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रात से रिश्वत ली है

जीत ने मात से रिश्वत ली है
दिल ने जज़्बात से रिश्वत ली है

चांदनी कम है अंधेरा ज़्यादा
चांद ने रात से रिश्वत ली है

फिर से बारिश में चुएगा छप्पर
इसने बरसात से रिश्वत ली है

सब समय की दुहाई देते हैं
सबने हालात से रिश्वत ली है

मुझको लगता है मिरी नींदों नें
कुछ ख़यालात से रिश्वत ली है

कैसे सच्चा जवाब दे कोई
जब सवालात से रिश्वत ली है

✍️ चिराग़ जैन

इक नया रास्ता

ज़िन्दगी जब भी आज़माती है
इक नया रास्ता दिखाती है

न तो पिंजरे में चहचहाती है
न ही अब पंख फड़फड़ाती है

जब कभी माँ की याद आती है
ये हवा लोरियाँ सुनाती है

वो मरासिम को यूँ निभाती है
मिरा हर काम भूल जाती है

मेरे ख़्वाबों में यूँ वो आती है
जैसे पाजेब छनछनाती है

लफ़्ज़ मिल पाए तो सुनाऊंगा
इक ग़ज़ल मुझमें छटपटाती है

जब भी जाता है चांद महफ़िल से
रात की जान सूख जाती है

दिल को मिलती है जब ख़ुशी कोई
अक़्ल कुछ दर्द भूल जाती है

✍️ चिराग़ जैन

इलेक्शन

होता तो यही है जी हर बार इलेक्शन में
पब्लिक को मनाती है, सरकार इलेक्शन में

जनता का ही पैसा है, जनता पे ही शासन है
जनता का ही होता है, व्यापार इलेक्शन में

कुछ झंडे उठाकर के, कुछ बिल्ले लगाकर के
बिन बात ही करते हैं, बेगार इलेक्शन में

कुछ रंगे सियारों ने, कुछ नंगे गरीबों के
बच्चों को लिया कैसे पुचकार इलेक्शन में

लीडर के कदम चूमें, ये लीपी हुई सड़कें
इनका तो हुआ ही है, उद्धार इलेक्शन में

हर दिल है महज दलदल, दिल्ली के दलालों की
कूदे तो भला कैसे, ख़ुद्दार इलेक्शन में

✍️ चिराग़ जैन

कोई बिछड़कर मिला है

जहाँ तुमको बस एक पत्थर मिला है
वहाँ हमको जन्नत का मंज़र मिला है

उसे भी ग़ज़ब का मुक़द्दर मिला है
मुक़द्दर में जिसको तिरा दर मिला है

कहाँ कोई ऐसा क़लन्दर मिला है
जिसे मन मुताबिक़ मुक़द्दर मिला है

हुआ एक अरसे के बाद आज तनहा
लगा, जैसे कोई बिछड़कर मिला है

भले चोट की जिस्म पर दोस्तों ने
मगर ज़ख़्म उसका ज़ेह्न पर मिला है

कोई तेरी रहमत को माने न माने
तिरा नाम सबकी ज़ुबां पर मिला है

ज़माना भले उसको समझे न समझे
मगर इक इशारा बराबर मिला है

जिसे जो मिला है वो उसका मुक़द्दर
मुझे जो मिला है वो बेहतर मिला है

कोई उनसे पूछे मुक़द्दर के मानी
जिन्हें तिश्नगी में समन्दर मिला है

✍️ चिराग़ जैन

बचपन नहीं जाता

अगर कुछ शोख़ियों की ओर उसका मन नहीं जाता
तो फिर इंसान के मन से कभी बचपन नहीं जाता

कोई कितना भी ख़ुद को सख्त दिल कहता रहे लेकिन
कभी यादों से पहले प्यार का सावन नहीं जाता

भले ही मिट गया दीवार का नामो-निशां भी अब
मगर मेरे ज़ेह्न से वो बँटा आंगन नहीं जाता

चुभन ही क्यों बहुत लम्बे समय तक याद रहती है
मिरे मन से वो इक पल का परायापन नहीं जाता

किसी के रूठ जाने पर जो पीछे छूट जाते हैं
बहुत दिन तक उन अपनों का अकेलापन नहीं जाता
✍️ चिराग़ जैन

लरजिश हमारे लहजे में

कहाँ अचानक मिले हैं हम-तुम, यहाँ के मौसम में शायरी है
जवान रुत, मदभरी हवाएँ, ये शाम जैसे ठहर गई है

महकती रुत उनके सुर्ख़ नाज़ुक लबों को छूकर बहक रही है
सनम के भीगे बदन की लरजिश हमारे लहजे में आ गई है

जो सोच की हद में आ गया हो, वो चाहे जो भी हो आदमी है
किसी तरह भी समझने से जो, समझ न आए, ख़ुदा वही है

शराब पीकर बहकने वालों को उस नशे की ख़बर नहीं है
वो उम्र भर फिर सँभल न पाया, रसूल की जिसने मय चखी है

नज़र में शोख़ी, ज़ुबां में नरमी, बदन में मस्ती, लबों पे सुर्ख़ी
ये हुस्ने-जाना है या ख़ुदा ने, कोई सरापा ग़ज़ल कही है

✍️ चिराग़ जैन

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