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चरित्रहीन अभिनेता

एक प्रश्न देश के लगभग प्रत्येक मस्तिष्क को परेशान किये हुए है कि चुनावी रैलियों में कोरोना क्यों नहीं फैल रहा। और जैसा कि हमारे समाज का चलन हो गया है, इस प्रश्न में भी प्रश्न से पहले मोदी विरोधी या मोदी समर्थक की तलाश की जाने लगी है। जबकि हक़ीक़त यह है कि आमूल-चूल राजनीति इस विषय पर एक साथ है। जनता मरती है तो मरे, हमें रैलियों में भीड़ जुटाकर न्यूट्रल वोट डायवर्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़नी है।
लोककल्याणकारी गणराज्य के इस भौंडे नाटक में चरित्रहीन अभिनेता की भूमिका निभानेवाला चुनाव आयोग भी चुनावी रैलियों के लिये बनाए गए कोविड नियमों को बिसराकर देश के गृहमंत्री, प्रधानमंत्री और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री तक के हठयोग का लुत्फ़ उठा रहा है।
न्यायपालिका ने अपने लिए कॉमेडियन की भूमिका चयन की है। वह ऐसे-ऐसे नियम बना रही है कि उनमें लॉजिक तलाशने की गरज से निकलो तो अपने सिर के बाल नोचने से पहले हाथ नहीं रुकेंगे।
बहरहाल, राजनीति और व्यवस्था के इस आचरण ने जनता का केवल एक नुकसान किया है कि जनता कोविड की गम्भीरता को लेकर संशय में आ गयी है। लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि यदि कोविड इतना ख़तरनाक है तो राजनेता जैसी डरपोक स्पीशीज़ को इससे डर क्यों नहीं लग रहा।
संशय जायज़ है, किन्तु चुनाव एक ऐसा नशा है जिसमें जनहित तो क्या आत्महित की भी बलि चढ़ाने से राजनेता नहीं चूक सकते। इसलिए राजनीति के आचरण को देखकर कोविड के इस काल में अपने आप को ख़तरे में न डाले।
कोरोना वायरस एक बार शरीर को जकड़ ले तो पोर-पोर दुःखता है। जीवन का संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। घर-परिवार में अजीब सी दहशत व्याप्त हो जाती है। इसलिए अपनी प्रतिरोधक क्षमता का ध्यान रखिये और अपने आप को कोविड तथा राजनीति दोनों से बचाए रखें।
स्थितियाँ इतनी विकट हैं कि रैलियाँ लिखो तो भी ‘रंगरलियाँ’ टाइप हो रहा है।
✍️ चिराग़ जैन

कलकत्ता से कोरोना गिफ्ट

बंगाल चुनाव की हलचल के बीच ‘लपेटे में नेताजी’ की शूटिंग के लिये कोलकाता जाना तय हो गया। कार्यक्रम के प्रोड्यूसर आशीष पाण्डे ने पिछली बार हुगली नदी में स्टीमर पर शो शूट करने का प्रयोग किया था, जिसकी काफी प्रशंसा हुई। उसी से प्रभावित होकर इस बार भी उसी प्रारूप में शो शूट होना था। 1 अप्रेल को कार्यक्रम की रूपरेखा बनी कि 4 अप्रेल को दो एपिसोड सुबह- सुबह शूट किये जाएंगे और एक एपिसोड शाम को। 3 अप्रेल की दोपहर को दिल्ली से फ्लाइट थी, सो हमारे पास तीन एपिसोड्स की तैयारी करने के लिये कुल 48 घण्टे का समय था।
ऐसी स्थिति पहले भी कई बार हुई है, लेकिन इस बार कठिनाई यह रही कि कोलकाता चुनाव पर ही पहले चार एपिसोड शूट किये जा चुके थे इसलिए चुनावी माहौल की काफी सामग्री हम पिछले शूटिंग शेड्यूल में प्रयोग कर चुके थे। उसी विषय और उसी पात्रों के साथ लगभग वैसे ही घटनाक्रम पर तीन एपिसोड्स तैयार करने थे वो भी केवल 48 घण्टे में।
चारों आमंत्रित कवि अपने अनुभव, निष्ठा तथा क्षमता के बल पर इस चुनौती से जूझ ही लेंगे यह प्रोडक्शन को विश्वास था, और अंततः यह विश्वास बना रह सका। लेकिन यह यात्रा बेहद रोमांचक रही। दिल्ली हवाई अड्डे पर पहुँचा तो सुदीप भोला जबलपुर से आकर सुबह से प्रतीक्षारत थे। उन्होंने बताया कि कोरोना की नयी लहर के चलते दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरते ही उनका कोविड टेस्ट किया गया है। हवाई अड्डे पर भी लोगों के चेहरे पर कोरोना का भय और व्यवहार में सावधानी देखकर लगा कि जनता इस वायरस के दूसरे आघात से जूझने के लिये तैयार है।
शाम 6 बजकर 30 मिनिट पर कोलकाता में लैंडिंग हुई। हवाई अड्डे की एक दर्जन कन्वेयर बेल्ट्स में से जिस पर हमारा लगेज आना था, वह अचानक चलते-चलते बन्द हो गयी। लगभग 40-45 मिनिट का समय इस अनचाही परिस्थिति ने नष्ट किया, वह भी उस समय जब हम चारों में से कुछ कवियों को होटल पहुँच कर सुबह 5 बजे शूट होनेवाले 2 एपिसोड्स के लिये कविताएँ पूरी करनी थीं। येन-केन प्रकारेण होटल पहुँचे और जल्दी-जल्दी भोजन की औपचारिकता निभाकर सभी सुबह की तैयारी में जुट गये। लिखना भी ज़रूरी था और स्क्रीन पर फ्रेश दिखने के लिये सोना भी ज़रूरी था। मैं लगभग पूरी तैयारी करके ही घर से निकला था, इसलिए तुरन्त सो गया।
रात में अचानक किसी की उबकाइयो की आवाज़ से नींद खुली। तंद्रा की अवस्था से बाहर आया तो ज्ञात हुआ कि सुदीप भोला कई बार उल्टी कर चुके हैं और बुखार जैसा महसूस कर रहे हैं। स्वाभाविक रूप से पहला संदेह कोविड का ही हुआ। सुबह तक सुदीप परेशान रहे और सुबह तक स्थिति यह हो गयी कि उनका चेहरा शिथिल हो गया।
पाँच बजे शूटिंग के लिये जाना था, लेकिन मैं और कार्यक्रम के संपादक अमृत आनंद जी मुँह अंधेरे ही सुदीप को निकटतम नर्सिंग होम में ले गये। आवश्यक जाँच तथा आवश्यक उपचार देकर एक डेढ़ घण्टे में हम सुदीप को वापिस होटल ले आये। कार्यक्रम सुदीप के बिना करने का निर्णय लिया जा चुका था, लेकिन जब तक मैं नहा-धोकर लौटा तब तक सुदीप शूटिंग पर चलने का मन बना चुके थे।
बिजली की सी फुर्ती दिखाते हुए सुदीप दस मिनिट में नहा-धोकर सेट पर जाने के लिये तैयार थे। कोलकाता की उमस ने सेट पर पहुँचते ही ऊर्जा शोषित करना प्रारंभ कर दिया। पहला शूट प्रारम्भ होते-होते सात-सवा सात का समय हो गया था। उमस का प्रकोप हुगली में तैरते स्टीमर पर भी कम न हो सका। निस्पंद वातावरण में क्षण-क्षण और उग्र होते सूर्य के सम्मुख जैसे-तैसे पहला एपिसोड रिकॉर्ड हो गया। इस मौसम ने सुदीप की जुटाई गई ऊर्जा में सेंध लगा दी। मैंने पहली बार सुदीप के चेहरे पर पीड़ा देखी। अभी नीचे आकर साँस भी नहीं ले सके थे कि दूसरे एपिसोड की तैयारी हो गयी। सुदीप इस बार भी हमारे साथ रहे। सूरज और प्रचंड हो गया था। उमस और प्रबल हो गयी थी। लेकिन शो मस्ट गो ऑन का पालन करते हुए हम शूटिंग करते रहे। डेढ़ घंटे की इस शूटिंग ने हम सभी को ऊर्जाहीन कर दिया। स्थिति यह हुई कि होटल पहुँचते-पहुँचते मेरे शरीर ने हिम्मत छोड़ दी और मैं शिकंजी इत्यादि का सेवन करके बिस्तर पर लंबलोट हो गया। जब उठा तो पता चला कि सुदीप दोबारा अस्पताल गए थे, लेकिन डॉक्टर ने उन्हें आराम करने की सलाह देकर कुछ विटामिन इत्यादि की टेबलेट्स दे दीं। जब मैं उठा तब तक सुदीप सो चुके थे। दवाई उनके सिरहाने रखी थी, लेकिन उन्होंने खाई नहीं थी।
मन घबरा रहा था, सुदीप को कई बार उठाने का प्रयास किया, लेकिन वे हुंकारा भरकर ऐसे सो जाते, ज्यों कोई भयंकर नशे में सो रहा हो। उमस से थके हुए शरीर को वातानुकूलित कमरे में सुला दिया जाए तो उस पर ऐसा ही नशा चढ़ता है, इसका अनुभव मैं पहले भी कोलकाता शहर में कर चुका हूँ, इसलिए सुदीप की नींद से मैं चिंतित नहीं था, लेकिन उनके बिना खाये-पिये रहने से परेशान ज़रूर था।
बहरहाल, शाम के शूट का समय हो गया। इस बार सुदीप को शूट पर नहीं जाना था, यह सुनिश्चित कर दिया गया। सुदीप निद्रा से तंद्रा की अवस्था में आ गए थे लेकिन शो तीन ही कवियों के साथ होना था, सो सुदीप के लिये खिचड़ी ऑर्डर करके हम होटल से निकल गए। सेट पर पहुँचे तो सुबह जैसी उमस का स्थान शाम की मोहक हवा ने ले लिया था। पूरा जहाज रौशनी से जगमगा रहा था। टीएमसी, भाजपा और सीपीआई के नेतागण आ चुके थे, श्रोताओं की उपस्थिति हो चुकी थी और कवियों और एंकर ने मेकअप भी ले लिया था। उसी वक़्त अचानक मंद समीर ने झंझावात का रूप ले लिया। हुगली की लहरों में जैसे कोई भूकंप आया गया हो। आसमान को चीरती बिजली कड़कने लगी और हवा ने जहाज पर लगे सेट को तहस-नहस करना शुरू कर दिया। आनन-फानन में कैमरे और लाइट्स छत से उतारकर नीचे लाई गईं। यूनिट के लोगों ने भाग-भागकर कुर्सियाँ इत्यादि उड़ने से बचाई। सारा तामझाम यूनिट एक छोटे से कमरे में समा गए। ऑडिएंस और लीडर, नदी किनारे किसी सुरक्षित स्थान पर तूफान के रुकने की प्रतीक्षा कर रहे थे।
यकायक तेज़ बारिश शुरू हो गयी। स्पष्ट हो गया कि अब शो नहीं हो सकेगा। अब सब बारिश रुकने का इंतज़ार केवल इसलिए कर रहे थे कि अपने-अपने घर जा सकें। सारी मेहनत पर पानी फिर गया था लेकिन यूनिट और हमारे माहौल तनाव या क्षोभ के स्थान पर इस आकस्मिक स्थिति का हंसी-ठट्ठा चल रहा था। बारिश हल्की हो रही थी और मौसम खुशनुमा हो चला था। अचानक आशीष पांडे लाइट्स टेक्नीशियन से बोले- ‘दोबारा सेटअप लगाने में कितना समय लगेगा?’ आशीष जी के इस सवाल ने संकेत दे दिया कि शूटिंग रद्द नहीं होगी। जिस फुर्ती से सेट समेटा गया था, उससे दोगुनी ऊर्जा के साथ सेट दोबारा तैयार किया गया। एक-डेढ़ घंटे में दोबारा रौशनी नाचने लगी। जहाज फिर से जगमगा उठा। देर से ही सही, लेकिन शूटिंग शुरू हुई। शानदार एपिसोड शूट हुआ।
ऐसा लगा कि सुबह प्रकृति ने जो ऊर्जा सोख ली थी, वह दस गुनी करके हम पर बरसा दी। ऊर्जा से भरे हुए होटल लौटे तो देखा सुदीप के चेहरे पर भी कुछ रंगत लौटने लगी थी। रात के भोजन के नाम पर नाममात्र का कुछ खाकर सब सो गए। सुबह 7 बजे एयरपोर्ट के लिए निकलना था।
दिल्ली हवाई अड्डे पर सुदीप का जो कोविड टेस्ट हुआ था, उसकी रिपोर्ट अभी तक भी नहीं आई है। एयरपोर्ट ले जाने के लिए जो टैक्सी आई, उसका टायर पंक्चर हो गया। एयरपोर्ट पहुँचे तो ज्ञात हुआ कि जिस जहाज से जाना है, उसमें तकनीकी ख़राबी आ गयी। 10 बजे उड़नेवाली फ्लाइट ने 1 बजे उड़ान भरी और इस पंक्ति के लिखते-लिखते दिल्ली हवाई अड्डे पर टच-डाउन हो गया है। शानदार लेंडिंग हुई।
सुदीप कल सुबह की फ्लाइट से जबलपुर चले जाएंगे। और मैं अभी घर पहुँचते ही कुंडली बाँचूंगा कि किस मुहूर्त में घर से निकले थे।
✍️ चिराग़ जैन

शर्म आनी चाहिए जनता को

कोरोना की वर्तमान स्थिति भयावह है। जनता को चाहिए कि अपनी सुरक्षा के लिए सरकारी नियमों का पालन करे। बाज़ारों में भीड़ देखकर सरकार को घबराहट होती है। जनता होली जैसे अनावश्यक त्योहारों की आड़ लेकर समारोह करने की सोच रही है। लोग, होली मंगल मिलन जैसे बेहूदे कामों के लिये इकट्ठा हो रहे हैं। शर्म आनी चाहिए इस देश की जनता को। घर पर नहीं रह सकते?
सरकार को मजबूर होकर जनहित में सख्ती करनी पड़ती है। विवश होकर पुलिसवालों को कहना पड़ता है कि जो भी बिना मास्क दिखे उसको धर लो। और भी कुछ नहीं तो रिश्तेदारों के साथ ही होली खेलने चल दोगे! लज्जा नहीं आती? कोरोना से डर नहीं लगता? अरे मूर्खाे, अपनी नहीं तो औरों की जान की ही परवाह कर लो!
इस देश के महान राजनेता अपनी जान पर खेलकर लाखों लोगों की रैलियाँ कर रहे हैं ताकि लोकतंत्र बचा रह सके। कभी सोचा है कि कैसा लगता होगा जब दिल्ली में सोशल डिस्टेंस की सख्त नियमावली लागू करके बंगाल में लाखों लोगों की भीड़ के सामने मास्क हटाकर भाषण झाड़ना पड़ता है। कभी कल्पना की है कि अपनी आत्मा को क्या मुँह दिखाते होंगे बेचारे राजनेता!
महाराष्ट्र में लाखों केस आ गये, लेकिन हमारे राजनेता प्रदेश में गहराए राजनैतिक संकट से जूझने के लिए मंत्रालय, राजभवन, दिल्ली और प्रेस वार्ताओं में भागे फिर रहे हैं। कोरोना की जानलेवा दहशत को ताक पर रखकर, सरकारी गाइडलाइंस को धता बताकर भी कुर्सी की क़वायद में लगे हुए हैं। और तुम बस दो वक़्त की रोटी के लालच में धंधे-पानी पर निकल रहे हो। चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए ऐसी नाकारा जनता को।
क्या हो जाएगा अगर स्कूल नहीं खुलेंगे? क्या हो जाएगा अगर दफ़्तरों में काम नहीं होगा? क्या आफ़त आ जाएगी अगर लोग त्योहारों पर एक-दूसरे से नहीं मिलेंगे? कौन-सा पहाड़ टूट पड़ेगा अगर होली पर बिटिया के घर गुंजिया लेकर नहीं जा सकोगे? …इन सब टुच्ची बातों की तुलना चुनाव की महत्ता से करते हो?
उधर किसान आफ़त मचाए हुए हैं। इतने साल से अपने खेतों से कमा रहे थे ना! तब कौन से ताजमहल बना लिए तुमने। तब भी तुम फाँसी लगा-लगाकर मर रहे थे। अब सरकार जो कर रही है, उसे करने दो। इतनी हाय-तौबा क्यों? आकर बैठ गए हो दिल्ली बॉर्डर पर। …पड़े रहो। सरकार के पास क्या यही काम है कि तुम्हारा रोना सुनती रहे।
कभी बैठे हो सरकार में? कभी जाना है राजनीति किस चिड़िया का नाम है। सरकार के पास इन सब फालतू बातों के लिए वक़्त नहीं है, उसे चुनाव लड़ना है। चुनाव कोई हँसी-मज़ाक़ नहीं है। यह लोकतंत्र की आत्मा है। अब लोक के रोने-पीटने में लोकतंत्र को तो नहीं इग्नोर कर सकते ना! इसलिए ख़बरदार, अगर होली-वोली जैसे फालतू बहाने लेकर घर से बाहर क़दम निकाला तो!
✍️ चिराग़ जैन

कोरोना का स्विच सरकार के पास है

न्यूज़ बुलेटिन देखो तो दिमाग़ भन्ना जाता है। एक ख़बर बताती है कि कोरोना के डर के चलते मध्यप्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र में सरकारी नियमों में सख्ती। कोरोना के डर के कारण पंजाब सरकार ने बच्चों की परीक्षाएँ रद्द की। महाराष्ट्र के कुछ शहरों में नाइट कर्फ्यू। दिल्ली में 200 लोगों से ज़्यादा की सभा की मनाही। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ने कुम्भ पर लगाए प्रतिबंध हटाने को बताया जोखि़म भरा काम।
हम इन ख़बरों से डरने लगते हैं। जनहित के प्रति सरकार की गम्भीरता देखकर मन सरकार के प्रति श्रद्धा से भर जाता है। तभी ख़बर आती है कि खड़गपुर में केन्द्रीय गृहमंत्री की रैली में उमड़ी भारी भीड़। यह ख़बर देखते ही हमारी श्रद्धा की गति की दुर्गति हो जाती है। फिर एंकर बताती है कि ममता बनर्जी ने रैली में किया शक्ति प्रदर्शन। …हमारी श्रद्धा मुँह बाये हमारा थोबड़ा देखने लगती है। फिर पता चलता है कि तमिलनाडु, असम, पुदुच्चेरी, पश्चिम बंगाल और केरल में जमकर चुनावी रैलियाँ हो रही हैं, जहाँ ज़्यादा से ज़्यादा भीड़ दिखाना राजनेताओं की सफलता का मापदण्ड है। इसलिए सरकारों ने कोरोना को समझा दिया है कि तुम्हें कब किस रूट पर रहना है।
सरकार जानती है कि इस देश की जनता अनुशासित नहीं है। इसलिए सरकार ने जनता को अनुशासन में रखने के लिए कड़े कानून बनाए हैं। जैसे फ्लाइट में जाओ, तो एयरपोर्ट पर एक सीट छोड़कर बैठो लेकिन जहाज में एक-दूसरे से चिपककर बैठ सकते हो। क्योंकि सरकार ने कोरोना को समझा दिया है कि फ्लाइट में चिपकने पर मत फैलना।
ऐसे ही फ्लाइट में मास्क लगाकर बैठना ज़रूरी है क्योंकि एक-दूसरे की साँस से संक्रमण फैल सकता है। लेकिन जब एयर होस्टेस खाना बाँटती है, तब सभी यात्री अपना मास्क हटाकर एक-दूसरे से सटे हुए वातानुकूलित कम्पाउंड में बेझिझक खा सकते हैं, क्योंकि उतनी देर के लिए सरकार कोरोना का स्विच ऑफ कर देती है।
कोविड प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात करने के लिए शीर्ष नेता वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करके जनता को यह बताएंगे कि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कितना जरूरी है। लेकिन बंगाल में वही शीर्ष नेता उन्हीं मुख्यमंत्री के साथ हाथ से हाथ मिलाकर जनता को बताते हैं कि यहाँ कोरोना का स्विच ऑफ है।
स्टेडियम में लाखों लोग बिना मास्क के उछल-उछलकर मैच देखते हैं तो कोरोना नहीं फैलता, क्योंकि वहाँ सरकार ने कोरोना का स्विच ऑफ कर दिया है। लेकिन बिटिया की विदाई के समय यदि बारातियों की संख्या अधिक हुई तो कोरोना फैलने का डर रहता है, इसलिए सरकार वहाँ पुलिस भेज देती है। पुलिसवाला ऑफिशियली या अन-ऑफिशियली कुछ चार्ज लेता है और कोरोना का स्विच ऑफ करके चला जाता है।
अंतिम संस्कार में बीस से ज़्यादा लोग न हों क्योंकि वहाँ स्विच ऑफ नहीं किया गया है। यह स्विच ऑफ करवाने का उपाय सरकार जानती है, इसीलिए जिस प्रदेश में जिस सरकार को जो करना हो, वह कर लेती है। उसके पास कोरोना का स्विच है। लेकिन जनता को छूट दे दी गयी तो बेचारा कोरोना कहाँ जाएगा? और कोरोना चला गया तो न्यूज़ चैनल्स को बाक़ी ख़बरें दिखानी पड़ेंगी। और हमारे लोककल्याणकारी गणराज्य की सरकारें यह कतई बर्दाश्त नहीं करेंगी कि न्यूज़ चैनल्स ख़बरों में पेट्रोल डालने का काम करें।
न्यूज़ एंकर बताती है कि बाज़ारों में लोग लापरवाही कर रहे हैं इसलिए सरकार को सख्त होना पड़ रहा है। और अगली ही ख़बर में किसी राजनेता का रोड शो या रैली दिखाई जाती है, जहाँ न कोई मास्क है, न कोई सेनेटाइजर, न कोई सोशल डिस्टेंसिंग… लेकिन यहाँ तो स्विच ऑफ है।
मध्यप्रदेश में उपचुनाव थे, तब वहाँ स्विच ऑफ था लेकिन अब वहाँ धारा 144 लागू है। पंजाब में हाल ही में चुनाव हुए और चुनाव ख़़त्म होते ही कोरोना का स्विच ऑन हो गया। गुजरात में हाल ही में चुनाव हुए और अब वहाँ कोरोना है। बंगाल में अभी चुनाव हो रहे हैं इसलिए कोरोना की हिम्मत नहीं है कि वहाँ एंट्री कर ले।
सरकार ने कोविड को अच्छे से समझा दिया है कि पश्चिम बंगाल में इन दिनों चुनाव का माहौल है। देश के महत्वपूर्ण जननायकों को जनता से संवाद करके वोट मांगने हैं। यह लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है। लेकिन बच्चों की परीक्षा को टाल सकते हैं क्योंकि शिक्षा चुनाव से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है। बाज़ारों में धारा 144 लागू है क्योंकि जीना चुनाव से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है। कुम्भ और उर्स जैसे धार्मिक कार्यक्रमों में सावधानी बरतनी ज़रूरी है, क्योंकि धर्म भी चुनाव से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है। अंतिम संस्कार में सावधानी बरतनी होगी, क्योंकि मरना भी चुनाव से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है।

✍️ चिराग़ जैन

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