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थैंक्स गाॅड

बीत गए वो दिन
जब मैं बहाने ढूंढ़ता था
तुमसे मिलने के।
अब तो
साफ़-साफ़ कह देता हूँ-
“मिलना है तुमसे।”

थैंक्स गाॅड
अब पूछती नहीं हो तुम
कि क्या काम है
वरना झूठ बोलना पड़ता था
कुछ भी
अल्लम-गल्लम-

“वो ज़रा
डिस्कस करना था
कल की मीटिंग के बारे में ।”

✍️ चिराग़ जैन

इश्क़ की महफ़िल

दुनिया को भूल जाओ
ये इश्क़ की महफ़िल है
आओ हुज़ूर आओ
ये इश्क़ की महफ़िल है

जो होश में हैं उनको
दुनिया के ग़म मुबारक़
हुमको तो तुम मुबारक़
तुमको तो हम मुबारक़
हाथों में जाम उठाओ
ये इश्क़ की महफ़िल है

दिल की सुनो घड़ी भर
लोगों की फ़िक्र छोड़ो
अपनों की बात सुन लो
औरों का ज़िक्र छोड़ो
ख़ुद के क़रीब आओ
ये इश्क़ की महफ़िल है

✍️ चिराग़ जैन

चुटकुला

मंच की आलोचना का बोझ भी ढोता रहा
और उसका मंच पर उपयोग भी होता रहा
हास्य कविता की शक़ल में चुटकुला जब भी ढला
तालियाँ तो पिट गईं पर चुटकुला रोता रहा
✍️ चिराग़ जैन

अच्छी कविता

अपनों से मिलने वाला दर्द
जन्म देता है
अच्छी कविता को।

शायद इसी कारण
मैं नहीं लिखना चाहता
कोई अच्छी कविता
तुम्हें ले कर।

✍️ चिराग़ जैन

पानी ही पानी

दिल्ली में
हर साल आती है बाढ़
हर साल
सिर के ऊपर से
गुज़रने लगता है पानी।

और
हर साल
ढिठाई के साथ
बयानबाज़ी करते हैं
सरकारी गलियारे।

…कमाल है
जहाँ देखो
पानी ही पानी है
सिवाय
सरकारी आँखों के।

✍️ चिराग़ जैन

आन्दोलन

हम तो हर इक ज़ुल्म की हद से गुज़र भी जाएंगे
शेर के बच्चे हैं, अपनी ज़िद पे मर भी जाएंगे
ताश के पत्तों से बनते हैं सियासत के मकां
ये तुम्हारे घर हवाओं से बिखर भी जाएंगे

कौन रोके, गर फना होने पतंगा आ गया
एक बादल सूर्य से लेने को पंगा आ गया
ये सियासतदां संभल जाएं कि अब इस मुल्क में
नौजवां पीढ़ी के हाथों में तिरंगा आ गया

हमें ज़हमत हुई और आप पर इल्ज़ाम आया है
चलो जो कुछ हुआ, जैसा हुआ, सब काम आया है
सफ़र में मुश्क़िलें थीं, दर्द था, डर था, कराहें थीं
मगर हर ज़ख़्म को भरता हुआ अंज़ाम आया है

✍️ चिराग़ जैन

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