Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
मेले में भी पहुँचे साथ झमेले लेकर
उत्सव किस सूरत तुमको आकर्षित करते
बाँहें फैलाते होंगे जब खेल-खिलौने
कंगाली के दंश तुम्हें बिलखाते होंगे
आकर्षण उभरा होगा जब मुस्कानों का
लाभ-बचत का तब तुम गणित लगाते होंगे
द्वन्द वहाँ था आशा और निराशाओं का
तुम बढ़कर आशाओं को अपराजित करते
रामकथा से इतनी सीख न पाई तुमने
ठीक दिशा का बाण, अधम का अंत करेगा
अडिग रहो तुम शांत तथागत जैसे बनकर
तेज तुम्हारा हर डाकू को संत करेगा
अभिनय से जीवन का सार ग्रहण करना था
उलझन से ख़ुद को कुछ देर विभाजित करते
सरगम की पहली कक्षा से ऊब गए तो
अनहद का संगीत नहीं साधा जाएगा
धरती के प्राणी को अवरोधक माना तो
ईश्वर सा मनमीत नहीं साधा जाएगा
हर झूले की पींग तुम्हें ही लेकर उछले
ऐसी इच्छाओं को क्षण भर विस्मृत करते
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
पीड़ा के सागर मंथन से
उत्सव के मधुघट पाएंगे
चाहे कण्ठ रुंधा हो फिर भी
हम जीवन भर मुस्काएँगे
यादों के जलते छालों पर
भावों का मरहम धर देंगे
जीवन के उघड़े घावों में
शब्दों की हल्दी भर देंगे
सरगम के छू लेने भर से
ग़म के फोड़े भर जाएंगे
चाहे कण्ठ रुंधा हो फिर भी
हम जीवन भर मुस्काएँगे
हालातों का गर्जन होगा
चिंता की बिजली कौंधेगी
शंका के तूफ़ान उठेंगे
आंधी सपनों को रौंदेगी
फिर भी धरती मुस्काएगी
नभ में मेघ अगर छाएंगे
चाहे कण्ठ रुंधा हो फिर भी
हम जीवन भर मुस्काएँगे
आँसू से धुलकर मुस्कानें
शायद और निखर जाएँगी
सूरज जलकर बुझ जाएगा
फिर भी भोर सँवर जाएँगी
पतझर के मारे ठूंठों पर
वासंती मौसम आएंगे
चाहे कण्ठ रुंधा हो फिर भी
हम जीवन भर मुस्काएँगे
गीत रचेंगी भीगी पलकें
अधरों का विस्तार बढ़ेगा
अन्तस् पिघलेगा पीड़ा से
मुस्कानों से प्यार बढ़ेगा
गाते-गाते जीने वाले
हँसते-हँसते मर जाएंगे
चाहे कण्ठ रुंधा हो फिर भी
हम जीवन भर मुस्काएँगे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
त्रिपुरा में इक विप्लव अपनी सारी मर्यादा भूला
मोदी जी ने शी के संग फिर चाइना में झूला झूला
लालक़िले पर डालमिया के कब्ज़े का हल्ला-गुल्ला
राहुल को चैलेंज किया है पीएम ने खुल्लमखुल्ला
येदुरप्पा ने बुकिंग भी करा ली, शपथ रट डाली
कर्नाटक की है जंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ज़माना हुआ तंग भाइयो
बिन मतलब के लंबे-लंबे भाषण पेल रहे हो तुम
छोटे बच्चों से भी बोगस दावे ठेल रहे हो तुम
समझ न आता आख़िर कैसे ख़ुद को झेल रहे हो तुम
कभी-कभी ऐसा लगता है घर-घर खेल रहे हो तुम
कभी बोलने की बाज़ियां लगा लीं, या शायरी सुना ली
उड़ती रही पतंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ज़माना हुआ तंग भाइयो
देश फूँक कर अपनी कोठी जगमग ही तो करनी है
सिर्फ़ क्रीज़ पर टिके हुए कुछ ठक-ठक ही तो करनी है
तुम आपस में शर्त लगाकर टाइम पास करो अपना
क़ाग़ज़ देखो या मत देखो, बकबक ही तो करनी है
ये तो जनता है बड़ी भोली-भाली, बजाती रही ताली
बनी रही उमंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ज़माना हुआ तंग भाइयो
जो चुप्पी साधे थे वो भी होंठ खोलना सीख गए
बीजेपी वाले दलितों का मोल तोलना सीख गए
ख़ुद मोदी जी ने माना है, अच्छे दिन तो आए हैं
कांग्रेसी मोदीशासन में झूठ बोलना सीख गए
कभी जातियों पे रोटियाँ पका लीं, कहीं पे बकी गाली
यूँ चढ़ता रहा रंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ज़माना हुआ तंग भाइयो
सब अपनी-अपनी कहते हैं, कौन बताओ होश में है
सिर्फ़ जीत जाने की इच्छा हर इक के उद्घोष में है
उसकी वैसी हरक़त जितना पैसा जिसके कोष में है
बीजेपी तो मस्ती में है, कांग्रेस आक्रोश में है
कहीं मावस में भी है दीवाली, कहीं पे जेब ख़ाली
ये वोट की है जंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ज़माना हुआ तंग भाइयो
इस गर्मी में काॅमेडी का हीटर किसने आॅन किया
ये कहते हैं पाण्डव दल ने कौरव दल को फोन किया
चंद दिनों में टाॅप इन्होंने बकवासों का ज़ोन किया
दिल्ली ले जाकर भाई को जैसे-तैसे मौन किया
कभी पान की दुकान खुलवा ली, या गाय पलवा ली
ये कैसा नया रंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ज़माना हुआ तंग भाइयो
मनोरंजन पर भारी इस विप्लव के छक्के-चैके हैं
इस भाई ने दही-बड़े भी देसी घी में छौंके हैं
जब ज़ुबान चलती है तो फिर कौन जो उसको रोके है
नहीं डायना अच्छी लगती, ऐश्वर्या जी ओके हैं
जो दबी थी वो जी की कह डाली, यूँ आरज़ू निकाली
जवानी की उमंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ज़माना हुआ तंग भाइयो
रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क सब कुछ प्राइवेट हुए सर जी
हटी सब्सिडी गैस तेल के ऊँचे रेट हुए सर जी
लालक़िले के केअर टेकर मोटे सेठ हुए सर जी
हमें बताओ टैक्स के पैसे किनकी भेंट हुए सर जी
तुमने अपनी तो सेलरी बढ़ा ली, या रैलियाँ निकालीं
तमाशा करो बंद भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ज़माना हुआ तंग भाइयो
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
कल बना लेगा उदाहरण जग हमारे निर्णयों को
पर अभी हम आपके उपहास का संत्रास झेलें
कल हमारे अनुकरण की सीख देना पीढ़ियों को
आज हम अपने किये पर धृष्टता का त्रास झेलें
जब कभी गौतम नकारेगा गँधाती रीतियों को
तब उसे उद्दण्ड कहकर विश्व कर देगा बहिष्कृत
जब वही कृशकाय होकर लकड़ियों जैसा बनेगा
तब उसे गृहिणी करेगी देवता कहकर पुरस्कृत
स्वर्णबिंबित हो पुजेंगे कल तथागत विश्व भर में
आज भीषण जंगलों में कष्टप्रद संन्यास झेलें
जब किसी वैधव्य को जीवित चिता स्वीकार ना हो
तब उसे कुलटा बताकर राजगृह दुत्कार देंगे
बावरी जब कृष्ण की दीवानगी में मग्न होगी
तब नियम उसको गरल का पात्र देकर मार देंगे
कल तुम्हारी अर्चना का गान बन जाएंगी मीरा
आज भगवत भक्ति में वे दण्ड का विषग्रास झेलें
जग यही करता रहा है, जग यही करता रहेगा
अब जिसे द्रोही कहा है, कल उसे ईश्वर कहेगा
जिस कथा को हीन कहकर आज कर दोगे उपेक्षित
कल उसी पोथी से जग की आस्था का रस बहेगा
कल समूचा जग यही चौपाइयाँ गाता फिरेगा
आज तुलसी ज्ञानियों के दम्भ का परिहास झेलें
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
मीत! तुम्हारी सुधियों का ये कैसा बारहमासा है
अधरों पर मधुमास रखा है आँखों में चौमासा है
पल में मुखड़े पर जगमग दीवाली-सी आ जाती है
पल में मन में चैत दुपहरी की वीरानी छाती है
पल में डरकर मन बेचारा पूस निशा-सा कँपता है
पल में आषाढ़ी चातक-सा चंद्रकिरण को तकता है
क्षणिक हताशा, क्षणिक पिपासा, क्षणिक मिलन अभिलाषा है
अधरों पर मधुमास रखा है आँखों में चौमासा है
जब पुरवा के बहकाने से मन भरमाने लगता है
तब बिन मौसम की बारिश से खेत लजाने लगाता है
दुनियादारी के पचड़ों से आलस करने लगता है
इस बैरागी मन में महुए का रस झरने लगता है
मन संतृप्त हुआ बैठा है पर तन भूखा-प्यासा है
अधरों पर मधुमास रखा है आँखों में चौमासा है
इधर हृदय के पास अचानक जेठ पिघलने लगता है
उधर पुराने पल से तपकर अन्तस् गलने लगता है
सपनों के कजरारे बादल अम्बर तक बढ़ जाते हैं
धूप चढ़े तो इच्छाओं के मृग काले पड़ जाते हैं
इस पल शांत तथागत है मन, अगले पल दुर्वासा है
अधरों पर मधुमास रखा है आँखों में चौमासा है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
अंधियारे में चलते रहने से जग का उत्थान न होगा
प्रश्नों से परहेज किया तो कोई अनुसंधान न होगा
भगवद्गीता उत्तर ही तो है अर्जुन की जिज्ञासा का
यम तक ने सम्मान किया है नचिकेता की अभिलाषा का
समवशरण में प्रश्न न हों तो आगम ज्ञान कहाँ से आता
प्रश्न गरुड़ यदि पूछ न पाते गरुड़ पुराण कहाँ से आता
ज्ञानपिपासा तृप्त हुई तो ईश्वर का अपमान न होगा
प्रश्नों से परहेज किया तो कोई अनुसंधान न होगा
यक्षों की अनदेखी करके प्यास बुझाना सम्भव है क्या
शंकाओं का उत्तर देना सचमुच एक पराभव है क्या
कनक, कसौटी से कतराए ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है
जिज्ञासा से आँख चुराए, वह मेरा आराध्य नहीं है
प्रश्न सुने तो आपा खो दे, वह मानुष विद्वान न होगा
प्रश्नों से परहेज किया तो कोई अनुसंधान न होगा
सावित्री की हठ ने चाहा उसके पति के प्राण न जाएँ
तब तक प्रश्न उठाते रहिए जब तक विधिना मान न जाएँ
प्रश्नों के ही ताड़पत्र पर हर इक ग्रंथ लिखा होता है
प्रश्नों की आधारशिला पर ही गणतंत्र टिका होता है
जो प्रश्नों को द्रोह कहे उस शासक का यशगान न होगा
प्रश्नों से परहेज किया तो कोई अनुसंधान न होगा
दम्भी राजा की मनमानी का प्रतिकार गुनाह नहीं है
अभिमानी की पूजा करना प्रह्लादों की चाह नहीं है
मृत्यु प्रकट होती खम्भे से अहम् अगर सिर चढ़ आता है
वरदानों का दंभ किया तो विधि का लेखा मिट जाता है
राम अमर होंगे युग-युग तक, रावण का अभिमान न होगा
प्रश्नों से परहेज किया तो कोई अनुसंधान न होगा
✍️ चिराग़ जैन