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एक ख़ालिस कवि का जीवन

नीरज जी ने जब भी नज़र उठा कर देखा तो उनकी अदा दिल पर छप गई। उन्होंने अपनी भारी आवाज़ में कुछ आदेश कर दिया तो लगा कि हम धन्य हो गए। नीली लुंगी और जेब वाली बनियान पहने जब वे लोगों को सम्मोहित करते दिखते थे तब महसूस होता था कि कोई फकीर अपनी अल्हड़ मस्ती में हम नए साधकों को चपत लगाते हुए कहा रहा है कि – ‘अरमानी के सूट पहनने से कुछ नहीं होगा बे, अरमानों को स्वर देना सीख!’
उनका पूरा जीवन एक ख़ालिस कवि का जीवन था। कोई बड़ा आदमी भी उनसे मिलने आया तो उन्होंने उसके प्रभाव में कपड़े बदलना ज़रूरी न समझा। अपने अंतर्नाद में वे इतने सहज हो गए थे कि मुख्यमंत्री से बात करते समय भी उनके स्वर का आरोह-अवरोह ठीक वैसा होता था जैसा शशांक से या चिराग़ से बात करते हुए होता था।
उन्होंने 93 वर्ष की आयु में अपने भीतर के किशोर को कभी धीमा न पड़ने दिया। प्रशंसा और प्रसिद्धि की इतनी ऊँचाइयाँ देख चुके थे कि भय या लोभ उन्हें कुछ ओढ़कर जीने के लिए प्रेरित न कर सके।
उनके व्यवहार में साफ दिखता था कि वे हर मिलनेवाले पर अपनत्व का अधिकार अनुभूत करते थे। कार्यक्रम में पहुँचकर अपने स्वास्थ्य के अनुरूप अपने काव्यपाठ का क्रम तय करने में कभी संकोच नहीं करते थे। उनका आदेश इतना अधिकारपूर्ण होता था कि उससे उत्पन्न होनेवाली तमाम व्यवहारिक चुनौतियाँ नगण्य लगती थीं।
उनके आदेश को टालना या उन्हें उसकी कठिनाई बताने का प्रयास असंभव था। मुझ जैसे नए कवियों के नाम याद न रहने पर जब वे शशांक भाई से ‘दिल्लीवाला लड़का’ कहकर मेरा ज़िक्र करते थे तो लगता था कि किस वटवृक्ष ने झुककर एक तिनके का माथा चूम लिया हो।
वे बहुत प्यारे थे। वे बहुत सच्चे थे। वे बहुत अच्छे थे। और सबसे अच्छा यह था कि वे अब तक हमारे साथ थे। उनकी उपस्थिति में काव्यपाठ करते समय ऐसा लगता था कि कविता उनके कानों में धुलकर निखार पा रही हैं और किसी पंक्ति पर वे वाह कर देते थे तो लगता था कि बस, क़िला फतह हो गया।
वे हमें बहुत उपलब्ध थे। इतने कि उन्हें सहेजने की बात याद ही न रही। पर अब वे पूरी तरह अनुपलब्ध हैं, अब हम उन्हें चाह कर भी सहेज नहीं सकते।
अलीगढ़ में अग्नि ने गीतों के विदेह देवता को आलिंगनबद्ध कर लिया है। आसमान बरसकर उनके इस अंतिम गीत को संगीत दे रहा है। तिरंगे ने अपनी संस्कृति के इस लाडले रचनाकार को भरे मन से विदा किया। और हम उनकी स्मृतियों में डूबते-उतराते उनके सैंकड़ों गीत गुनगुनाकर ख़ुद को तसल्ली दे रहे हैं।

✍️ चिराग़ जैन

काव्यपाठ के प्रारंभिक प्रमाण

चारों वेद काव्यरूप हैं और इनमें श्रुतियों का संकलन है अतः यह माना जा सकता है कि वेद का प्रत्येक ऋषि वाचिक परम्परा का कवि रहा होगा। तथापि इन श्रुतियों के पाठ का कोई प्रामाणिक संदर्भ ज्ञात नहीं है।
महर्षि वाल्मीकि ने क्रौंचवध की घटना से आहत होकर श्लोक उच्चारा था –

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम्।।

यह श्लोक स्वरचित कविता के पाठ का प्रथम प्रामाणिक उदाहरण है। उत्तर रामायण में अयोध्या की राजसभा में लव-कुश द्वारा रामकथा का पाठ किया गया। इस घटना को भी काव्यपाठ का उदाहरण माना जा सकता है। यहाँ यह तथ्य विशेष ध्यातव्य है कि जब लव-कुश रामकथा सुनाते थे, तब वहाँ जन-सामान्य उपस्थित होता था।
कुरुक्षेत्र के युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण द्वारा गीता के अठारह अध्यायों का पाठ किया गया। यह भी काव्यपाठ का ही एक उदाहरण माना जा सकता है।
इस्लाम पूर्व मक्का में उकाज नामक स्थान पर अरब के कवि एकत्रित होते थे। इस सम्मेलन में भाग लेनेवाले कवियों के बीच काव्य-प्रतियोगिता होती थी और विजेता की कविता को स्वर्णपत्र पर अंकित कर जिस दीवार पर लगाया जाता था उसे ही आज हम काबा कहते हैं। इस्लाम पूर्व काव्य ग्रन्थ सेररूल-ओकुल के नाम से आज भी प्रतिष्ठित है।
भक्तिकाल में संत कवियों का परस्पर सम्मिलन अंततः काव्य-गोष्ठी की शक्ल ले लेता था। सूरदास प्रतिदिन एक भजन रचकर आरती के समय उसका पाठ करते थे। कुम्भलदास, रैदास, मीराबाई जैसे कवियों की भेंट के वृत्तांत भक्तिकालीन साहित्य में भरे पड़े हैं। रीतिकाल भी राजाओं के मनोरंजनार्थ कवियों के काव्यपाठ की घटनाओं के प्रमाण प्रस्तुत करता है।
राजपूत राजाओं के महल में विधिवत कवि नियुक्त किये जाते थे, जो राजा के कार्यों का गुणगान तथा युद्धकाल में मनोबल वृद्धि हेतु कविताएँ लिखते थे और सभा में उनका पाठ करते थे। मुग़ल काल में उर्दू के शायरों की महफ़िल बादशाहों के दरबार में जमती थी। मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र ख़ुद एक बेहतरीन शायर थे, जो इस महफिलों में एक शायर की हैसियत से शिरक़त भी करते थे। मीर, ज़ौक़, ग़ालिब जैसे कितने ही नामचीन शायर इन मुशायरों की शान होते थे। उर्दू-मुशायरों का वर्तमान स्वरूप इन्हीं दरबारों से तैयार हो गया था, लेकिन हिंदी कवि सम्मेलनों ने जो शक़्ल आज अखि़्तयार की है उसकी मिट्टी बहुत बाद में गुंथनी शुरू हुई।
गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ के संयोजन में जो पहला कवि सम्मेलन हुआ, उसमें कुल 27 कवियों ने काव्यपाठ किया और उसके आयोजक थे- ‘सर जॉर्ज ग्रियर्सन’। उसके बाद साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं में कवि-सम्मेलनों के आयोजन की परंपरा चल निकली। यहाँ तक कवि सम्मेलनों में अर्थ का संयोग नहीं हुआ था।
कविगण ससम्मान आमंत्रित किये जाते थे और बन्द मुट्ठी में जो पत्र-पुष्प आयोजक दे देता था, वह स्वीकार कर लेते थे। मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुभद्राकुमारी चौहान, गिरिजाकुमार माथुर, वियोगी हरि, सोहनलाल द्विवेदी, रामधारी सिंह दिनकर, रमई काका और हरिवंशराय बच्चन जैसी विभूतियाँ, इसी प्रकार कवि सम्मेलनों में काव्यपाठ करती रहीं।
ऐसा मेरा अनुमान है कि किसी कार्यक्रम में आयोजक के द्वारा प्रदत्त इस मानदेय पर या तो कोई विवाद हुआ होगा अथवा आलोचना हुई होगी, जिसके बाद कवियों को बंद मुट्ठी में मानदेय दिए जाने की परंपरा निमंत्रण के समय सुनिश्चित किये जाने वाले मानदेय में परिवर्तित हो गई होगी। यद्यपि यह राशि भी नाममात्र की ही होती थी। इसी दौरान बच्चन जी ने मधुशाला लिखी। मधुशाला इतनी लोकप्रिय हो गई कि बच्चन जी प्रत्येक कवि सम्मेलन की आवश्यकता बन गए। एक बार बच्चन जी अस्वस्थ हुए तो उन्होंने आयोजक को सूचित किया कि स्वास्थ्य ठीक न होने की वजह से वे कवि-सम्मेलन में उपस्थित नहीं हो सकेंगे। आयोजक ने अपनी प्रतिष्ठा का वास्ता देते हुए बच्चन जी पर कार्यक्रम में उपस्थित होने का दबाव बनाया तो बच्चन जी ने अपनी मनमर्ज़ी के मानदेय पर उपस्थित होना स्वीकार कर लिया।
यहाँ से कवि सम्मेलनों में मानदेय की राशि आयोजकों की मर्ज़ी से कवियों के अधिकार क्षेत्र में आ गई। इसी दौर में दिल्ली में पण्डित गोपाल प्रसाद व्यास जी ने लालकिला कवि सम्मेलन की स्थापना की। यह आयोजन देश भर में कवि-सम्मेलनों की प्रतिष्ठा वृद्धि का कारण बना। वर्ष भर लोग इसकी प्रतीक्षा करने लगे। व्यास जी चुन-चुन कर श्रेष्ठतम कवियों को इस मंच पर बुलाने लगे। इसकी ख्याति में चार चांद तब लगे जब देश के प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू इस आयोजन में मुख्य अतिथि बनकर आए। बड़े-बड़े राजनेता, बड़े-बड़े सितारे, उद्योग, समाजसेवा और शिक्षा जगत् की श्रेष्ठ प्रतिभाएँ इस आयोजन की दर्शक दीर्घा में दिखाई देने लगी।
लालकिला कवि सम्मेलन किसी भी कवि की प्रतिष्ठा का नियामक बन गया। शिवमंगल सिंह सुमन, देवराज दिनेश, भवानीप्रसाद मिश्र, रामवतार त्यागी, रमानाथ अवस्थी, माया गोविंद, रामदरश मिश्र, बालस्वरूप राही, गोपाल सिंह नेपाली, बलबीर सिंह रंग, शिशुपाल सिंह निर्धन, कन्हैयालाल नन्दन, इंदिरा गौड़, बाबा नागार्जुन, मुकुट बिहारी सरोज जैसे रचनाकार लालकिले की शोभा के दैदीप्यमान नक्षत्र बन गए। किन्तु इस आयोजन का उत्तरदायित्व भी था, एक साहित्यिक संस्था के ही कंधों पर था। इसी दौरान श्री रामरिख मनहर ने कवि सम्मेलनों को मारवाड़ी सेठों के द्वार तक पहुँचाने के लिए अथक परिश्रम किया।
अब कवि सम्मेलन में अर्थ का मार्ग खुल गया। इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ, दिल्ली और वाराणसी की सीमाओं को तोड़कर कवि सम्मेलन राजस्थान, मुम्बई, कोलकाता और मद्रास (अब चेन्नई) तक भौगौलिक विस्तार पा गया। ज्यों ही साहित्यिक संस्थाओं से निकलकर कवि सम्मेलनों ने उन्मुक्त गगन में पंख पसारे ठीक उसी समय गोपालदास नीरज, बालकवि बैरागी और काका हाथरसी सरीखे लोकप्रिय कवि अस्तित्व में आए।
नीरज जी हिंदी कवि सम्मेलनों की जनप्रियता की आधारशिला बन गए। खरद की गुनगुनाहट में जब गीत लोकार्पित होता तो श्रोतादीर्घा सम्मोहित हो उठती। नीरज जी ने गीत को प्रेम के गुलाबी बगीचे से दर्शन के भव्य देवालय तक की यात्रा करवाई। नयन कोर पर अपनी पीड़ा का नीरानुवाद संजोकर लोग स्मित अधरों से नीरज को सुनते थे। उनकी सजीव आँखें और शरारती हँसी उनकी प्रस्तुति में मणिकांचन योग निर्मित करती थी।
नीरज के इस सम्मोहन में कवि सम्मेलनों का कारवां बहुत तेज़ी से लोकप्रियता की मंज़िलें तय करता हुआ बढ़ने लगा। संभवतः नीरज जी पहले ऐसे कवि थे जिन्होंने अपनी लेखनी के साथ-साथ अपनी अदाओं से भी लोगों के दिल पर राज किया। यह उनकी अदाओं का ही करिश्मा था कि यद्यपि उनके अधिकतर लोकप्रिय गीत दर्शन की धुरि पर केंद्रित थे, फिर भी उन्हें प्रेम और सौंदर्य के कवि के रूप में जाना गया।
‘कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है’; ‘अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए’; ‘आदमी को आदमी बनाने के लिए’ और ‘कारवां गुज़र गया’ जैसे गीतों की सरल शब्दावली और गूढ़ अर्थवत्ता ने गीत की धारा मोड़ दी। इस दौर में कविता साहित्यिक अभिरुचि से विहीन जन तक पहुँचने में क़ामयाब हुई।
यद्यपि वीर रस की भाषा अभी भी अपेक्षाकृत क्लिष्ट थी, लेकिन बालकवि बैरागी की कविता राष्ट्र पर मर मिटने के शौर्य के साथ-साथ जीवन की कठिन परिस्थितियों में स्वाभिमान के जीवट की वक़ालत करने लगी तो उसकी भावभूमि और भाषा स्वतः ही अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति से जुड़ती चली गई। शहीदों के प्रति करुणा और श्रद्धा उत्पन्न करती ओज कविता करुण रस, भक्ति रस, रौद्र रस और वीर रस का संगम स्थल बन गई।
लोगों का मन सीमा पर खड़े बेटों के प्रति वात्सल्य से भरने लगा। वीर रस की कविता शिराओं के रक्तप्रवाह को तीव्र करने के साथ-साथ आँखों को भी नम करने लगी। बैरागी जी की लोकप्रियता का आलम यह था कि देश के बड़े कवि सम्मेलनों में बैरागी जी की उपस्थिति न हो तो श्रोता कार्यक्रम शुरू नहीं होने देते थे। इस दौर तक कवि सम्मेलन मंच पर गीत का बोलबाला था। जीवन दर्शन के गीत, प्रेम के गीत और सामरिक माहौल में ओज के गीत।
हास्यरस को हेय दृष्टि से देखा जाता था। मंच पर जब हास्य का कवि काव्यपाठ करता था तो शेष कवि उसे अनदेखा करते थे। यद्यपि रमई काका जैसे कवियों ने जनता के तनाव को ठहाकों में बदलने की परंपरा को बख़ूबी निभाया, लेकिन हास्यरस को वह सम्मान नहीं मिल सका जिसका वह हक़दार था। जनता हास्य पसंद तो करती थी, किन्तु मंच पर बैठे अन्य कवियों की भंगिमा को देखकर यह हास्यप्रेम जता नहीं पाती थी।
ऐसे समय में मंच पर काका हाथरसी का प्रवेश हुआ। उनकी प्रस्तुति से मंचासीन कवियों की त्यौरियाँ पिघलने लगीं और दर्शक दीर्घा की स्मित ने ठहाके का रूप ले लिया। यहाँ से कवि सम्मेलनों का रंग-रूप बदल गया। काका की लोकप्रियता का सूरज गाँव-खेड़ों से लेकर सात समुंदर पार तक दमकने लगा। व्यंग्य के कवियों ने अपनी रचनाओं में हास्य का अनुपात बढ़ा दिया। अब व्यंग्य, व्यंग्य न रहकर ‘हास्य-व्यंग्य’ बन गया। कवि-सम्मेलन भी कवि-सम्मेलन से ‘हास्य कवि-सम्मेलन’ बन गए।
कवि सम्मेलनों के बैनर पर ‘हास्य’ शब्द लगाना आवश्यक हो गया। मंच पर हास्य कवियों का अनुपात बढ़ने लगा। काका की कुंडलियों ने समाचार पत्रों में स्थान बना लिया। पण्डित गोपाल प्रसाद व्यास और रामरिख मनहर जैसे मंच-संचालकों के संचालन में चुटीली टिप्पणियों, सहज जुमलों, व्यंग्योक्तियों और चुटकुलों ने जगह बनानी शुरू की।
नीरज, बैरागी और काका ने हिंदी कवि सम्मेलनों का चेहरा आमूल-चूल बदल दिया। बदलती तकनीक के साथ बनती बिगड़ती परंपराओं की कहानी अगली कड़ी में…
✍️ चिराग़ जैन

कवि सम्मेलनों का सफ़र

कवि सम्मेलनों का सफ़र सौ साल पूर्ण करने के पड़ाव पर है। अक्टूबर 1920 में श्री अयोध्या सिंह उपाध्याय जी की अध्यक्षता और श्री गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ जी के संयोजन में हिंदी के प्रकाण्ड विद्वान श्री जॉर्ज ग्रियर्सन जी के निवास पर कुल 27 कवियों का कवि सम्मेलन हुआ जिसे कवि सम्मेलन का पहला क़दम माना जा सकता है। तब से अब तक यह परंपरा अनवरत चल रही है। स्वाधीनता संग्राम, चीन युद्ध, पाक युद्ध, आपातकाल, कारगिल युद्ध और तमाम ऐतिहासिक घटनाओं में कवि सम्मेलनों ने जन भावना को बौद्धिक ख़ुराक़ उपलब्ध कराई है। कवि सम्मेलनों की इस क्षमता के कारण ही पत्रकारिता के विद्वानों ने इस माध्यम को “लोक परंपरागत जनसंचार माध्यम” के रूप में स्वीकार किया है। देश भर में मनोरंजन तथा बैद्धिक विमर्श को समानांतर रूप से साधने वाली यह कला परिवर्तित होती सामाजिक परिस्थितियों तथा जनता की मानसिक परिस्थितियों के अनुरूप सम्प्रेषण की भाषा व विधा का निर्धारण करती रही है। यही लचीलापन इस कला की सम्प्रेषणीयता को अक्षुण्ण बनाए हुए है। इस प्रभावी सम्प्रेषण माध्यम के अनेक महत्वपूर्ण स्तम्भ 9-10 जुलाई को हरिद्वार में एकत्रित हुए तथा उन्होंने कला के इस भवन के वैभव व गरिमा की वृद्धि की दिशा में विचार विनिमय किया। कवि सम्मेलन समिति के इस अधिवेशन में अपनी क्षमताओं की सीमा के साथ मैंने भी गिलहरी जैसा योगदान दिया, इस हेतु मन संतुष्टि के भाव से आनंदित है।

✍️ चिराग़ जैन

संजू

आरोप को अपराध मानकर किसी के प्रति राय क़ायम कर लेने की हमारी सामान्य प्रवृत्ति किसी के जीवन को किस हद्द तक चुनौतियों से बेन्ध सकती है -इसी तथ्य की प्रामाणिक कथा है संजू। मीडिया इसी प्रवृत्ति का लाभ उठाकर जनमानस की मानसिक लतों का पोषण करता हुआ अपना गुजर-बसर कर रहा है।
हम कुछ परंपरागत अफवाहों को सच मानते हुए अपनी कई पीढ़ियाँ बर्बाद कर चुके हैं। अफवाहों के इसी हवनकुण्ड में कई महत्वपूर्ण जिंदगियां स्वाहा करने में हम कभी हिचकते भी नहीं हैं। संजय दत्त ऐसे ही हवन कुंड में भस्म हुई एक ऐसी प्रतिभा का नाम है जिसने उतार-चढ़ाव के अनेक आश्चर्यजनक दौर जिये।
संजू फ़िल्म हर उस ख़बर पर एक प्रश्नचिन्ह है जिसने डेढ़ मिनिट की सनसनी के चक्कर में एक मुकम्मल ज़िन्दगी तबाह कर डाली। सामाजिक जीवन जीने वालों के व्यक्तिगत चरित्र की पड़ताल करना और उसके विषय में कहानियों की फसलें बोने में हमे बड़ा मजा आता है। आश्चर्य यह है कि किसी पर आरोप लगाकर उसकी चरित्र-हत्या करने वाला मीडिया आज तक कभी किसी की ज़िंदगी बर्बाद करने के बाद क्षमायाचना करने भी प्रकट न हो सका।
अदालतों में चल रही सुनवाई को दरकिनार कर फैसले सुनाने वाले मीडिया की घिनौनी तस्वीर का पर्दाफाश किया गया है इस फ़िल्म ने। फ़िल्म को देखकर संजय दत्त के प्रति संवेदना जन्मती है और सुनील दत्त के प्रति सम्मान। चुनौतियों से जूझने की प्रवृत्ति और कभी न थकने का जज़्बा उनके व्यक्तित्व का वह पक्ष था जिसे अब से पहले न तो किसी न्यूज़ चैनल ने स्पेशल स्टोरी बनाकर दिखाया था न ही किसी गॉसिप मैगज़ीन ने। कमलेश उर्फ परेश जैसे किसी दोस्त का रिश्ता संजय दत्त की किस्मत से ईर्ष्या उत्पन्न करता है।
मज़े की बात यह है कि संजय दत्त के रोम-रोम पर नज़र रखने वाली मीडिया को उनके इस साए का कभी आभास न हुआ। ड्रग पेडलर्स कैसे काम करते हैं और बचपन पर अधिक अनुशासन कैसा असर डालता है -इन दोनों सवालों को बहुत करीने से फ़िल्म में पेश किया गया है। सिल्क स्मिता के बाद सम्भवतः पहली बार किसी भारतीय सिने स्टार की बायोपिक बनी है। बदनाम ज़िन्दगियों के अनकहे पहलुओं को उजागर करती ये दोनों ही फिल्में यह तो सिद्ध करती हैं कि अखबारों के समझाने पर जिसे हम बुरा आदमी कहकर छोड़ देते हैं उसके भीतर भी काफ़ी कुछ अच्छा छुपा होता है जिसे देखने के लिए उसके साथ कुछ वक़्त बिताने की दरकार होती है।

✍️ चिराग़ जैन

राजगोपाल सिंह जी की याद

“कविता व्याकरण के दोष बर्दाश्त कर सकती है लेकिन भाव के चरित्र में मिलावट नहीं झेल पाती।” – यही गुरुमंत्र दिया था मेरे भीतर के कवि को श्री राजगोपाल सिंह जी ने। पितृत्व और गुरुत्व की गुणमुक्ताओं को मित्रता के सूत्र में पिरोने से संबंध का जो गलहार बनेगा, बस वही नाम है मेरे और उनके सम्बन्ध का। कितनी ही यात्राओं, कितने ही संस्मरणों और कितने ही संघर्षों के चित्र सजीव हो उठते हैं, उनका नाम गुनने भर से। ग़ज़ल और गीत के अतिरिक्त बाग़वानी के वे ख़ूब शौकीन थे। बोनसाई और कैक्टस की उनकी दीवानगी उनके व्यक्तित्व का दर्पण बन गई। बोनसाई की तरह उन्होंने जीवन भर अपना क़द बढ़ाने से अधिक ध्यान अपने अस्तित्व की पूर्णता पर दिया और कैक्टस की तरह कंटीला जीवन जीने के बावजूद कहीं से भी तड़कने पर गीत का दूधिया बहाव कम नहीं हुआ। कैक्टस कंटकों के लिए जाना जाता है, लेकिन राजगोपाल जी ने यह समझा कि काँटों की बदनामी झेलता कैक्टस वर्ष में एक बार पुष्पित भी होता है और जब यह पुष्प खिलता है तो इसके एक फूल के सम्मुख हज़ारों कुमुदनियों की प्रसिद्धि फीकी पड़ जाती है। आज भी नजफगढ़ में उनके घर की छत पर उनके ये बोनसाई और कैक्टस उनकी मान्यताओं का अनुवाद कर रहे हैं। उनके अशआर में यह हरियाली अपने पूरे सौष्ठव के साथ उपस्थित है। प्रकृति के प्रेम में पगी ग़ज़लों के रचयिता के जन्मदिन का आयोजन है। वे तो नहीं होंगे लेकिन उनकी स्मृतियां होंगी, उनका चित्र होगा और उनकी कविताओं में प्रदर्शित उनका पूरा चरित्र होगा। पूरा जीवन लेखनी को समर्पित करने वाले राजगोपाल सिंह जी को याद करने के लिए अपने जीवन के कुछ पल निकाल सकें तो आप भी आना! अच्छा लगेगा!
✍️ चिराग़ जैन

वीरे दी वेडिंग

“वीरे दी वेडिंग” चार लड़कियों की कहानी हैं जिन्हें बारहवीं कक्षा की परीक्षा सम्पन्न होने की ख़ुशी में घरवाले घर में शराब पार्टी अरेंज करके देते हैं। पहली लड़की विवाह से पूर्व अपने बॉस से सेक्स सम्बन्ध बनाती है। यह लड़की अपनी सहेलियों के कहने पर अपने मंगेतर को भरी महफ़िल में किस करने की कोशिश करती है और जब मंगेतर इस पर ऐतराज करता है तो सरे-आम उसको माँ की गाली देती है। यही लड़की अपनी सहेली की शादी के बीच से निकल कर एक ऐसे लड़के के साथ जाकर सो जाती है जिसका वह नाम भी नहीं जानती। .
दूसरी लड़की का पति उसे हस्त-मैथुन करते हुए पकड़ लेता है। वह लड़की अपने पति को छोड़कर अपने पिता के घर लौट आती है। यह लड़की अपनी सहेली को इस बात पर ताना देती है कि वह किसी से सेक्स किये बिना शादी कैसे कर सकती है। यह लड़की अपने पिता को बताती है कि उसके पति ने उसे क्यों छोड़ दिया तो उसका पिता उसे कहता है “मुझे पहले बताना था, तेरे पति को तो मैं लटका दूँगा।”
तीसरी लड़की अपनी सहेली को बताती है कि टेस्ट ड्राइव किये बिना तो मैं गाड़ी भी न लूँ फिर तू पति कैसे ले सकती है। चौथी लड़की अपने प्रेमी से इस बात पर आश्चर्य जताती है कि जब हम दो साल से साथ रह रहे हैं तो फिर तू शादी क्यों करना चाहता है! ये चारों लड़कियां बेहद सभ्य परिवारों से आती हैं इसलिए “फ़िल्म की स्क्रिप्ट की तथाकथित डिमांड पर” हिंदी भाषा के कुछ अश्लील शब्द जिन्हें हम गाली कहते हैं उनको बीप कर दिया गया है। लेकिन इन्हीं लड़कियों ने फ़िल्म में कुछ अंग्रेजी की शब्दावली का प्रयोग भी किया है।
अंग्रेजी वह पतित पावनी है जिसमें नहाकर अश्लीलता भी स्टेटस सिंबल बन जाती है। इसीलिए पूरी फिल्म में बार बार FUCK, ASS, SHIT जैसे पवित्र शब्दों को सेंसर ने स्वीकार कर लिया। “मेरी लेले”; “तेरी लेने के लिए डिग्री भी चाहिए”; “उसे अपनी तीसहजारी दिखा दे”; “चढ़ जा”; “तूने बॉस को ठोक दिया”; “अपना हाथ जगन्नाथ”; ओ हेलो, हमारा भी ले लो” और “मेरी फटी पड़ी है” जैसे संवाद इन चारों लड़कियों के मुँह से उचर कर फ़िल्म की और स्त्री अस्मिता की शोभा बढ़ा रहे हैं।
जब-जब इन भौंडे संवादों और अश्लील इशारों पर सिनेमा हॉल में सीटियां गूंजी तब-तब मुझे नारी सशक्तिकरण के अभियान अपने मुँह पर कालिख पोते खड़े दिखाई दिए। जब जब फ़िल्म में सोनम कपूर पर उसकी सहेलियों ने अश्लील कमेंट किये तब तब लड़की को घूरने पर भी उसे प्रताड़ना मानने वाला कानून और अधिक अंधा प्रतीत हुआ। जब स्वरा भास्कर के हस्तमैथुन दृश्य पर सिनेमा हॉल का अंधेरा सिसकारियों से भर गया तब तब मुझे “नारी-सम्मान” के नारे लूले नज़र आने लगे।
कानून कहता है कि किसी स्त्री को अश्लील इशारे करना या उसे अश्लील सामग्री दिखाना अपराध है। लेकिन फ़िल्म की चारों अबला नारियाँ फुकेट में नंगे नाच देखने जाएँ तो यह बोल्डनेस है। इस फ़िल्म में प्रदर्शित लड़कियां समाज के जिस चेहरे का चित्र उतार रही हैं उसे देखकर कानून, मर्यादा, समाज और संस्कृति के परदों के पीछे जारी सभ्यता के इस भौंडे नाटक का यवनिका पतन हो जाएगा।

✍️ चिराग़ जैन

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