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प्रतीक्षा की गली

प्रेम चलकर आएगा जब तक प्रतीक्षा की गली में
तब तलक संसार भर में प्रीति जीवित रह सकेगी
है समर्पण जब तलक तैयार सब कुछ हारने को
उस घड़ी तक भावना की जीत जीवित रह सकेगी

जब तलक बदली स्वयं बेचैन होकर झर न जाए
तब तलक चातक उसे तकता रहेगा प्यास लेकर
बदलियों की शुष्क लापरवाहियों को क्या पता है
कण्ठ में अटके हुए हैं प्राण इक विश्वास लेकर
मृत्यु से पहले बरस जाओ, पिघल जाओ अगर तुम
तो प्रणयगत साधना की रीति जीवित रह सकेगी

उम्र काटी है शिला ने भी यही विश्वास रखकर
एक दिन मझमें विधाता प्राण भर देंगे परस कर
बेर चख-चख कर कोई शबरी प्रतीक्षारत रही है
इस अभागे प्रेम को स्वीकार लेंगे राम हँसकर
चेतना में प्रीत के अमरत्व का उल्लास भर दो
देह भी हर नियति के विपरीत जीवित रह सकेगी

✍️ चिराग़ जैन

उस पल मुझको रोना आया

जब तुम चल दी राह बदल के
दो आँसू ना आँख से छलके
जब मैंने घर वापस आकर, ख़ुद घर का दरवाज़ा खोला
घर के भीतर घर ग़ायब है, ये घर का हर कोना बोला
जब तुमको आवाज़ लगाई
और न कोई उत्तर पाया

उस पल मुझको रोना आया
यादों के सौन्धे बिस्तर पर, मैं बिल्कुल एकाकी सोया
तब समझा, मैंने क्या खोया, तब मैं फफक-फफक कर रोया
पीठ दुखी तो बाम उठाकर
मेरा हाथ लेप ना पाया
उस पल मुझको रोना आया

जब मैंने अपना बोझा ख़ुद अपने ही कंधों पर ढोया
टूटा बटन लगाने को जब ख़ुद सूईं में धागा पोया
सुबह-सुबह भागादौड़ी में
बटुआ साथ नहीं ले पाया
उस पल मुझको रोना आया

देर रात घर वापिस आकर, जब-जब मैंने खाना खाया
फ्रिज से निकली दाल गर्म करने में मुझको आलस आया
जब भोजन के बाद किसी ने
जूठा बर्तन नहीं उठाया
उस पल मुझको रोना आया

जब इस जीवन से उकताकर, मरने की इच्छा हो आई
कहीं किसी ने आँखें पढ़कर मेरी थकन नहीं सहलाई
‘मरें तुम्हारे दुश्मन’ कहकर
मुझको ढांढस नहीं बंधाया
उस पल मुझको रोना आया

✍️ चिराग़ जैन

चुनाव आ गए

अभी सबके ही पत्ते खुलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए
सारे नेता सड़क पर मिलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए

पहला युद्ध टिकट बँटने का हर दल के भीतर होगा
दलबदलू मौका ढूंढेंगे, किस दल में बेहतर होगा
भाषण, रैली, वादे, गाली, पग-पग ये मंज़र होगा
टोपी और किसी की होगी, और किसी का सर होगा
अब तो पानी में पत्थर घुलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए
अभी सबके ही पत्ते खुलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए

देशप्रेम का रोज़ दिखेगा कोरा ड्रामा, हंगामा
वादे झूठे, जुमले झूठे, झूठा जामा हंगामा
कोई है बेटा जनता का, कोई मामा हंगामा
हर छुटभैया नेता कूदे पहन पजामा, हंगामा
सबके खद्दर के कुर्ते सिलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए
सारे नेता सड़क पर मिलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए

बीजेपी को रामलला की याद आएगी वोटिंग है
कट्टर दुश्मन से भी हाथ मिला आएगी वोटिंग है
कांग्रेस की करतूतों को गिनवाएगी वोटिंग है
जो भी प्रश्न करोगे उसको भटकाएगी वोटिंग है
असली मुद्दे सड़क पर रुलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए
अभी सबके ही पत्ते खुलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए

राहुल बाबा को भगवान बनाने निकले कांग्रेसी
जनता को इक गुड्डे से बहलाने निकले कांग्रेसी
बीजेपी के सारे पाप गिनाने निकले कांग्रेसी
नौ सौ चूहे खाकर हज को जाने निकले कांग्रेसी
अब तो कीचड़ से कपड़े धुलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए
अभी सबके ही पत्ते खुलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए

एक अकेले राहुल गांधी कितना काम करें भैया
पार्टी के हर इक खेमे का युद्ध विराम करें भैया
कुर्ते की बाजू ऊपर करके संग्राम करें भैया
दिन में रैली रात में बैठक, कब विश्राम करें भैया
जन समर्थन में पापड़ बिलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए
सारे नेता सड़क पर मिलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए

शाम-सवेरे दाग़ रहे जुमलों के गोले मोदी जी
अपने खातों पर रखते हैं सबके झोले मोदी जी
डमरू लेकर कर देते हैं भम भम भोले मोदी जी
हर रैली में मित्रो-मित्रो करते डोले मोदी जी
राहुल बाबा पे जम कर पिलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए
सारे नेता सड़क पर मिलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए

मनमानी वाले कर पाएं सीएम पद की सैर नहीं
जनता से पूछा तो बोली कांग्रेसी भी ग़ैर नहीं
हम उनको कैसे चुन लें जो भू पर धरते पैर नहीं
मोदी जी से वैर नहीं पर रानी जी की ख़ैर नहीं
हाय इनके न नखरे झिलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए
सारे नेता सड़क पर मिलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए

✍️ चिराग़ जैन

प्यार कहाँ खो बैठे

जिसको छू लेने से मन की महक गुलाबी हो जाती थी
जिसमें आँखें बतियाती थीं, हम वो प्यार कहाँ खो बैठे
जिसके दम पर हम दोनों का अपनापन गहरा होता था
जो हमको इक-दूजे पर था, वो अधिकार कहाँ खो बैठे

जाने कैसी ज़िद्द पनपी है, संवादों का स्वर ऐंठा है
तन पर मन भर बोझ चढ़ा है, मन ऐसा तन कर बैठा है
ख़ुशियों की क्यारी जिसके आलिंगन में फूला करती थी
जिसमें रिश्ता पंख पसारे, वो विस्तार कहाँ खो बैठे
हम वो प्यार कहाँ खो बैठे

बातें करने बैठ गए तो फिर बातों का छोर नहीं था
नयनों में बस मुस्कानों का डेरा था, कुछ और नहीं था
जो छोटी सी दुनिया हमको, दुनिया से अच्छी लगती थी
जिसमें अपने सब अपने थे, वो संसार कहाँ खो बैठे
हम वो प्यार कहाँ खो बैठे

आपस की सरगम ऐसी थी, खटपट से भी सुर सजते थे
पल भर सन्नाटा होता था, फिर घंटों नूपुर बजते थे
जो धागा हम-तुम दोनों को आपस में बांधे रखता था
जिससे हम हर बार जुड़े थे, वो इस बार कहाँ खो बैठे
हम वो प्यार कहाँ खो बैठे

✍️ चिराग़ जैन

नियति

रोज़ नया अनुभव जुड़ता है
रोज़ उमर घटती जाती है
रोज़ नए बिरवे उगते हैं
रोज़ फसल कटती जाती है

जब यह तय है कुछ दिन पीछे हम सबको निश्चित मरना है
फिर इतने सारे अनुभव का आख़िर हमको क्या करना है
बिन मतलब के अनुभव से ही
निश्छलता छँटती जाती है
रोज़ नए बिरवे उगते हैं
रोज़ फसल कटती जाती है

सागर युग-युग तक गरजेगा, लहरें आएंगी-जाएंगी
कुछ सागर तट को चूमेंगी, कुछ पहले ही मिट जाएंगी
लहर नियत सीमा तक बढ़कर
ख़ुद पीछे हटती जाती है
रोज़ नए बिरवे उगते हैं
रोज़ फसल कटती जाती है

श्रम में जीवन बीत गया तो, कब तन को विश्राम मिलेगा
काया केवल कष्ट सहेगी, और चेतन को राम मिलेगा
जो पाया उसको बिसराकर
दुनिया क्या रटती जाती है
रोज़ नए बिरवे उगते हैं
रोज़ फसल कटती जाती है

✍️ चिराग़ जैन

दुःख से यारी

सुख मिलने से भी कतराया
दुःख देहरी तक चलकर आया
सुख के नखरे कौन उठाता
मैंने दुःख से यारी कर ली

सुख को पाने की कोशिश में, हर दिन ख़ुद को सेज किया है
दुःख, जिसने किरदार निखारा, उससे ही परहेज किया है
अब मैंने अपने दुखड़े संग
हँसने की तैयारी कर ली
सुख के नखरे कौन उठाता
मैंने दुःख से यारी कर ली

सुख की सबको चाह रही है, दुःख का कोई चाव नहीं है
पर सुख जो मुझसे करता है, वो अच्छा बर्ताव नहीं है
सुख से भीख नहीं मांगूंगा
दुःख से ही अलमारी भर ली
सुख के नखरे कौन उठाता
मैंने दुःख से यारी कर ली

जितनी इसकी पूछ करूं मैं, उतने ताव दिखाता है सुख
जिस दिन से मुँह फेर चला हूँ, पीछे-पीछे आता है सुख
तब इसने दुत्कार दिया था
अब मैंने ख़ुद्दारी भर ली
सुख के नखरे कौन उठाता
मैंने दुःख से यारी कर ली

साथ न छोड़ेगा जीवन भर, सारे दोष क्षमा कर देगा
दुःख से हँसकर मिल लूंगा मैं, तो ये क्या से क्या कर देगा
दुःख से रायशुमारी कर के
सारी दुनियादारी कर ली
सुख के नखरे कौन उठाता
मैंने दुःख से यारी कर ली

✍️ चिराग़ जैन

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