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ज़ख़्म कौन धोएगा

भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा तेरे बँटते हुए आँचल में कौन सोएगा बम्बई ने जो धमाकों के ज़ख़्म खाए हैं भूखे बच्चे जो गोधरा में बिलबिलाए हैं मंदिरों में भी धमाकों की गूंज उठती हैं आज हिन्दोस्तां में अरथियाँ भी लुटती हैं किसी मासूम की जब आह सुनी जाती है तो ख़यालों में यही...

कैसे लिखूँ

मस्त था मैं, भ्रमर-सा दीवाना था मैं, लेखनी प्रेयसी बन गई थी मेरी ऑंसुओं की अमानत संजोई बहुत, जुल्म से जंग-सी ठन गई थी मेरी एक दिन प्रेयसी मुझसे कहने लगी- “मेरे प्रीतम ये क्या कर दिया आपने मेरे बचपन को क्यों रक्त-रंजित किया, मांग में रक्त क्यों भर दिया आपने क्यों...
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