Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
इश्क़ को बेदर्दियों का ख़ौफ़ है
ताज़रों को फ़र्दियों का ख़ौफ़ है
जानवर इन्सान का दुश्मन कहाँ
आदमी को वर्दियों का ख़ौफ़ है
ओस, कोहरा, बर्फ़ और ठण्डी हवा
बेघरों को सर्दियों का ख़ौफ़ है
ज़ख़्म को मरहम न मिल जाए कहीं
ज़ुल्म को हमदर्दियों का ख़ौफ़ है
मन के जज़्बातों को दुनिया में ‘चिराग़’
तन की गुण्डागर्दियों का ख़ौफ़ है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सत्य का पथ हमें क्यों जटिल सा लगा
उम्र को झूठ में ढाल कर चल दिए
सादगी की सुहानी डगर छोड़ कर
ज़िन्दगानी फटेहाल कर चल दिए
जो रवैया हमें पीर देता रहा
क्यों उसी के लिए हम पुरस्कृत हुए
ज़िन्दगी पर चढ़े पाप के आवरण
पाठ जितने पढ़े सब तिरस्कृत हुए
प्रश्न तो आत्मा ने उठाए मगर
हम उन्हें बिन सुने टालकर चल दिए
हर घड़ी भावनाएँ खरोंची गईं
हर क़दम दंभ की जीत होती रही
राजसी स्वप्न पलकें सजाए रहे
सत्व की रौशनी मौन सोती रही
लोभ की राह पर पीर रोती मिली
हम उसे और बदहाल कर चल दिए
हम ख़ुशी ही कमाने चले थे मगर
हम ख़ुशी ही गँवाते रहे उम्र भर
कौन जाने कि किस चैन के वास्ते
चैन अपना गँवाते रहे उम्र भर
उम्र भर आँकड़े ही जुटाते रहे
प्यार की जेब कंगाल कर चल दिए
भागते-दौड़ते रास्तों पर अगर
दर्द लाचार तनहा तड़पता मिला
पूस की रात में कोई बेघर दिखा
जेठ में प्यास से कोई मरता मिला
एक पल के लिए मन द्रवित तो हुआ
भावना पर क़फ़न डालकर चल दिए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Hasya Kavita, Poetry
हर आदमी के जीवन में
तीन तरह के लोग होते हैं
एक जानने वाले
एक पहचानने वाले
एक बुरा मानने वाले
जानने वाले लोग
जीवन को बहाव देते हैं
पहचानने वाले गाहे-बगाहे भाव देते हैं
और बुरा मानने वाले
हमेशा तनाव देते हैं।
जानने वाले लोग
ज़िन्दगी की डोर होते हैं
पहचानने वाले बेमतलब का शोर होते हैं
और बुरा मानने वाले
न डोर होते हैं, न शोर होते हैं
ये साले कुछ और होते हैं।
बुरा मानने वाले लोग
पतझड़ में मिलते हैं
बहारों में मिलते हैं
दुश्मनों में मिलते हैं
यारों में मिलते हैं
पड़ोसियों में मिलते हैं
रिश्तेदारों में मिलते हैं।
शास्त्रीय भाषा में कहा जाए
तो जहाँ-जहाँ तक
जीवन के निशान हैं
ये बुरा मानने वाले
वहाँ-वहाँ तक विद्यमान हैं।
ये अपनी-अपनी हाँकते हैं
और सामने वाले को
कुछ नहीं कहने देते हैं।
ये न तो कभी ख़ुद ख़ुश रहते
और न किसी को रहने देते हैं।
इस प्रजाति के लोग
जब घर से निकलते हैं
तो इनका एक ही लक्ष्य होता है
और ये लक्ष्य जीवन भर अक्षय होता है
कि किसी नए आदमी से बैर ठानना है
आज फिर किसी बात का बुरा मानना है
इस लक्ष्य को साधने
ये सारा दिन भटकते हैं
गाड़ियों में चलते हैं, बसों में लटकते हैं
तरह-तरह से लोगों से अटकते हैं
दुनिया भर में अपनी राय भिड़ाते हैं
सबकी फटी में टांग अड़ाते हैं
सबकी समस्याएँ अपने ऊपर ओटते हैं
और फाइनली
किसी न किसी बात का
बुरा मान कर ही घर लौटते हैं
डिस्कवरी चैनल वाले
जब इन पर प्रोग्राम बनाएंगे
तो इनके बारे में कुछ यूँ बताएंगे
बुरा मानने वाले ये जीव
पृथ्वी के हर कोने मेें पाए जाते हैं
सामान्यतया
बुरा मानने का तत्व
मादा में नर से अधिक होता है
इन तस्वीरों में जो व्यक्ति
अपनी आँखों के ऊपर की भौंहें ताने हुए है
वह वास्तव में कैमरे से बुरा माने हुए है
इस जाति के एक किंग
नाम था उखड़सिंह
किसी के घर खाने पर गए
ऐसे ही नहीं गए
बाक़ायदा उसके बुलाने पर गए
बुलाने वाले ने ख़ूब दिया आदर सत्कार
सेवा-सुश्रुसा, अपनत्व और प्यार
हाथ जोड़कर विनम्रता का मनोयोग
स्वादिष्ट पकवान, पूरे छप्पन भोग
भेंट देकर स्वागत किया था
उपहार देकर विदा किया
घर पहुँचते पहुँचते
उखड़सिंह जी इस बात पर नाराज़ हो गए
कि अगले ने नाराज़ होने का मौका ही नहीं दिया
बुरा मानने वाली प्रजातियों के
अलग अलग रीति-रिवाज़ होते हैं
न तो ये व्यक्ति की परवाह करते हैं
न ही अवसर के मोहताज होते हैं
चाहे ये किसी को जानते हैं
चाहे नहीं जानते हैं
सबसे समभाव रखते हैं
मतलब, बराबर बुरा मानते हैं
ये अलौकिक लोग न चोर होते हैं
न मवाली होते हैं
न संत होते हैं, न आली होते हैं
ये लोग दरअस्ल बेहद ठाली होते हैं
परेशान रहना इनकी लाइफ का फंडा होता है
कड़वा बोलना इनका परमानेंट एजेंडा होता है
कोई इन्हें ख़ुश करने की कितनी भी कोशिश कर ले
लेकिन इनका रिस्पांस बेहद ठंडा होता है
ये गले में भौंकड़ा पूरते हुए पैदा होते हैं
माथे में त्यौरियां डाले जीते हैं
और अपने जीवन में
पानी से ज़्यादा
ख़ून का घूंट पीते हैं।
मुस्कुराहट इनके पास आने से नाटती है
हंसी इन्हें काटती है
ठहाकों से ये डरते हैं
और ज़िन्दगी से इतना बुरा माने हुए हैं
कि लगभग रोज़ मरते हैं
बुरा मानना है तो ऐसे मानो
जैसे गांधी जी ने माना था
अंग्रेजों के अत्याचार का
जैसे शांतिदूत कृष्ण ने माना था
दुर्योधन के दुर्व्यवहार का
जैसे सीता ने माना था
रावण की मनमानी का
जैसे प्रह्लाद ने माना था
हिरण्यकश्यप जैसे अभिमानी का
ऐसा बुरा मत मानो
कि निरपराध अहिल्या का जीवन
पत्थर सा शाप बन जाए
ऐसे नाराज़ न होओ
कि किसी श्रवण कुमार का पुण्य
किसी दशरथ का पाप बन जाए
ऐसी गांस मत पालो
कि कुरुक्षेत्र में महाभारत खड़ी हो जाए
और ऐसी आदत मत डालो
कि कोई भी छोटी सी बात
इस अनमोल जीवन से बड़ी हो जाए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
वो तुमसे मेरी पहली मुलाक़ात थी
और सिर्फ़ तुम जानती थीं
कि आख़िरी भी…!
स्टेशन पर खड़े
चिड़चिड़ा रहे थे सभी लोग
कि ट्रेन लेट क्यों हो रही है
और हर आहट के साथ
सहम जाता था मैं
-’हाय राम!
कहीं गाड़ी तो नहीं आ रही!’
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Doha, Poetry, Unpublished
शरद रात्रि का चंद्रमा, किसे सुनावे पीर
ना जमना में नीर है, ना अंगना में खीर
सखी! शरद की पूर्णिमा, मन हो गया अधीर
मैं तरसूं निज श्याम को, दुनिया खाए खीर
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
बहुत ज़्यादा न हो पर कुछ तो हसरत सबको होती है
जहाँ में नाम और शोहरत की चाहत सबको होती है
मरासिम हर दफ़ा ताज़िन्दगी निभता नहीं लेकिन
किसी से इक दफ़ा सच्ची मुहब्बत सबको होती है
मन अपने आप से भी इक ना इक दिन ऊब जाता है
किसी अपने की दुनिया में ज़रूरत सबको होती है
हर इक मुज़रिम को लगता है, उसी पर सख़्त है मुन्सिफ़
नहीं तो हर सज़ा में कुछ रियायत सबको होती है
किसी को बादशाहत दी, किसी को झोपड़ों के सुख
मगर फिर भी मुक़द्दर से शिक़ायत सबको होती है
फ़क़त इक मौत जीवन को कोई मौक़ा नहीं देती
वगरना एक-दो लमहों की मोहलत सबको होती है
✍️ चिराग़ जैन