Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
न जहाँ में तेरा जवाब है, न नज़र में तेरी मिसाल है
तेरी दोस्ती भी क़माल थी, तेरी दुश्मनी भी क़माल है
क्या हसीन खेल है ज़िन्दगी, कभी ग़मज़दा, कभी ख़ुशनुमा
कभी एक उम्र का ग़म नहीं, कभी एक पल का मलाल है
मेरी सोच बदली तो साथ ही, मेरी ज़िन्दगी भी बदल गई
कभी मुझको उसका ख़याल था, कभी उसको मेरा ख़याल है
ज़रा ये बता दे कहाँ गईं, तेरी दोस्ती, तिरी उल्फ़तें
मुझे अपने ग़म से गरज़ नहीं, तेरी रहमतों का सवाल है
तेरी राह मुझसे बदल गई, कि ये वक़्त थोड़ा बदल गया
तब दूर जाना मुहाल था, अब साथ रहना मुहाल है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
नये घटनाक्रम की पोटली
समय के कंधे पर लटकाये
एक और नया साल
आ खड़ा हुआ है
जीवन की पगडंडी पर।
बिछाते हुए शुभकामनाओं के फूल
इस बार भी स्वागत करेंगे
सभी लोग
इस अजनबी का
अपने-अपने घर में।
खोल-खोलकर
पोटली में बन्द घटनाओं को
शुभ-अशुभ
अच्छे-बुरे
सुख-दुःख
तथा ऐच्छिक-अनैच्छिक का
अनजना ख़ज़ाना बिखेरता हुआ
समय के घोडों की लगाम
एक नये सारथी को थमाकर
यह वर्ष भी बस जायेगा
यादों के विराट भवन में
आओ! प्रार्थना करें
कि इस बार रीती हो
इस मुसाफ़िर की पोटली
दुर्भाग्य से
ताकि नम न हों
अगले वर्ष के स्वागत में बिछी आँखें।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Muktak, Poetry
पलक गिरते ही पल में खेल सारे देख लेता हूँ
मैं इनसे आँख को ढँक कर सितारे देख लेता हूँ
मेरी ये बन्द पलकें दूरबीनों से कहाँ कम हैं
मैं इनमें ज़िन्दगी भर के नज़ारे देख लेता हूँ
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
क्रूर काल ने गुरुग्राम की एक दम्पत्ति की गोद सूनी कर दी और अस्पताल ने उनकी जेब काट ली। इस देश में कुछ बुनियादी आवश्यकताएं जनता की लूट का माध्यम बन गई हैं। चिकित्सा में सरकारी तंत्र की नाकामी का लाभ अस्पताल उठाते हैं और कई कई दिन तक शव को वेंटिलेटर पर रख कर बिल बढ़ाते पाए जाते हैं। बीमारी से परेशान रोगी और किसी अपने से बिछड़ जाने के शोक से ग्रस्त परिजन कसाई की तरह निष्ठुर बने अस्पताल प्रशासन के हाथों लुटने को विवश हैं।
यदि चिकित्सा एक सेवाकार्य है तो यह कहाँ तक उचित है कि एक सेवक मानवीय संवेदनाओं को धता बता कर लाश तक सौंपने से पूर्व मोलभाव पर उतर आए? और यदि यह व्यवसाय है तो फिर कोई व्यापारी जिस काम को करने की कीमत ले रहा है, जब वह काम ही न हुआ तो ग्राहक से उसकी कीमत कैसे मांग सकता है। एक डॉक्टर किसी मरीज का डेंगू का इलाज कर रहा है और इस इलाज के एवज में दस लाख का मूल्य मांगता है यदि वह मरीज इलाज के दौरान मर जाए तो इसका अर्थ है कि डॉक्टर इलाज नहीं कर पाया और यदि इलाज नहीं कर पाया तो ग्राहक से पैसे लेने का उसका अधिकार समाप्त हो जाना चाहिए।
पूरा विश्व मानव जीवन की बेहतरी के लिए चिकित्सा जगत पर निर्भर है, विश्व भर में अलग अलग पद्धतियों के शोधकर्ता जटिल रोगों के निदान खोजने में जीवन होम कर रहे हैं। लेकिन इन शोधकार्यों से निकल कर नुस्खे का अमृत कलश पेटेंट के अंधकूप में समा जाता है फिर उस संजीवनी को महंगे दामों पर कोई व्यवसायी ख़रीद लेता है और मूर्छित लक्ष्मण के परिजनों से मुंहमांगी रकम वसूलता है।
व्यवसाय बन चुके चिकित्सा के पेशे में स्वास्थ्य और इलाज वरीयता नहीं रह गए हैं। फाइव स्टार में तब्दील हो चुकी वैद्यशालाएँ अब लाचार परिवारों से पैसा लूटने की जुगत में व्यस्त हैं। दवाई कम्पनियों से मिलने वाली कमीशन के आधार पर डॉक्टर्स की प्रिस्क्रिप्शन निर्धारित होने लगी है। महंगे महंगे टेस्ट (वो भी डॉक्टर साहब द्वारा सुझाई गई लैब से) करवाने में ही डॉक्टर साहब की सबसे ज़्यादा रुचि होती है।
सरकारी अस्पतालों में नम्बर नहीं आता और निजी अस्पताल आपका नम्बर लगा देते हैं। सरकारी अस्पतालों में बदतमीज़ी और बेहूदगी की ज़िल्लत झेलनी पड़ती है तो निजी अस्पताल में सीने पर स्टेथोस्कोप रखकर लूटा जाता है। सरकारी अस्पताल में इलाज के अभाव में मरीज़ मर जाता है तो निजी अस्पताल में इतना इलाज मिलता है कि उसका मोल चुकाने में मरीज़ और उसके परिजन सब मर जाते हैं।
अस्पताल में कोई मरीज़ इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हो पाता कि उसे जो मिल रहा है वह इलाज ही है या उसे कुछ दिन तक अस्पताल में टिकाए रखने का नुस्खा दिया जा रहा है।
अस्पताल प्रशासन ने डॉक्टर्स की नौकरी को बंदी बना रखा है कि यदि अमुक राशि हर महीने अस्पताल के खजाने में नहीं जमा करवाई तो आपकी नौकरी चली जाएगी। अपनी नौकरी की इज़्ज़त बचाने के लिए बेचारा डॉक्टर मरीज़ को एटीएम समझ कर उसमें दहशत का कार्ड डालता है और पैसे निकाल कर अस्पताल को फिरौती देता रहता है।
सरकार को यूरोप की तर्ज़ पर टैक्स लेने की सुध आ गई है लेकिन सरकार को यह याद नहीं आया कि ज़्यादा कर चुकाने वाले यूरोपवासियों को चिकित्सा पर एक भी पैसा ख़र्च नहीं करना पड़ता। वृद्धों के लिए हर सप्ताह डॉक्टर घर आता है और बच्चों के लिए हर महीने। दवाई से लेकर इलाज तक सब कुछ सरकार मुहैया करवाती है।
राजनीति की रोटियाँ सेंकने के लिए सरकारें बेशक देश को विकास के पोस्टरों से पाट दें लेकिन उससे पहले कृपया सही और पूर्ण इलाज के वरदान की सुविधा मुहैया करवा दें।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
सिर्फ़ मतलब के लिए हर चाल चलना पाप है
हर दफ़ा दर देखकर मजहब बदलना पाप है
शाइरी, दीवानगी, नेकी, इबादत, मयक़शी
और राहे-इश्क़ में गिर कर संभलना पाप है
काश बच्चों की तरह हालात भी ये जान लें
ख़्वाहिशों की तितलियों के पर मसलना पाप है
दौर इक ऐसा भी था, जब झूठ कहना मौत था
और अब ये हाल, सच की राह चलना पाप है
किस डरौने दौर में हम जी रहे हैं या ख़ुदा
घर में रहना ऐब है, घर से निकलना पाप है
पाप का दिल से निकल हरक़त में आना ज़ुर्म है
ज़ुर्म का भीतर ही भीतर दिल में पलना पाप है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
इन नासमझों का होगा नहीं रे कल्याण
रामधरा पर मांग रहे हैं रामलला के प्रमाण
श्रीराम बसे हैं आंगन में, पावन तुलसी की क्यारी में
श्री राम बसे हैं घर-घर में, आपस की दुनियादारी में
श्रीराम हमारी आँखों में, श्रीराम हमारे सपनों में
श्रीराम हैं सारे संबंधों में, सब रिश्तों में, अपनों में
बोलो कण-कण व्यापी का, कैसे करोगे परिमाण
मांगो प्रमाण रामायण के, इस भारत भू के कण-कण से
सरयू की निर्मल धारा से, और अवधपुरी के आंगन से
पूरब के उस मिथिलांचल से, पश्चिम के उस दंडक वन से
उत्तर के बृहत् हिमालय से, दक्षिण के उस भीषण रण से
देगा गवाही तुम्हें, सागर का थोथा अभिमान
ढूंढो शबरी के बेरों में, जंगल की दुर्गम राहों में
तिनकों की पावन कुटिया में, महलों की सिक्त निगाहों में
कब राम हुए थे ये पूछो, जंगल के हर इक वानर से
जिसने रावण को टक्कर दी, उस पंछी के टूटे पर से
भ्राता भरत से पूछो, पूजे थे जिसने पदत्राण
रामायण इस भारत भू के गौरव की अमर कहानी है
ये कथा हमारे पुरखों के पौरुष की एक निशानी है
रामायण केवल ग्रंथ नहीं, संस्कृति का ताना-बाना है
इस रामायण को झुठलाना, इस संस्कृति को झुठलाना है
इसमें बसा है अपने भारत का स्वर्णिम स्वाभिमान
जिनको पढ़ कर जीना सीखा, उनको मिथ्या बतलाते हैं
ये रावण के गोरे वंशज, राघव पर प्रश्न उठाते हैं
ये मैकाले के दूत भला तुलसी को क्योंकर मानेंगे
जो ख़ुद को जान नहीं पाए, रघुपति को क्या पहचानेंगे
आंखों पे पट्टी बांधे, करने चले हैं पहचान
✍️ चिराग़ जैन