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साहिब!

ये तुमने कौन से अंदाज़ से छुआ साहिब
हुई है बेअसर हर शख़्स की दुआ साहिब

सियार करते थे शब भर हुआ-हुआ साहिब
उन्हें भगाने चला आया तेंदुआ साहिब

हमारे चैन की हुंडी का हो गया सौदा
ज़रा बताओ, मुनाफ़ा किसे हुआ साहिब

ज़ुबां तो काट दी, रोटी न छीनना हमसे
सुना है पेट भी देता है बद्दुआ साहिब

ज़रा-ज़रा सा कब तलक करोगे क़त्ल हमें
दबा ही क्यों नहीं देते हो टेंटुआ साहिब

कई करोड़ निवाले हैं दाँव पर इसमें
तुम्हारे वास्ते जो है महज़ जुआ साहिब

सही बताओ, तुम्हें कुछ समझ नहीं आता?
बहाते रहते हैं क्यों लोग टेसुआ साहिब

तुमसे पहले की मसीहाई चुआती थी छतें
ये तुमने क्या किया, आँखों से कुछ चुआ साहिब

जोंक जब जिस्म से चिपकी तो ये समझ आया
इससे अच्छा था गये साल केंचुआ साहिब

✍️ चिराग़ जैन

भोर से ठीक पहले

रेत, अंतिम बून्द भी यदि सोख ले अपनी नदी की
साफ़ मतलब है पहाड़ों की बरफ़ अब गल चुकी है
रात का अंधियार जब अपने चरम पर आ गया हो
तब समझना, सूर्य की पहली किरण अब चल चुकी है

त्यौरियों के बोझ से भौंहें भले दुखने लगी हों
होंठ की बस एक हरक़त से हवा हो जाएंगी ये
ये निराशा, ये उदासी, ये परेशानी जगत् की
एक पल की आस जगते ही कहीं खो जाएंगी ये
दिन ढले कल धैर्य ने कुछ बीज बोये थे हृदय में
सिर्फ़ दो पल और ठहरो, वह प्रतीक्षा फल चुकी है

आँख से कह दो कि अब उजियार की मत आस छोड़े
जब सुबह होगी, इसी को लालिमा का दर्श होगा
कान, जो वीरान सन्नाटा लपेटे फिर रहे हैं
चंद घड़ियों में इन्हीं को कलरवों का हर्ष होगा
बस अभी दुर्भाग्य को तुम हाथ मलते देख लेना
भाग्य की देवी कहीं पर आँख अपनी मल चुकी है

सिर उठाओ, देख लो पूरब निखरने लग गया है
होंठ फैलाओ, सवेरा सृष्टि पर छाने लगा है
खोल दो बाँहें, पवन सौरभ लुटाता आ रहा है
पंछियों का दल गगन में झूम कर गाने लगा है
श्वास में स्वर घोल कर आकण्ठ उत्सव में उतर लो
भैरवी गाओ, अंधेरी रात जग से टल चुकी है
✍️ चिराग़ जैन

बलात्कार को ओनर किलिंग बनाने की शुरुआत

सियासत किस तरह करती रही बर्ताव, मत भूलो
कुरेदेंगे तुम्हारे ही बदन के घाव, मत भूलो
तुम्हारी चीख़ से कुर्सी न हिल जाये मसीहा की
अरे ओ हाथरस वालो, अभी उन्नाव मत भूलो

✍️ चिराग़ जैन

क्या करोगे

कहाँ तक झूठ का पर्दा करोगे
कभी तो झील में चेहरा करोगे

बिछाकर जाल दाना डालता है
तो क्या सय्याद का सजदा करोगे?

कराहों को दबाया जा रहा है
कहीं चीखें उठीं तो क्या करोगे

सुना है भूख शर्मिंदा हुई है
हवस को कब तलक पूरा करोगे

अगर ज़िल्लत की आदत पड़ गई तो
फिर ऐसी ज़िन्दगी का क्या करोगे

उजालों को मिटा कर देख लेना
अंधेरे में तुम्हीं रोया करोगे

✍️ चिराग़ जैन

जिस दिन साँस पराई होगी

देह बचेगी स्पर्श न होगा
आँखें होंगीं दर्श न होगा
सब अपनों के आने का भी
मुझको किंचित हर्ष न होगा
उस दिन अधरों पर भी कोई याद नहीं मुस्काई होगी
जिस दिन साँस पराई होगी

जिन होंठों की मुस्कानों से मुझको प्राण मिला करते हैं
जिन चेहरों के खिल जाने पर मन के तार हिला करते हैं
उन चेहरों पर पीर दिखेगी
पीड़ा की तस्वीर दिखेगी
मेरी यादों में गुमसुम-सी
ख़ुशियों की जागीर दिखेगी
शायद उस दिन मेरे कारण वे आँखें भर आई होंगी
जिस दिन साँस पराई होगी

जिस देहरी पर मेरे होने से सुख सारा हो जाता है
जिस आंगन में मेरी आहट से उजियारा हो जाता है
उस आंगन में क्रंदन होगा
कण-कण में निस्पंदन होगा
मेरी माटी की काया के
चरणों का अभिनन्दन होगा
शायद उस दिन इस आंगन की फुलवारी मुरझाई होगी
जिस दिन साँस पराई होगी

मन में रखने वाले मुझको, कंधों पर लेकर जाएंगे
मेरे संगी-साथी मुझको, सन्नाटे में धर आएंगे
पानी से रिश्ते धोऊंगा
उस दिन कड़वा सच ढोऊंगा
उस दिन मेरा मौन रहेगा
उस दिन मैं माटी होऊंगा
उस दिन मेरे पास समूचे जीवन की तन्हाई होगी
जिस दिन साँस पराई होगी
✍️ चिराग़ जैन

उलाहना

मैं अंधेरों के नगर में दीप धरने जा रहा हूँ
तुम उजालों की प्रतीक्षा में समय व्यतीत करना
मैं पसीने से नदी का पाट भरने जा रहा हूँ
तुम किसी बरसात की मनुहार का संगीत गढ़ना

कर्मरत अर्जुन हुआ तो कृष्ण उसके सारथी थे
देवता जीवन बदल सकते नहीं केवल भजन से
आ गई चलकर अकेली जो गहन अंधियार में भी
जूझना ही सीख लेते, भोर की पहली किरण से
भाग्य की हर हार को मैं जीत करने जा रहा हूँ
तुम स्वयं को हस्तरेखा बाँच कर भयभीत करना

पाँव चलने के लिए तैयार हैं बस ये बहुत है
क्यों करूँ परवाह इसकी, कौन मेरे साथ आया
मन, भुजाएँ, श्वास, धड़कन, दृष्टि मेरे पास हो बस
और सब कुछ बोझ भर है, जो अभी तक है जुटाया
मैं स्वयं के हाथ से अब ख़ुद सँवरने जा रहा हूँ
तुम समूची सृष्टि से बस आचरण विपरीत करना

सृष्टि का हर तंत्र मेरे ही लिये निर्मित हुआ है
नियति के हर शाप और वरदान का कारण स्वयं हूँ
यक्षप्रश्नों के सभी उत्तर मुझी को खोजने हैं
मैं स्वयं के हर पतन-उत्थान का कारण स्वयं हूँ
मैं जगत् का सौख्य अपने नाम करने जा रहा हूँ
तुम सदा उपलब्ध दुःख-सुख को समर्पित प्रीत करना
✍️ चिराग़ जैन

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