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देख ले इक बार तो मुड़कर

छोड़ कर घर-द्वार मत जा
आस के उस पार मत जा
राग मत बैराग से कर
नेह को यूँ हार मत जा
घर बिना तेरे यकायक हो गया खंडहर
देख ले इक बार तो मुड़कर

विश्व को रौशन बनाने के लिए सूरज बहुत है
बाहरी दीवार पर उजियार की सजधज बहुत है
घर समूचा डूब जाता है अंधेरे में तेरे बिन
इस अभागी देहरी को सिर्फ़ तेरी रज बहुत है
घर में अंधियारा भरा है, दीप है बाहर
देख ले इक बार तो मुड़कर

उर्मिला को सौख्य भी दे, राम को परमार्थ भी दे
विश्व को सर्वार्थ भी दे, राधिका को स्वार्थ भी दे
सृष्टि का करुणेश तू, घर के लिए करुणा बचा ले
सौंप दे जग को तथागत, नीड़ को सिद्धार्थ भी दे
तू हुआ मधुमास, घर पतझर
देख ले इक बार तो मुड़कर

✍️ चिराग़ जैन
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दुःख के दम पर पुजता है तू

दुनिया को भरमाने वाले
सारा खेल रचाने वाले
दुःख के दम पर पुजता है तू
सुख से तुझको डर लगता है

जग का कर्ता-धर्ता तू है, जग में कष्ट अपार भरे हैं
पहले तूने पापी भेजे, फिर तूने अवतार धरे हैं
पहले आग लगाने वाले
फिर पानी बरसाने वाले
तेरा, सुख देने के दावा
कोरा आडम्बर लगता है
दुःख के दम पर पुजता है तू
सुख से तुझको डर लगता है

सब कुछ सहज चले दुनिया में, यह तुझको स्वीकार न होगा
कष्ट नहीं हो तो दुनिया में, तेरा कारोबार न होगा
हँसते लोग रुलाने वाले
दुःख देकर इतराने वाले
सुख की मांग बढ़ाता फिरता
तू इक सौदागर लगता है
दुःख के दम पर पुजता है तू
सुख से तुझको डर लगता है

आँसू, पीड़ा, कष्ट, विवशता -इनसे रिश्वत लेता है तू
सुख के झोला देता है तो, उनमें दुःख रख देता है तू
सुख के स्वप्न दिखाने वाले
दुख के पेड़ लगाने वाले
सबके सुख के परिधानों में
क्यों दुःख का अस्तर लगता है
दुःख के दम पर पुजता है तू
सुख से तुझको डर लगता है

✍️ चिराग़ जैन

हौसला मत छोड़ देना

राह कितनी भी कठिन हो, हौसला मत छोड़ देना
यह नियत है, हर डगर के अंत में मंज़िल मिलेगी
जो सफ़र पूरे हुए हैं, उन सभी का हाल पूछो
हर विजय की राह हर युग में बहुत बोझिल मिलेगी

राम होने के लिए वन-वन भटकना ही पड़ेगा
भाई की हत्या बिना सुग्रीव निष्कासित रहेगा
जो दशानन के सिंहासन पर सुशोभित हो गया है
वह विभीषण वंशहंता हो के अभिशापित रहेगा
वीर लक्ष्मण की कथाएँ जब खंगालेगा कोई तो
राजमहलों के सुखों में घुट रही उर्मिल मिलेगी

जंगलों को छाँट कर चाहे नगर निर्माण कर लें
रण बिना पूरा हुआ क्या, पांडवों की जीत का पथ
द्यूत, लाक्षागृह, कठिन वनवास और फिर दास जीवन
हर क़दम जर्जर हुआ है न्याय की उम्मीद का रथ
मौन रहकर भी समय को काटना चाहा कभी तो
कीचकों के रूप में निश्चित कोई मुश्किल मिलेगी

भोर की पहली किरण का मार्ग अंधियारा रहेगा
रात के अंतिम पहर को दीप की झिलमिल मिलेगी
प्रेम को सारे ज़माने की घृणा सहनी पड़ेगी
नफ़रतों को हर क़दम पर प्यार की महफ़िल मिलेगी
जिंदगानी के सफ़र में मौत का साया रहेगा
मौत को मंज़िल कहा तो, मौत भी तिल-तिल मिलेगी

✍️ चिराग़ जैन

सत्य

सत्य, जिसकी हम अभागे खोज करते फिर रहे हैं
वो युगों से वैभवों का दास बनकर जी रहा है
न्याय, जिसकी चाह में जीवन समर्पित कर चुके हैं
वो किसी दरबार में उपहास बनकर जी रहा है

पीर की सिसकी सुनी तो आँख का पानी पिलाया
दर्द बेघर था, उसे अपने बड़े दिल में बसाया
आह बेसुध थी, उसे सम्बल दिया अपनी भुजा का
हिचकियाँ बेचैन फिरती थीं, गले उनको लगाया
कष्ट की आँखें सजल पाकर उसे अपना कहा था
रंगमंचों पर वही, उल्लास बनकर जी रहा है

आपसी विश्वास, छल की छूट का पर्याय भर है
हर शपथ, मन में बसे इक झूठ का पर्याय भर है
धैर्य कड़वा घूँट है, कायर जनों का ढोंग कोरा
दान क्या है, आत्मा की लूट का पर्याय भर है
भाग्य जब हमसे मिला तो, ठूठ-सा था रूप उसका
आजकल वह बाग़ में मधुमास बनकर जी रहा है

ज्ञान, अपनी धूर्तता को, नीति कहने की कला है
धर्म, नियमों को नियति की रीति कहने की कला है
अर्थ है वह उपकरण जो पाप को भी पुण्य कर दे
प्रेम, कोरी वासना को प्रीति कहने की कला है
जो कथानक वास्तविकता के धरातल पर नहीं था
आजकल वह विश्व का इतिहास बनकर जी रहा है

✍️ चिराग़ जैन

ओ समय!

ओ समय! जब तू मेरे विपरीत चलकर थक चुकेगा
तब तुझे कुछ देर मेरे साथ भी चलना पड़ेगा
जिस दीये के भाग्य में घी और बाती आ गई है
उस दीये को आज सारी रात भी जलना पड़ेगा

सत्य के तप की परीक्षा जब कभी प्रारब्ध लेगा
तब महाश्मशान तक प्रारब्ध ख़ुद भी जाएगा ही
सत्य तो हर इक चुनौती झेल ही लेगा नियति की
भाग्य लेकिन नित नया दुःख ढूंढ़कर तो लाएगा ही
जब किसी के वक्ष पर तू मूंग दलने जाएगा तो
ख़ुद तुझे ही मूंग अपने हाथ से दलना पड़ेगा
ओ समय! जब तू मेरे विपरीत चलकर थक चुकेगा
तब तुझे कुछ देर मेरे साथ भी चलना पड़ेगा

प्रश्नचिह्नों ने स्वयं ही वक्रता का दंश झेला
उत्तरों ने पूर्णता पाई सरल रेखा बनाकर
जिस किसी की कीर्ति को विषपात्र सौंपा था समय ने
ग्लानि धोता फिर रहा उनकी अमर गाथा सुनाकर
जानकी तो अग्निपथ को पार कर लेगी सहज ही
किन्तु युग को उस अगन के ताप में जलना पड़ेगा
ओ समय! जब तू मेरे विपरीत चलकर थक चुकेगा
तब तुझे कुछ देर मेरे साथ भी चलना पड़ेगा

राम का वनवास, सीता का विरह, उर्मिल के आँसू
तू अवध की देहरी पर और पीड़ा क्या रखेगा
सुत, पितामह, तात, अग्रज खो चुका कौन्तेय रण में
पाण्डवों के द्वार पर यम और क्रीड़ा क्या रचेगा
दूसरों को राह में काँटे बिछाने के लिए तो
ख़ुद तुझे भी कंटकों के रूप में ढलना पड़ेगा
ओ समय! जब तू मेरे विपरीत चलकर थक चुकेगा
तब तुझे कुछ देर मेरे साथ भी चलना पड़ेगा

✍️ चिराग़ जैन

अपशकुनों का दोष

सागर खारा, नदिया सूखी
ताल-तलैया में कीचड़ था
लेकिन प्यास नहीं बुझने का,
हर आरोप ओक ने झेला

पेट अन्न को तरस रहा था
और शिरा में रक्त नहीं था
प्रेम व्यस्त था, प्रीत त्रस्त थी
आलिंगन का वक़्त नहीं था
चिंताओं की धूप धरा की उर्वरता को सोख चुकी थी
पर फिर भी बंध्या जीवन का, सारा दंश कोख़ ने झेला

मुस्कानों में आडम्बर थे
उत्सव थे कोरी मजबूरी
हवन बिना मन के होते थे
और अर्चना रही अधूरी
श्रम ने भाग्य भरोसे रहकर, कोशिश का अपमान किया था
लेकिन फिर भी अपशकुनों का, सारा दोष शोक ने झेला

इन्द्रासन, त्रैलोक्य, अमरता
शस्त्रों का संधान दे दिया
मंशा की अनदेखी करके
सबको ही वरदान दे दिया
निशदिन कठिन साधना करके, असुरों ने वरदान जुटाए
फिर इन सारे वरदानों का, हर अभिशाप लोक ने झेला

✍️ चिराग़ जैन

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