Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
शब्द तो कह रहे हैं बहुत ख़ुश हो तुम
मौन लेकिन गवाही नहीं दे रहा
देखना चाहता जो शिखर पर तुम्हें
वो तुम्हें रास्ता ही नहीं दे रहा
एक अपनत्व का बोझ ढोते हुए
चाह को एक डर में डुबोते हुए
तुम सिहरती हो पलकें भिगोते हुए
दर्द को आसरा ही नहीं दे रहा
लक्ष्य से तीर भी चूकता है मगर
स्वप्न नगरी समय फूँकता है मगर
प्यास से कंठ तो सूखता है मगर
भाग्य बढ़ कर सुराही नहीं दे रहा
जग तुम्हारा पुरस्कार पोसा करे
कर्म तुमको सफलता परोसा करे
भाग्य तुम पर ज़रा सा भरोसा करे
ये इजाज़त सखा ही नहीं दे रहा
साधना पर निछावर न संबंध हो
किन्तु श्वासों पे कोई न प्रतिबंध हो
लक्ष्य औ‘ भावना में नहीं द्वन्द हो
मीत दिल से दुआ ही नहीं दे रहा
पत्थरों पर स्वयं को निछावर किया
आप अपने हुनर का अनादर किया
जिसको रौशन स्वयं को जलाकर किया
वो तुम्हें हौसला ही नहीं दे रहा
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
अब नहीं आना हमको सारी दुनिया के समझाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में
दुनिया की सारी दौलत ठुकरा बैठी दीवानी थी
उसको अपने नटवर नागर के सँग प्रीत निभानी थी
मिश्री सा मीठापन पाया उसने विष पी जाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में
थाम लुकाठी हाथ कबीरा साखी गाया करता था
ढोंगी को झीनी चादर से ख़ूब छकाया करता था
अपना ही घर फूंक लिया दुनिया के दीप जलाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में
बिगड़े मस्त दिमाग़ों में ही ख़ुशियों वाले लच्छे हैं
हमको पागल ही रहने दो हम पागल ही अच्छे हैं
रंग बसंती गहराएगा फाँसी पर चढ़ जाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में
जब आँखों की एक झलक से सारी दुनिया हल्की हो
जब कोई हिचकी पलकों से आंसू बनकर ढलकी हो
उसके बिन जीने से अच्छा है उस पर मर जाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में
जिन आँखों में रंग ख़ुशी का भरना अच्छा लगता है
उसकी हर इक चाहत पूरा करना अच्छा लगता है
अपने सारे काम भुला कर उसका हाथ बँटाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में
मन करता है हाथ उठाकर मुक्त गगन में बह जाएँ
समझ मना करती है जिनको, वो सब बातें कह जाएँ
कितनी इच्छाएँ कैदी हैं मन के पागलखाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में
जब कोई बेचारा केवल आँख सेकता रह जाए
बंदर बोटी ले भागे और शेर देखता रह जाए
किसी और की पटी प्रेमिका को लेकर भग जाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में
✍️ चिराग़ जैन
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जानती है हर नदी
जिस राह पर मैं बढ़ रही हूँ
उस सफर का अंत खारा है
किन्तु कैसे रोक लूँ मैं पाँव अपने
इस सफर का रास्ता आकृष्ट करता है
घाट है रंगीन इसके और
हर इक गाम प्यारा है
छू गया सूरज मुझे जब
तो पिघल कर बह चली मैं
फिर कभी पर्वत नहीं मिल पाएगा अब
सत्य यह भी सह चली मैं।
मैं इसी अनुभूति के रोमांच से अभिभूत हूँ
जिस ठौर पर संतृप्त होती है किसी की प्यास
वो मेरा किनारा है।
पत्थरों की देह का घर्षण मिलेगा
दृढ़ नुकीली पीर से यह तन छिलेगा
किन्तु उन सब अड़चनों को लांघ कर
जिस क्षण किसी निश्छल कन्हैया की सताई
गोपिका मुझमें दुबक लरजाएगी
उस कल्पना का रंग न्यारा है।
✍️ चिराग़ जैन
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यूँ समझ लो हम किसी पर्वत शिखर पर आ गए हैं
जब कई झोंके हवा के आएंगे तो भय लगेगा
उस घड़ी तुम हारना मत
सिर्फ ये आभास करना
इस महापर्वत के अपराजित शिखर पर
श्वास लेते आदमी को देखने का
इन हवाओं को अभी अभ्यास कम है
ये समीरों का समर सामान्य ही है
ध्यान से देखो इन्हें तुम
है स्वयं की हार पर अचरज इन्हें ज़्यादा
तुम्हारी जीत पर विश्वास कम है
यूँ समझ लो
हम किसी बादल के ऊपर उड़ रहे हैं
जब कभी नीचे धरातल दिख पड़ेगा
भय लगेगा
उस घड़ी तुम काँपना मत
सिर्फ ये उल्लास करना
बादलों की पालकी पर तैरने के
स्वप्न को साकार होते देखने पर
विश्व को विश्वास कम है
ये धरा का मोहबल सामान्य ही है
ध्यान से देखो इसे तुम
क्षोभ है इसको स्वयं के स्वप्न पर ज़्यादा
पर तुम्हारी कामना की पूर्ति का संत्रास कम है
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
मंच पर दो शब्द कहने की विवशता
भौंथरा करती रही है
सैंकड़ों शब्दों की पैनी धार को,
मार डाला है
बनावट से सुसज्जित ग्रीटिंगों ने
मौन अधरों पर थिरकते प्यार को।
बात दिल से झूमकर निकले
तो फिर
बस ‘भाइयो-बहनो’ का सम्बोधन
भरी महफ़िल को दीवाना बना दे,
धमनियों से बह के आए शब्द हों तो
एक ही विन्यास
बर्बर डाकुओं की क्रूरता को
आदमीयत का
(सभी को मान्य)
पैमाना बना दे।
किन्तु अब इस दौर में
भाषाओं के व्यापारियों से
मंच के भाषण लिखाए जा रहे हैं।
स्वार्थ की डाली पे बैठे
काग को कोयल बताकर
अब सियारी गीत गाए जा रहे हैं।
चापलूसी
ज्ञान का मांगा हुआ लहंगा पहनकर
मंच पर मुजरा करे तो
अब उसे मुजरा नहीं कहते।
शब्द के लच्छे बनाकर
वक़्त के महंगे लम्हे
बर्बाद करने की कला
श्रोताओं को पूर्णार्थ की ख़्वाहिश से
कोसों दूर रखती है।
प्रेम, मानवता, दया, करुणा
हमारी संस्कृति
माँ-बाप, हिन्दुस्तान
जनता, लोकसत्ता
न्याय और संघर्ष
अपनी सभ्यता
संवेदना, अध्यात्म
और ऐसे ही ढेरों शब्द
अपने अर्थ का बल क्षीण करके
अधमरे से हो गए हैं।
अब इन्हें सुनकर किसी के
रोंगटे उठते नहीं हैं।
हमने अपने मानसिक रनिवास में बैठी
प्रशंसा की सुरक्षा के लिए
जिन शब्दों का पहरा बिठाया है
उन्हें ख़ुद ही नपुंसक कर दिया है,
शांति के सब वाक्य
इतने खोखले शब्दों के मिलने से बने हैं
समझ लो
हमने अपने हाथ से
माहौल हिंसक कर दिया है।
शब्द ऐसे जी के बोले जाएँ
मदिरा बोल देने मात्र से
पूरी सभा मदहोश हो जाए।
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
मुस्कानों ने सूर्य उगाया
संकोचों ने अस्त कर दिया
आशाओं का महल नवेला
आशंका ने ध्वस्त कर दिया
मर्यादा की डोरी थामे
स्वीकृति का इंगित तो आया
किन्तु झुकी पलकों का मतलब
आशंकित मन समझ न पाया
ख़ुद ही मैंने हिम्मत जोड़ी
ख़ुद ही उसको नष्ट कर दिया
हलकी सी मुस्काई भी थीं
तुम दाँतों में होंठ दबाकर
फिर मीठे गुस्से से तुमने
देखा था मुझको झुँझलाकर
बिन बोले ही तुमने मेरी
दुविधा को आश्वस्त कर दिया
साथसदा रहने की ज़िद में
संगत का सौभाग्य गँवाऊं
तुम मिल जाओ इस चाहत में
मिलने तक को तरस न जाऊँ
मैं तो पग-पग पर कतराया
तुमने मार्ग प्रशस्त कर दिया
✍️ चिराग़ जैन