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रेशम है कविता

रेशम है कविता
झट से फिसल जाती है
उंगलियों को चूमती हुई।

थाम लेते हैं इसे
जीवन के
खुरदरे अनुभव।

दर्द रिसता तो होगा।
पीर बहती तो होगी।

कौन जाने
क्या ज़्यादा दुखदायी है
दर्द का रिसना
या रेशम का फिसलना?

…डर लगता है
गुलाबी छुअन से।

रेशम का कसता फंदा
सहला भर जाता है
खुरदरे अनुभवों को।
✍️ चिराग़ जैन

ख़ुशियाँ

आज
डिनर टेबल पर
गोल्डन एप्पल नहीं खाए
माँ ने।

बस कह भर दिया-
“मुझे ना अच्छे लगते सेब-पेब।”
और फिर
हम सब
चट कर गये
सारे सेब
हाथों-हाथ।

…रात में तकिये पर सिर टिकाए
छत पर चमकते रेडियम के सितारों में
अचानक उभरकर याद आई
माँ की बात-
“सुन रे!
सेब लिअइयो
भोत दिन हो गए सेब खाये!“

सम्पन्नता या विपन्नता से
कोई फ़र्क नहीं पड़ता
उसकी आदत पर
दूसरों को खिलाकर ही
ख़ुश होती है माँ।

✍️ चिराग़ जैन

व्यस्तता

तुम आई थीं
सुख की गगरिया लिए
सुख लुटाने।

पर मैं
बैठा ही रह गया
घात लगाए
जीवन के अहाते में
चुराने को
दो पल सुख।

अब सुख तो है
पर चोरी का है
तुम नहीं हो ना!
गगरिया नहीं है
मीठे सुख की।

✍️ चिराग़ जैन

नेह का दर्प

प्रेम की धारा में तुम निर्बाध बह पाते
काश मुझसे एक पल तुम सत्य कह पाते

जब कोई अपनत्व था चरितार्थ तुममें
जब कभी जागा हो कोई स्वार्थ तुममें
क्यों मेरा संकोच बदला आग्रहों में
कौन सा अधिकार था उनकी तहों में
काश उस मनुहार का तुम अर्थ गह पाते

जब किसी घटना से आहत हो गया मन
जब क्षणिक आवेश में रत हो गया मन
जब मेरे मन में घना विक्षोभ जागा
जब मेरी वाणी ने तुम पर क्रोध दागा
काश मेरे नेह का तुम दर्प सह पाते

✍️ चिराग़ जैन

उम्मीद के बिना

तुम हमेशा
मुझे दोषी ठहराती हो
कि मैं अपने रिश्तों में
उम्मीदें बहुत रखता हूँ

लेकिन समझ नहीं पाता हूँ मैं
कि उम्मीद के बिना
निभ ही कैसे सकता है
कोई रिश्ता

…..उम्मीद के बिना तो
दान तक नहीं दिया जाता!

✍️ चिराग़ जैन

कम्मो मिल गई बीच बाज़ार

कम्मो मिल गई बीच बाज़ार
बीवी लड़ने कू तैयार

कम्मो ने मुस्का कर देखा, बीवी हो गई ढोल
चार दिनां से बोल रही ना हमसे मीठो बोल
कम्मो ही बढ़िया थी यार

कम्मो मिली मगर की हमने एक न मन की बात
एक तरफ बीवी लतियाये एक तरफ जज़्बात
फिर से जागा सोया प्यार

ऐसी मिली घड़ी भर कम्मो खड़ी हो गई खाट
बीवी मुँह फेरे लेटी है, घर के रहे न घाट
हमपे पड़ी दुतरफ़ा मार

हालचाल तक पूछ न पाए, मुफ्त हुए बदनाम
कम्मो छूटी, बीवी रूठी, माया मिली न राम
उल्टे गले पड़ गई राड़

कर-कर हार गए मनुहार, कम्मो मिल गई बीच बाज़ार
अब तो डाल दिए हथियार, कम्मो मिल गई बीच बाज़ार

✍️ चिराग़ जैन

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