Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
उथल-पुथल सी मची हुई है
हल जीवन को रौंद रहा है
शायद ईश्वर की आँखों में
फिर से सावन कौंध रहा है
जितना ज़्यादा जोता जाए,
उतना सृजन निराला होगा
जब-जब खेत चुभन झेलेगा,
तब-तब ही हरियाला होगा
मिट्टी के कण-कण को निर्मम, दो बैलों के खुर कूटेंगे
फाल निरंतर चोट करेगी, परतों के तन-मन टूटेंगे
जिनमें फलने की इच्छा हो, उन बीजों को गड़ना होगा
तब इस धरती के दामन में आशा के अंकुर फूटेंगे
माटी का तन सीला होगा,
धरती का मुँह काला होगा
जब-जब खेत चुभन झेलेगा,
तब-तब ही हरियाला होगा
दिन भर अम्बर आग उगलता, तब आती है शाम सलोनी
फिर सूरज के छिप जाने को, हम कह देते हैं अनहोनी
लेकिन ऐसी हर अनहोनी केवल आँखों का धोखा है
दिन से किस दिन रात रुकी है, रातों ने कब दिन रोका है
कुछ पल रात बितानी होगी,
फिर भरपूर उजाला होगा
जब-जब खेत चुभन झेलेगा,
तब-तब ही हरियाला होगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर, कैसे प्राण बचाए
इससे वो ही बच पाया, जो औरों को मरवाए
न्याय भवन में जनहित का इक ढोंग चलाया जाता है
ऊँची-ऊँची बातें करके पास बुलाया जाता है
फिर धोखे से इस चौसर के पासे बदले जाते हैं
इस दलदल में धर्मराज तक अपराधी बन जाते हैं
सिंहासन तन-मन से अंधा, वीर पड़े मुँह बाए
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर, कैसे प्राण बचाए
न्याय, मूर्ति बनकर बैठा है, षड्यंत्रों का मेला है
नियमों का इक चक्रव्यूह है, जिसमें सत्य अकेला है
आरोपी पर धाराओं के शस्त्र चलाए जाते हैं
नियमों का खिलवाड़ बनाकर वीर गिराए जाते हैं
सच के साथी प्रथम द्वार तक, पार नहीं कर पाए
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर कैसे प्राण बचाए
वो जिसने आरोप लगाया, उससे प्रश्न करेगा कौन
ढोंग किसी का, क्षोभ किसी का, लेकिन मोल भरेगा कौन
राजभवन के जयकारों की क़ीमत कौन चुकाता है
सत्ता का अन्याय जगत् में मर्यादा कहलाता है
सच ख़ुद को साबित करता है, झूठ खड़ा इतराए
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर कैसे प्राण बचाए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
बड़बोलों को भी तो समझा लो
नकेल कोई डालो
इन्हें भी ज़रा टोक दीजिये
कोढ़ मिटा है लेकिन मद में बिल्कुल फूल नहीं जाना
जिसमें घृणा पढ़ाई जाए, उस स्कूल नहीं जाना
जश्न मनाना लेकिन हरगिज़ आउट ऑफ रूल नहीं जाना
उनकी इज़्ज़त, अपनी इज़्ज़त, इसको भूल नहीं जाना
अपने मन को भी कुछ तो खंगालो
घृणा है तो मिटा लो
प्यासों को अपनी ओक दीजिये
बिगड़े बच्चे घर आए हैं, उनको थोड़ा प्यार करो
ताने दे-देकर मत उनको, लड़ने को तैयार करो
जो झुकता है, वही फलेगा, इस सच का विस्तार करो
जो भी हैं, जैसे भी हैं, अपने हैं ये स्वीकार करो
छोटे भाइयों को गले से लगा लो
ओ फेसबुक वालो
ज़ुबानी जंग रोक दीजिये
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
युग बदला, हालात वही हैं
निर्बल पर आघात वही हैं
चेहरा बदला है चौसर ने
लेकिन शह और मात वही हैं
लगता है फिर महासमर से, बस थोड़ी ही दूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
फिर कुंती मजबूर हुई हैं, फिर कचरे में कर्ण मिले हैं
फिर पांचाली चीररहित है, फिर कुनबे के होंठ सिले हैं
महलों की फिर गोद भरे जो, क्षमता सिर्फ़ नियोगी की है
सत्ता या तो अंधे की है या नाकारा रोगी की है
हर शासन पाखण्डी निकला
न्यायालय भी मंडी निकला
अम्बा को वरदान मिला तो
उसका रूप शिखण्डी निकला
सब प्रतिशोधों से प्रेरित हैं, सबकी साध अधूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
गुरुकुल शिक्षा की रेवड़ियां, जाति देख कर बाँट रहे हैं
प्रतिभा का अपमान हुआ है, द्रोण अंगूठे काट रहे हैं
गुरुता स्वार्थ टटोल रही है, करुणा का पथ छोड़ चुकी है
रंगभूमि सारे नियमों को अपने हित में मोड़ चुकी है
आश्रम सभी अशुद्ध हुए हैं
विद्या पथ अवरुद्ध हुए हैं
परशुराम इक सूतपुत्र की
क्षमता लखकर क्रुद्ध हुए हैं
चिड़िया की हत्या कर देना, अर्जुन की मजबूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
कुंती पर भी प्रश्न उठाओ, बिन ब्याहे आह्वान किया क्यों
भीष्म पितामह से भी पूछो, अनुचित का सम्मान किया क्यों
क्यों दुःशासन ही दोषी हों, क्यों दुर्योधन ही दंडित हों
जो प्रतिकार नहीं कर पाए, वो क्योंकर महिमामंडित हों
हर इक सभा-समिति बदल दो
प्रतिशोधों की नीति बदल दो
अम्बा, भीष्म सुरक्षित होंगे
स्वयंवरों की रीति बदल दो
यह परिवर्तन कर देने को, हर मन की मंज़ूरी है अब
सच मानो, सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
कर्नाटक के
इस नाटक का
पर्दा गिरनेवाला है
ख़बरों में चर्चा है उनका गुडलक फिरनेवाला है
चाल चली जो बीजेपी ने उसके पासे ठीक पड़े
सत्ता में बैठे साथी ही बाग़ी बनकर चीख पड़े
गुपचुप गुपचुप खिचड़ी पक गई, उनके साथी टूट गए
फ्लोर टेस्ट में इज़्ज़त लुट गई, और पसीने छूट गए
जेडीएस की कुर्सी पर अब
संकट घिरनेवाला है
ख़बरों में चर्चा है उनका गुडलक फिरने वाला है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
ये नीतीशवा करे है कानाफूसी
करावे जासूसी
मोदी जी इनका साथ छोड़ दो
इनके तेवर में भर दो ज़रा भूसी
कि छोड़ो कंजूसी
सत्ता की शह-मात छोड़ दो
आर एस एस पर और विहिप पर नज़रें इनकी पैनी हैं
हम हैं मौन तुम्हारी ख़ातिर उनके हाथों छैनी हैं
हमें बता दो आख़िर कब तक गुंडागर्दी सहनी है
संघ लुटा तो बीजेपी की लाज कहाँ फिर रहनी है
जहाँ होती हो रोज़ बेईमानी
क्या दोस्ती निभानी
मोदी जी ये बिसात छोड़ दो
ये नीतीशवा करे है कानाफूसी
करावे जासूसी
मोदी जी इनका साथ छोड़ दो
इनके तेवर में भर दो ज़रा भूसी
कि छोड़ो कंजूसी
सत्ता की शह-मात छोड़ दो
✍️ चिराग़ जैन