका इन आठ-दस रोटियों से कैसे पेट भरेगा?’
फ़क़ीर ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘मैं उनका पेट भरने नहीं जा रहा हूँ। मुझे बस उन्हें रोटी का स्वाद चखाना है, फिर पेट भरने का काम तो वो ख़ुद कर लेंगे।’

✍️ चिराग़ जैन

वन्स अपॉन ए टाइम

वन्स अपॉन ए टाइम। जम्बूद्वीपे भरतखण्डे एक ऐसा राजा था, जिसे प्रशंसा सुनने का बहुत चाव था। उसने राजा बनते ही अपने महल में से बहादुर सिपाहियों को हटाकर वहाँ सैनिक के कपड़ों में प्रशंसक खड़े कर दिए।
प्रशंसा और चाटुकारिता की क्षमता देखते हुए राजतंत्र को पद तथा पदोन्नतियाँ दी गईं। जब कोई नागरिक राजा के दरबार में समस्या लेकर जाता तो प्रशासकों के वेश में बैठे चाटुकार, उसकी समस्या सुनने के बजाय उसे राजा की प्रशंसा से भरी पुस्तिका थमा देते। जो कोई राज्य की किसी अव्यवस्था या समस्या की बात करता, उस पर राजद्रोह का अभियोग चलाकर उसे पड़ोसी देश चले जाने का दण्ड सुना दिया जाता।
एक दिन राज्य पर शत्रु ने आक्रमण कर दिया। सारा राज्य तहस-नहस हो गया। जनता मरती रही और राजमहल राजा की महानता की पुस्तिकाएँ जारी करता रहा। राज्य को ध्वस्त करने के बाद शत्रु राजमहल में घुस गया।
राजा अपनी जान बचाने के लिए भागने लगा। उसने महल के द्वार पर खड़े सिपाही से रक्षा करने की गुहार की। गुहार सुनते सैनिक ने अपने शस्त्र नीचे रखे और तालियाँ बजाते हुए गाने लगा- ‘वाह महाराज, क्या भाग रहे हैं! वाह राजन, क्या दौड़ रहे हैं!’
अगले दिन प्रशंसा पुस्तिका में छपा- ‘हमारे राजा ने विश्व में सबसे तेज़ दौड़ने का कीर्तिमान स्थापित किया।’

✍️ चिराग़ जैन

भई संतन की भीड़

गोस्वामी तुलसीदास ने रामायण का अवधी में अनुवाद करके रामचरितमानस लिखी। संस्कृत विद्वानों ने ‘कट्टर संस्कृतभाषी’ नामक व्हाट्सएप ग्रुप में मानस को संस्कृत के लिए संकट घोषित करते हुए फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम पर तुलसी विरोध की फौज तैयार कर ली।
मानस अनपढ़ों का ग्रन्थ है, तुलसी की जाति का पता नहीं है, तुलसी अनपढ़ है, तुलसी भिखमंगा है जैसे मेन्युपुलेटिड तथ्यों से शुरू होकर तुलसी मुग़लो का चमचा है, तुलसी विदेशी फंडिंग से देशविरोधी गतिविधियाँ करता है, तुलसी खानखाना का दोस्त है, तुलसी हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान कर रहा है, तुलसी का असली नाम तुफ़ैल खान है, तुलसी मुफ्त का चन्दन घिसता रहता है – जैसे आधारहीन विवादों तक तुलसी का विरोध हुआ। टेक्स्ट, पोस्टर, फ़ोटो, वीडियो और ऑडियो जैसे हर माध्यम से व्यवस्थित रूप से मानस और तुलसी का विरोध किया गया। कई दिन तक हंगामा चलता रहा और कई लोगों ने तुलसी को ब्लॉक कर दिया।
बाद में कट्टर संस्कृतभाषी लोगों ने अपने यूट्यूब चौनल पर व्यूज़ बढ़ाने के लिए थम्बनेल बनाया, जिस पर लिखा था – ‘ऐसी रामकथा आपने पहले नहीं सुनी होगी – हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता’!

✍️ चिराग़ जैन

देश का भला

“भाई! देश का भला कब होगा?”
“जब आपके वोट से हम चुनाव जीतेंगे।”

“भैया जी! चुनाव में जीत मुबारक़ हो। अब देश का भला कीजिये!”
“अभी तो जीते हैं यार। चुनावों में रात-दिन काम किया है। साँस तो ले लें।”

“सर जी! आपको चुनाव जीते एक साल हो गया, अब देश का भला कीजिये।”
“विपक्ष ने हमारा जीना मुहाल कर रखा है। रोज़ सरकार के कामकाज पर हंगामा हो रहा है। इनसे निबटना पड़ेगा, तब देश का भला करेंगे।”

“जनाब! सरकार बने दो साल हो गए, अब तो देश…!”
“अरे यार तुम तो पीछे ही पड़ गए। सरकार के पास बहुत काम हैं। इतनी सारी समितियां हैं, इतने सारे विभाग हैं, इतने सारे अफसर हैं। इनसे फुर्सत मिले तब तो कुछ करें।”

“सरकार, तीन साल बीत गए। महंगाई बढ़ रही है, सड़कें टूट रही हैं, ग़रीबी, भुखमरी, बेरोज़गारी, अपराध से जनता त्रस्त है।”
“तुम बार-बार यहाँ क्यों चले आते हो। अपने गिरेबान में झाँको। सरकार सड़कें बनवाती है, तुम उन्हें तोड़ देते हो। सरकार कहाँ तक करेगी। तुम लोग इस लायक हो ही नहीं कि तुम्हारे लिए कुछ किया जाए। जाओ पहले समाज को जागरूक करो, हर बार मुँह उठा कर सरकार के पास मत आया करो।”

“माई-बाप! एक साल रह गया है आपकी सरकार का। जनता आपसे नाराज़ है। लोगों में ग़ुस्सा है कि आपने जनता के लिए कोई काम नहीं किया।”
“ये सब हमारे ख़िलाफ़ विपक्ष का षड्यंत्र है। हमारी अर्थव्यवस्था बेहतर हुई है। दफ़्तरों में भ्रष्टाचार ख़त्म हो गया है। चारों तरफ़ ख़ुशहाली है। ग़रीब आदमी सुखी हो गया है। पूरी दुनिया में हमारे नाम का डंका बज रहा है। और आप कहते हैं कि सरकार ने काम नहीं किया। यह विपक्ष का फैलाया हुआ भ्रम है।”

“हाँ भई! अब क्यों आए हो? हम तुम्हें वोट नहीं देंगे।”
“आप हमारी विचारधारा के मजबूत स्तम्भ हैं। आप हमसे नाराज़ हो गए तो देश ग़लत हाथों में चला जाएगा। हम आपसे वादा करते हैं कि आपकी सारी शिकायतें दूर कर देंगे।”
“रहने दीजिए, ऐसे वादे आपने पिछली बार भी किये थे।”
“तो ठीक है। दे दीजिए उन लोगों को वोट जो हमारी जाति के विरोधी हैं। बैठा दीजिये उन्हें कुर्सी पर जो हमारे धर्म के दुश्मन हैं। होने दीजिए देश को ग़ुलाम। आप देश की हानि से पहले अपने स्वार्थ की सोचते हैं। हमें शर्म आती है कि आप जैसे लोगों के लिए हमारे महापुरुषों ने अपने प्राण दिए।”
नेताजी की लताड़ सुनकर वोटर शर्मिंदा हो गया और चुपचाप गर्दन नीचे करके वोट और देश नेताजी के हाथों में दे आया ।

✍️ चिराग़ जैन

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