Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
ज्वार भावनाओं का जो मन में उमड़ता है,
तब आखरों का रूप धरती है कविता
आस-पास घट रहे हादसों की कीचड़ में
कुमुदिनी बन के उभरती है कविता
प्रेयसी के रूप में सँवरती है कविता; औ
शहीदों की अरथी पे झरती है कविता
लोग मानते हैं काग़जों पे लिखी जा रही है,
कवि जानते हैं कि उतरती है कविता
‘रश्मिरथी’ में ‘रेणुका’ में ‘सामधेनियों’ में
दिनकर बन के दमकती है कविता
सूर, रसख़ान जैसे साधुओं में बसती है,
निराला की ‘बेला’ में झलकती है कविता
कभी घुंघरुओं में ख़नकती है कविता; औ
कभी ‘मधुशाला’ में छलकती है कविता
कभी महादेवी-सा बिरह झेलती है; कभी
आँसुओं की धार में ढलकती है कविता
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Jainism, Poetry
ज्ञानसिंधु वीतरागी हित-उपदेषी हैं जो
ता की करो पूजा नित प्रति अष्ट द्रव्य से
पंच-महाव्रतों का जो बाना पहन के चलें
ऐसे गुरुओं की सेवा करो जीव भव्य रे
जिन की जो वाणी जिनवाणी का मनन करो
संयम का पालन बनाओ बस लक्ष्य रे
व्रत-उपवास करो नितप्रति दान करो
तब ही चिराग कहलाओगे सुसभ्य रे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Jainism, Poetry
क्षमा को भुलाओ नहीं मति भरमाओ नहीं
घाव को कुरेदोगे तो ख़ून बह जाएगा
जो हुआ सो भूल जाओ आज में सुधार लाओ
निज को संवारे वही वीर कहलाएगा
अम्बर को छोड़ के दिगम्बर को ओढ़ ले तो
धन्य तेरी जननी का क्षीर कहलाएगा
समता का भाव धरे काऊ से ना राग करे
तब ही ‘चिराग’ महावीर कहलाएगा
✍️ चिराग़ जैन