Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
भारतीय राजनेताओं को स्मृति-नियंत्रण का एक विशेष वरदान प्राप्त है। इसी वरदान के आधार पर वे सत्ता के दुर्ग बना पाते हैं। यह विशेष सुविधा ही उन्हें शर्मिंदा होकर डूब मरने से बचा लेती है अन्यथा हमारा देश राजनेताओं से विहीन हो चुका होता।
लालूप्रसाद यादव के साथ गठबंधन करते समय यदि नितीश कुमार को यह याद आ गया होता कि चारा घोटाले के उजागर होने पर उन्होंने क्या-कुछ कहा था, तो वे जनता की भलाई के लिए यह गठबंधन कैसे कर पाते। उन्होंने वे सारी गालियाँ गठरी में बांधकर दिल पर रखे पत्थर के नीचे दबा दी और सरकार बना ली। फिर एक दिन अचानक उनकी आत्मा ने उन्हें याद दिलाया कि लालू भ्रष्टाचारी हैं। बस अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर उन्होंने पत्थर के नीचे दबी गठरी खोली, उसमें मोदी को दी जाने वाली गालियाँ बांधकर रख दीं और लालू को दी जाने वाली गालियाँ बाहर निकाल लीं। फिर से अपने दिल पर पत्थर रखकर वे सरकार चलाने लगे।
कितने विवेकशील और परोपकारी नेता हैं। बिहार में आपदा के समय जब नरेन्द्र मोदी ने जनता की सहायतार्थ कुछ सरकारी राशि भेजी थी तो उन्होंने आपातकाल में भी अपनी घृणा की लक्ष्मण रेखा नहीं लांघी। इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि वे सरकार बचाने के मार्ग में इस घृणा को प्रकट होने देते। वे बाढ़ से पीड़ित जनता को अपनी व्यक्तिगत घृणा की भेंट चढ़ा सकते हैं, लेकिन कुर्सी को इस संकट में कदापि नहीं डाल सकते। आखि़र कुर्सी पूज्यनीया जो है। बाढ़ तो हर साल आती है। लोग तो हर साल मरते हैं, लेकिन कुर्सी एक बार गई तो पाँच साल तक सूखा झेलना पड़ता है। यदि उन्हें राष्ट्रहित की चिंता न होती तो वे लोहिया जी की विचारधारा के विरुद्ध जाकर दक्षिणपंथी विचारधारा की पार्टी के साथ कदापि गठबंधन नहीं करते। वे जानते हैं कि उनका कुर्सी पर बैठना अनिवार्य है। यदि वे कुर्सी पर न बैठे रहेंगे तो समाज कल्याण के समस्त कार्यक्रम रुक जाएंगे। और यह वे हरगिज़ बर्दाश्त नहीं कर सकते। इस रास्ते में कोई ज़मीर, कोई आत्मा, कोई विचारधारा, कोई निष्ठा, कोई वायदा टांग नहीं अड़ा सकता।
कश्मीर की जनता के कल्याण के लिए भाजपा ने भी दिल पर पत्थर रखा और पीडीपी को गद्दार घोषित करनेवाले अपने सारे जुमलों को भुला दिया। भाजपा जानती थी कि जिस दिन भी गठबंधन टूटेगा उस दिन इन गालियों की दोबारा ज़रूरत पड़ेगी इसलिए महबूबा मुफ्ती के विरुद्ध सारे ज़हर को अपनी शिराओं के कोल्ड स्टोरेज में संभालकर रख लिया और सारे देश ने देखा कि सरकार के गिरते ही वह सारी नफ़रत पूरी ताज़गी के साथ फिर काम आने लगी। कुर्सी पर बैठकर जनता की सेवा करने के महान उद्देश्य को साधते समय भाजपा ने न तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी की ओर देखा न ही राष्ट्रवाद के नारों की ओर। इसे कहते हैं कर्तव्यपरायणता।
ऐसी ही देशभक्ति के उदाहरण उत्तर प्रदेश में सुश्री मायावती जी ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन करके प्रस्तुत किये। एक बार छले जाने के बावजूद देश के हित में उन्होंने दोबारा उन्हीं धोखेबाज़ों से गठबंधन कर लिया ताकि देश को बचाया जा सके।
उधर अससुद्दीन ओवैसी को अचानक अंबेडकर जैसे दोस्त की दोस्ती दिखाई देने लगी। उसकी दोस्ती के लिए वे महाराष्ट्र में चुनाव लड़ने की इच्छा को भी त्याग दिया।
रामविलास पासवान इस विषय में संत हैं। उन्होंने विचारधारा, मान्यता, सोच और ख़ेमे वगैरह का टंटा ही नहीं पाला। उन्होंने तो एक ही नीति अपनाई – ‘जिसकी सरकार, उसका पासवान!’ उन्होंने कभी जनता को इस भ्रम में नहीं रखा कि वे किसी महापुरुष, किसी विचार, किसी पंथ पर चलकर देश का कल्याण करेंगे। उनका फंडा साफ है कि सरकार किसी की भी बने, मेरा मंत्री बनना तय है।
अमित शाह जी भी जनता से झूठ बोलने की बजाय सीधे दूसरों के विधायकों के लिए चुम्बक बन जाते हैं। उनके व्यक्तित्व के प्रभाव से विरोधियों के जीते हुए विधायक उनकी ओर खिंचे चले आते हैं। इस प्रेमभाव के समय विचारधारा, मेनिफेस्टो, वायदे जैसी खरपतवार स्वतः छँट जाती है।
समाज को जाति के ज़हर से सराबोर करनेवाली राजनीति को यह जादू अच्छी तरह आता है कि जिसको गालियों के पत्थर मारे हों, उससे फूल लेकर मिलने की ट्रिक क्या है। सत्ता में बने रहने की इस अंधी होड़ में जनहित और जनपीड़ा की अनदेखी होना स्वाभाविक है।
जनता को भी अब पार्टी और विचारधारा के आधार पर वोट देने की परंपरा को त्यागना पड़ेगा। हम पार्टी का चुनाव चिन्ह देखकर वोट करते रहे हैं। हम विचार का झंडा देखकर वोट करते रहे हैं। इन दोनों ही स्थितियों में ठगा जाना तय है। प्रत्याशी का चरित्र देखकर वोट करेंगे तो कम से कम हमें यह तो पता रहेगा कि अमुक व्यक्ति किस सीमा तक गिर सकता है। क्योंकि पार्टी गिरती है तो सीमाएँ असीम हो जाती हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose, Story
चैनल के स्टूडियो में बाहर गार्ड तैनात था। उसका काम था अनावश्यक लोगों को स्टूडियो में जाने से रोकना। इसलिए वह प्रत्येक व्यक्ति का परिचय जानकर उसे प्रवेश करने दे रहा था।
पहले व्यक्ति ने बताया कि वह एंकर है, उसे मुद्दे पर प्रश्न पूछने हैं। गार्ड ने उसे प्रवेश दे दिया। दूसरे व्यक्ति ने बताया कि मुझे मुद्दे के पक्ष में बोलना है। तीसरे ने मुद्दे के विपक्ष में बोलना था। चौथा मुद्दे का विशेषज्ञ था। गार्ड ने सबको स्टूडियो में जाने दिया। दर्शक दीर्घा में भी ताली बजाने के लिए जनता की भरपूर व्यवस्था की गई।
अंत में एक बदहवास सा बूढ़ा स्टूडियो में घुसने लगा तो गार्ड ने उससे उसका परिचय पूछा। बूढ़े ने अकड़ते हुए कहा – “मेरे बिना यह बहस शुरू ही नहीं हो सकती। …मैं मुद्दा हूँ।”
बूढ़े की अकड़ देखकर गार्ड को हँसी आ गई। फिर उसे डाँटते हुए बोला- “आगे जाओ बाबा। पैनल पूरा हो चुका है। आपके लिए स्टूडियो में न तो कोई जगह बची है, न ज़रूरत।”
बूढ़ा अपना से मुँह लेकर बाहर खड़ा रह गया। स्टूडियो के भीतर बहस शुरू होने वाली थी। डायरेक्टर के इशारे पर दर्शक दीर्घा मूक बैठी ताली बजा रही थी। डायरेक्टर ने पूरी आवाज़ में चिल्लाया- स्टैंड बाइ… कैमरा रोलिंग… एक्शन!
मैं मुद्दा हूँ।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan, Story
वर्ष 2004 की घटना है। अटल जी की सरकार चली गई थी। उन दिनों अटल जी कुछ अस्वस्थ रहने लगे थे। उन्हीं दिनों नानाजी देशमुख भी अस्वस्थ थे और दिल्ली स्थित दीनदयाल उपाध्याय शोध संस्थान में प्रवास कर रहे थे। एक शाम अटल जी नानाजी से मिलने पहुँच गए।
नानाजी ने उन्हें डाँटते हुए कहा – “अटलजी! आप स्वयं अस्वस्थ हो, ऐसे में मेरा हाल जानने के लिए स्वयं आने की क्या आवश्यकता थी?”
अटल जी ने तपाक से उत्तर दिया – “मैं आपसे मिलने नहीं आया हूँ नानाजी! एक कनिष्ठ रोग एक वरिष्ठ रोग से मिलने आया है।”
उत्तर सुनते ही वहाँ उपस्थित सभी लोगों के चेहरे खिलखिला उठे। नानाजी भी मुस्कुराए और सहज होते हुए पूछा – “आप अस्वस्थ हैं अटलजी! मेरा स्वास्थ्य ख़राब है। आपकी सरकार चली गई है। देश नेतृत्व के संकट से जूझ रहा है। इन तनावपूर्ण परिस्थितियों में तुम मुस्कुरा कैसे लेते हो?”
अटल जी ने उसी सहजता से उत्तर दिया – “नानाजी! तनाव से केवल समस्याएं जन्म ले सकती हैं, समाधान खोजने हैं तो मुस्कुराना ही पड़ेगा।”
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Prose, Reviews, Unpublished
स्त्री मन की बेलाग अभिव्यक्ति का दस्तावेज है कवयित्री संध्या यादव का सद्य प्रकाशित काव्य संग्रह “चिनिया के पापा”। कुल 147 कविताओं का यह संग्रह मूलतः नारी की उन अनुभूतियों का बयान है जिनमें पीड़ादायी परिस्थितियों की स्वीकारोक्ति को वरीयता दी गई है।
इन कविताओं में कवयित्री न तो नारी मुक्ति आंदोलन की रवायत निभाते हुए पीड़ा से आज़ाद होने को छटपटाती दिखाई देती है न ही नियति के द्वारा किये जा रहे दुर्व्यवहार से व्यथित होकर भाग्य को कोसती नज़र आती है। मन की कचहरी में अपने अनुभव और चिंतन की गवाही दर्ज कराने भर का उपक्रम है यह काव्य संग्रह। यह ऐसे ही है ज्यों चोट लग जाने पर एक आह अनायास ही मुँह से निकल जाए; ज्यों छले जाने पर एक सिसकी अनायास ही आँखों से बह निकले। इसमें प्रयास करके आँसू बहाने के परिश्रम की गुंजाइश नहीं है। इसमें स्वयं को दीन-हीन दिखाने का पाखण्ड नहीं है। यही कारण है कि पीड़ा से व्यथित होने के बावजूद कवयित्री की लेखनी स्वाभिमानी तो होती दीख पड़ती है किंतु विद्रोही नहीं।
अपने उत्तरदायित्वों से विमुख होकर परदेस में विलसमग्न पति को चिट्ठी लिखते समय गिड़गिड़ाहट और दोषारोपण के स्थान पर स्वाभिमान से उत्पन्न कटाक्ष की भाषा इन कविताओं की विशेषता है। बलात्कार की शिकार किसी लड़की के साथ सामाजिक व्यवहार की विद्रूपता से पूर्व उसके परिवार के व्यवहार का नश्तर इन कविताओं की विशेषता है। ससुराल की प्रताड़ना के घिसे-पिटे जुमलों से हटकर पीहर के वीभत्स सत्य का शब्दांकन इन कविताओं की विशेषता है।
बहुओं पर हो रहे ज़ुल्म की हज़ारों कहानियां हम लिख-पढ़-सुन चुके हैं। बेटियों के अनकहे मन की आवाज़ भी बहुधा कविता की शक्ल में हमारे सामने से गुज़री है। किंतु ब्याहता बेटी के सम्मुख पीहर के भावनात्मक शोषण के कारण जो चुनौतियां उत्पन्न होती हैं उनकी प्रतिध्वनि संभवतः पहली बार इन कविताओं में आकर ले पाई है।
पुरुष की आकांक्षाओं में दिखाई देती ‘केवल’ दैहिक सुख की कामना से स्त्री मन पर जो खरोंचें पड़ती हैं उनको बयान करते समय कवयित्री साफ़गोई की चौखट तक तो कई बार गई है किंतु उसने कभी भी अश्लीलता के आंगन में प्रवेश नहीं किया। संबंधों पर से जब अपनत्व का मुलम्मा उतर जाता है तो उसके माथे पर कभी न पिघलने वाले कुछ बल पड़ जाते है। इन त्यौरियों को भी कवयित्री ने कई कविताओं में स्वीकारोक्ति के साथ स्वीकार किया है।
इस सबके बावजूद कवयित्री किसी भी सीमा तक जाकर संबंधों को निभाने की पक्षधर है। वह संबंध को बंधन घोषित कर उससे आज़ाद हो जाने की वकालत नहीं करती। वह मर्यादा की लक्ष्मण रेखा को स्त्री अस्मिता पर प्रश्नचिन्ह मानकर उसका उल्लंघन करने का प्रयास नहीं करती।
शिल्प पक्ष की बात करें तो बिल्कुल आम बोलचाल की शब्दावली के साथ सहज प्रतीकों का प्रयोग इन कविताओं में दिखाई देता है। गांधारी की आँखों पर बंधी पट्टी को पुरुष के अहंकार का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत करने में भी संध्या हिचकती नहीं हैं और गूगल पर अपने अभीष्ट की सर्फिंग से भी उन्हें कोई परहेज नहीं है। रसोईघर की सामग्री से भी वे अपनी अभिव्यक्ति के बिम्ब खोज लेती हैं और पेड़, जड़, फूल, पत्तियों से भी अपनी कविताओं की क्यारी सजा लेने में दक्ष हैं। इन कविताओं में अपने हिस्से के आधे चांद को कूरियर से भेजने की कल्पनाशीलता भी है और पुरुषवादी मानसिकता के मन में पल रही कुंठाओं का सच भी है।
किताब के सफ़हे पलटते हुए पीड़ा की साफ़गोई से उत्पन्न नकारात्मकता पाठकों को विचलित कर सकती है किन्तु इस विचलन से भी मन की परतों के उघड़ने का रोमांच कहीं कम नहीं होता। इक्कीसवीं सदी की कामकाजी महिलाओं के सामान्य जीवन में सम्मिलित विशेषता को जानने के लिए यह काव्य संग्रह कारगर सिद्ध होगा।
पुस्तक के प्रारम्भ में कवयित्री का आत्मकथ्य और प्रदीप जैन जी की भूमिका के साथ सुरेन्द्र शर्मा की विश्लेषणात्मक टिप्पणी पाठकों को पुस्तक की मूल सामग्री से जुड़ने में सहयोगी सिद्ध होगी।
कवयित्री ने अनुरोध किया है कि पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर इस पुस्तक के पृष्ठ पलटे जाएं। पाठक यदि इस अनुरोध को स्वीकार कर सकेंगे तो निश्चित रूप से इन कविताओं का सेतु उन्हें रचनाकार की मनःस्थिति का पर्यटन कराएगा।
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Diary, Prose
अनुभूतियाँ ज्यों-ज्यों ऊँची उठती जाती हैं, त्यों-त्यों उनकी उड़ान सहज होने लगती है। और एक सीमा के बाद उन्हें पंख नहीं हिलाने पड़ते, वे स्वतः ही सृजन के आकाश में तैरने लगती हैं। फिर उड़ान, उड़ान न रहकर बहाव बन जाती है। बस यही बहाव गीत का प्राणतत्त्व है।
शिल्प की यान्त्रिकता पीछे रह जाये और अनुभूति स्वतः ही लयात्मक होकर अभिव्यक्त होने लगे तो इसे गीत का अवतरण कहा जा सकता है। इस प्रक्रिया में व्याकरण को अलग से साधना नहीं पड़ता, इस स्थिति में मात्राएँ गिननी नहीं पड़तीं, बल्कि आनन्द के किसी चरम पर यदि पंख प्रमादी भी होने लगें तो आनन्द का वेग परिन्दे को बहा ले जाता है। यहाँ केवल आनन्द शेष रह जाता है और प्रक्रिया गौण हो जाती है। फिर तिरना निश्चित हो जाता है। यह याद ही नहीं आता कि पंख भी हिलाने हैं। यह होश ही नहीं रहता कि उड़ने के मूलभूत नियम न पाले गये तो दुर्घटना घट सकती है।
यह किसी रचनाकार के अपनी अनुभूतियों से एकाकार हो जाने की अवस्था है। यह किसी पथिक के मार्ग में लीन हो जाने की अवस्था है। पानी में दूर तक यात्रा करनी है तो ख़ुद को पानी कर लेने से बेहतर कोई दूसरा उपाय नहीं है। आकाश में बहुत ऊँचे जाना हो तो हवा में घुल जाना ही श्रेयस्कर है।
भाव और भाषा के इसी एकाकार स्वरूप का नाम है गीत। लय की झंकृति के आकाश में तिरता अनुभूति का पाखी है गीत। पीड़ा, हर्ष, दर्शन, उत्साह अथवा अन्य किसी भी मनोदशा के चरम पर पहुँचकर रचनाकार को अनहद की जो ध्वनि सुनायी देती है, वही गीत है।
इसके लिये बहुत ज़ोर नहीं आज़माना पड़ता। ज़ोर आज़माकर गीत रचा ही नहीं जा सकता। बादलों को पत्थर मारने से बरसात नहीं होती। बादल तो स्वतः ही बरस पड़ता है …बेपरवाह …झमाझम। यदि अनुभूति लबालब भर गयी है तो गीत को छलकना ही होगा। उसको आमन्त्रित नहीं करना पड़ेगा। वह स्वतः आयेगा। आप मना करेंगे, तब भी आ जायेगा। फिर उसे रोकना नामुम्किन होगा।
मैंने कई बार गीत से झगड़ा किया है लेकिन उसने भी ढीठ दोस्त की तरह आने का क्रम जारी रखा। कई-कई दिन शक्ल नहीं देखी, लेकिन फिर जब मिला तो ऐसे मिला जैसे कभी बिछुड़ा ही न हो। गत दो-ढाई वर्ष में तो गीत मेरी अभिव्यक्ति का साया बन गया है। विचार का हाथ थामकर किसी भी राह पर चलूँ, लेकिन मंज़िल पर गीत खड़ा मिलता है।
‘छूकर निकली है बेचैनी’ ऐसी ही सृजन यात्राओं का प्राप्य है। संवेदना के अस्तित्व से जो कंपन मन के धरातल पर घटित होता है, उसकी तरंगों का लिप्यंतरण हैं ये गीत। इनमें प्रसव की पीर से लेकर विरक्ति की मनोदशा तक की अभिव्यक्ति है। इनमें वयष्टि के झरोखे से समष्टि का दर्शन करने का प्रयास है। पौराणिक संदर्भों के कॅनवास पर परिवेश का चित्र उकेरने की कोशिश है। हिन्दी गीत के वातायन में कणांश सरीखा अस्तित्व लिये यह संग्रह पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत है। इसकी किसी भी पंक्ति से आपको अपने किसी अनुभव की गूंज सुनायी दे तो मेरी लेखनी को सहजता का आशीष दीजियेगा।
✍️ चिराग़ जैन
(“छूकर निकली है बेचैनी” की भूमिका)
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दिल्ली भारत की राजधानी है। देश के सभी प्रकार के कार्यों को करने के लिए बड़े-बड़े सरकारी दफ्तर इसी शहर में बनाए गए हैं। इस प्रयास में पूरा शहर एक दफ़्तर हो गया है और हर नागरिक एक फाइल। घर से दफ़्तर और दफ़्तर से घर के बीच घूमते-घूमते हर नागरिक के व्यक्तित्व पर इतनी खरोंचें पड़ गई हैं कि जब वह ख़ुद को तलाशने के लिए अपने आप पर हाथ फिराता है तो उसका वजूद किसी गली हुई फाइल के कागज़ात की तरह बिखर जाता है। यह देखकर नागरिक घबरा जाता है और उन पुर्ज़ों को जैसे तैसे फाइल कवर में ठूंसकर टेबल टू टेबल चक्कर लगाने लगता है।
एक फाइल सुबह गाड़ी में बैठकर ख़ुद को दफ़्तर की ओर धकेलती है तो रास्ते में साइकिल, ई रिक्शा, ठेले, स्कूटर, मोटर साइकिल और बसों में बैठी फाइलें उसके वक़्त की जेब में सेंध लगाती हैं। वह अपनी ज़िंदगी की पोटली से कुछ लम्हों की पूंजी उन पर ख़र्च करके कुछ गालियों का गुज़ारा भत्ता उनके मुँह पर मारकर आगे बढ़ जाता है।
इस लेनदेन में जब भी किसी एक फाइल की ईगो किसी दूसरी फाइल की ईगो से भिड़ जाती है तो पीछे लगी सभी फाइलें कई-कई घंटे जाम में फँसी रहती हैं। बाद में एक पुलिसिया बाबू उन दोनों से सहायता भत्ता लेकर उनके द्वारा एक दूसरे को दी जा रही गालियों का रुख़ अपनी ओर मोड़ लेता है और पीछे की सभी फाइलों का मार्ग क्लियर करवा देता है।
सरकार ने दिल्ली को स्वच्छ रखने के लिए सड़कों के किनारे कूड़ेदान रखवाए हैं। कूड़ेदान इतने ख़ूबसूरत हैं कि उनमें कचरा फेंकने का मन नहीं करता। इसलिए हम सड़कों पर कचरा फेंककर कूड़ेदान के सौंदर्य को बचा लेते हैं। वो तो भला हो सरकार का कि जनता की भारी मांग के बावजूद सड़कों की हालत सुधारने के निर्देश नहीं जारी किए, वरना हमें ज़रा सा कचरा फेंकने के लिए भी सरकारी दफ़्तरों की ओर दौड़ना पड़ता।
सरकारी दफ़्तरों में आप कहीं भी कचरा फेंक सकते हैं। यूँ भी दफ़्तरों को कचरे से ख़ास लगाव है। यही कारण है कि किसी फाइल के कचरा हो जाने तक कर्मचारी उस पर कार्रवाई नहीं करते। यह सरकारी कर्मचारियों की निष्ठा का ही प्रमाण है कि एक बार किसी आम नागरिक का काम किसी सरकारी दफ़्तर में अटक जाए, उसके बाद पूरी व्यवस्था उसे यह आभास कराने में जुट जाती है कि व्यवस्था के सम्मुख उसका वजूद कचरे से अधिक कुछ नहीं है।
पुराने ढर्रे की सड़ांध मारते इन दफ़्तरों में बैठे बाबुओं की शक्ल भी दिन-प्रतिदिन फाइलों की तरह बासी होती जा रही है। ऐसा लगता है कि ये सभी बाबू लोग स्वयं को व्यवस्था से एकरूप करने पर तुले हैं ताकि कोई दरख़्वास्त करनेवाला यह अंतर न कर पाएं की इस व्यवस्था में बाबू कहाँ शुरू होता है और व्यवस्था कहाँ ख़त्म।
अब दफ़्तरों की सड़ांध फाइलों में छुपकर घरों तक पहुँचने लगी है। घरों से बच्चों में और बच्चों से भविष्य तक यह सड़ांध फैल गई है। और हम नाक बंद किये चुपचाप देख रहे हैं कि हर फाइल दिन में दर्जनों बार बाबू बन जाती है और हर बाबू दिन में दर्जनों बार फाइल बन जाता है।
सरकार की ओर देखना हम छोड़ चुके हैं क्योंकि हम जानते हैं कि दिल्ली भारत की राजधानी है और हर काम को करने के लिए यहाँ बड़े-बड़े दफ़्तर सरकार ने ही बनवाए हैं। यहाँ सब लोग बड़े-बड़े काम ही करते हैं। या यूँ कहें कि यहाँ जो काम होता है वह बड़ा ही होता है। इसलिए आम जनता के छोटे-छोटे काम पीढ़ियों तक अधूरे ही पड़े रहते हैं।
✍️ चिराग़ जैन