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कोशिश

मैं ‘मन’ लिखने की
कोशिश करता हूँ
….सिर्फ़ कोशिश।

कभी इसका मन
कभी उसका मन
कभी सबका मन
…और कभी-कभी
अपना भी मन।

इतना ही समझ आता है मुझे
कि ‘कोशिश’
और ‘कामयाबी’
उर्दू ज़ूबान के
दो अलग-अलग अलफ़ाज़ हैं!
✍️ चिराग़ जैन

अनदेखी

देर तक देखता रहा मैं
एक बिन्दु को
आशा भरी नज़रों से
लगातार।

उतनी ही देर तक
तकती रहीं
दो आँखें
छलछलाती हुईं
मुझे भी!

✍️ चिराग़ जैन

इलेक्शन

होता तो यही है जी हर बार इलेक्शन में
पब्लिक को मनाती है, सरकार इलेक्शन में

जनता का ही पैसा है, जनता पे ही शासन है
जनता का ही होता है, व्यापार इलेक्शन में

कुछ झंडे उठाकर के, कुछ बिल्ले लगाकर के
बिन बात ही करते हैं, बेगार इलेक्शन में

कुछ रंगे सियारों ने, कुछ नंगे गरीबों के
बच्चों को लिया कैसे पुचकार इलेक्शन में

लीडर के कदम चूमें, ये लीपी हुई सड़कें
इनका तो हुआ ही है, उद्धार इलेक्शन में

हर दिल है महज दलदल, दिल्ली के दलालों की
कूदे तो भला कैसे, ख़ुद्दार इलेक्शन में

✍️ चिराग़ जैन

महत्व

तुमसे मिलना…
…जैसे
हाई-वे पर दौड़ती गाड़ी
दो पल को ठहरे
किसी पैट्रोल पम्प पर।

…जैसे
परवाज़ की ओर
बढ़ता परिंदा
यकायक उतर आए
धरती पर
पानी की चाह में।

…जैसे
बहुत लंबी
मरुथली यात्रा के दौरान
हरे पेड़ की छाँव!
✍️ चिराग़ जैन

रिस्क

मेरे भीतर
दौड़ना चाहती है
इक नदी
दरदरे रेगिस्तान की ओर।

मस्तिष्क ने कहा-
“रिस्क है इसमें।”

मन बोला-
“जुआ ही तो है
या तो लहलहा उठेगा
रेगिस्तान
या दरदरा जाएगी
नदी!”

संकल्प

मैं ये दावा नहीं करता कि दुनिया को बदल दूंगा
मगर जो रास्ता सच का हो, उस रस्ते पे चल दूंगा
मेरा अधिकार है चिंतन पे, संकल्पों पे, कर्मों पे
मैं ये संकल्प लेता हूँ कि सत्कर्मों पे बल दूंगा

© चिराग़ जैन

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