Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
दिल्ली – यह केवल एक शहर का नाम नहीं, बल्कि एक अंदाज़ है ज़िन्दगी का। अपने साथ न जाने कितने ही किस्से-कहानियाँ लेकर अपने नम इतिहास के साथ ये शहर, ज़िंदा भी है और आबाद भी।
तोमर, पिथौरा, सीरी, सैयद, लोधी, तुग़लक़, ग़ुलाम, मुग़ल, खि़लजी,और अंग्रेज सभी ने इस शहर को अपने-अपने अंदाज़ में बसाया और अपने-अपने तरीके से उजाड़ा है।
दिल्ली के लगभग हर इलाके ने इतिहास की कोई न कोई करवट ज़रूर देखी है। अनंगपाल तोमर और रायपिथौरा से लेकर जॉर्ज माउंटबेटन और जवाहरलाल नेहरू तक न जाने कितने ही तख़्त-ओ-ताज बनते-बिगड़ते देखे हैं इस ज़मीन ने।
लालकोट, किलोकरी, सीरीफोर्ट, सफदरजंग, लोधी गार्डन, तुगलकाबाद, निज़ामुद्दीन, कुतुब मीनार, हुमायूँ का मक़बरा, खानखाना मक़बरा, सब्ज़ गुम्बद, शाहदरा, लालक़िला, जामा मस्जिद, फतेहपुरी मस्जिद, फव्वारा चौक, शीशगंज साहिब, बंगला साहिब, नानकसर साहिब, मजनू का टीला, ख़ूनी दरवाज़ा, दिल्ली दरवाज़ा, नजफगढ़… हर जगह इतिहास के बेहद क़ीमती ज़र्रे जड़े हुए हैं। एक-एक इमारत की अपनी एक मुक़म्मल कहानी है।
कभी मौक़ा मिला तो इन सब कहानियों को आपके साथ साझा करूँगा।
दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली है
जो भी गुज़रा उसी ने लूटा है
यह शेर कहानी का केवल एक पहलू बयां करता है। हक़ीक़त यह है कि इस शहर ने हर लुटेरे से कुछ न कुछ रेहन रखवा लिया है, जो तारीख़ के ख़ज़ाने में आज तक महफ़ूज़ है।
मुहम्मद शाह रंगीला की अय्याशियों की वजह से नादिरशाह के हमले को छोड़ दें, तो बाक़ी कोई ऐसा न रहा, जिसने दिल्ली की सरज़मीन पर क़दम रखा हो और इस शहर को कुछ देकर न गया हो। कुछ तो अपना दिल ही इस शहर को देकर दीवाने हो गए।
कहानी कहने बैठें तो तय करना मुश्किल हो जाता है कि इस शहर को ज़ौक़-ओ-ग़ालिब की दिल्ली कहा जाए या ज़फ़र-ओ-दाग़ की दिल्ली! इसे हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का शहर कहा जाए या रायपिथौरा का शहर! इसके निर्माण के लिए शाहजहां को शुक्रिया कहें या सर लुटियन्स को इस शहर के निर्माण का थैंक्स बोला जाए। चांदनी चौक से गुज़रते हुए फव्वारा चौक पर गुरु तेग़ बहादुर के शिष्यों की क़ुर्बानी याद करके मत्था टिकता है तो ख़ूनी दरवाज़े को देखकर 1857 के विद्रोह के सर्वमान्य नायक बहादुशाह ज़फ़र के शहज़ादों के बलिदान याद आते हैं।
जिधर देखो, उधर अतीत का कोई सफ़हा वक़्त की हवाओं पर संगीत सुनाता दिखाई देता है। ऐतिहासिक इमारतों की इस शहर में इतनी तादात है कि दर्जनों बहुमूल्य इमारतें कभी मंज़रे-आम पर रौशन ही नहीं हो पातीं। वज़ीराबाद में जमुना के किनारे मौजूद खण्डहर, लोदी कॉलोनी में नजफ़ खां का मक़बरा और नजफगढ़ का दिल्ली गेट रोज़ दिखाई देता है लेकिन उसका इतिहास जानने की जिज्ञासा शायद ही किसी को होती हो।
तीर्थ करने चलो तो यह शहर किसी तीर्थक्षेत्र से कम नहीं है। मंदिरों की एक पूरी फेहरिस्त है यहाँ। चांदनी चौक के गौरीशंकर मंदिर से शुरू करके कालकाजी शक्तिपीठ, झंडेवालान, छतरपुर, पांडवकालीन भैरों मंदिर, इस्कॉन, लोटस टैम्पल, चांदनी चौक का लाल मंदिर, महरौली का अहिंसा स्थल, दादाबाड़ी, लोदी रोड का साईं मंदिर और मलाई मंदिर के अलावा गली-गली में आस्था के इन केंद्रों की बहुतायत है।
औलियाओं की फ़क़ीरी याद करो तो हज़रत निज़ामुद्दीन से लेकर अब्दुर्रहीम ख़ानखाना, अमीर खुसरो, मिर्ज़ा ग़ालिब और बख़्तियार काकी की दरगाह तक का सफ़र किया जा सकता है।
स्वाद के दीवानों के लिए बालूशाही, मालपुए, कुल्फी, हलवा-नागौरी, कचौड़ी, बेड़मी, गोलगप्पे, परांठे, कलमी वड़े और न जाने कितने ही लज़ीज़ व्यंजनों के विकल्प मिल जाएंगे।
मौसम इतना मेहरबान है कि सर्दी, गर्मी और बरसात का भरपूर मज़ा लेता है यह शहर। हर सुख के साथ दुःख जुड़ा होता है इसलिए कोहरा, चिल्ला, लू और बाढ़ भी इसके मुक़द्दर में आ ही जाती है।
गुलमोहर, नीम, अमलतास, पिलखन, कीकर, पलाश, बोगनबेलिया, मधुमालती, गूलर, पपीते और बरगद यहाँ ख़ूब फलते-फूलते हैं।
मकर संक्रांति, वसन्त पंचमी, फूलवालों की सैर, होली, महावीर जयंती, हनुमान जयंती, ईस्टर, गुड फ्राइडे, गणगौर, शिवरात्रि, जन्माष्टमी, रक्षाबंधन, हरियाली तीज, पर्यूषण, वाल्मीकि जयंती, क्षमावाणी, गणेश चतुर्थी, नवरात्रि, दशहरा, दीपावली, प्रकाश पर्व, ईद, मुहर्रम, छठ पूजा, करवा चौथ, क्रिसमिस, न्यू ईयर, गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती यहाँ उत्सव का माहौल बनाए रखते हैं।
दिल से जीनेवालों के लिए यह शहर अपनी शानदार किस्सागोई के साथ बेहतरीन पनाहगाह है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
अप्रैल 2002 में मैंने कवि-सम्मेलनों में कविता पढ़ना प्रारम्भ ही किया था कि रोहिणी (दिल्ली) के एक कवि-सम्मेलन में एक पतले-दुबले कवि के दर्शन हुए। देहयष्टि प्रभावी नहीं थी लेकिन उनके भीतर के कवित्व और आँखों के सम्मोहन से मैं अछूता न रह सका।
मुझे याद है कि उस दिन उस मंच का संचालन भी उन्होंने ही किया था। छोटे माइक पर अर्द्ध-पद्मासन लगाकर जब वे मसनद पर विराजित हुए तो ऐसा लगा कि विद्वत्ता साकार होकर मंच का मोर्चा संभाल रही है। मुखर हुए तो ऐसा लगा जैसे शब्दों का प्रक्षालन करके उन्हें साधकर प्रस्तुत करने का आदेश पालन हो रहा हो। कवि-सम्मेलन के बीच जहाँ कहीं हास्य का प्रसंग हुआ तो उनकी भाव-भंगिमा में शरारत घुल गयी।
उस दिन मैंने उन्हें बहुत देर तक देखा और व्यंजना से आच्छादित उनके व्यक्तित्व और प्रेम की विरह धारा से निर्मित उनके कृतित्व में एक संपूर्ण कवि को अनुभूत किया। उस दिन के बाद लम्बे समय तक उनकी संगत हुई।
उनका सान्निध्य मेरे भीतर करवट ले रहे ‘कवि’ को रोचक लगने लगा। यह दौर उनके संघर्ष का भी दौर था। संघर्षशील व्यक्ति से अधिक समृद्ध गुरुकुल कोई नहीं हो सकता। सो मैं उनकी ख़ूब संगत करता और विपरीत परिस्थितियों में उनके निर्णयों की सफलता और विफलता से जीवन का पाठ पढ़ता रहता।
किसी का आकलन करना मेरी प्रवृत्ति का अंश नहीं है, सो उनकी गतिविधियों और क्रियाकलापों को कभी सही और ग़लत के तराजू में तोलने की मैंने आवश्यकता महसूस नहीं की। मेरा मत है कि हर व्यक्ति एक ‘प्रवृत्ति’ होता है, और प्रवृत्ति कभी नहीं बदलती। इसी कारण उनके साथ बिताए लंबे-लंबे दिन और रात में मैं कभी परीक्षक बनकर नहीं, केवल शिक्षार्थी बनकर उपस्थित रहा।
अपनी भरपूर मेधा और शब्द-मंजुषा से उन्होंने मुझे ख़ूब निहाल किया। मैंने देखा कि संघर्ष से उपजने वाली खीझ से आँखें नम करने की बजाय दंतपंक्ति को आपस में रगड़ लेना अधिक कारगर सिद्ध होता है। मैंने देखा है कि जब परिस्थितियाँ चारों ओर से आघात कर रही हों तो थककर बैठ जाने की बजाय टूटे रथ का पहिया उठाकर जूझ जाने में सफल होने की गुंजाइश बची रहती है। मैंने देखा है कि उन्होंने रथ का पहिया उठाकर दर्जनों चक्रव्यूह भेदे हैं।
जो किसी का बुरा नहीं होता वह निष्क्रिय होता है। जो सक्रिय होगा उसे आलोचना मिलेगी ही मिलेगी। लेकिन अपनी आलोचना से बिलबिलाने की बजाय दोगुनी ऊर्जा से जुटे रहना किसी को कुमार विश्वास बना सकता है।
राजनैतिक जीवन हो अथवा साहित्य जगत्… डॉ कुमार विश्वास ने बुलेटिन भर-भर आलोचना झेली है। सोशल मीडिया के ट्रोलर्स की चोट सहना आसान नहीं होता। डॉ विश्वास ने वह चोट बार-बार भोगी है। जब किसी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व की निंदा की कोई उचित दर दुकान नहीं मिलती तो निंदक उसकी निजता के गोदाम में प्रवेश करके ‘नियरे’ आने का प्रयास करने लगते हैं। ऐसी परिस्थिति में भी उन्होंने न तो जनता की सिम्पैथी से उन्हें खदेड़ा न ही गोदाम पर ताला लगाया… बल्कि भरे गोदाम में उन्हें रीते हाथ बाहर लौट आने पर विवश कर दिया।
2002 से 2022 तक के इस लंबे सफ़र में मैंने उनका अपनत्व और परायापन… दोनों भोगे हैं, लेकिन इस परायेपन में भी मैंने उनसे यह सीखा है कि एक फोन कॉल से किसी भी पराएपन को अपनत्व में बदला जा सकता है।
मेरे एक शे’र को दुबई के मुशायरे में उद्धृत करके डॉ कुमार विश्वास ने मुझे यह सौभाग्य दिया है कि मुझे अज़ीम शायर जनाब अहमद फ़राज़ ने फोन करके आशीष दिया। इस बात के लिये मैं उनका कृतज्ञ हूँ। मेरी एक क्षणिका की घुमावदार पगडण्डी को उन्होंने न जाने कितने ही लोगों तक पहुँचाया इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ। उनसे नाराज़ भी बहुत कारणों से रहता हूँ, लेकिन वह हमारी निजता का विषय है…!
✍️ चिराग़ जैन
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हिन्दी की वाचिक परम्परा में अनेक विभूतियों का संसर्ग मिला है। मंच पर सक्रिय होने के कारण ऐसे अनेक सितारों को स्पर्श करने का अवसर मिला है जिन्हें हमेशा दूर से ही देख सका था।
ऐसे ही एक दीप्त नक्षत्र हैं- डॉ अशोक चक्रधर। कवि-सम्मेलनीय व्यस्तताओं के बीच अनवरत सृजन तथा शोध में संलग्न रहने का फ़ार्मूला क्या है -यह मैंने अशोक जी से सीखा। उनसे मिलने पर ज्ञात हुआ कि हमें जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ करने के लिए नहीं मिला है। इसीलिए बहु-अवधान का कौशल विकसित किये बिना एक ही जीवन में ढेर सारे काम करना सम्भव नहीं है।
सामान्यतया कवि-सम्मेलनीय यात्राओं में हम लोग बातचीत और हँसी-ठट्ठा करके समय काटते हैं, लेकिन अशोक जी ज्यों ही यात्रा में निकलते हैं तो वे अपने तीन संस्करण बना लेते हैं। पहले क्लोन का काम होता है कि साथ के कवियों की बातचीत को सुनते हुए बीच-बीच में हुंकारा भरकर उसमें अपनी उपस्थिति बनाए रखे और आवश्यक होने पर उसमें पूरे मनोयोग से सम्मिलित भी हो। ठीक इसी समय में दूसरे क्लोन को प्रशंसकों की मुस्कान का प्रत्युत्तर देते हुए सेल्फ़ी और ऑटोग्राफ आदि में संलग्न रहना होता है। और इसी के समानांतर तीसरे अशोक जी अपने आईपैड या मोबाइल पर कोई लेख, स्क्रिप्ट, कविता या कांसेप्ट लिखने में जुटे रहते हैं।
इस प्रकार एक ही समय में अपने मस्तिष्क को तीन अलग-अलग दायित्वों में लगाकर वे हर पल तिगुना जीवन जी रहे होते हैं।
सृजनशील रहना या काम करना सामान्यतया लोगों की विवशता होती है। कुछ लोग इसे शौक़ बना लेते हैं और बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जिन्हें काम करने का रोग हो जाता है। अशोक जी, ये तीसरी तरह के लोगों में हैं। काम करने का रोग इतना भयावह है कि उसमें अपनी मानसिक पीड़ा तो दूर, दैहिक रोग भी दिखाई देना बंद हो जाता है।
अभी हाल ही में एक दुर्घटना के कारण उनके उत्तरदायी कंधों में कुछ टूट-फूट हो गयी। कंधे का अस्थिभंग जब टीसता है तो दुनिया के समस्त कार्य अनावश्यक लगने लगते हैं। इस बात को अनुभूत करके मैंने और अन्य कवियों ने उनका हालचाल जानने के लिए भी उन्हें कम-से-कम ही फोन मिलाया कि कहीं फोन उठाने में उन्हें कष्ट न सहना पड़े। लेकिन इस एकांत का लाभ उठाकर अशोक जी ने आईसीयू में लेटे-लेटे अपने आईपैड पर अपनी नातिन के जन्मदिन की शानदार किताब तैयार कर दी।
कविग्राम में उनका एक नियमित स्तम्भ प्रकाशित होता है। गत माह उन्हें तीसरी लहर के कोरोना ने जकड़ लिया और उनके ज्वर का पारा ऊर्ध्वगामी हो गया। 20 जनवरी को मैंने उन्हें कहा कि इस बार आपके स्तम्भ के बिना अंक निकाल लेंगे, और मैं सम्पादकीय टिप्पणी में स्तम्भ प्रकाशित न होने की कोई वजह लिख दूंगा। लेकिन अशोक जी को मेरी बात अच्छी न लगी। उन्होंने मुझे कहा कि महीने की आखि़री तारीख़ तक रुक जाओ, तब तक न लिख सका तो तुम निर्णय ले लेना। मैंने पत्रिका पूरी तरह तैयार करके रख ली और 31 जनवरी को यह सोचकर उसे फाइनल पैक कर दिया कि अब अशोक जी का लेख नहीं छप सकेगा। उन्हें फोन करने से इसलिये बच रहा था कि कहीं वे लिखने का दबाव न महसूस करें। लेकिन 31 जनवरी की सुबह 10 बजे उनका फोन आया कि उन्होंने स्तम्भ लिखकर भेज दिया है। फोन पर अपनी सद्य-सृजनोपरांत उपजने वाले उत्साह के साथ उन्होंने स्तम्भ के कुछ अंश पढ़कर भी सुनाए।
वे स्तम्भ सुना रहे थे और मैं उनके बुखार का ताप महसूस कर रहा था। उस दिन मैंने एक बार फिर सीखा कि सृजनशील व्यक्ति को स्वस्थ होने के लिए आराम की नहीं काम की ज़रूरत होती है।
आज पद्मश्री डॉक्टर अशोक चक्रधर का जन्मदिन है। अपने कंधे की पीड़ा को अंगरखे से ढाँप कर वे उसी कंधे पर अपनी गर्दन टिकाए जन्मदिन की बधाइयों का मुस्कुराते हुए उत्तर दे रहे होंगे।
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भाषा से खेलने का अधिकार केवल उसे प्राप्त है, जिसने भाषा की आत्मा को स्पर्श करके उसकी संवेदना के सबसे महीन तंतुओं को महसूस किया हो। शब्द का सिंगार करके उसकी अर्थ-व्यवस्था को बलवती बनानेवालों को भाषा की समृद्धि का श्रेय मिलता है।
आदरणीय डॉ अशोक चक्रधर, उन एकाध हिंदीभाषियों में से एक हैं, जो इस श्रेय के सम्यक अधिकारी हैं। किसी कवि की रचनाधर्मिता जब कविता गढ़ते-गढ़ते, शब्द भी गढ़ने लग जाए तो यह इस बात की सूचना है कि उसकी सर्जना अपनी भाषा के शब्दकोश की सीमा के पार निकल गई है। यह इस बात का प्रमाण है कि उसकी भावभूमि के लिए भाषा में उपलब्ध शब्दों का आकाश छोटा रह गया है।
इस बिंदु पर कवि कविता के साथ-साथ शब्द रचने लगता है। कभी ये शब्द आस-पड़ोस की भाषाओं से अपनी भाषा के संयोग का प्रतिफल होते हैं, तो कभी अपनी ही भाषा की पुरातन परम्परा से टटोलने पर हाथ लगते हैं, जिन्हें कवि नई साज-सज्जा के साथ पुनः लोकार्पित कर देता है। यही कारण है कि इन शब्दों का कोई विलग शब्दकोश न होने के बाद भी ये बिना समझाए समझ आ जाते हैं। ये शब्द इतने समर्थ होते हैं कि ये न केवल अपना अर्थ स्पष्ट करते हैं, बल्कि अपना सन्दर्भ तक आसानी से समझा देते हैं।
डॉ अशोक चक्रधर के सृजनलोक में ऐसे अनेक शब्द मौजूद हैं जिन्हें किसी विशेष सन्दर्भ के लिए उन्होंने बाक़ायदा रचा है। उनकी अनेक रचनाओं में निरर्थक शब्दों से अर्थ उत्पन्न होता दिखाई देता है। बच्चों की तोतली बोली में शब्द जब अपना रूप बदलकर अष्टवक्र हो जाता है, तब उसके दर्शन को पकड़कर उसे भी लिपिबद्ध करने का सामर्थ्य उनकी अनुभूति को लब्ध है।
वर्तमान में अशोक जी की रचनात्मक चेतना लोक-अभिरुचियों की चिंता से ऊपर उठकर शाश्वत साहित्य की साधना में संलग्न है। यह सृजन की तुरियावस्था है। यहाँ दैहिक पीड़ा, व्याधि, यश, लोभ और लौकिक सफलता की तमाम बेड़ियाँ छूट चुकी होती हैं। यहाँ मनुष्य लोक से मुक्ति पाकर बोध का आनंद भोगने लगता है। यहाँ कवि मुक्तिबोध होने लगता है।
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लता जी का जाना, किसी सरस्वती के साकार से निराकार हो जाने जैसा अनुभव है। बहुत लम्बी तपस्या के बाद वरदान देने को प्रकट हुई किसी देवी के अंतर्धान हो जाने पर तपस्वी को जो अनुभूति होती होगी, ठीक उसी अनुभूति से आज भारत का एक-एक बाशिंदा गुज़र रहा है।
भारतभूमि के सहस्रों पुण्य फलित हुए तब जाकर तिरानबे वर्ष पहले देवी ने इस धरा पर जन्म लिया और भारतीय संगीत उस देवी के सुरम्य वरदानों से निखर उठा। अलाप, मुरकी और गायन की ऐसी-ऐसी हरक़तें संगीत के आंगन में किलोल करने लगीं कि कान से लेकर मन तक निहाल हो गया। ‘मेरी आवाज़ ही पहचान है’ गाते हुए जब उन्होंने ‘आवाज़’ शब्द गाया तो ऐसा लगा जैसे उनके कण्ठ में विद्यमान माँ वाणी लास्य कर उठीं। ‘नैनों में बदरा छाए’ गीत ने जब उनके कण्ठ का तीर्थ किया तो ऐसा लगा जैसे धैर्य के उत्तुंग शिखर से मिलन कि प्यास का झरना फूट पड़ा हो। ‘लग जा गले’ के शब्दों को जब उस स्वर का संसर्ग मिला तो ऐसा लगा मानो दुर्भाग्य के द्वार पर खड़े सौभाग ने वक़्त के उस लम्हे को अपने बाहुपाश में समेट लिया हो। और ‘ऐ मेरे वतन के लोगो’ को जब लता जी ने अपनी आवाज़ दी तो ऐसा लगा कि हिमालय के वैराट्य में साकार होकर माँ भारती बिलखते हुए अपने वीर बेटों का शौर्य गा रही हो।
पिछली एक शताब्दी से हम भारतीयों को इस आवाज़ की आदत पड़ गयी है। पिछली एक शताब्दी में हम इस सौभाग्य को इतना उपलब्ध मान चुके हैं कि कभी यह विचार ही नहीं आया कि एक दिन ये देवी अंतर्धान हो जाएगी। हम यह कल्पना ही न कर सके कि सुरों के सागर से नित नये नग़मे उलीचने वाली यह मेरुशिला एक दिन अचानक विलीन हो जाएगी। उनके सहज जीवट ने कभी आभास ही नहीं होने दिया कि आयु का देवता इस काया की भी उम्र का हिसाब रख रहा होगा। हम सोच ही न सके कि भारत में एक दिन ऐसा भी सूरज उगेगा, जिसके भाग्य में लता मंगेशकर को साँस लेते देखने की लकीर नहीं होगी।
आज सोशल मीडिया देखा तो ऐसा लगा जैसे एक बार फिर एक कलाकार तमाम विषाद, तमाम विद्रूपताओं और तमाम नकारात्मकताओं के आगे अपने पूरे अस्तित्व के साथ अड़ गया है। आज जिधर देखो उधर लता ही लता है। कहीं उनके गीत, कहीं उनकी गुनगुनाहट, कहीं उनकी यादें, कहीं उनके चित्र और कहीं उनकी बातें…! आज कला ने फिर पूरे देश के शोर-शराबे को सुरों से ढँक लिया है।
आज बहुत दिन बाद, दुःख में ही सही; लेकिन पूरा देश एक ही सुर में कोरस कर रहा है। आज बहुत दिन बाद; दुःख में ही सही; लेकिन पूरे देश की आँखों में एक ही रंग के आँसू है। आज बहुत दिन बाद पूरा देश एक ही लय में मौन है।
लता जी के महाप्रयाण पर मैंने अपनी पलकों के नम किनारों पर खड़े होकर करोड़ों सुबकियों की आवाज़ सुनी है। बेशक़ लता जी इस देश के सवा सौ करोड़ लोगों से व्यक्तिगत रूप से नहीं मिली थीं लेकिन आज पहली बार ऐसा लग रहा है कि इस देश के सवा सौ करोड़ लोगों ने उन्हें किस हद्द तक अपना माना हुआ है।
वसन्त पंचमी के दिन श्वेतवर्णी लता मंगेशकर निराकार हुई हैं। देश उनसे रोज़ बतियाता हो ऐसा नहीं है लेकिन देश उनकी आवाज़ सुने बिना कोई दिन नहीं बिताता यह सत्य है।
तिरंगे से लेकर हर रंग आज उदास है। एक सम्पूर्ण कलाकार अपनी भरपूर कृपा लुटाकर ऐसे जा रहा है ज्यों अपने सातों रंग बिखेरकर कोई इंद्रधनुष अदृश्य हो गया हो।
जहाँ से गुज़र रहा हूँ, वहीं लता जी की आवाज़ सुनाई दे रही है। पूरा देश उन्हें बताना चाहता है कि दीदी! आप कितनी भी ज़िद्द कर लो, आप हमारे बीच से कहीं जा न सकोगी।
✍️ चिराग़ जैन
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सीमित संसाधनों में असीमित सुख भोगने का साधन है- प्रेम। भौतिकता और नैतिकता; इन दोनों की कुण्डली से मुक्त होकर निस्पृह विचरण का निमित्त है- प्रेम। क्रोध, मान, माया और लोभ -इन चारों से रहित होकर निश्छल हो जाने की अनुभूति है- प्रेम। अमूर्त को देख लेने की कला है- प्रेम।
प्रेम के पथ पर भाव ही भाव हैं; वहाँ अभाव जैसा कुछ है ही नहीं। यही कारण है कि जिसने प्रेम को जिया वह भावुक हो उठा। जिसने प्रेम को भोगा, वह आनन्दित हो गया। जिसने प्रेम को सुना, वह मौन हो गया। यही मौन प्रेम की गहनतम अनुभूति का पाथेय है।
जिसने सर्वश्रेष्ठ को सुन लिया, उसे उसमें अपनी आवाज़ मिलाने का ध्यान ही नहीं आ सकता। मुँह में गुड़ की डली घुल जावे, फिर कौन मूर्ख उसका स्वाद बताने में रस नष्ट करेगा! हाँ, उसके मुखमण्डल की भंगिमा का आलोक देखकर अन्यान्य लोग उसे अभिव्यक्त करने का अनुमान अवश्य लगाते हैं। लेकिन यह केवल अनुमान भर है।
प्रेम की अनुभूति तो पूर्णता की अनुभूति है। वहाँ कोई उद्देश्य शेष रह ही नहीं जाता। यश-अपयश; स्वीकृति-अस्वीकृति.. ये सब उस अनुभूति से पूर्व के चिंतन मात्र हैं। जिसने पा लिया; वह तो घुल गया उसमें। हम इधर बैठे अनुमान लगाते रह गए। जिन खोजा तिन पाइयां गहरे पानी पैंठ… वह तो गहरे पानी पैंठ गया। और हम बावरे किनारे बैठकर लिखते रह गये कविता। बूझते रह गये पहेलियाँ। गढ़ते रह गये परिभाषा।
मीरा तो विलीन हो गयी। और हम इस पहेली में उलझे रह गये कि उसकी गुनगुनाहट ‘भक्ति’ है या ‘शृंगार’। सूर तो बिना आँखों के उसे देखकर निहाल हो लिये और हम उनकी रचनाओं में उसे ढूंढते रह गये। कबीर ने कुछ लिखा थोड़े ही। वह तो बावरा-सा उससे बतियाते हुए बड़बड़ाता रहा। और हमने उस बड़बड़ाहट को लिखकर दावा कर दिया कि हमने कबीर को सहेज लिया।
यह सब हमारा अंधविश्वास है। प्रेम की अनुभूति हम तक कभी आयी है तो हमने उसे अपनी व्यस्तताओं की चादर से ढँक दिया है। ऐसा नहीं है कि हमने प्रेम को जिया नहीं है। हमारे सम्मुख भी ऐसे अवसर अवश्य आए हैं कि प्रेम का अथाह सागर बाँहें फैलाये हमें समेटने को द्वार तक चलकर आया। लेकिन इस क्षण किसी ने बताया कि तुम पागल हो गये हो, और हमने पैर पीछे हटा लिये। यही तो अवसर था पागल हो जाने का। लेकिन हमें तो किसी ने समझाया और हम समझ गये… हम जैसे समझने को तैयार ही बैठे थे। …उफ़! यही समझना तो ख़तरनाक हो गया। इसी अवसर पर तो बुल्लेशाह हो जाने की ज़रूरत थी। …बुल्ले नू समझावण आइयां, बहना तें परजाइयां।
अच्छा हुआ कि बुल्लेशाह नहीं समझे। समझ जाते तो गये थे काम से। उन्होंने उस क्षण में अपने प्रेम की गोद में बैठकर बेफ़िक्री का उद्घोष कर दिया- ‘बुल्ला की जाणा मैं कौन?’ इस क्षण में समझानेवाले से उसकी पहचान नहीं पूछनी होती। यह क्षण तो ख़ुद को तलाशने का क्षण है। और जब प्रेम हमें चारों ओर से घेर ले तो बेफ़िक्री से गा उठो- ‘रब्ब दीआं बेपरवाहियाँ।’
बुल्लेशाह बहनों और परजाइयों की बात समझना तो चाहता है, लेकिन वो उस बुल्लेशाह को पहचान नहीं पा रहा है जिसे उनकी बात समझ आ सके। यहाँ, जहाँ वह पहुँच गया है, वहाँ बहुत सारे बुल्लेशाह हैं। बल्कि यूँ कहें कि सारे ही बुल्लेशाह हैं। बिल्कुल एक जैसे। यहाँ कोई दूसरा है ही नहीं। इसलिए इनमें से आपकी बात समझनेवाला बुल्लेशाह ढूंढा नहीं जा सकता। क्योंकि वहाँ तो सब एक ही हैं। …प्रेम गली अति साँकरी या में दो न समाय। फिर तो सभी अंतर मिट जाते हैं। स्त्री-पुरुष; जाति-धर्म; देह-विदेह; भक्त-भगवान सब एक हो जाते हैं। फिर कृष्ण, राधा के वस्त्र पहनकर नाच सकते हैं। फिर भगवान भी भक्त के पीछे दौड़ सकते हैं… पीछे-पीछे हरि फिरें।
यह सब शब्दातीत है। यह सब अमूर्त है। यह सब निराकार है। जाति, कुल, गोत्र, लाभ, हानि, नियम, युग, देश, धर्म… सबकी सीमाओं के पार। और इसे पाने के लिये कहीं जाने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती। यह तो ठीक वहीं तक चलकर आता है, जहाँ आप उपस्थित हैं। कहीं जाकर या कहीं होकर, इसे पा लेने की बातें कोरी अफ़वाह हैं।
यह इतना सहज है कि इसके अनुमान भर पर जो साहित्य रचा गया, उससे रस के अजस्र स्रोत फूट पड़े। प्रेम की समस्त कविताएँ इस अकथ अनुभूति का अनुमान भर हैं। यूँ समझ लो कि मिर्ज़ा के विश्वास पर चेनाब की धार में उतरने वाली सोहनी पार हो गयी और हम उसके कच्चे घड़े के साथ डूब गये। महसूस करो, कि जब उस डूबने की कथा में हमें इतना रस मिल रहा है तो जो पार हो गयी, उसको क्या मिला होगा!
हम तब से अब तक कहते फिर रहे हैं कि सोहनी कच्चे घड़े के भरोसे चेनाब में उतर गयी और डूब गयी। यह हमारी आँखों के द्वारा बोला गया झूठ है। भला घड़े के भरोसे कोई चढ़ती नदी की धार में उतरता है। ये नदी की धार, ये कच्चा घड़ा और ये डूबती हुई सोहनी… ये सब हमारी आँखों द्वारा फैलाई गई अफ़वाह हैं। नदी कहीं बाहर थी ही नहीं। नदी तो सोहनी के भीतर थी। उत्ताल तरंगों के ज्वार का वेग। प्रेम का अथाह सागर सोहनी के मन में लहरा उठा होगा। …इस सागर से पार उतरने के लिए कच्चे घड़े की नहीं, पक्के विश्वास की आवश्यकता होती है। उस दिन उस पार मौजूद मिर्ज़ा की आँखों में वह विश्वास दिखा होगा सोहनी को, और एक बार यह विश्वास दिख जावे, फिर घड़ा फूट सकता है, लेकिन विश्वास नहीं टूट सकता। प्रेम का विश्वास अनब्रेकेबल होता है। पूरा ब्रह्मांड थर्रा उठे तो भी प्रेम के विश्वास का पाँव नहीं हिल सकता।
इसीलिए सोहनी को डूबते देखकर जो साहित्य रचा गया उसे पढ़ने कभी न तो सोहनी आई, न महिवाल। वो तो उतर गये पार। और हम टूटे घड़े के टुकड़े उठाकर साहित्य रचते रह गये। ‘बाणोच्छिष्टम् जगत्सर्वम्’ -संस्कृत की इस उक्ति को जब मैंने पढ़ा तब समझ न सका था। लेकिन जब मैंने बाणभट्ट का साहित्य पढ़ा तो इसका अर्थ ज्ञात हुआ। आज यही उक्ति मैं प्रेम के संदर्भ में कहता हूँ- ‘प्रेमोच्छिष्टम् सरस सर्वम्!’ जो भी कुछ सरस है, वह प्रेम की जूठन है। मूल स्रोत तो कहीं पुण्डरीक की प्रतीक्षा में बसा हुआ है। वह तो कादम्बरी के सौंदर्य में बिंधा धरा है। और हम पत्रलेखा-सी परिचारिका की भाँति प्रयासरत हैं।
लेकिन यह प्रयास भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। प्रेम की ये कविताएँ भी किसी-किसी क्षण आपके भीतर स्थित अनुभूति की इस कुंडलिनी को जागृत कर सकती हैं। इन्हीं प्रयासों में कभी कोई देवल आशीष लिख बैठता है कि ‘मैंने धरती को दुलराया, तुमने अम्बर चूम लिया।’ यह साधारण पंक्ति नहीं है। यह लहरों में समाती किसी सोहनी के उस पार उतर जाने की गवाही का प्रयास है। इन्हीं प्रयासों में कभी कोई महादेवी वर्मा कह लेती हैं कि ‘जो तुम आ जाते एक बार, कितनी करुणा, कितने संदेश, पथ में बिछ जाते बन पराग’ -यह पंक्ति भी साधारण नहीं है। यह शबरी की प्रतीक्षा में व्याप्त राम के विश्वास की मुहर है। यह उस एक क्षण की यूएसपी है, जिसके लिए कोई जीवन भर बेर चुन-चुनकर प्रतीक्षा कर लेता है।
इन्हीं प्रयासों में माया गोविंद लिख पाती हैं कि ‘आशाएँ अलख जगाती हैं, बीमार कल्पना के द्वारे।’ -यह पंक्ति प्रेम की अनुभूति का कुछ अधिक स्पष्ट झरोखा है। कल्पना की बीमारी को भाँपकर आशाओं की अलख देखने में कवयित्री सफल हुई हैं। प्रेम के महीन परत को उघाड़कर देख लेने में कवयित्री सफल हुई हैं।
यह परत शृंगार की रचनाओं में ही उघड़ पाए… ऐसा कतई आवश्यक नहीं है। यह कहीं भी सामने आ जाती है। क्षण मात्र के लिए जब ‘वह तोड़ती पत्थर’ में भी यह परत उघड़ती दिखाई देती है तो इसको जीनेवाले निराला की आँखें यकायक लाल होते हुए भीग जाती हैं। लेकिन ‘सरोज-स्मृति’ के निराला की आँखें यकायक लाल नहीं होतीं, उनके अश्रुओं का रंग धीरे-धीरे गुलाबी होता है और फिर उनका मन नीला पड़ जाता है।
पर ये सभी रंग जिस इंद्रधनुष से फूट रहे हैं, वह सतरंगा इन्द्रधनु प्रेम के क्षितिज पर ही उभरता है। जिस रचनाकार ने एक बार इस क्षितिज पर टकटकी लगा दी, उसके लिये फिर रस की कोई कमी न रही। कल्पना के पंख लगाकर स्वयं को विहग कर लेना जिसने सीख लिया, उसी को प्रेम का विहंगम दृश्य देखना नसीब हो सका। फिर मेघदूत का यक्ष अपने चारों ओर विस्तृत प्रकृति में प्रिया के दर्शन कर पाता है। फिर मेघ के हाथों संदेशा भेजा जा सकता है। फिर वाल्मीकि आश्रम में बैठकर यह अनुमान किया जा सकता है कि द्रोणाचल से फूटते झरनों का दृश्य कैसा रहा होगा। फिर कलयुग में बैठकर यह भाँपा जा सकता है कि वाटिका में राम से नयन मिलने पर सीता कैसे लजा गयी होंगी। फिर बेर की कँटीली झाड़ियों से जूठी मिठास सहेजकर प्रेम के अपूर्व बिम्ब रचे जा सकते हैं। फिर विदुरानी खाद्य और अखाद्य का भेद भूल सकती हैं।
फिर हवा के स्पर्श से कँपकँपाती पाँखुरी की आवाज़ स्पष्ट सुनाई देने लगती है। फिर किसी मीठी याद में गड़ा तिनका बरसों बाद भी कविता की याद में चुभ सकता है। फिर देवता के गुनाह में भी पारलौकिक प्रेम के दर्शन किये जा सकते हैं। फिर सब कुछ देखा जा सकता है। फिर सब कुछ जाना जा सकता है।
हज़ार कवि प्रेम के इस मार्ग पर चलते हैं तो उनमें से कोई एकाध ही देह के पार पहुँचकर प्रेम-वैभव तक पहुँचने वाली राह को स्पर्श कर पाते हैं। और इस राह को स्पर्श करने वाले हज़ारों कवियों में कोई एकाध ही विदेह के भी पार पहुँचकर प्रेम को स्पर्श करने में सफल होता है। और ये एकाध ही कबीर, मीरा, सूर, बुल्लेशाह होकर अपनी अनुभूतियों की गूंज से युग-युग तक प्रेम का स्मरण कराते रहते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
‘रमेश मुस्कान’ -यह किसी व्यक्ति का नहीं, एक प्रवृत्ति का नाम है। ज़िन्दगी उन्हें कितनी ही सैड सिचुएशन दे, वे उसको ठहाके की ओर मोड़कर उसका ‘दी एन्ड’ करने में माहिर हैं।
कई बार कुछ लोगों को देखकर ऐसा लगता है कि इनके जीवन में कोई चुनौती, कोई परेशानी है ही नहीं। लेकिन ध्यान से देखने पर पता चलता है कि इन लोगों की आँखों का निचला हिस्सा ढेर सारा पानी रोके हुए है। निरंतर ठहाके लगाकर ये लोग अपनी अलकों के बांध से उस पानी को रोके रखने में सफल हो जाते हैं।
इनके ठहाके इतने प्रभावी इसलिए होते हैं कि इनमें बनावट की कोई गुंजाइश नहीं होती। हँसने के लिए मनुष्य का अतिरिक्त बुद्धिमान होना आवश्यक है। यदि आपमें लतीफ़ा समझने जितनी बुद्धि न हो तो लतीफ़ा आपके होंठों पर हँसी रखने की बजाय पेशानी पर परेशानी रख देगा।
ज़िन्दगी भी हमें हर घड़ी लतीफ़ा सुना रही होती है। मुझ जैसे मूर्ख लोगों को वह लतीफ़ा समझ नहीं आता और मैं उसे समझने की जुगत में परेशान दिखने लगता हूँ। बाद में जब परिस्थिति बीत जाती है तब मैं उसी बात पर ख़ूब हँसता हूँ, जिसने मुझे कभी परेशान किया था। रमेश मुस्कान सरीखे लोगों का आई-क्यू लेवल इतना हाई है कि ये ज़िन्दगी के लतीफ़े को झटपट समझ लेते हैं और हमेशा ज़िन्दगी के साथ खिलखिलाते हुए पाए जाते हैं।
कुछ वर्ष पहले रमेश मुस्कान का भयंकर एक्सीडेंट हुआ। टक्कर इतनी भयावह थी कि एक टांग की हड्डी दल बदलकर कूल्हे की हड्डी में घुस गयी। डॉक्टर साहब ने भूलवश एनेस्थीसिया की दवा का असर पूरी तरह होने से पहले ही सर्जरी शुरू कर दी। दर्द की इस चरम सिचुएशन में डॉक्टर को अपने होशो-हवास की इत्तला देने की बजाय ये ऋषिकेश मुखर्जी इस बात की प्रतीक्षा करते रहे कि डॉक्टर को हँसाने का अवसर कब मिलेगा। कुछ समय बाद डॉक्टर साहब किसी बात से परेशान होकर अपने सहायक पर झल्लाने लगे। रमेश जी झट से बोल उठे- ‘डॉक्टर साहब, मैं कुछ हेल्प कर दूँ?’
एक क्षण के लिए डॉक्टर सन्न रह गया और फिर दोबारा एनेस्थीसिया लगवाकर सर्जरी को आगे बढ़ाया। लेकिन इस एक पंक्ति ने ऑपरेशन थियेटर के सारे तनाव को छू-मंतर कर दिया।
आर्थिक चुनौती हो या व्यावसायिक चुनौती; रमेश मुस्कान हर स्थिति में मस्त रहने की कला जानते हैं। उनके साथ वक़्त गुज़ारना किसी पैट्रोल पम्प पर अपनी ऊर्जा का टैंक फुल कराने जैसा अनुभव है। उनकी सलाह हमेशा लाजवाब होती है क्योंकि वे चश्मा आँखों पर नहीं, माथे पर लगाए फिरते हैं।
✍️ चिराग़ जैन