Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जब शब्द हिचकियों और सुबकियों में अनूदित होजाते हैं। आज संतोष आनंद जी को सुबकते हुए देखा तो उनके गीतों की जिजीविषा वहाँ व्याप्त सन्नाटे में लास्य करने लगी। इसी जिजीविषा की उंगली थामकर मृत्त्यु के सम्मुख निरुपाय खड़ा एक बुज़ुर्ग बाप कदाचित् फिर से अपनी सुबकियों का शब्दानुवाद कर सके।
संकल्प और नंदिनी की शोकसभा में बैठा था तो कहीं दूर अवचेतन में एक गीत गूँजता रहा-
“जो दिल को तसल्ली दे, वो साज उठा लाओ
दम घुटने से पहले ही, आवाज़ उठा लाओ…”
संतोष जी को माइक दिया गया तो उनकी जिजीविषा ने उनकी जर्जर देह में प्रवेश किया, उन्होंने माइक लिया, एक पल को पलकें झपकीं, फिर अपने मेरुदंड को सीधा करते हुए सीने को प्राणवायु से लबरेज़ कर बोले- “मैं टूटुंगा नहीं… मैं इस बच्ची रिद्धिमा के लिये जिऊंगा… मैं इस परिवार के लिये जिऊंगा…!”
सबकी आँखें नम थीं, सभा समाप्त हुई, सब बाहर निकले… द्वार पर संतोष जी की पत्नी, उनकी दो बेटियाँ और उनकी पोती बैठी थी… संतोष जी अपने काँपते हाथों से सबका अभिवादनकर विदा कर रहे थे… उनकी आँखें लगातार बोल रही थीं- …मैं जिऊंगा …मैं टूटुंगा नहीं…!
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
फेसबुक के प्रयोक्ताओं को रोज़ कुछ अच्छा स्टेटस डालने का शौक तो चर्रा गया है, लेकिन इसके साथ अपनी सृजनात्मक क्षमता बढ़ाने की ललक नहीं जगी। ऐसे में दूसरों की प्रोफाइल से स्टेटस या स्टेटसांश कॉपी करके अपनी timeline पर पेस्ट करने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है। इसमें कोई बुराई तो नहीं है, लेकिन कष्ट तब होता है जब उसके नीचे से मूल लेखक का नाम गायब कर दिया जाता है।
जिनके अपने बच्चे नहीं होते वो दूसरों के चुरा लें क्या। ज़्यादा शौक़ है तो बच्चा गोद ले लो। गोद लेने वाली स्त्री को चरित्रहीन तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन बच्चा चुरा लेने वाली स्त्री अपराधिन अवश्य कहलाती है।
किसी की बात पसंद आये तो उसको कॉपी-पेस्ट करने की बजाय शेयर करने में क्या दिक्कत है भाई। कॉपी-पेस्ट करने में लेखक का नाम न लिखो तो “अज्ञात” या “फ़ॉर्वर्डेड” ही लिख दो।
विचार या रचनाएँ चुरानेवाले लोग कभी दो कौड़ी के दो शब्द भी ख़ुद लिख कर देखें। उसके बाद शब्दकोष में भी उन शब्दों को उसी क्रम में देख कर दुःख न हो तो कहना। किसी की रचना चुराने वाले बुरे लोग हैं। ऐसे लोगों का बहिष्कार करें और इसको स्वच्छ भारत अभियान का ही एक हिस्सा समझें।
-चौरकर्म पीड़ित
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Prose, Quotation, Unpublished
सत्ता से चूक गए राजनेता की ईमानदारी उस चरित्रवती जवान विधवा की तरह है जिससे लताड़ खाने के बाद हर लौंडा कहता फिरता है- “खेत में हाथ पकड़ कर मो ते लिपट रही हती छिनाल, मैं धक्का दई के भाज आयो।”
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
मैंने आरएस पुरा बॉर्डर कई बार देखा है। सतवारी एयरपोर्ट से निकलकर धान के खेतों से गुज़रते हुए कई बार पहुंचा हूँ उस गेट तक जहां माइलस्टोन लगा हुआ है “सियालकोट 11 किलोमीटर”। ज़ीरो लाइन भी देखी है। “919 इण्डिया” का मार्क-स्टोन…. तिरंगे में रंगी भारतीय पोस्ट…. हरे रंग में रंगी पाकिस्तानी पोस्ट… “सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा” और “पाकिस्तान जिंदाबाद” के नारे…. सब देखे हैं। साथ ही देखी है एक लाचारी भरी दहशत, अपने गांववालों में…. एक हताशा भरा अविश्वास, अपने सैनिकों में…!
यूं ही पूछ लिया था एक सैनिक से मैंने -“सिंह साहब, बॉर्डर पर रहकर डर तो रहता होगा?”
उसने ठहर कर बताया था – “ज्जे पकिस्तानियो का कोई भ्रोसा नी ए साब।”
कई दिनों से टीवी पर न्यूज़ देखते हुए उस सैनिक के शब्द कानों में गूँजने लगते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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भारत रत्न का सवाल है साहब। विवाद लाज़मी है। इतिहास साक्षी है हमने आज तक आसानी से किसी को महान नहीं माना। आसान और महान का कोई तारतम्य नहीं है ना। रामको जंगल भेजा, पत्नी से वियोग कराया, उनका घर उजाड़ दिया तब पता चला कि वो महान हैं। नानक, कबीर, महावीर, गांधी सबके साथ यही किया हमने। रूल इज़ रूल। फिर चाहे वो कोई भी हो।
हाँ, अगर कोई विदेशी रिकमेन्डेशन जुगाड़ ले, फिर उसकी महानता पर हमें कोई संदेह नहीं रहता। जैसे टैगोर; जिसको अंग्रेजों ने महान मान लिया उसकी महानता सर्टिफाइड हो गयी।
बीच में कई सालों तक हमने कई सालों को भारत रत्न नहीं दिया। कोई महान था ही नहीं। फिर सिलसिला शुरू हुआ तो मरे हुए भी लाइन में लग गए।
सचिन तेंदुलकर का क़द ऊंचा था; तो ये विवाद किया कि खेल को भारत रत्न क्यों? इस विवाद की आवाज़ इत्ती ज्यादा थी कि किसी और महापुरुष के दावे की रिरियाहट सुनाई ही नहीं दी।
अब मामला अटल जी के नाम का है। तो नेताजी को ताव आ गया। उधर सपाइयों ने लोहिया की चारपाई मैदान में पटक कर ताल ठोक दी। मायावती इसलिए चुप हैं कि उनके अम्बेडकर आलरेडी एक अदद भारत रत्न कब्ज़ाए बैठे हैं। लालूजी दाल-रोटी के सवाल में उलझे हैं वर्ना राबड़ी जी का नाम प्रपोज़ किया जा सकता था।
कई बार लगता है कि हमारे वोटर आईडी कार्डपर एक-एक भारत रत्न छापने का आदेश ज़ारी किया जाना चाहिए। और जिसके कार्ड पर भारत रत्न खुद छपने से इनकार कर दे, उसे सम्मानित मान लिया जाना चाहिए।
गांधी, सुभाष, गौतम, महावीर, भगतसिंह, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे लोग सम्मान के इस खेल से बहुत ऊपर हैं साहब। किसी तमगे का लालच दिखा कर इनको छेछालेदार के इस भौंडे दंगल में घसीटना भारत का भी अपमान है और इन रत्नों का भी।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
अपने हर चरित्र में जो मनोवैज्ञानिक इंजीनियरिंग की वो कमाल थी। चाचा चौधरी का दिमाग़ बड़ा बनाया और होंठ मूछ में छुपा दिए। साबू का शरीर बड़ा बनाया। पिंकी, बिल्लू, चाची इन सबके आकार में एक प्रकार था। साबू जैसे चरित्र की कल्पना कार्टून जगत् में एलियन का प्रादुर्भाव था। संभवतः यह चरित्र भारतीय बच्चों का एलियंस से पहला परिचय है।
कैरिकेचर की दुनिया में वे एक नयी धारा के संयोजक थे। काल्पनिक चरित्रों को उन्होंने सूरत दी, पहचान दी। और खुद की पहचान को केवल एक साधारण से हस्ताक्षर तक सीमित करलिया।
बचपन के कनवास पर कौतूहल मिश्रित हास्य के बीज बोने वाले प्राण महान थे।
विनम्र श्रद्धांजलि
✍️ चिराग़ जैन