Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
पिछले दिनों फैशन टीवी पर यह कहकर प्रतिबंध लगाया गया कि उस पर फैशन कार्यक्रमों की आड़ में अश्लीलता परोसी जा रही है। प्रतिबंध लगा और हट भी गया; लेकिन इससे किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। क्योंकि अब हमारे देश का दर्शक वर्ग उत्तेजक दृश्यों के लिए कुछ गिने-चुने अंग्रेज़ी चैनल्स पर ही निर्भर नहीं रह गया है। न्यूज़ मीडिया ने अंग्रेज़ी चैनल्स के एकाधिकार को समाप्त कर दिया है। अपराध बुलेटिनों के नाम पर रोज़ रात को सोने से पहले किसी के यौन-शोषण, अश्लील एमएमएस, बलात्कार, अवैध सम्बन्ध, देह व्यापार और बार डांस की घटनाओं का जो परत-दर-परत विश्लेषण दिखाया जाता है वह देश में वीटीवी, एमटीवी, एफटीवी और इस प्रकार के अन्य विदेशी चैनल्स के महत्व को कम करने के लिए पर्याप्त है।
जो कुछ क़सर इस क्षेत्र में बाक़ी थी भी उसको पूरा करने के लिए देश भर के सिने कलाकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रसेवा की भावना से भर कर मीडिया का साथ देने का निश्चय किया है। जिस दिन दुर्भाग्यवश उक्त क़िस्म की कोई घटना प्रकाश में आने को तैयार नहीं होती उस दिन कोई न कोई सेलिब्रिटी किसी न किसी कार्यक्रम में किसी न किसी सेलिब्रिटी को चूम लेती है, और हो जाता है संकट का समाधान। इस प्रकार यौन-विषयों पर शोध कर रहे आधुनिक वात्स्यायनों की भीष्म प्रतिज्ञा खंडित होने से बाल-बाल बच जाती है। यदा यदा हि यौनस्य, ग्लानिर्भवति चैनलः…….
कुल दस सेकेण्ड के चुम्बन कांड को 13-14 घंटे तक कैसे दिखाना है इस कार्य में हमारे मीडिया ने वीरगाथा काल के कवियों से विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया है। पहले डेढ़-दो घंटे तक चुम्बन दृश्य का रीप्ले होता है और पीछे से एंकर की आवाज़ रनिंग कमेंट्री की तर्ज पर निरंतर सुनाई देती है- ”आप देख सकते हैं कि किस प्रकार ‘सरेआम’ शिल्पा शेट्टी को अअअ….. आलिंगन में भरते हुए ‘किस्स्स’ किया रिचर्ड ने। (रीप्ले) ….एक बार फिर हम अपने दर्शकों को दिखा रहे हैं ताज़ा तस्वीरें पूरे घटनाक्रम की….. एड्स अवेअरनेस का कार्यक्रम था जिसमें रिचर्ड ने मंच पर ही ‘सरेआम’ शिल्पा शेट्टी को किस किया। (रीप्ले) …..एक बार फिर से देखिए वो तस्वीरें जिसमें मुस्कुराते हुए रिचर्ड गेरे बिना किसी हिचकिचाहट के ‘सरेआम’ शिल्पा शेट्टी को चूम रहे हैं…………….. किसी भी तरह की कोई झिझक या तनाव नहीं दिखाई दे रहा है शिल्पा के चेहरे पर।“
इस प्रकार जब उस दृश्य को देखकर बोले जा सकने वाले तमाम वाक्य दर्शकों को कंठस्थ हो जाते हैं तब तक गैस्टगण स्टूडियो में पहुँच चुके होते हैं। फिर इस मुद्दे पर ज़बरदस्त बहस होती है। फिर उन लोगों से सम्पर्क किया जाता है जो बुद्धिजीवी होते हुए भी कुछ विशेष आर्थिक कारणों से स्टूडियो तक नहीं पहुँच सके। उसके बाद सीन पर मौजूद हस्तियों से सम्पर्क साधा जाता है। और ख़बर के सभी पक्षों का मत जानने के लिए घटनास्थल पर मौजूद पत्रकार कार्यक्रम मंे मौजूद दर्शकों से बातचीत करता है-
“आप उस समय कार्यक्रम में मौजूद थे जब रिचर्ड ने शिल्पा को किस किया?”
“जी हाँ। मैं उस समय आगे से दूसरी पंक्ति में आठवीं कुर्सी पर पैर ऊपर करके बैठा था। और उस समय मेरी गर्दन…….”
“तो आप यह बताइये कि कैसे हुआ ये सारा घटनाक्रम?”
“…..बस शिल्पा शेट्टी ने रिचर्ड गेरे को मंच पर बुलाया और फिर रिचर्ड गेरे ने आकर शिल्पा शेट्टी का हाथ पकड़ लिया और फिर उसको अपनी ओर खींच लिया और गले लगा लिया जी। अजी शिल्पा शेट्टी चाहती तो उस अंग्रेज को थप्पड़ मार सकती थी लेकिन जी उसको तो इस सबकी आदत है जी।”
इसके बाद पत्रकार और एंकर के बीच कुछ अध्यक्षीय स्तर की बातचीत होती है। इस प्रकार 12-13 घंटे के कठोर परिश्रम के बाद पत्रकारों का पूरा दल प्रदत्त विषय पर पूरा शोधग्रंथ तैयार कर देता है।
ऐसा ही एक अन्य उदाहरण पिछले दिनों एक दक्षिण भारतीय अभिनेत्री के अश्लील एमएमएस का हो सकता है। किसी मसाज पार्लर में बने इस एमएमएस का शालीनीकरण कर सभी न्यूज़ चैनल्स ने प्रसारित किया। इस के साथ ही सनद स्वरूप उक्त अभिनेत्री के किसी पुराने एमएमएस की भी झलक दिखाई गई जिसमें उसको नहाते हुए दिखाया गया था। इन दोनों ही कार्यक्रमों को प्रसारित करते समय स्क्रीन के कुछ हिस्सोें को अर्द्धपारदर्शी पट्टी से ढँक दिया गया था और साथ ही हैडर और फूटर में उन वेबसाईट का नाम दिया गया था जहाँ से न्यूज़ चैनल्स ने उक्त क्लिप्स ‘साभार’ प्राप्त की थी।
यह तो था प्रदर्शित सत्य। लेकिन इन दृश्यों के साथ वेबसाइट्स का नाम देने के पीछे एक मूक संदेश था- “प्रिय दर्शको! कुछ अनर्गल कानूनों की वजह से हम आपको ये दृश्य पूरी तरह नहीं दिखा पा रहे हैं। इसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। लेकिन आपकी सुविधाओं और रुचियों का ध्यान रखते हुए हमने इस कार्यक्रम का प्रसारण ऐसे समय पर किया है जब सभी सरकारी कार्यालय बन्द हो चुके हैं। सो इससे पहले कि हमारे चैनल पर प्रसारित होने के कारण इस ख़बर पर कोई कार्रवाई हो और सरकार उक्त वेबसाइट को बैन कर दे, आप तुरन्त अपना इन्टरनेट खोलिए और इन क्लिप्स को डाउनलोड कर लीजिए। आपके पास पूरे 12 घंटे का समय है। आपका समय शुरू होता है अब…… काल करै सो आज कर, आज करै सो अब, पल में एक्शन होएगा, लाॅगिन करेगा कब।“
राखी सावंत, मल्लिका शेरावत, नेहा धूपिया, बिपाशा बासु, करीना कपूर, इमरान हाशमी, मिक्का, शाहिद कपूर, शक्ति कपूर, अनारा गुप्ता और अन्य समाज सेवक जब तक मौजूद हैं तब तक मीडिया का यह शोध अनवरत ज़ारी रहेगा।
दरअसल ऐसी की ख़बरों में समाचार चैनल्स की विशेष रुचि का कारण यह है कि इस क़िस्म की एक ही ख़बर मीडिया के तीनों लक्ष्यों (शिक्षा, सूचना और मनोरंजन) को लक्ष्य करती है। समाचार जगत की अन्य किसी विधा में इतना बूता नहीं है।
इस सारी समीक्षा का लब्बोलुआब यह है कि हमारा मीडिया पूरी तरह जागृत है और मैच्योर हो गया है। यही कारण है कि अपने बचपन के दौर में भारतीय पत्रकारिता देशभक्ति के गीत गाती थी, और यौवन आते ही मीडिया काॅलेज लाइफ को एन्ज्वाय करने लगा है सो देशभक्ति की बोर और बचकानी बातों की संकीर्ण मानसिकता से बाहर आकर ग्लोबल वे में उन विषयों पर खुलकर चर्चा करने लगा है जिन्हें छूना बच्चों के लिए निषेध होता है। शरीर विज्ञान की भाषा में कहें तो मीडिया में अब हार्मोनल चेंज आ गए हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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ओलंपिक हो या आस्कर, क्रिकेट हो या हाॅकी और विज्ञान हो या तकनीक; हमारा देश हमेशा ‘नम्बर वन’ बनने से चूक जाता है। पिछले दिनों एक उम्मीद तब बंधी जब एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने विश्व के सबसे भ्रष्ट राष्ट्र का चयन करने का निश्चय किया।
भ्रष्टाचार हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। न जाने कितने ही मीर ज़ाफरों और जयचंदों ने अपने-अपने समय में ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता की सत्ता को ललकारते हुए विपरीत परिस्थितियों में भी इस कला को जीवित रखने के लिए जान की बाज़ी लगाई थी। मंथरा, शकुनि, वीरभद्र और कंस जैसे अनेक भ्रष्ट शिरोमणियों से हमारे देश की धरती सदैव धन्य होती रही है। इसलिए मुझे विश्वास था कि भ्रष्ट राष्ट्रों की फेहरिस्त में तो हमारा देश अव्वल रहेगा ही। लेकिन हाय रे दुर्भाग्य! 158 देशों के इस सर्वेक्षण में भारत सत्तरवें स्थान पर रहा। हालांकि जापान, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े राष्ट्रों को हमने धता बता दिया लेकिन पाकिस्तान, बांग्लादेश, वियतनाम, फिलीपिन और नेपाल जैसे मुट्ठी भर देश हमें पछाड़ कर आगे बढ़ गए।
रिपोर्ट पढ़कर मेरा सिर शर्म से गड़ गया। एक क्षण में ही हमारे राजनेताओं, म्युनिसिपल कमेटियों, लालफीताशाहों, पुलिस, इंजीनियरों, डाॅक्टरों, सरकारी कर्मचारियांे और अध्यापकों के अथक प्रयासों पर पानी फेर दिया गया। अपने देश की महान विभूतियों का ऐसा अपमान देखकर जिस्म के रोमानी प्रदेशों में भयंकर अग्नि धधकने लगी। यह तो गनीमत है कि हमारे समाचार पत्रों का सर्कुलेशन अभी नर्क तक नहीं पहुंच सका है अन्यथा हमारे पूर्वज इस रिपोर्ट को पढ़कर हमें धिक्कारते। इस घटना ने हमें अपने पूर्वजों को मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा। एक रिपोर्ट ने हमारे सारे काले कारनामों पर पानी फेरकर हमें धवल तिलक लगा दिया। हमें इस सफेद धब्बे को अपनी काली चादर पर से मिटाना होगा।
मैं अक़्सर कल्पना करता हूँ एक ऐसे भारत की जिसे ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में सर्वाधिक भ्रष्ट राष्ट्र होने का गौरव प्राप्त होगा। चारों ओर भ्रष्टतंत्र का बोलबाला होगा। देश में शांति, सत्य, न्याय, सौहार्द, अहिंसा और सद्भाव जैसे बेकार पड़े मूल्यों के स्थान पर छल-कपट, धोखाधड़ी, ठगी, लूट, रिश्वतखोरी, जालसाजी, कालाबाज़ारी और मिलावट जैसे आदर्श तथा समसामयिक मूल्यों की स्थापना होगी।
बातें करने से क्रांति नहीं आती। इसलिए इस सपने को सच करने के लिए हमें मिलजुल कर देश का नक्शा बदलने के प्रयास करने होंगे। बाज़ार, घर, परिवार, शिक्षण संस्थान और मंदिरों से लेकर गांव, शहर, महानगर, प्रशासन, शासन और संसद आदि में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन करने होंगे ताकि परम आदरणीय, प्रातः स्मरणीय, लोकहितकारी श्री भ्रष्टाचार महोदय देश मंे अपने विराट रूप में अवतार ले सकें।
संसद भवन के भीतरी स्वरूप में कोई विशेष परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं है लेकिन बाह्य परिसर में जो स्वतंत्रता सेनानियों और संविधान निर्माताओं की ‘ऊबसूरत’ मूर्तियाँ ‘अशोभायमान’ हो रही हैं; वहाँ हर्षद मेहता जी, रोमेश शर्मा जी, बंगारू लक्ष्मण जी, दिलेर मेहंदी जी, सलमान खुर्शीद जी, ए राजा जी, सुरेश कलमाड़ी जी, राबर्ट वाड्रा जी, ओमप्रकाश चैटाला जी और सलमान खान जी जैसे महान लोगों की ‘खूबसूरत’ मूर्तियां सुशोभित होंगी। जहाँ अम्बेडकर संविधान लेकर संसद की ओर उंगली किए खड़े हैं वहां तेलगी जी हाथ में अपने हाथ से छापे हुए स्टाॅम्प पेपर के सेम्पल लिए मोबाइल पर बात करते दिखाई देंगे। उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश की कुर्सी के पीछे महात्मा गांधी की जगह नटवर लाल का चित्र होगा जिसके नीचे ‘सत्यमेव जयते’ जैसे अव्यवहारिक वाक्य के स्थान पर लिखा होगा ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’। इस प्रकार की व्यवस्था में लोग आत्मनिर्भर बनेंगे तथा अपने दम पर जीवन जीना सीखेंगे।
स्कूलों में बच्चों को जो किताबें पढ़ाई जाएंगी वे होंगी- ‘चाल भारती’, ‘आओ जुगाड़ सीखें’, ‘केस और उनकी निकासी’ तथा ‘हमारे घोटाले’ इत्यादि। राजनीति, चिकित्सा, अध्यापन, आध्यात्म, सुरक्षा, बीमा, परिवहन और यहाँ तक कि केन्द्रीय जाँच ब्यूरो जैसे नास्तिक सम्प्रदायों के लोेग भी एक मत से विराट भ्रष्ट पुरुष के अपावन चरणों में स्वयं को अर्पित कर ‘धननीय’ हो जाएंगे।
जैसे भला करने वालों को हमेशा बुराई ही मिलती है, ठीक इसी प्रकार हमें विश्व में एक गरिमामय पहचान दिलाने वाले आदरणीय भ्रष्टाचार जी को देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा बताया जा रहा है। कितने निकृष्ट हैं हम; अहसान-फरामोश। जब भी कोई हमारे देश की पहचान विश्व में स्थापित करने के लिए आगे बढ़ता है तो हम उसकी टांग खींचने लगते हैं। लेकिन ‘जा को राखे साइयां, मार सके न कोय’। यही कारण है कि सारे विरोध और तिरस्कार के बावजूद महान भ्रष्टाचार जी को कोई उनके पथ से डिगाने में कामयाब न हो सका। तमाम आलोचनाओं को अनदेखा करते हुए एक सच्चे साधक की तरह भ्रष्टाचार महोदय अपने कर्तव्य पथ पर बढ़ते जा रहे हैं। डाॅ.कुंअर बेचैन का एक शेर है- ‘चलने को एक पांव से भी चल रहे हैं लोग, पर दूसरा भी साथ दे तो और बात है।’ यही स्थिति भ्रष्टाचार जी के साथ भी है।
भ्रष्टाचार जी लोकतंत्रात्मक शासन पद्धति के घोर समर्थक हैं। जनमत को अपने पक्ष में करने के लिए हमारे उन्होंने भाषण, जलसे और रैलियों जैसे चालू माध्यमों का सहारा न लेकर एक महान शिक्षक की तरह अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि उनके साथ रहकर मानव कैसे महान बन सकता है। उन्होंने राजनीति, प्रशासन, खेल, बाज़ार और मंदिरों में ऐसे उदाहरण पेश किए जो उनके बताए पथ पर चलकर रातों रात धनवान तथा मीडियावान बन गए। कहते हैं कि प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। जब जनता जनार्दन ने बंगारू लक्ष्मण जी, तेलगी जी और रोमेश शर्मा जी की कथा मीडिया रूपी व्यास से सुुनी तो अपने घर में भी भ्रष्टाचार भगवान की कथा कराने का निर्णय किया।
धीरे-धीरे मनुष्यों को समझ आने लगा कि कर्तव्य, नैतिकता, भाईचारा, इमानदारी, सच्चाई और मर्यादा जैसे घिसे-पिटे नियमों का पालन तो तुच्छ प्राणी करते हैं, या यूं कहें कि इनका पालन करके मनुष्य तुच्छ हो जाता है। लेकिन जो प्राणी अपना तन-मन-जीवन भ्रष्ट देवता को समर्पित कर देता है उसके गद्दे, कमरे, दीवान, कनस्तर और यहां तक कि सोफे तक भी धन के स्पर्श से पवित्र हो जाते हैं। लक्ष्मी उनकी दासी हो जाती है। घर स्वर्ग बन जाता है, और प्राणी अपने परिवार के साथ अपनी निजि इन्द्रसभा में बैठकर ब्रांडेड सुरा का पान करता है तथा अंतरा, धूपिया, लियोने और बिपाशा जैसी मल्लिकाओं का पावन नृत्य देखता है।
कहते हैं जिस समस्या का कोई समाधान न हो उस समस्या को ही समाधान समझ लेना चाहिए। यूँ तो भ्रष्टाचार स्वयं में कोई समस्या नहीं है लेकिन कुछ असामाजिक तत्वों की बात मान कर यदि एक क्षण के लिए इसे समस्या मान भी लिया जाए तो पिछले छः दशकों से हम अपनी ऊर्जा इस महान कला का विरोध करने में खर्च करते रहे हैं, लेकिन अब समय आ गया है कि इसकी अनुमोदना की जाए तथा इस जुगाड़ यज्ञ में अपने भ्रष्ट कार्यों की आहुति दें।
इससे अनेक लाभ हैं। एक तो देश का नाम पूरे विश्व में रोशन हो सकेगा साथ ही जितना धन जाँच ब्यूरो, न्याय प्रक्रिया, प्राशासनिक कार्यवाहियों तथा आलोचनाओं पर खर्च होता है उसकी बचत होगी। संसद का समय किसी की निजि संपत्ति तथा व्यक्तिगत ज़िंदगी में बर्बाद होने से बच जाएगा और साथ ही साथ उस व्यक्ति विशेष की ज़िंदगी भी बर्बाद होने से बच जाएगी। रिश्वत जैसे हमारी शास्त्रीय परंपरा; जिसे एक प्रोपेगेंडा के तहत बुरा सिद्ध कर दिया गया है; उसका सम्मान बढ़ेगा। लोग एक दूसरे की सहायता के लिए अपने रेट फिक्स कर लेंगे। इससे सरकारी कार्यालयों की कार्यशैली में सुधार होगा तथा कोई भी बेहिचक अपना काम करवाने के लिए वास्तविक तरीके से अवगत हो सकेगा। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक रिश्वत से हमारी वार्षिक आय केवल 210 अरब रुपये है। इस रकम में बढ़ावा होगा।
जाली नोट बनाना, ड्रग्स बेचना, कालाबाज़ारी, चोरबाज़ारी, लूटपाट, हफ़्ता वसूली आदि मजबूत स्तंभों पर एक नया इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा होगा और बेरोज़गारी की समस्या से निजात मिलेगा। नकली स्टाॅम्प पेपर और सिक्के गलाने जैसे कुटिर उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा।
एक भ्रष्टाचार को स्वीकार करने से कितने सारे लाभ हैं और हमारे समाज के असामाजिक तत्व इस विराट पुरुष को धक्के मार कर बाहर निकालना चाहते हैं। हमारी तरक्की से जलने वाली विदेशी ताकतों के इशारों पर ये लोग जब परम श्रद्धेय भ्रष्टाचार महोदय को गाली देते हैं तो इससे हमारी आत्मा को बहुत ठेस पहुँचती है। ऐसे लोगों ने हमारी भावनाओं को आहत किया है और हमें इस अपराध के लिए उन्हें मुंह तोड़ जवाब देना होगा। आओ देश के होनहार नागरिकों आज यह शपथ लें कि- ‘हम भारत के लोग भारत को एक भ्रष्टसत्ता सम्पन्न, सम्पूर्ण जुगाड़वादी, लूटतंत्रात्मक राज्य बनाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे……’
✍️ चिराग़ जैन
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कहते हैं इतिहास स्वयं को दोहराता है, लेकिन पिछले दिनों विद्वानों की इस चिर-परिचित सूक्ति को ताक पर रखकर, आध्यात्म ने स्वयं को दोहरा दिया। आध्यात्म की इस उद्दण्डता पर सारा साहित्य-जगत सकते में है।
हुआ यूं कि जम्बूद्वीपे भारतखण्डे दिल्लीनाम्निनगरे पीएमहाउसे (वाल्मिकी रामायण से साभार) दो पवनपुत्रियां संध्याकाल के अंतिम क्षणों में प्रधानमंत्री निवास में घुसकर उसी प्रकार ‘बिना कुछ बांका करवाए’ वापस निकल आईं ज्यों त्रेतायुग में पवनपुत्र हनुमान अपनी विलक्षण प्रतिभा के दम पर सुरसा महामाई के मुख में प्रवेश कर ‘बाल बांका करवाए बगैर’ ससम्मान बाहर निकल आए थे।
बजरंग बली के इस करतब से प्रसन्न होकर सुरसा ने न केवल उनकी पीठ थपथपाई बल्कि उन्हें लंका जाने का शाॅर्टकट भी बताया। (स्थानाभाव के कारण मैं इस घटना को एक पंक्ति में निपटा रहा हूँ, लेकिन तुलसीदास जी ने हनुमान जी के सूक्ष्मरूप की विशाल पीठ की इस थपथपाहट को 10-12 चैपाइयों में अभिव्यक्त किया है।)
कलयुग वाली स्टोरी लाइन भी ठीक-ठाक चल रही थी। सौंदर्य के विमान पर सवार हो, आकाशीय चुंबन उछालतीं हुईं, पवनपुत्रियां सुरक्षा एजंसियों के जबड़े में घुसकर बिना किसी दांत या जीभ के स्पर्श हुए रेसकोर्स रोड पर उतर आई थीं। सुरक्षा एजंसियों के सामने धर्मसंकट था कि वे चुंबन संभालें या सुरक्षा। लेकिन ज्यों ही इस दुविधा को त्याग तुलसीदास जी के कथनानुसार सुरसा…. मेरा मतलब है सुरक्षा एजंसियां इस कौतुक से इम्प्रेस होने को तैयार हुईं तभी उनकी नज़र सागर के जल में पड़ रही ‘सत्यानाश खड्ग’ की परछाई पर पड़ी। मुड़कर देखा तो मीडियासुर हाथ में खड्ग थामे ‘कैमरा दृष्टि’ से पूरे घटनाक्रम पर पैनी नज़र गड़ाए खड़ा था।
यह मीडियासुर त्रेता-युग का वही परमवीर असुर कुम्भकर्ण है, जिसने उस युग में सो-सोकर अपनी नींद का कोटा पूरा कर लिया था। अब वह मीडिया के रूप में पैदा हुआ है और सबकी नींदें हराम करने पर तुला है। इसको ब्रह्मा जी ने ‘टी.आर.पी.अस्त्र’ और ‘स्टिंग चक्र’ वरदान में दिए थे, लेकिन इस दुष्ट ने इनको गलाकर इनकी धातु से ‘सत्यानाश खड्ग’ बना ली।
इस दैत्य के भय से बहुत से फिल्म अभिनेताओं-अभिनेत्रियांे, सुरक्षा कर्मियों, घूसप्रेमियों, रघुवंशियों, दुकानदारों, सेल्समैनों, प्रेमियों, सोर्सलैस अफसरों और ऋषि मुनियों को अनिद्रा का महारोग हो गया है। इस रोग से मुक्ति पाने के लिए ये सब दुखी जन ‘सतर्कता’ की टैबलेट खा रहे हैं और ‘भरोसे’ से परहेज कर रहे हैं। राजनीति को इस दैत्य से कोई भय नहीं है। उसने बचपन में ही कानून देवता की तपस्या करके ‘जुगाड़ास्त्र’ प्राप्त कर लिया था।
बहरहाल, इस असुर के आतंक से कलयुग की इस महान रामायण के उक्त एपिसोड की स्टोरी लाइन में काफी परिवर्तन करना पड़ा। इस बार सुरसा स्वयं पवनपुत्रियों को ब्रह्मपाश में बांधकर लाई और लंकेश के सामने पेश किया। उनके इस उपद्रव से कुपित होकर उनके धर्मपिता पवनदेव ने उनकी पवनवेग से उड़ने की शक्तियां छीन लीं। आजकल पवन पुत्रियां ‘बेसहारा’ हैं, लेकिन अपनी प्रतिभा और आधारभूत शक्तियों के दम पर वे लंकेश के चंगुल से निकलकर मीडियासुर के महल में आ पहुंचीं।
मीडियासुर के विनम्र अनुमोदन पर उन्होंने कुछ समय तक वहां रहना स्वीकार कर लिया है। अब वे ग्लैमर-महल की तमाम वाटिकाओं में घूम-फिर रहीं हैं। महाकवि तुलसीदास जी जीवित होते तो इस सिचुएशन पर लिखते-
पीएम के घर कार घुसाई, निसदिन हर चैनल पर छाई।
तुम उपकार मीडियाहिं कीन्हा, कौतुक करके स्टोरी दीन्हा।
दुर्गम काज ‘लश्कर’ के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम धनवान काहू को डर ना।
पुलिस-वुलिस निकट नहीं आवै, सोनाटा जब कार दिखावै।
दाईं आंख से प्रेस रिझाई, बाईं आंख से पुलिस छकाई।
जो निसदिन तव न्यूज़ दिखाई, सो अच्छी टी.आर.पी.पाई।
✍️ चिराग़ जैन
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साहित्य संस्कृति का दर्पण है। इसी सूक्ति को ध्यान में रखते हुए हिन्दी कविता हमेशा से ही हमारे सांस्कृतिक मूल्यों का अनुपालन करती रही है। यह और बात है कि इन सिध्दांतों की आड़ में काव्य के मूल सिध्दांत और स्वयं कविता भी बैकुण्ठवासी हो चली है।
हमारी संस्कृति हमेशा से ही अतिथियों को भगवान मानती रही है। यह दीगर बात है कि इसी सिध्दांत का लाभ उठाकर रावण सीता को उठाकर ले गया था और हरिश्चंद्र को राजा के पद से च्युत होकर श्मशान का पंडित बनना पड़ा और न जाने क्या-क्या अपमान भोगना पड़ा। ख़ैर ‘अतिथिदेवोभवः’ के सिध्दांत की परमकृपा के चलते बाबा तुलसी अपना गृहनगर छोड़ते ही परमात्मा स्वरूप पूजे जाने लगे। यदि उस ज़माने में हवाई जहाजों का चलन होता तो रामचरितमानस् की पहली प्रति यूएसए अथवा यूरोप के किसी ‘बड़े’ प्रकाशक बंधु ने आर्टपेपर पर फोरकलर में छापी होती। …लेकिन लाल रंग तिसको लगा, जिसके बड़ भागा (इसी कारण हतभागियों की किताब काले रंग से छपती है)।
इस सिध्दांत में भारतीय जुगाड़ संहिता की धारा 420 के अनुच्छेद 1 में एक छूट मिलती है- ‘यह कि यदि कोई धनिक जो कि भारत का नागरिक है, किसी विशेष अथवा सामान्य कारण से भारतीय भौगोलिक क्षेत्र से बाहर अपना निवास निर्माण नहीं कर पाया है तो भी उसकी खाता विवरणिका (बैंक स्टेटमेंट) में उपलब्ध शेष राशि के न्यूनतम नव अंकीय होने को आधार मानकर उसके काव्य को श्रेष्ठ काव्य की श्रेणी में गणित किया जा सकता है।’ जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे को सब कुछ दरसाई! बहिरो सुरै मूक पुनि बोलै, रंक चले सिर छत्र धराई! (यहाँ पर जाकी से सूरदास जी का तात्पर्य बैंक बैलेंस से है)।
इसी धारा के अनुच्छेद 2 के अनुसार- ‘यदि कोई भारतीय नागरिक राजकीय सेवा में किसी ऐसे पद पर विराजमान है, जहाँ से वह साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों अथवा अकादमियों के सचिवों को विदेश यात्रा अथवा पुरस्कारों का वरदान देने में सक्षम हो तथा इस योग्यता के साथ-साथ स्वयं को कवि भी मानता हो तो उसके काव्यकर्म का सम्मान करना संपादकों तथा अकादमियों का परम कर्त्तव्य बन जाता है।’ जा पर कृपा राम की होई, ता पर कृपा करें सब कोई (इस चौपाई के रचनाकाल में घट-घटवासी राम सरकारी कुर्सी में जा बसे थे)।
बाद में कुछ विशेष प्रयोजनों के चलते इस धारा में एक अनुच्छेद और जोड़ा गया जिसके अनुसार- ‘यह कि कोई धनाढ्य मनुज जो कि एक पंक्ति भी शुध्द नहीं लिख सकता, ऐसे नागरिक को यदि कवि बनने की उत्कंठा जागे तो उसकी भावनाओं को ध्यान में रखते हुए प्रकाशकों का दायित्व बन जाता है कि भारतीय संविधान के समानता के अधिकार का प्रयोग करते हुए उन्हें पाण्डुलिपि तैयार करके देवें। इसके लिए समय-समय पर कुछ ‘वास्तविक’ निर्धन कवियों की पाण्डुलिपि को यह कहकर निरस्त किया जाना आवश्यक है कि उनकी कविताएँ तो कूड़ा हैं। ऐसा कहकर निर्धन कवियों की रचनाओं को गुदड़ी में फेंक देना अपरिहार्य है ताकि समय पड़ने पर ‘गुदड़ी के लाल’ ढूंढे जा सकें और एक उत्तम पुरस्कारणीय पाण्डुलिपि तैयार की जा सके। विदेशी होगा पहला कवि, प्लेन से आया होगा गान, निकलकर रिजेक्टिड से चुपचाप, छपी होगी कविता अनजान।
इस प्रकार सभी भारतीय कवियों, साहित्यकारों, अप्रवासियों, धनिकों, प्रकाशकों, अधिकारियों तथा अन्य प्रत्येक नागरिक का धन्यवाद करते हुए अपनी आदत के अनुसार एक श्लोक को उध्दृत करना चाहूंगा। यह श्लोक प्रूफ की अशुध्दियों के चलते लम्बे समय से ग़लत छपता रहा है। आज मैं यहाँ पर उसका असली रूप प्रकाशित कर रहा हूँ-
मा लेखक प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत् धनाढ्यजुगाड़ादेकमवधी काव्यमोहितम्।।
अर्थात् हे लेखक! तुझे प्रतिष्ठा, आदर-सत्कार, मान-मर्यादा, गौरव, प्रसिध्दि, ख्याति, यश, कीर्ति, स्थिति, स्थान, स्थापना, ठौर, ठिकाना, ठहराव, आश्रय इत्यादि नित्य-निरंतर कभी भी न मिले, क्योंकि तूने इस जुगाड़तंत्र में निमग्न धनिकों, राजनायिकों, अप्रवासियों (जिनसे प्रकाशकों व अकादमिकों को कुछ लाभ हो सकता था) की, बिना किसी पत्रिका में प्रकाशित हुए ही आलोचना की है।
✍️ चिराग़ जैन
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पिछले रविवार को मेरे एक परिचित का फोन आया कि उनके पिताजी का स्वर्गवास हो गया है। यह और बात है कि मैंने कभी उनके पिताजी को देखा नहीं था लेकिन फिर भी परंपरानुसार मैंने फोन पर उन्हें यह जताने की हर संभव कोषिष की कि उनके पिताजी के निधन के इस आकस्मिक समाचार से मैं अर्द्धमृत सा हो गया हूँ। यदि उनके एकाध और पिताजी इसी प्रकार दिवंगत हो जाते तो मैं पूरी तरह मर गया होता।
फोन रखने के बाद मैंने कई दिनों से बेकार पड़े अपने सफेद कुर्ते-पायजामे पर इस्तरी की और देह के शेष हिस्सों को अस्त-व्यस्त कर कार्यक्रम स्थल पर पहुँच गया। मेरे समान ही और भी बीस-बाईस अर्द्धमृतगण वहाँ पहले से ही उपस्थित थे, जो घर के बाहर हाथ बांधे हँसी रोके खड़े थे। मेरे पहुँचने पर सबने मुझे इस कौतूहल के साथ देखा मानो मेरी ही मृत्यु हुई हो। मैं झेंपकर अपने जीवित होने पर खिन्न होता हुआ एक ओर खड़ा हो गया। इसके बाद कुछ लोगों ने अपने-अपने पड़ोसियों के कान में कुछ कहा और फिर चेहरे पर शोक का स्थायी भाव लिए हुए पूर्ववत खड़े हो गए।
नवागंतुकों के स्वागत की इस परंपरा के निर्वाह के उपरांत उसे बताया जाता था कि लालाजी ने अभी प्राण त्यागे नहीं हैं। दो दिनों से वे कृत्रिम श्वास पर जीवित थे। वेंटिलेटर का पचास हज़ार रुपए रोज़ का ख़र्चा है। इसलिए आज परिवारवालों ने लिखकर दे दिया है कि वंेटिलेटर हटा दिया जाए। बस वेंटिलेटर हटते ही लालाजी दिवंगत हो जाएंगे और दस-बारह मिनिट में उनका पार्थिव शरीर घर ले आया जाएगा।
यही सूचना लगभग तीन घंटे तक लोगों के बीच आषा की किरण बनी रही। इस दौरान कुछ लोग ताज़ा समाचारों के लिए लगातार अस्पताल में स्थित लोगों से संपर्क बनाए हुए थे। शाम के लगभग चार बजे ख़बर मिली कि वंेटिलेटर हटा दिया गया है। ख़बर मिलते ही लोगों ने चैन की साँस ली। कुछ लोग अपने ज्योतिषियों को फोन कर पंचक आदि की गणना करवाने लगे। कुछ अपनी घड़ियों की ओर देखकर यह कालगणना करने लगे कि अभी घर पहुँचने में कितना समय लग सकता है। इसी प्रकार के कार्यक्रमोें में काफी समय बीत गया। कोई पोने पांच बजे अस्पताल की गाड़ी आकर रुकी। सभी मनुष्य अपनी स्वाभाविक जिज्ञासु प्रवृत्ति के चलते गाड़ी के इर्द-गिर्द इकट्ठा होने लगे।
लालाजी को चार-पांच लोगों ने गाड़ी से बाहर निकाला। उनकी श्वास अभी भी चल रही थी। उनको जीवित देख सबको घोर निराषा हुई। निराषा और शोक के इस माहौल से निकालते हुए लालाजी को घर के भीतर लिटाया गया। शेष आत्मीयजन घर के बाहर ही इंतज़ार करने लगे।
अब तक सभी के भीतर कथावाचकों की आत्माएं प्रवेष कर चुकीं थीं। सभी एक-दूसरे को मृत्युबोध और असार संसार के आँखों देखे क़िस्से सुनाने लगे। कई बार तो कथावाचक महोदय को देखकर ऐसा लगने लगता था कि वे अभी उठेंगे और हिमालय की कंदराओं में कहीं खो जाएंगे। लेकिन अगले ही क्षण जब वे जेब से तम्बाकू का पाउच निकालकर हालाहल के समान अपने मुख में डालते तो समझ आता कि अभी वे संसार में व्याप्त विष का पान कर रहे हैं और जब तक संसार का समस्त विष अपनी देह में धारण कर विष्व को विष मुक्त नहीं कर देंगे तब तक संन्यास नहीं लेंगे।
लोक-परलोक की इन्हीं चर्चाओं और भीष्म-प्रतिज्ञाओं के बीच जब सात बज गए तो अमृतक के भाई ने बाहर आकर हाथ जोड़कर धन्यवाद ज्ञापन किया और यह विष्वास दिलाया कि जैसे ही लालाजी अंतिम श्वास लेंगे, सबको समाचार दे दिया जाएगा। सबने उनको कृतज्ञता और क्रोध भरी दृष्टि से देखा और पत्थर जैसे क़दम उठाते हुए भारी मन लिए घर लौट आए।
✍️ चिराग़ जैन
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भारतीय स्वयंवर परंपरा के गौरवशाली इतिहास में जानकी और द्रौपदी के स्वयंवरों की टीआरपी सबसे हाई रही है। इन दिनों राखी सावंत इस इतिहास को डायरेक्ट चुनौती दे रही है। यहाँ यह बताना बेहद ज़रूरी है कि स्वयंवर की ‘ईवेंट मैनेजमेंट’ में राखी को सीता और द्रौपदी से अधिक मेहनत करनी पड़ी। पहले तो उन्हें अपने लिए कुछ ‘भाई’ ढूंढने पड़े। इस चयन प्रक्रिया में न्यूनतम योग्यता यह थी कि आवेदक की मौजूदा स्थिति ‘आउट आॅफ फोकस’ होनी चाहिए ताकि उनको पेयमेंट कम करनी पड़े। पूज्यनीय राम ‘भैया’ इस ‘कसौटी’ पर खरे उतरे और उन्हें अपनी बहन के स्वयंवर की एंकरिंग करने का स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ। इस बहाने उनको काम मिल गया और उनकी ‘हैल्दी प्रज़ेंस’ के कारण उनके तेरह काल्पनिक बहनोई उनकी बहन की ओर आँख उठा कर नहीं देख सके। ये और बात है कि जब एक उम्मीदवार ने राखी को ‘किस’ कर लिया तो लड़ने के लिए दूसरे बहनोई को उस पर छोड़ दिया गया और ‘भैया जी’ ने उसकी ओर आँख नहीं उठाई।
ख़ैर अब दूसरे भैया की बात करते हैं। आदरणीय रविकिशन जी सेट पर आए तो राखी जी ने उनका आलिंगन कर उनका स्वागत किया। इस स्वागत समारोह के दौरान बहुत से ‘सैंया उम्मीदवार’ भैया जी की क़िस्मत से जल रहे थे। उधर कुछ सालियाँ और सासू माँ भी सेट पर अवतरित हुईं। उनके साथ सभी बहनोइयों की अच्छी पटी। यह शोध का विषय है कि आने वाले एपिसोड्स में राखी का हाथ बँटाने और कौन-कौन कुनबेदार आने वाले हैं। यह शोध का विषय है कि राखी पति खोजने निकली हैं या कुनबा जोड़ने।
जो भी हो, इतना तो मानना ही पड़ेगा कि राखी जी ने स्वयंवर जैसी परंपरा के रीति-रिवाज़ों से कोई छेड़छाड़ नहीं की। ये दीगर बात है कि द्रौपदी और सीता अपने स्वयंवर से पूर्व राजकुमारों के साथ ‘डेट’ पर नहीं गई थीं। इसके दो कारण हैं। पहला कारण तो यह कि वे राखी जी की तरह ‘बोल्ड’ नहीं थीं और दूसरा यह कि उन दिनों ‘कलैण्डर’ नहीं होते थे।
बहरहाल, राखी जी ने स्वयंवर की परंपराओं को हर क़ीमत पर निभाया है। स्वयंवरों का टूट-फूट से गहरा रिश्ता रहा है। कहीं शिव का धनुष तोड़ा गया तो कहीं मछली की आँख फोड़ी गई। इस परंपरा को क़ायम रखते हुए राखी ने स्वयंवर में शर्त रखी है कि जो प्रत्याशी टीआरपी के रिकाॅर्ड तोड़ने में सर्वाधिक मदद करेगा, राखी की माला उसी के गले पड़ेगी।
स्वयंवर के पहले दिन राखी जी से प्रश्न पूछा गया- ‘स्वयंवर करने का निर्णय लेने में आपको क्या कठिनाई हुई?’ यह प्रश्न पूछ कर पत्रकार ने राखी जी की क्षमताओं पर सवालिया निशान खड़ा किया है। लेकिन हमारी उदार राखी जी ने पत्रकार की धृष्टता को अनदेखा करते हुए इस सवाल का बेहद तार्किक और सारगर्भित उत्तर दिया। टाॅपलेस टाॅप पहनकर; अपने एक हाथ में अपना ही दूसरा हाथ थामे हुए, नज़रें नीची कर राखी जी ने कहा- (इनवर्टिड कौमा स्टार्ट) हर लड़की शादी के लिए छह-सात लड़कों से तो मिलती ही है। बस मैंने इन सबको एक साथ बुला लिया (इनवर्टिड कौमा क्लोज़)। कितने महान विचार हैं। काल करै सो आज कर………!
कुछ समझ आया मूर्ख पत्रकार! मैं समझाता हूँ। इन महान उद्गारों के माध्यम से राखी जी कहना चाहती हैं कि हर प्राणी जीवन में लगभग आधे वक़्त तो सोता ही है, तो क्यों ना बच्चे को पैदा होते ही खूब सारी नींद की गोलियां खिला दी जाएँ ताकि वह सोने का सारा काम एक साथ निपटा ले। या फिर यूँ कहें कि हर व्यक्ति आठ रोटी प्रतिदिन के हिसाब से पूरे वर्ष में लगभग दो हज़ार नौ सौ बीस रोटियाँ खाता है। यदि उसको साठ वर्ष जीना है तो उसे जन्म लेते ही एक लाख पचहत्तर हज़ार दो सौ रोटियाँ खिला देनी चाहिएँ। इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है कि प्रत्येक व्यक्ति रोज़ाना लगभग पाँच मिनट शौचालय में बिताता है, तो उसे चाहिए कि वह साठ वर्ष की संभावित आयु के मुताबिक़ तीन माह तक लगातार शौचालय में रहे ताकि उसे जीवन में पुनः ऐसी गंदी जगह न जाना पड़े।
मुझे पूरा यक़ीन है कि ‘ज़मीन से जुड़े’ इस अंतिम उदाहरण से आपको राखी जी के कथन का सार समझ आ गया होगा। आइए अब हम ‘ज़मीन से जुड़ी’ राखी जी की बात पर लौटते हैं। उनकी महान प्रतिभा को पहचानने वाले जौहरी का नाम है- लव। उन्होंने राखी जी के बलिदानों और व्यक्तित्व को ध्यान में रखते हुए कहा- ‘जिस तरह हमारे देश में रानी लक्ष्मीबाई थी, जैसे हमारे देश में इंदिरा गांधी थी; वैसे ही अब हमारे देश में राखी जी हैं।’ लव के इस ‘अध्यक्षीय’ वक्तव्य के बाद योजना आयोग कुछ ऐसी योजनाएँ तैयार कर रहा है जिनका नाम पूज्यनीया राखी जी के नाम पर रखा जाएगा, जैसे- राखी सावंत खुला विश्वविद्यालय योजना, राखी सावंत एक्सप्रेस हाई-वे योजना और राखी सावंत संस्कृत विद्यापीठ इत्यादि।
कहने का मतलब ये है कि लब ने सीता मैया, रानी लक्ष्मीबाई और इंदिरा गांधी की तुलना राखी सावंत से कर के देश की संस्कृति और सम्मान को इतना ऊपर उठा दिया है कि अधिक ऊँचाई के कारण उस पर हृदयाघात का ख़तरा मंडराने लगा है।
तो भाई लोग, नित नए ‘करतब’ लिए राखी का स्वयंवर जारी है! राखी सचमुच महान हैं। उनमें कुछ भी कर गुज़रने की क्षमता है। अब देखना यह है कि टीवी पर पब्लिसिटी बटोरने आए नौजवानों में से किसे राखी की मांग भरनी पड़ती है। दुआ कीजिए कि स्वयंवर के पश्चात् इसी सिरीज़ में अगला कार्यक्रम हो – ‘राखी का हनीमून।’
✍️ चिराग़ जैन