Blank Verse, Chirag Jain Writings, Mann To Gomukh Hai, Poetry
एक दिन
पीपल के पत्तों को
हवा ने बरगलाया!
फिर शरारत से भरे लहजे में
उनका गात छूकर
कान में यूँ फुसफुसाया-
“तुमको अंदाज़ा नहीं
क्या रूप है तुमको मिला
इस नाकारा पेड़ की
शोभा के तुम आधार
तुम जो चाहो तो हवाएँ ले चलें तुमको
दूर परियों के सुनहरे देस
अम्बर पार!
ये ख़नकती देह धर कर भी
भला क्योंकर
ढो रहे हो बोझ तुम इस ठूठ का बेकार
वृक्ष की तो ज़िन्दगी है
जड़, अचल, लाचार
तुम भला क्यों झेलते हो
ये नियति की मार?
बादलों की पालकी पर बैठकर हम-तुम
छोर नापेंगे धरा के
और गगन के आज
मैं बहूंगी
हाथ मेरा थाम लेना तुम
फिर करेंगे हम जहाँ के हर चमन पर राज।”
कुछ ने सुनकर अनसुनी कर दी
हवा की बात
और कुछ कमज़र्फ़
बह निकले हवा के साथ।
पर बढ़े वे थामने को जब हवा का हाथ
सब हवाई बात निकली कुछ न आया हाथ।
छू तलक पाए नहीं पत्ते
हवा का छोर
और हवा हौले से बह निकली
गगन की ओर।
आ गिरे धरती पे
जो थे फुनगियों के ताज
सरगमों पर छा गई
इक कर्कशी आवाज़।
क्या इसी को बोलते हैं सब ‘समय का फेर’
जो ख़नकते थे, वो हैं अब एक सूखा ढेर
स्वप्न वो देखें गगन के और परिस्तां के
जो न हो पाए सगे अपने गुलिस्तां के
मूल से छूटें तो जीवन को तरसते हैं
और जुड़ कर पेड़ से पत्ते खनकते हैं
अब कोई झोंका हवा का
जब कभी भी छेड़ जाता है
तड़पते हैं सूखे पत्ते
और पीपल खिलखिलाता है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
हमने सूरज को यहाँ डूब के मरते देखा
और जुगनू से अंधेरों को सँवरते देखा
तूने जिस बात पे मुस्कान के पर्दे डाले
हमने उसको तेरी आँखों में उतरते देखा
एक लमहे में तेरे साथ कई रुत गुज़रीं
तेरे जाने पे मगर वक़्त ठहरते देखा
लोग कहते हैं बस इक शख़्स मरा है लेकिन
क्या किसी ने वहाँ सपनों को बिखरते देखा
तेरे विश्वास में कोई कमी रही है ‘चिराग़’
वरना पुरखों ने तो पत्थर को भी तरते देखा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
आप संग गुज़रे लम्हे, पीड़ा अजानी हो गये
प्यार के रंगीन पल, क़िस्से-कहानी हो गये
हर किसी के ख़्वाब जब से आसमानी हो गये
पाप के और पुण्य के तब्दील मआनी हो गये
एक दीवाने से झोंके ने उन्हें छू भर लिया
और उनकी चूनरी के रंग धानी हो गये
सर्द था मौसम तो बहती धार भी जम-सी गयी
धूप पड़ते ही मरासिम पानी-पानी हो गये
वक़्त की हल्की-सी करवट का तमाशा देखिये
ये सड़क के लोग कितनी खानदानी हो गये
मुफ़लिसी में जिनकी बातें गालियाँ बनकर चुभीं
दौलतें बरसीं तो उनके और मआनी हो गये
आपसे मिलकर हमारे दिन हुए गुलदाउदी
आपको छूकर तसब्बुर रातरानी हो गये
जब उचककर आपने तोड़ी निम्बोली; उस घड़ी
नीम के पत्ते भी सारे ज़ाफ़रानी हो गये
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry, Unpublished
परेशानियों में यदि उलझा हो अंतस् तो
कैसा लगता है ये वसंत मत पूछिये
एक-एक दिन एक युग लगता है; और
कैसे होता है युगों का अंत मत पूछिये
प्रेमगीत शोर लगते हैं और लिपियों के
चुभते हैं कितने हलन्त मत पूछिये
जल विच कमल सरीख़ा लगता है मन
काहे बनता है कोई सन्त मत पूछिये
धरती के रोम-रोम से सुगन्ध उठती है
कैसे झूमता है ये वसन्त मत पूछिये
मकरंद ओढ़ कैसे सजता-सँवरता है
जगती का आदि और अंत मत पूछिये
लेखनी में रस घुलता है और घुंघरू से
बजते हैं लिपि के हलन्त मत पूछिये
चंदनी पवित्रता का भोग करते हैं; सारी
दुनिया के सन्त औ महन्त मत पूछिये
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
सूरज जैसा जल के देख
सोच में मेरी ढल के देख
मुझसे तेज़ निकल के देख
अपनी सोच बदल के देख
हाला तेरे अंतस् की
यहाँ-वहाँ न छलके देख
अगुआई क्या होती है
मेरे आगे चल के देख
फिर से तेरी बात चली
फिर से आँसू ढलके देख
राम लिखा और तैर गए
पत्थर होकर हल्के देख
पायल मौन चली आई
होंठ खुले साँकल के देख
याद, मुहब्बत, ख़्वाब, ख़याल
कितने रूप ख़लल के देख
शब्द बदलना छोड़ ‘चिराग़’
अब तू अर्थ बदल के देख
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
कजरी, गारी, फाग, जोगीरे भूल गए
बंसी, तबले, ढोल, मंझीरे भूल गए
इतनी तेज़ी से दुनिया की ओर बढ़े
अपने घर को धीरे-धीरे भूल गए
✍️ चिराग़ जैन