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गुनाहों का एहतराम

दिल में उग आए गुनाहों का एहतराम करें
काम यूँ झूठे दिखावे का हम तमाम करें

बाद मरने के क़सीदे तो पढ़ेंगे सब ही
लोग कुछ हों, जो हमें जीते जी सलाम करें

ज़ीस्त! हम कर चुके जो तेरे साथ करना था
मौत अब आ मरे तो उसका इंतज़ाम करें

इस तरह अक़्ल पे तारी हो नश्अ बोतल का
वाइज़ आए कोई मिलने तो राम-राम करें

हमने तहज़ीब में जिन-जिन से करी है तौबा
वो सारे काम करें, और सुब्हो-शाम करें

✍️ चिराग़ जैन

मेरे गीत उधार रहेंगे

सपनों का विस्तार रहेंगे
आँसू की मनुहार रहेंगे
युग-युग तक सारी दुनिया पर, मेरे गीत उधार रहेंगे

जिन शब्दों से कर्ज़ा लेकर, भावों की झोली भरता था
रोते-रोते जिस पीड़ा के माथे पर रोली धरता था
उस पीड़ा का सार रहेंगे
भाषा का श्रृंगार रहेंगे
शब्दों की नश्वर काया में, प्राणों का संचार रहेंगे
युग-युग तक सारी दुनिया पर, मेरे गीत उधार रहेंगे

बातों में घुल-मिल जाएंगे, चैपालों की रंगत होंगे
एकाकी राहों पर चलते मौन पथिक की संगत होंगे
चिट्ठी का आधार रहेंगे
उत्सव का गलहार रहेंगे
माँ की मीठी लोरी होंगे, बाबा की फटकार रहेंगे
युग-युग तक सारी दुनिया पर, मेरे गीत उधार रहेंगे

घोर उदासी की सेना से जब अभिलाषा का रण होगा
मेरा गान प्रबल सहयोगी आशाओं का उस क्षण होगा
कोशिश पर बलिहार रहेंगे
और थकन पर वार रहेंगे
नफ़रत से तपती धरती पर, प्यार भरी रसधार रहेंगे
युग-युग तक सारी दुनिया पर, मेरे गीत उधार रहेंगे
✍️ चिराग़ जैन

(श्री गोपालदास नीरज जी के निधन पर)

गोपालदास नीरज जी के निधन पर

ये निशा आज फिर नीरज-निशा कहाएगी
बस क्षोभ यही; इसमें अब वैसा नूर नहीं
ग़ज़लें बाक़ी हैं, गीत बचे हैं अनगिन पर
ये आज तुम्हारे स्वर सुख से भरपूर नहीं

तुम गीत नहीं रचते थे, जादू करते थे
दर्शन की देहरी पर श्रृंगार सजाते थे
रस की गगरी के चातक बड़े छबीले थे
शब्दों की टोली से कितना बतियाते थे

जब आज शाम मैंने सूरज को देखा था
वह लिए शरारत भरे नयन इतराता था
अब जाना उसकी इस इतराहट का मतलब
वह तुम्हें मनाकर साथ लिवाए जाता था

जग को लगता है यही कि ’नीरज’ मौन हुआ
दरअस्ल कारवाँ और बढ़ाने निकले हो
धरती की गोद हरी कर के कविताओं से
अब नभ भर को गीतिका सुनाने निकले हो

थक जाना या चुक जाना; वह भी ’नीरज’ का
मालूम नहीं जलवा नादान ज़माने को
महफ़िल-महफ़िल तुम स्वयं बताते फिरते थे
सदियाँ कम हैं ’नीरज’ की याद भुलाने को

✍️ चिराग़ जैन

दोतरफ़ा पोषण

मैं अपनी हर जीत भुला दूँ, तुम बिसरा दो हार को
दोतरफ़ा पोषण से सींचें सीधे-सच्चे प्यार को

जब धरती ने हरियाली का रूप सजाना छोड़ दिया
तब अम्बर ने बादल लेकर आना-जाना छोड़ दिया
कोई तो आकर्षण मिलता सावन की बौछार को
दोतरफ़ा पोषण से सींचें सीधे-सच्चे प्यार को

दिन की हर तारीफ़ भुलाकर महक लुटाई रातों पर
ध्यान नहीं अटका ख़ुशबू का दुनिया भर की बातों पर
रातों ने होंठों से चूमा खिलते हरसिंगार को
दोतरफ़ा पोषण से सींचें सीधे-सच्चे प्यार को

सबके जीवन में दुनिया की थोड़ी तो मजबूरी है
फिर भी हर इक रिश्ते में थोड़ा सम्मान ज़रूरी है
कब तक मथुरा ठुकराएगा गोकुल की मनुहार को
दोतरफ़ा पोषण से सींचें सीधे-सच्चे प्यार को

✍️ चिराग़ जैन

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