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विक्रम और बेताल

विक्रम तुम तो वर्तमान हो
बल, विवेक, सामर्थ्य सभी कुछ मिला-जुलाकर
आगत का सिंगार करो तुम
ये क्या अपने कंधे पर तुम भूत लादकर घूम रहे हो

क्या तुमको आभास नहीं है
जब भी तुम उस प्रेतकाय के
उलझे केशों से उलझे हो
तब तब तुम अपने भविष्य को
पीठ दिखाए खड़े रहे हो

और कभी जब उसे लादकर
तुम भविष्य की ओर बढ़े हो
तब उसने तुमको बेमतलब
गल्प-कथा में व्यस्त किया है

ऐसी कितनी दंतकथाएँ
तुम्हें भविष् की ओर
देखने से हरदम रोका करती हैं

तुम उसके प्रश्नों का उत्तर देकर ज्यों ही इतराते हो
वह अतीत फिर उसी डाल की ओर
अचानक उड़ जाता है
और तुम्हारा पांव दुबारा
फिर भविष्य को छोड़
भूत की ओर यकायक मुड़ जाता है

तुम जो इस नंगे अतीत को
अपने कंधे पर ढो-ढोकर
किसी तंत्र तक ले आने पर अड़े हुए हो
केवल इस ज़िद के कारण ही
वर्तमान से बहुत दूर तुम
किसी भयानक भूत-स्थल पर खड़े हुए हो

काश कभी ये जान सको तुम
तुम्हें भूत के पीछे जिसने भेज दिया है
वह तुमसे निष्कंटक होकर
अपनी स्वार्थ साधना में संलग्न हुआ है
उसे पता है
भूत कभी भी उस मसान से बाहर नहीं निकल सकता है
कोई कैसा भी विक्रम हो
अगर भूत से उलझ गया तो
भूत उसे भी उस मसान से बाहर नहीं निकलने देगा!

✍️ चिराग़ जैन

इधर भी है उधर भी

कुर्सी का घमासान इधर भी है, उधर भी
दो लोगों का गुणगान इधर भी है, उधर भी

जो डेडिकेट है वो सिर्फ झंडे उठाए
दल बदलुओं का मान, इधर भी है उधर भी

जो हाँ में हाँ मिलाए, वही पद पे रहेगा
सच कहने में नुक़सान इधर भी है, उधर भी

किस्मत न बदल पाओ तो क्यों दल बदल रहे
सिद्धू तो परेशान इधर भी है उधर भी

मुफ्ती, पंवार, ठाकरे, अखिलेश या जयंत
पंजे के संग कमान इधर भी है, उधर भी

शाहों की ख्वाहिशों पे ही प्यादे निसार हों
ये खेल का विधान, इधर भी है उधर भी

जिसकी भी घुड़चढ़ी हो वहीं नाच रहे हैं
दो-चार पासवान इधर भी हैं, उधर भी

मैं जिनके साथ हूँ वही ईमानदार हैं
सिब्बल का ये बयान इधर भी है, उधर भी

✍️ चिराग़ जैन

घूमर की धुन पर बीहु

दो दिन प्रकृति की गोद में रहकर अब दिल्ली लौट रहा हूँ। ग्रीष्म ऋतु के जिस प्रकोप में दिल्ली से उड़ान भरी थी, उसके परिप्रेक्ष्य में डिब्रूगढ़ उतरते हुए स्वर्ग की अनुभूति हो रही थी।
पायलट ने लैंडिंग की घोषणा की और हमारा विमान घने बादलों के साम्राज्य में प्रविष्ट हो गया। खिड़की के बाहर बारिश की बूंदों ने अठखेलियाँ शुरू कर दी थी। वैभवशाली मेघों को पार कर ज्यों ही हमें धरती दिखाई दी तो ऐसा लगा ज्यों अचानक किसी ने आँखों में हरा रंग भर दिया हो। रिमझिम बरसात में पुलकता हुआ डिब्रूगढ़ शहर किसी सृजनशील चित्रकार की पेंटिंग जैसा जान पड़ता था।
जहाज के पहियों ने टच डाउन पॉइन्ट को स्पर्श किया तो गति से उत्पन्न उष्मा ने भीगी हुई धरती में समाकर पानी की फुहारों का एक धुआँ सा उत्पन्न कर दिया। ऐसा लगा ज्यों आसमान का कोई बादल जहाज के किसी पेंच में अटक गया हो, जो अचानक धरती पर गिरने के झटके से छुटकारा पा रहा हो।
हम भी भौतिक वायुयान से उतर कर मन को उड़न खाटोला बनाने के लिए हवाई अड्डे से बाहर आ गए। बाहर सुमित खेतान जी हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। एयरपोर्ट परिसर से बाहर निकलते ही चाय के बागान सड़क के दोनों ओर बिछने लगे। नहा-धोकर भीगी खड़ी चाय की हरियाली इतनी ख़ूबसूरत हो गयी थी कि बादल रह-रहकर बरखा का वेश बनाकर चाय की पत्तियों को चूमने का बहाना ढूंढता दिखा। प्रेम की इन पसीजी हुई शरारतों में सड़क शर्म से पानी-पानी हुई जाती थी। लहराती हुई सड़क पर हमारी गाड़ी किसी रोमांटिक स्पर्श की तरह दौड़ी चली जाती थी।
असमिया संस्कृति में साफ़-सफाई और सौंदर्यबोध को खासा स्थान प्राप्त है इसीलिए अनवरत हरे रंग के बीच जहाँ कहीं कोई घर दिखाई देता तो उसका रंग विधान बचपन के खिलौने जैसा आकर्षित करता था। रास्ते की इस ख़ूबसूरती को आँखों में भरते हुए हम तिनसुकिया पहुँच गए।
आयोजन मंडल के सदस्यों का व्यावहार कंचन में सुगंध का प्रतिमान बन रहा था। उत्तर भारत के शेष क्षेत्र की अपेक्षा इस क्षेत्र में सूर्य काफी पहले उग जाता है इसलिए सूरज की ड्यूटी के घण्टे भी शाम 4-5 बजे तक समाप्त होने लगते हैं। इस स्थिति के कारण कवि-सम्मेलन का समय भी जल्दी का ही था। शहर के एक शानदार हॉल में कवि-सम्मेलन हुआ। हम पाँच कवियों के लिए ढाई घण्टे का कार्यक्रम तय था लेकिन साढ़े तीन घण्टे बाद भी सायास कवि-सम्मेलन समाप्त करना पड़ा। श्रोताओं ने सेल्फियाँ खिंचवाते समय यह सुखद शिकायत की कि मन नहीं भरा!
सफल कार्यक्रम से ऊर्जा द्विगुणित करके भोजन आदि के बाद हम सो गए और अगली सुबह जब आँख खुली तो देखा कि कोई मेरे कमरे की खिड़की पर बूंदों से म्यूरल पैटर्न की चित्रकारी कर गया था। बादलों ने सूर्य की किरणों का रास्ता रोक रखा था लेकिन उजाला, शीशे पर बिखरी बूंदों को यह संदेश सुना रहा था कि दिन निकल आया है।
बिस्तर पर अलसाया हुआ मैं प्रकृति के इस संचार को भोग ही रहा था कि फोन की घंटी मुझे भौतिक जगत् में लौटा लाई।
मनोज मोदी जी का फोन था कि होटल से अशोक बाज़ारी
जी के घर नाश्ता करके, वहीं से घूमने निकलना है। मैं जल्दी से तैयार होकर लॉबी में आया तो दिनेश बावरा पहले से गाड़ी में बैठे थे। वे पर्यटन पर नहीं जा रहे थे ब्लकि नाश्ता करके सीधे एयरपोर्ट की ओर निकलने वाले थे। भुवन मोहिनी जी की फ्लाइट दोपहर में थी इसलिए वे भी थोड़ी देर घूम फिर कर प्रस्थान करने वाली थीं।
मैं पिछले दो महीने में तीसरी बार इस क्षेत्र में आया था और यहां के मौसम और सौंदर्य से आकृष्ट था इसलिए सोच-समझकर इस बार पर्यटन का प्लान बनाकर आया था।
अशोक जी के घर बेहतरीन मारवाड़ी नाश्ता करने के बाद मोदी जी मुझे, भुवन को और बाबू जी को अपने घर ले आए। मोदी जी का घर एक अच्छा ख़ासा बंगला है। बाहर गार्डन में सुपारी और आम जैसे वृक्षों के साथ एक मुकम्मल किचन गार्डन था। बरसात लगातार जारी थी सो मौसम और मौके का सम्मान करते हुए मोदी जी ने हमें अपने गार्डन के भुट्टे खिलाए। फिर हमने उनके ख़ूबसूरत बगीचे में खूब फोटोग्राफ़ी की।
यहाँ से हम एक चाय बागान की ओर चले। ढाई फुट के चाय के पौधों की सलीके से लगी हुई क्यारियों के बीच हमने ख़ूब मस्ती की। मैंने चाय की शायरी का प्रयोग करते हुए चाय के महत्व पर एक वीडियो बनाया। अनियोजित वीडियो में सद्य बोला गया वॉयस ओवर चाय पर एक बेहतरीन ललित निबंध जैसा बन गया।
घड़ी देखी तो भुवन मोहिनी जी को फ्लाइट का टाइम ध्यान आया। बेमन से उन्हें पर्यटन का सुख छोड़कर प्रस्थान करना पड़ा। उनके रवाना होने पर हम मनोज मोदी जी के साथ अरुणाचल प्रदेश के लिए निकल गए। तिनसुकिया से बाहर आते-आते हम एक ऐसी सड़क पकड़ चुके थे जिसके एक और रेल लाइन थी और दूसरी ओर जंगल। जहाँ कहीं बस्ती दिखाई देती वहां जंगल कुछ पीछे चला जाता था लेकिन रेल लाइन ने सड़क का साथ नहीं छोड़ा।
पचास किलोमीटर के करीब इस अलौकिक सौंदर्य को निहारते हुए हम अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर पहुंच गए। अरुणाचल में देश के अन्य भागों की तरह फ्री एंट्री नहीं है। इस राज्य में प्रवेश करने के लिए अनुमति की कुछ औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती हैं। मोदी जी गाड़ी से उतरकर यह प्रक्रिया पूरी करके आए और हम सूर्योदय के प्रदेश में प्रविष्ट हो गए। नाप-तोल कर बनाई गई सड़क के दोनों ओर शालीनता से खड़े पेड़ जब ऊपर ही ऊपर एक दूसरे से गले मिलते थे तो सड़क के ऊपर किसी गुफा जैसा दृश्य बन जाता था।
इस वर्णनातीत दृश्य से गुज़रते हुए हम गोल्डन पैगोडा पहुँचे। मोदी जी पार्किंग में गाड़ी लगा रहे थे और मैं स्वर्णद्वार के सम्मुख खड़े बौद्ध भिक्षुओं को निहार रहा था। छोटे-छोटे बालकों से लेकर कैशोर्य और यौवन की देहरी को छू रहे ये लामा गहरे लाल और गहरे पीले रंग के चोगे में दिव्य लग रहे थे। संन्यास के तेज और तथागत के पथ की शांति से इनका सौंदर्य दिव्य हो गया था। बुद्ध पूर्णिमा के दिन इस स्थान पर आने का संयोग आनंद में वृद्धि कर रहा था।
हमने टिकट लेकर तीर्थ परिसर में प्रवेश किया। बहुत करीने से संजोए गए बड़े से बगीचे के बीच चारों ओर से एक जैसा दिखने वाला एक विशाल मंदिर था जिसमें बुद्ध का भव्य स्वर्णबिम्ब विद्यमान था। मंदिर के चारों प्रवेश द्वार चीनी शैली के सिंह बिम्ब से अलंकृत थे। बाहर एक बड़े से तालाब में बुद्ध विराजित थे। बारिश की बूँदें जब तालाब के पानी में गिरती थीं तो एक गोल दायरा बनता जो बुद्ध की मूर्ति तक जाकर विलीन हो जाता था। यह दृश्य ‘ध्यान’ विधि के साकार कर रहा था। विचारों की तरह अनवरत उपजते दायरे निमीलित नयन युक्त ध्यानस्थ योगी तक पहुँच कर विलीन हो रहे थे। मैं अपलक इस दृश्य से बंधने लगा। क्षण भर के लिए बारिश की बूंदों की अनुभूति विस्मृत हो गई थी। क्षण भर के लिए मन विचारशून्य होकर तथागत के बिम्ब का स्पर्श कर आया था। नयन खुले थे किंतु दृश्य गौण हो रहे थे। कान उपस्थित थे किंतु ध्वनि शून्य हो गई थी। देह जिवित थी किंतु स्पर्श विलीन हो गया था… क्षण भर में असीमित ऊर्जा बटोरकर मेरी तन्द्रा टूट गई।
अनुभव की जिस वीथि में मैं क्षण भर विचरने लगा था, वह लिखने का समय सम्भवतः इस जीवन में मैं न जुटा सकूँगा। बस इतना कह सकता हूँ कि ध्यान के इस स्वर्णिम सम्मोहन ने क्षण भर में मुझसे मेरा मन ठग लिया था।
स्वयं को संयत करने के उद्देश्य से मैंने वहाँ से एक फेसबुक लाइव किया और इस परिसर को डिजिटल तकनीक में सहेजकर वापिस गाड़ी में आकर बैठ गया। भौगोलिक स्थिति के कारण दोपहर ढल चुकी थी और रात हुई नहीं थी। इतनी लंबी शाम का यह मेरा पहला अनुभव था। पूरा रास्ता शाम में ही बीता। रास्ते में मोदी जी ने अपनी चाय फैक्ट्री दिखाई। चाय बनने की प्रक्रिया जानकर बहुत अच्छा लगा। हरी पत्तियों के काले दानों में बदल जाने की पूरी प्रक्रिया देखकर विकास की आवश्यकता तथा साधना का अर्थ समझ आया।
तिनसुकिया पहुँचकर हमने सुमित खेतान जी, अशोक बाज़ारी जी और मनोज मोदी जी के साथ स्वादिष्ट भोजन किया, अपनी-अपनी अटैची की क्षमता के अनुसार चायपत्ती के पैकेट बटोरे और सो गए।
सुबह-सुबह हवाई अड्डे के लिए निकल लिए हैं। असम की संस्कृति, अरुणाचल का सौंदर्य और राजस्थानी लोगों के मीठे अपनत्व की संगत… ऐसा लग रहा है जैसे मेरा मन कालबेलिया की धुन पर बीहु नृत्य करके लौटा हो।

✍️ चिराग़ जैन

शुभचिंतक

एक राजा के दो बेटे थे। एक नाटे कद का था और दूसरा लंबे कद का। बचपन से ही दोनों में तनाव रहता था। जब वे बड़े हुए तो राजा ने राज्य का बंटवारा कर दिया और पूरे देश के अधिकतम नाटे नागरिक नाटे बेटे के देश में चले गए। मूल राज्य में लंबे नागरिक रह गए। लेकिन कुछ नाटे लोग अपना देश छोड़कर नाटे देश में नहीं गए और लंबे राजा के शासन में रहने लगे।
लंबे राजा ने अपने राज्य में बचे सभी नाटे लोगों को माली, तांगा, मजदूरी, दर्जी, हजामत और अन्य छोटे कामों में लगाए रखा। वे सोचने-समझने का विवेक न हासिल कर लें इसलिए नगर में जगह जगह उनके लिए नाटे बाबा के नाम पर समुदाय केंद्र बना दिये जहां हर ढाई पहर बाद पूरे नाटे समुदाय को इकट्ठा होना अनिवार्य कर दिया। अपने लोगों से उनके बीच यह बात और फैला दी कि वो जितने ज़्यादा बच्चे पैदा करेंगे उतना ही उनका भला होगा। उन्हें यह भी बता दिया कि उनकी किसी भी परम्परा में यदि बदलाव किया गया तो यह उनकी सामुदायिक भावनाओं का अपमान होगा।
अब लंबे लोग व्यापार करते रहे और नाटे लोग उनके यहां नौकरी करते रहे और बदबूदार परंपराओं को निबाहते हुए जनसंख्या बढाने में लगे रहे। विकासहीन रूढ़ियों में बंधी यह जनसंख्या अपने संकरे मुहल्लों में सीमित रहकर बीमारियों और अशिक्षा का शिकार बनी रही।
कुछ समय बाद लंबे समुदाय के कुछ लोग नाटे लोगों की इस दशा से द्रवित हुए और उन्होंने स्वयं को लंबे समुदाय का शुभचिंतक घोषित करके राज्य की सत्ता हथिया ली। सत्ता हाथ में आते ही उन नए राजाओं ने सबसे पहले नाटे समुदाय में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करना शुरू किया। उनके समुदाय केंद्र ध्वस्त करने शुरू कर दिए। और अपने लोगों से लंबे समुदाय में यह बात फैला दी कि लंबे लोगों को भी हर ढाई पहर बाद लंबे बाबा के समुदाय केन्द्र पर इकट्ठा होना चाहिए और ज्यादा बच्चे पैदा करने चाहियें।
अब अपने ऊपर अचानक आए संकट से नाटे लोगों का समुदाय जागरुकता की ओर बढ़ने लगा है और शिक्षा, सभ्यता तथा विकास के पथ पर अग्रसर लंबू समुदाय काम-धंधा, रोज़गार, कला, हास्य और उत्सव भुलाकर कट्टरता, घृणा, प्रतिहिंसा, नारेबाजी और उपद्रवों में रुचि लेने लगा है।
सत्ता में बैठे लोग मन ही मन खुश हैं कि उन्होंने नाटे लोगों के विकास की बाड़ गिरा भी दी और लंबे समुदाय वाले उन्हें अपना शुभचिन्तक भी मान रहे हैं।

✍️ चिराग़ जैन

बाड़ और अराजकता

कोई मनुष्य अपने भीतर चल रहे प्रत्येक भाव को अभिव्यक्त कर दे, तो समाज उसे तत्काल ‘पागल’ घोषित कर देगा। इच्छाएँ उस मदमस्त गजराज की तरह होती हैं कि उन पर लोकभय का अंकुश न लगाया जाए तो वे पूरा वनप्रदेश तहस-नहस कर सकती हैं। आजकल कुछ लोग अपने मन के भीतर की इन समस्त उत्कंठाओं को अभिव्यक्त करने को आधुनिकता कहते हैं, जबकि अध्यात्म इन इच्छाओं को नियंत्रित करके शांत करने को संन्यास कहता है। यहाँ यह ध्यातव्य है कि ‘संन्यास’ इच्छाओं को नियंत्रित करने का मार्ग है और ‘मोक्ष’ इच्छाओं से पार पा जाने का बिंदु है, लेकिन इसके बावजूद इच्छाओं से उलझकर जीवन को सुलझाने की उत्कंठा रखनेवाले व्यक्ति के लिए नगर नहीं, वन उपयुक्त बताया गया है।
नगर में रहना है तो नगर के नियमों का पालन करना ही होगा, अन्यथा समाज में अराजकता फैल जाएगी। समाज को अराजकता से बचाने के लिए ही समाज को नियमों की बाड़ से बांधा जाता है। यह बाड़ समाज का विकास अवरुद्ध करने के लिए नहीं, अपितु समाज को सुंदर, सुव्यवस्थित तथा सुगढ़ बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
यह बहुत संभव है कि इस बाड़ की कोई कड़ी समाज के सुख को अवरुद्ध करके उसे चोटिल करने लगे तो उसे हटाकर उसका समाधान करने की व्यवस्था भी बाड़ बनानेवाले करते ही हैं। इसीलिए दुनिया के प्रत्येक संविधान में नियमों के बदलाव संबंधी नियम भी सम्मिलित होते हैं। एक सभ्य समाज इन्हीं नियमों का पालन करते हुए किसी सामाजिक नियम के परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करता है।
बाड़ की कोई डंडी आपको चुभी और आपने अपने समर्थकों की फौज जुटाकर पूरी बाड़ को ही ध्वस्त कर डाला तो आपने अपने नगर में जंगल बोने से अधिक कुछ नहीं किया।
कई बार राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण बाड़ की डंडियों का प्रयोग समाज की प्रताड़ना हेतु होने लगता है। ऐसे में पूरा समाज धीरे-धीरे संगठित होकर पुरानी बाड़ को उखाड़ फेंकता है और नई खपच्चियाँ लगाकर थोड़ी खुली बाड़ लगाने लगता है। बाद में इस नयी बाड़ के खुलेपन में जब गन्दगी सड़ने लगती है तो फिर उस बाड़ को काट-छाँटकर टाइट कर दिया जाता है और समाज व्यवस्थित रूप से मर्यादित हो जाता है।
कमोबेश, यही समाज के संचालन की सामान्य प्रक्रिया है। किंतु सोशल मीडिया के दौर में जब प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में अपना मनोभाव अभिव्यक्त करने का साधन आ गया है, ऐसे में ‘केवल ध्यानाकर्षण के उद्देश्य से’ कुछ लोग न केवल असंयत भावनाओं को ढिठाई से अभिव्यक्त करने लगे हैं बल्कि यह भी मान बैठे हैं कि उनसे बाड़ में वे जिस एक संटी को बदलना चाह रहे हैं, उसी से पूरी बाड़ का चरित्र बदलने की क्रांति हो जाएगी। जिसका जो मन होता है, वह बाड़ पर लिख जाता है। जो चाहे, जिस मर्ज़ी लकड़ी को कोसने लगता है। कोई इन खपच्चियों को आपस में रगड़कर आग लगाने पर उतारू है, तो कोई इन्हें अलग-अलग रंगों में रंगकर रंगदारी वसूलने में लगा है। कोई इन डंडियों को हथियार बना लेना चाहता है तो कोई इन डंडियों पर पाँव रखकर अपना क़द ऊँचा करने में व्यस्त है।
सोशल मीडिया के कारण पूरा समाज इस बाड़ पर अपनी-अपनी क्षमतानुसार प्रहार कर रहा है, किन्तु यह प्रहार किसी आवश्यक क्रांति के लिए लोकतांत्रिक प्रयास न होकर कुछ लाइक्स, कुछ कमेंट और कुछ व्यक्तिगत लाभ बटोरने का उद्देश्य से किये जा रहे कुत्सित आघात हैं। इनके परिणामस्वरूप मर्यादा की बाड़ जगह-जगह से जर्जर हो गयी है। और यदि सोशल मीडिया पर बौराए फिर रहे उन्मादियों के इन आघातों को नहीं रोका गया तो इस बाड़ के उस पार खड़ा जंगल, सूनामी के वेग से समाज में घुस आएगा और उस वेग में सबसे पहले वे लोग ध्वंस होंगे जो अनवरत इस सामाजिक बाड़ को जर्जर कर रहे हैं।
…और तब, अराजकता बो रहे इन मूढ़ों के अस्तित्व की लाश पर सैड वाली इमोजी भी पोस्ट करने कोई नहीं आएगा, क्योंकि इनकी पोस्ट लाइक करने वाला समाज तब अराजकता की सुनामी से जूझ रहा होगा।

© चिराग़ जैन

अश्लीलता के मआनी

अधिकारों की ओट में छिपकर उच्छृंखल हो जाना भी उतना ही अश्लील है, जितना संस्कृति की ओट में छिपकर शालीन बनने का ‘दिखावा’ करना। नैतिकता की परिभाषा, काल-पात्र-स्थान के अनुरूप बदल जाती है। शालीनता केवल यौन आचरण तक ही सीमित नहीं है। समय तथा परिस्थिति के अनुरूप आचरण न करते हुए किया गया कोई भी आचरण अश्लील कहलाता है।
लहंगे, जेवर और फूलों से सजी-धजी स्त्री सबको स्वीकार है; किंतु यही स्त्री यदि किसी मातम में ऐसे साज-सिंगार के साथ उपस्थित हो तो असभ्य कही जाएगी। चिड़चिड़ा व्यक्ति कोई यौन दुराचार न भी कर रहा हो तो भी अपने उत्सव-टेलों में उसकी अकारण चढ़ी त्योरियाँ बर्दाश्त नहीं की जा सकेंगी।
कोई बहुत मिलनसार तथा हेल्पफुल मनुष्य भी यदि किसी की सहमति के बिना उसकी देह को स्पर्श करें तो उसे अश्लील कहा जाएगा। उस समय उसके अन्य व्यवहार के कारण उसकी इस अश्लीलता को अनदेखा नहीं किया जा सकेगा। किन्तु चिकित्सक, दर्जी, जिम ट्रेनर या कभी-कभी कोई सहकर्मी भी अनजाने में अथवा विवशता में आपसे स्पर्श हो जावे और आप उसे यौन-शोषण कहकर हंगामा कर दें, तो यह बर्बरता है। आपके बॉस ने आपकी बात नहीं मानी और आपने उसको सेक्सुअल हरासमेंट के पचड़े में घसीट लिया… यह दुराचार है।
हमने दुराचार और अश्लीलता की परिभाषा को सीमित करके बड़ा अपराध किया है। कोकशास्त्र, कामसूत्र तथा खजुराहो के आधार पर जिस समाज की प्रशंसा की जाती है, वहाँ किसी यौन समस्या पर उठे विमर्श को किसी स्त्री के चरित्र का मापदण्ड बना देना भी अश्लीलता है।
हर विमर्श में व्हिसल ब्लोअर ही सही नहीं होता। किन्तु जिसने विमर्श उठाया है, उसकी चरित्र हत्या करनेवाले न तो विमर्श के हित में हैं, न ही समाज के हित में। और तो और, ऐसे लोग जो इस प्रकार का विमर्श उठानेवाली स्त्री को चरित्रहीन कहकर उसकी निजता में प्रवेश कर रहे हैं, ये लोग सभ्यता की ओट में छिपकर अपनी यौन कुंठाओं को तुष्ट करने के लिए प्रयासरत असभ्य बर्बर हैं।
उस समस्या के पक्ष में और विपक्ष में अपना मत सबको देना चाहिए किन्तु ‘आइये हमसे ले लीजिए चरम सुख’; ‘यार बहुत सुंदर है इसको तो मैं ही संतृष्ट कर दूंगा’; ‘बहुत गर्म है यार, इसे मैं ही ठण्डा कर सकूंगा’ -जैसी टिप्पणियाँ करनेवाले अश्लील यौनकुंठितों की मानसिकता इस समाज के लिए किसी भी अश्लीलता से अधिक भयावह है।
सोशल मीडिया पर उपलब्ध स्त्रियों से पूछो तो आपको पता चलेगा कि उनके इनबॉक्स में ऐसे कितने ही संस्कृति और सभ्यता के ठेकेदारों की अश्लील कुंठाएँ नंगा नाच करती हैं।
मैं उन स्त्रियों का कतई पक्षधर नहीं हूँ जो आज़ादी के नाम पर नंगेपन की सीमा तक सड़क पर घूमने की हिमायत करती हैं। शौच तथा संभोग हमारे जीवन का हिस्सा ही नहीं अपितु सृष्टि के संचालन हेतु आवश्यक भी हैं, किन्तु इन क्रियाओं को यदि हम भरे बाज़ार में सड़क पर करने लगें तो हम दोपायों की काया में चौपायों का आचरण कर रहे होंगे।
प्रेम अनुभूति का विषय है जिसकी दैहिक अभिव्यक्ति नितांत निजी होती है। उसे सार्वजनिक करके फेसबुक पर लाइक्स बटोरने की कुत्सित चेष्टा का मैं समर्थक नहीं हूँ। अपनी प्री-वेडिंग शूट पर निर्वसन हो जाने की आधुनिकता मुझे समझ नहीं आती किन्तु ऐसा कर रही लड़की को भी सर्वभोग्या अथवा वेश्या करार देकर, उसके विषय में घृणित बातें लिखने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता।
हमें कम से कम इतना विवेक तो जागृत करना ही होगा कि हम किसी प्रश्न का उत्तर देते समय अपनी भाषा तथा शालीनता का उत्तरदायित्व निभा सकें। किसी की गाली का उत्तर गलौज से देने वाला व्यक्ति भी गाली देनेवाले से कम अशिष्ट नहीं है।
हर यौनाचार अश्लीलता नहीं होता और हर अश्लीलता यौनाचार नहीं होती। किन्तु सोशल मीडिया के युग में किसी महिला द्वारा किसी यौन-समस्या पर चर्चा करने भर से पूरे समाज की जो नंगी आवाज़ें कमेंट्स और ट्रोल-प्लेटफार्म्स पर गूंज रही हैं उनसे यह अवश्य कहा जा सकता है कि हम मुँह में घास के तिनके दबाए बैठे रंगे सियारों को देवदूत मान बैठे हैं, जो ज़रा सी हुआँ-हुआँ सुनते ही भूल जाते हैं कि वे देवदूत बनकर भाषण झाड़ने निकले थे।

✍️ चिराग़ जैन

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