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“अलवर में एक मूक-बधिर बालिका के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ।” इस ख़बर में न तो ‘अलवर’ शब्द महत्वपूर्ण है, न ‘मूक-बधिर’। इसमें अगर कुछ महत्वपूर्ण है तो वह है बलात्कार। इसमें किसी शब्द पर शर्मिंदा हुआ जा सकता है तो वह शब्द है बलात्कार।
लेकिन हम इस एक शब्द को छोड़कर, बाक़ी हर शब्द पर चर्चा करेंगे। भाजपा समर्थक ‘अलवर’ शब्द को बार बार बोलकर राजस्थान की कांग्रेस सरकार को नीचा दिखाएंगे। उत्तर में कांग्रेस समर्थक ‘हाथरस-हाथरस’ चिल्लाकर उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार को चिकोटी काटेंगे। कोई ‘दलित-दलित’ चिल्लाएगा तो कोई बलात्कृता और बलात्कारी का धर्म बताकर चिल्लाने लगेगा।
लेकिन इन सब चीख़-चिल्लाहटों में वो एक चीख़ कराहकर दम तोड़ देगी, जो उस दुर्घटना में किसी चिड़िया के हलक़ से निकली होगी। हम बलात्कार को छोड़कर हर विषय पर चर्चा करेंगे।
आख़िर कब तक हम मूल विषय की आवाज़ को अपने शोर-शराबे की क्षमता से दबाते रहेंगे? कई बार ऐसा लगता है कि कहीं ये राजनैतिक दल इस बात की प्रतीक्षा तो नहीं करते कि चुनाव से पहले अगर विरोधी पार्टी की सरकार वाले राज्य में कोई बलात्कार हो जाए तो बाज़ी पलटी जा सकती है। …लेकिन मन यह मानने को तैयार नहीं होता कि कोई मनुष्य किसी बलात्कार की प्रतीक्षा कर सकता है। लेकिन जिस तरह बलात्कार के बाद राजनीति होती है, उसे देखकर इस आशंका को सिरे से ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता।
निश्चित रूप से, प्रशासन या राजनेता बलात्कार जैसे घिनौने अपराध के समर्थन में नहीं हो सकते। लेकिन वे ऐसा कर पाने का नैतिक बल क्यों नहीं दिखा पाते कि इस तरह की किसी भी दुर्घटना पर अपराधी की जाति, धर्म और विचारधारा को दरकिनार करके स्पष्ट विरोध दर्ज कराए।
एक बार, किसी एक मुद्दे पर हम ख़ालिस इंसान होकर सोचने की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाते? किसानों की आत्महत्या भाजपा के शासनकाल में हुईं तो कांग्रेस शोर मचाने लगी। अरे भाई, एक बार यह स्वीकार क्यों नहीं करते कि एक भी आत्महत्या प्रशासन के लिए शर्मनाक है। फिर चाहे वह जिसकी भी सरकार हो।
एक बार, किसी एक मुद्दे पर हम सब कोरे भारतवासी होकर क्यों नहीं सोच सकते। एक बार भाजपा समर्थक भाजपा से, और कांग्रेस समर्थक कांग्रेस से सवाल क्यों नहीं पूछ पाते?
ऐसी कौन सी शासन व्यवस्था का सपना हम देख चुके हैं जिसमें शासन कोई भी करे, व्यवस्था पूरी तरह चरमराई ही रहेगी? एक बार महंगे को महंगा, झूठे को झूठा, मूढ़ को मूढ़, भ्रष्ट को भ्रष्ट, अभद्र को अभद्र, अश्लील को अश्लील क्यों नहीं कहा जा सकता?
एक बार विपक्षी पार्टी में मौजूद किसी अच्छे इंसान की सार्वजनिक प्रशंसा क्यों नहीं की जा सकती? इतने लंबे समय तक राजनीति को प्रमुख मानकर देख चुके तो एक बार मुद्दों को प्रमुख मानकर क्यों नहीं देखा जा सकता?
किसानों के आंदोलन पर पानी की बौछार करवाने वाली सत्ता की आलोचना करने वाला विपक्ष एक बार इतना नैतिक बल क्यों नहीं जुटा पाता कि वह रामदेव के आंदोलन पर आधीरात को हुए लाठीचार्ज के लिए क्षमायाचना कर सके।
अलवर के बलात्कार पर अशोक गहलोत को घेरने वाले भाजपाई एक बार यह स्वीकार क्यों नहीं कर पाते कि बलात्कार हाथरस में हो या हैदराबाद में; अलवर में हो या दिल्ली में …बलात्कार सिर्फ़ बलात्कार होता है। और इस अपराध के अपराधियों को यथाशीघ्र सज़ा दिलवाने के लिए हम सब राजनीतिज्ञ एकजुट होकर काम करेंगे।
एक बार किसी बलात्कार की ख़बर में घटनास्थल, जाति और धर्म टटोलने से पहले हम अपने घर के आंगन में खेलती किलकारी के सिर पर हाथ फेरकर यह शपथ क्यों नहीं उठा सकते कि कम से कम इस एक विषय पर हमारी धारणा किसी राजनैतिक प्रोपेगेंडा से प्रभावित नहीं होगी। न पक्ष में, न विपक्ष में।
दलित का बलात्कार! क्या मतलब है इस बात का? सवर्ण का होता तो क्या अपराध न होता? मुस्लिम के साथ दरिंदगी? हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन के साथ होती तो दुखद न होती? आख़िर कब तक हम इन मातमों में माइक तलाशते रहेंगे?
कोई सद्भाव की बात करे तो उसमें वामपंथ तलाशा जाने लगता है। कोई मिलकर रहने को कहे तो उसे कांग्रेसी चमचा कहकर ट्रोल किया जाता है। कोई सांस्कृतिक चेतना का हवाला दे तो उसे संघी और भाजपाई कहकर अपमानित किया जाता है। कोई मनुष्यता पर सतर्क विवरण प्रस्तुत कर तो उसे रवीश का चेला कहा जाता है। कोई सभी दलों से अलग हटकर केवल भारतीय होने की अपील करे तो उसे केजरीवाल की राह पर चलने वाला बताया जाने लगता है।
मैं देश के सभी राजनैतिक दलों से अपील करता हूँ; मैं देश के सभी बुद्धिजीवियों से अनुरोध करता हूँ; मैं देश के सभी धर्मगुरुओं से निवेदन करता हूँ; मैं देश की सभी सेलिब्रिटीज़ से रिक्वेस्ट करता हूँ कि घृणा और विघटन की राह पर बहुत आगे निकल आए इस देश को एक बार मनुष्यता की भव्यता की याद दिलाएँ ताकि जब हमारी अगली पीढ़ी के साथ कोई अन्याय हो तो उसके आँसू पोंछने वाले हाथ उससे उसकी जाति, कुल, धर्म या राजनैतिक विचारधारा का सर्टिफिकेट न मांगे।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
बाँसुरी मेरा प्रिय वाद्य है। अपनी ख़ामियों को ख़ूबी बना लेने का श्रेष्ठतम उदाहरण है बाँसुरी। बाँस के खोखलेपन से सुर निकाल लेने का चमत्कार है बाँसुरी।
श्वास की लिपि से मन की भाषा बोलने का यंत्र है बाँसुरी। अंगुलियों पर थिरकते सुरों को उच्छ्वास की ऊष्मा से मीठा करने का जादू है बाँसुरीवादन।
जब कोई बंसी बजाता है तो उसके नयन स्वतः मुंद जाते हैं। पलक गिरते ही भीतर आनन्द का महारास प्रारम्भ होता है। स्थूल दृष्टि से देखने पर केवल अधरों को बाँसुरी बजाते देखा जा सकता है, किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो हम पाएंगे कि अधर ही नहीं; अंगुलियाँ, कान, मस्तिष्क, मन और आत्मा तक सब मिलकर बाँस की इस पोरी को रसाल-सा मीठा करने में जुट जाते हैं।
श्वास चौकन्नी रहती है कि कहीं उसके आधिक्य से सुर न बिगड़ जाए। अंगुलियाँ सावधान रहती हैं कि ज़रा-सी इधर-उधर हुई तो तान में व्यवधान हो जाएगा। पलकें बन्द होकर ध्यान से सबकी चौकसी करने में तल्लीन ही जाती हैं। मन तान की सर्जना करता है और कान उसके साकार होने पर हर्ष की रोमावली को जागृत कर देते हैं।
गहरे ध्यान में उतरने की संगीतमयी वीथि है बाँसुरी। भीतर घटित हुए अनहद नाद का सुरावतार है बाँसुरी वादन। संगीत की सर्वाधिक मुँहलगी विधा है बाँसुरी वादन।
जब बाँसुरी बजती है तो पूरा परिवेश कलात्मक हो उठता है। दसों अंगुलियाँ ऐसी प्रतीत होती हैं मानो दस गन्धर्व किसी बाँस के पुल पर लास्य कर रहे हों। ओंठ की मुद्रा देखकर ऐसा लगता है ज्यों अनंग ने अपने पुष्पधनु पर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसे तान दिया हो। ग्रीवा हौले से एक दिशा में घूमकर कोई नाट्यमुद्रा की छवि प्रस्तुत करती है।
कुल मिलाकर सब कुछ मधुर हो जाता है। शायद इसीलिए वंशवाले कन्हैया के लिए कहा जा सका- ‘मधुराधिपतेरखिलं मधुरं!’
✍️ चिराग़ जैन
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आगरा शहर पीछे छूट रहा था और राजमार्ग सकुचाते हुए एक समान्य सी सड़क में समा गया था। निमंत्रण देते समय ही होलीपुरा के वयोवृद्ध गीतकार शिवसागर शर्मा जी ने बता दिया था कि सड़क पर गाय-मवेशी बहुत मिलेंगे इसलिए गाड़ी आराम से ही दौड़ाना।
ज्यों-ज्यों हम आगरे की शहरी आबोहवा से बाहर निकल रहे थे, त्यों-त्यों सड़क किनारे हरियाली और सड़क पर गैया की मात्रा बढ़ती जा रही थी।
आसमान के बादल रह-रहकर हमारी गाड़ी पर रिमझिम से हस्ताक्षर कर रहे थे। सड़क के बीच मवेशियों की महा-पंचायतें लगी थीं। ऐसा लगता था जैसे गौवंश के महाकुंभ में अलग-अलग अखाड़े अपनी बिछावत सजाए बैठे हों। इनकी संख्या इतनी अधिक थी कि महानगरों में सरपट दौड़ती गाड़ियां यहाँ दबे पांव किनारे होकर निकल रही थीं।
इस वृंदावननुमा वातावरण से गुज़रते हुए जब काफ़ी समय बीत गया तो जीपीएस ने हमें मुख्य सड़क से लगभग एक पगडंडी पर उतार दिया। दोनों ओर खेत कतार बाँध कर खड़े थे और उनके बीच से हमारी गाड़ी लहराती हुई पगडंडी पर दौड़ रही थी। खेतों का साम्राज्य संपन्न हुआ तो हम होलीपुरा के रिहायशी इलाके में पहुँच गए।
रास्ता, मौसम और गांव… तीनों ने मन को रमणीक बना दिया था। हवा की नमी से मन भीगने लगा था कि अचानक गाड़ी एक बड़े से गेट में प्रविष्ट हुई और एक मैदान में जाकर रुक गई। सामने बड़ा सा फ्लैक्स लगा था जिसमें आमंत्रित कविगण की सूची में मेरा भी शानदार चित्र छपा था।
बैनर से लेकर आयोजक तक सादगी का समारोह था। गाँव के इंटर कॉलेज के टीनवाले सभागार में आयोजन था। दीवारें ख़ूबसूरत और महंगे पेण्ट से सजी नहीं थीं, लेकिन उन पर जीवन की वे इबारतें लिखी थीं, जिनको आत्मसात करके मनुष्य बना जा सकता है। स्टेज पर गद्दा बिछा था और उस पर मसनद लगाई गयीं थीं। आयोजकों की भागदौड़ (जो कार्यक्रम सम्पन्न होने तक यथावत बनी हुई थी) से गद्दे में सिलवटें पड़ गयी थीं लेकिन स्वागतकर्ताओं की मुस्कान में ज़रा भी सिलवट नहीं मिली।
एनसीसी कैडेट्स और अन्य कुछ बच्चे स्टेज के ठीक सामने बिछी दरी पर विराजित थे। शेष श्रोतादीर्घा कुर्सियों से सज्ज थी। हॉल में थोड़ी आवाज़ गूंज रही थी लेकिन साउंड सिस्टम इतना बढ़िया था कि हॉल की इको का दुष्प्रभाव कवियों की प्रस्तुति पर नहीं पड़ा।
कार्यक्रम का आयोजन सीधे-सादे गीतकार श्री शिवसागर शर्मा की दो पुस्तकों के लोकार्पण के उपलक्ष्य में किया गया था। पीले कुर्ते के नीचे सफेद रंग की धोती पहने शिवसागर जी बड़े ख़ुश थे। सारी व्यवस्था प्रयत्क्ष रूप से वे स्वयं ही कर रहे थे इसलिए कवियों के स्वागत, श्रोताओं की व्यवस्था, माइक, हॉल, पुस्तक लोकार्पण, माला, भोजन, मानदेय, दीप प्रज्ज्वलन की मोमबत्ती और सभी व्यवस्थाओं ने उनको अतिरिक्त व्यस्त कर रखा था।
प्रोफेसर हरि निर्माेही ने प्रारंभिक संचालन किया और पुस्तक लोकार्पण का कार्य सम्पन्न करवाया उसके बाद शिवसागर जी ने काव्यपाठ भी किया और अपने बेहतरीन गीत से कार्यक्रम का स्तर सुनिश्चित कर दिया।
इसके बाद मेरे संचालन में सभी कवियों ने सधा हुआ, संक्षिप्त किन्तु सार्थक काव्यपाठ किया। स्थानीय कवियों को सुनकर भी यह समझ आ गया था कि परिवेश गीत का है। फिर तो सभी कवियों ने अपने मन का काव्यपाठ किया। भोजन का समय होने पर कार्यक्रम में ब्रेक दिया गया। सबने मान-मनुहार से भोजन किया।
एक बार मुझे ऐसा लगा कि इस ब्रेक के कारण श्रोताओं की संख्या कम हो जाएगी लेकिन जब हम भोजन करके लौटे तो हॉल उतना ही भरा हुआ था।
कवि-सम्मेलन क्या था, कविताओं का महोत्सव था। गीत पर श्रोताओं की प्रतिक्रिया देखकर मैं भी गीत सुनाने की हिम्मत कर सका; जिसे सफल कहा जा सकता है।
एक गर्म दुःशाला, एक डिब्बा गुंजिया, दो सद्य प्रकाशित पुस्तकें और ढेर सारा ‘मन’ लेकर गाँव से घर लौट आया हूँ लेकिन यह स्वीकार करना चाहता हूँ कि तानसेन बनकर घूमते-घूमते आज हरिदास की कुटिया में पहुँचा तो अपनी अट्टालिकाओं का बौनापन समझ आ गया।
भव्य मंच, ग्लैमरस साज-सज्जा, चकाचौंध और बेतहाशा शानो-शौक़त से दूर आज गाँव का कवि-सम्मेलन करके लौटा हूँ। ऐसा लग रहा है ज्यों बहुत दिन तक पिज़्ज़ा और डबलरोटी खाने के बाद यकायक किसी ने चूल्हे के पास बैठाकर पानीवाले हाथ की रोटी, ताज़ी पिसी चटनी के साथ परोस दी हो।
✍️ चिराग़ जैन
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प्रधानमंत्री की सुरक्षा में चूक की घटना पर दोनों तरफ़ के लोग जो ट्रोलिंग कर रहे हैं, वह अधिक दुःखद है। यह विषय देश के सर्वाेच्च नेतृत्व की सुरक्षा से जुड़ा है। इसमें परिहास और उपहास की कोई गुंजाइश नहीं है। बल्कि आदर्श स्थिति तो यह थी कि इसमें राजनीति की भी संभावनाएँ न खोजी जातीं।
सीधा-सा मसअला है कि जो विभाग अथवा अधिकारी इसके लिए उत्तरदायी हैं, उन पर कार्रवाई की जावे। लेकिन इसकी बजाय दोनों ओर के लोग इस दुर्घटना को पंजाब चुनाव में भुनाने के लिए कांग्रेसी और भाजपाई होकर दौड़ पड़े हैं।
यह घटना शर्मनाक है। दोनों तरफ़ अतिवाद हावी है। मोदी जी के समर्थक चन्नी की तुलना नवाज़ शरीफ़ से और पंजाब की तुलना पाकिस्तान से करने लगे हैं। तो मोदी विरोधियों ने इसे किसान आंदोलन में हुई मौतों का बदला करार दे दिया। दोनों ही घृणास्पद हैं।
राजनीति जब इस देश के लोक को लोकतंत्र और संविधान का सम्मान सिखाने की बजाय भाजपाई और कांग्रेसी होना सिखा रही थी तब शायद उसे यह नहीं पता था कि इस राह पर कैसे-कैसे मोड़ आ सकते हैं।
बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी के पैर का प्लास्टर मीम और जोक्स का विषय बना था तब भाजपाइयों को यह इल्म न रहा होगा कि उनके लीडर भी हाड़-मांस के ही बने हैं और चोट किसी को भी लग सकती है। कांग्रेसी जब नरेंद्र मोदी के लड़खड़ाने पर चुटकियाँ ले रहे थे तब वे भूल गए थे कि यही जनता, रैली में पत्थर फेंककर एक प्रधानमंत्री की नाक घायल कर चुकी है। तब वे भूल गए थे कि घृणा की जिन वादियों में राजनीति के बीज बोए जाते हैं उनका शिखर ख़ून से लथपथ हो जाता है।
द्वेष और स्वार्थ की इन क्यारियों में लोकतंत्र का बगीचा नहीं फूल पाएगा। हम धीरे-धीरे नहीं, बहुत तेज़ी से वर्गों में बँटते जा रहे हैं। हम इतने संवेदनहीन होते जा रहे हैं कि जब दूसरे पक्ष के आंगन में मातम होता है तो हम अपने चौक में जश्न मनाने लगते हैं। हम इतने निष्ठुर हो गए हैं कि शवयात्रा पर भी पत्थर फेंकने से नहीं कतराते।
हम मृत्यु के अवसर पर भी अपने-अपने झंडे उठाए गाली-गलौज करने लगते हैं। राहत इंदौरी, ऋषि कपूर, सुशांत सिंह राजपूत, रोहित सरदाना, विनोद दुआ और न जाने कितने दिवंगतों ने अपनी अंतिम यात्रा में ये बदबूदार गालियाँ झेली हैं।
हमारी राजनैतिक महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ गयी है कि हमने श्मशान और कब्रिस्तान तक को अखाड़ा बना लिया है। हिंदू-मुस्लिम से अधिक बड़ा द्वंद्व कांग्रेसी-भाजपाइयों में चल पड़ा है। मोदी समर्थक और मोदी विरोधी के मध्य तलवारें खिंच रही हैं। सौहार्द और समन्वय की बात करने वाले गाली खा रहे हैं। ऐसे में पंजाब की घटना से पूरे देश के राजनेताओं को यह सीखना पड़ेगा कि जिन रास्तों में नागफनी बोई जा रही है, उनसे कभी ख़ुद भी गुज़रना पड़ सकता है।
ईश्वर एक मनुष्य के रूप में प्रत्येक राजनीतिज्ञ को भी स्वस्थ तथा दीर्घायु रखे और मेरे देश की जनता को विवेक का वरदान दे!
✍️ चिराग़ जैन
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वह दिन दूर नहीं जब हर टोल प्लाज़ा पर लिखा होगा कि अगला टोल प्लाज़ा 500 मीटर आगे है।
2017 में भारत सरकार ने सभी वाहनों के लिए टोल टैक्स भुगतान करने के लिए ‘फास्ट टैग’ आवश्यक कर दिया था। इसके समर्थन में यह तर्क दिया गया था कि इससे टोल प्लाज़ा पर लगने वाली लम्बी कतारों से मुक्ति मिलेगी। (यद्यपि तब भी यह नियम था कि यदि टोल प्लाज़ा पर एक निश्चित दूरी से अधिक लम्बी लाइन लग जाए तो सभी वाहनों को बिना टोल वसूले जाने दिया जाएगा।)
यदि किसी ने फास्ट टैग न लगवाया तो टोल प्लाज़ा से गुज़रते समय उससे दोगुने पैसे वसूले जाएंगे। अब जनता विवश होकर निजी कंपनियों के पास फास्ट टैग ख़रीदने पहुँची। कंपनियों ने सिक्योरिटी मनी के रूप में 150-200 रुपये प्रत्येक वाहन धारक से धरवा लिए। रीचार्ज के लिए जमा करवाने वाली रक़म करोड़ों रुपये का आँकड़ा पार कर गयी।
अब हर वाहन पर फास्ट टैग लग गए और वाहन चालक यह समझने लगे कि टोल प्लाज़ा पर जाम लगना बंद हो जाएगा। कुछ जगह हुआ भी लेकिन अधिकतर टोल प्लाज़ा पर फास्ट टैग की मशीनें काम नहीं करतीं। वहाँ खिड़की पर बैठा वसूलीकर्ता आपको गाड़ी आगे-पीछे करवाता रहता है। फिर भी मशीन स्कैन न कर सके तो आपको कह दिया जाता है कि आपके फ़ास्ट टैग में बैलेंस नहीं है। आप आश्चर्यचकित होकर मोबाइल निकालते हैं। फिर उसमें फास्ट टैग की एप्प खोलकर उसे बैलेंस दिखाते हैं। वह अपने भावनाशून्य चेहरे को दूसरी ओर घुमाकर एक अजीब से स्वर में चिल्लाता है। उस स्वर को सुनकर कुछ मिनिट बाद एक प्राणी अपने हाथ में एक छोटा-सा स्कैनर लेकर आता है। आपके फास्ट टैग को स्कैन करता है और तब आप टोल से निकल पाते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में यदि आप थोड़े भी चिड़चिड़ाते हैं तो तुरंत आपकी गाड़ी के चारों ओर छह-सात पहलवान प्रकट हो जाएंगे और आपको प्रकान्तर से समझा देंगे कि हमसे पैसे वसूलने के लिए इन्होंने सरकार को पैसे दिए हैं, इसलिए इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
रोज़-रोज़ की इस ज़्यादती से परेशान होकर आप थाने जाने का विचार करते हैं और एक दिन थाने चले जाते हैं। थानेवाले आपको पहले प्यार से और फिर डाँटकर चलता कर देते हैं। आप थाने के बाहर खड़े होकर समझ जाते हैं कि पुलिसवालों के हाथों बेइज़्ज़त होने की अपेक्षा ठेकेदार के गुंडों के हाथों लुटना बेहतर है।
अब टोल प्लाज़ा पर कितनी भी लाइन लगे, आप चुपचाप खड़े रहते हैं। इस जिल्लत से गुज़रते हुए आपको यह ध्यान ही नहीं रहता कि कब आपके टोल टैक्स में 20-25 प्रतिशत की वृद्धि कर दी गयी है। इस वृद्धि का विरोध नहीं किया जा रहा, इससे ठेकेदार ख़ुश है। ठेकेदार जनता से वसूलकर मोटा पैसा सरकार को दे रहा है, इससे सरकार ख़ुश है। (क्योंकि सरकार का काम बिज़निस करना नहीं है) और जनता… वह यह सोचकर ख़ुश है कि पहले से बनी हुई सड़क पर जो नया टोल प्लाज़ा बन रहा है, उस पर अभी टोल शुरू नहीं हुआ है।
✍️ चिराग़ जैन
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पिछले कुछ वर्ष में भारतीय संस्कृति के विरुद्ध एक ऐसा डिजिटल षड्यंत्र प्रारम्भ हुआ है, जिसके शिकंजे में हमारे हज़ारों युवा फँसते जा रहे हैं। भारतीय संस्कृति अपनी आर्य परम्परा, सहिष्णुता, सौहार्द तथा वात्सल्य के दम पर पूरी दुनिया में शीर्ष पर रही।
इन मूल्यों के कारण ही यूनान, मिस्र, रोमा सब मिट गये जहाँ से लेकिन हमारी संस्कृति का बाल बांका न कर सके। मुग़लों ने भारत पर इतने लंबे समय शासन किया लेकिन सनातन परंपरा की गहरी जड़ों को हिला न सके। अंग्रेजों ने भौतिकवाद के तमाम अस्त्र छोड़े किन्तु विनम्रता और परस्पर उपकार करने की आदत के आगे उनका एक भी शस्त्र सफल न हो सका।
भयावह क्रोध में किसी के प्रति आक्रोश उमड़ता था तो भी घर की दीवार पर लगी मर्यादा पुरुषोत्तम की मुस्कान हमारे द्वेष को विगलित कर देती थी और हम उसकी नकारात्मकता से होड़ करने की बजाय अपनी सकारात्मकता की लकीर को बड़ा करने में जुट जाते थे।
हमने श्रीराम से सीखा है कि रावण से युद्ध जीतने के लिए रावण होना कोई उपाय नहीं है। स्वयं को राम बनाए रखते हुए अपनी सीता वापस लेने का नाम ही विजय है। यदि सामने वाले ने आपको अपने जैसा बनने के लिए विवश कर दिया तो फिर काहे की जीत?
यही आदर्श पूरी दुनिया को हमारे सामने घुटने टेकने पर विवश करता रहा है। इसीलिए मेरा ऐसा मत है कि दुनिया भर में सनातन संस्कृति से ईर्ष्या रखने वालों ने सोशल मीडिया पर ऐसी लाखों प्रोफाइल्स बनाई हैं, जिनके डीपी में या तो हिन्दू ध्वज होता है, या श्रीराम के उग्र स्वरूप का चित्र होता है या फिर ‘मैं कट्टर हिन्दू हूँ’ का उद्घोष होता है। इन प्रोफाइल्स पर आप नीचे तक स्क्रॉल करेंगे तो पाएंगे कि इनमें से अधिकतर में चार-पाँच बार डीपी चेंज करने के अलावा कुछ और नहीं होता। ऐसी कुछ प्रोफाइल्स में कट्टरता की पोस्ट्स भी कभी-कभार शेयर कर ली जाती हैं। कुल मिलाकर आप इन प्रोफाइल्स पर विचरण करेंगे तो आसानी से समझ सकते हैं कि यह किसी की ओरिजनल प्रोफ़ाइल नहीं है, बल्कि एक उद्देश्य विशेष के लिए बनवाई गयी फेक प्रोफाइल्स में से एक है।
ये सभी प्रोफाइल्स भारतीयता की बात करनेवालों को, लोकतंत्र की बात करनेवालों को, सद्भाव की बात करने वालों को और वर्तमान शासन की आलोचना करनेवालों की पोस्ट पर गंदी गालियाँ लिखकर आती हैं। इसमें सरकार की आलोचना करनेवालों को गालियाँ बककर वे यह सिद्ध करते हैं कि ये प्रोफाइल्स भाजपा सरकार ने बनवाई हैं। जबकि वास्तव में उनका उद्देश्य सनातन संस्कृति को बदनाम करना है।
जब कोई डीपी में भगवान राम का चित्र लगाकर माँ-बहन की गालियाँ बकेगा तो उससे साख तो श्रीराम की ही धूमिल होगी। जब कोई ‘मैं कट्टर हिंदू हूँ’ लिखकर अभद्र टिप्पणियाँ करेगा तो इससे बदनामी उसकी नहीं होगी, हिंदू धर्म की होगी।
ऐसे में मोदी सरकार के भोले-भाले समर्थक इनके झाँसे में आकर इनके जैसा आचरण करने को ही राष्ट्रवाद मान बैठे हैं। जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना में मातृभूमि के जिस गुण की सबसे पहले पूजा की गई है वह है ‘वात्सल्य’ (नमस्ते सदा ‘वत्सले’ मातृभूमे)। ऐसी विचारधारा के लोग भला कट्टरता और गाली-गलौज का समर्थन कैसे कर सकते हैं।
श्रीराम को आदर्श माननेवाली परम्परा भला बदले की भावना को कैसे भड़का सकती है? यदि बदला लेना ही उचित होता तो क्या श्रीराम सीता के अपहरण के बदले मंदोदरी का अपहरण न कर लेते! लेकिन श्रीराम ने हमें सिखाया कि उस युद्ध का उद्देश्य केवल अपनी सीता वापस लेना है। इस प्रयास में जो लंका उन्होंने जीती उस पर भी अधिकार नहीं किया।
‘हमने दुश्मन को गले मिल-मिल के शर्मिंदा किया है’ जैसे सूक्ति वाक्यों का अनुगमन करने वाली परम्परा को गाली-गलौज और वैभत्स्य के अखाड़े में खींचने का यह षड्यंत्र श्रद्धेय डॉ हेडगेवार और पूज्य गुरु गोलवलकर जी के सपनों को ध्वस्त करने का एक कुचक्र है।
आप स्वयं देखिए, जबसे ये प्रोफाइल्स बनी हैं तबसे हेडगेवार जी और गुरु गोलवलकर जी का कोई नाम भी उद्धृत नहीं करता। क्योंकि इनके विचारों पर विवाद नहीं किया जा सकता। सब लोग सावरकर के नाम को उछालते हैं, नाथूराम गोडसे का नाम लेते हैं क्योंकि इनके नाम पर विवाद करके हमारी संस्कृति, परम्परा और विचारधारा को विवादित सिद्ध किया जा सकता है।
श्रीराम के मुस्कुराते हुए चित्र, वन को जाते हुए श्रीराम के चित्र, हनुमान को गले लगाते हुए श्रीराम के चित्र, शबरी के बेर खाते हुए श्रीराम के चित्र हमारे जीवन से ग़ायब कर दिए गए हैं। क्योंकि इन सब चित्रों को देखकर श्रीराम उनके लिए भी पूज्यनीय हो जाते हैं, जो जन्मतः वैष्णव नहीं हैं। इसके स्थान पर आपको क्रोधित राम की पेंटिंग दी गयी है डीपी पर लगाने के लिए। ज़रा याद करके देखें कि आपने अपने बचपन में क्रोधित राम का चित्र कहाँ देखा था? आपको समझ आएगा कि ये पेंटिंग्स पिछले कुछ वर्षों में एक षड्यंत्र के तहत बनवाई गई हैं ताकि अपनी मुस्कान से सबका मन मोहनेवाले भगवान राम की उस छवि को बदला जा सके।
अपनी विनम्रता से पूरी दुनिया को दीवाना बना लेने वाले सनातन धर्म को लड़ाकों और कट्टरवादियों का धर्म सिद्ध किया जा सके। काश मेरे इस महान धर्म की युवा पीढ़ी इस षड्यंत्र से बच सके ताकि ‘मधुराधिपतेरखिलं मधुरं’ की इस अद्वितीय संस्कृति को बचाया जा सके।
✍️ चिराग़ जैन