Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
बुश बैरॉन का एक टीवी हमारे पास भी था। घर का सबसे स्पेशल कोना सुशोभित होता था उससे। क़माल ये था कि संज्ञा के तौर पर टीवी ने पूरा कमरा हड़प लिया था। टीवीवाला कमरा नाम था उस चुम्बकीय कक्ष का। कुछ अपरिहार्य कर्मों के इतर, लगभग सबके सभी नित्य-अनित्य कर्म उस कमरे में सम्पन्न होते थे।
एंटीने की तकनीकी कमज़ोरी ने हमें बरखा और तेज़ हवा से घृणा करना सिखा दिया था। किसी की पतंग जब एरियल के जंजाल में फँस जाती थी, तो ऐसा लगता था कि परमात्मा ने लोगों का सुख छीनने के उद्देश्य से इस पतंगासुर की रचना की होगी। जी करता था कि पतंग उड़ानेवालों को उन्हीं की सद्दी से फाँसी लगा दें।
‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ सुनने के आदी हो चुके लोग, इसे सुनने के लिये लड़ने लगे। बेशक़ उन्हें पंडित जी के रागों, बहुभाषीय कलाकृति और चेहरे में कोई रुचि नहीं थी, लेकिन तनुजा, अमिताभ बच्चन और रेखा जैसी सूरतों को बार-बार देखना किसी मंत्रजाप से कम न था। ब्योमकेश बख्शी, मशाल, हम लोग, बुनियाद, जुनून, इम्तिहान, कैप्टन व्योम, चन्द्रकांता और न जाने कितने स्पीड ब्रेकर उग आये थे मुहल्ले की चौपाली संस्कृति तक पहुँचाने वाली सड़क पर। फिर रामानंद सागर ने ऐसा ब्रह्मास्त्र फेंका कि बस मुहल्ला कल्चर पर परमाणु आ गिरा।
स्मिता पाटिल और सलमा सुल्तान के भावविहीन चेहरों से समाचार सुनना सबको भाने लगा। जब कभी एक गंजा-सा आदमी बुलेटिन पढ़ने आ जाता था, तो देखनेवालों के चेहरे पर ऐसे भाव होते थे, जैसे बढ़िया सलाद की आखि़री किश्त में कड़वा खीरा आ गया हो। कृषि दर्शन आये या फ़ीचर फ़िल्म, टेलिविज़न अपने समभाव से चालू रहता।
जो माँ पहले खेलने-कूदने पर धुन देती थी, अब न खेलने पर धुनने लगी। बच्चों का सारा दिन टीवी के आगे बैठे रहना उसे अखरता था। लेकिन टीवी बच्चों का हमजोली बन गया था। माँ चार गाली बच्चों को देती तो दो टीवी को भी पड़ती।
धीरे-धीरे टीवी ने हमें ग़ुलाम बना लिया। रंगोली की हेमामालिनी, सुरभि की रेणुका शहाणे, शक्तिमान के मुकेश खन्ना और फूल खिले हैं गुलशन-गुलशन की तबस्सुम ने जबसे अपने आपको हमारा ‘दोस्त’ कहना शुरू किया, तब से हमने लंगोटिया यारों का रजिस्ट्रेशन करवाना बंद कर दिया।
तहक़ीक़ात की बीयर से शुरू हुआ शौक़ आज संबंधों की जासूसी के नशे तक पहुँच चुका है। मनोहर श्याम जोशी के ‘हम लोग’ आज परिवार के नाम पर घिनौने और भद्दे संबंधों का नंगा नाच देखकर ख़ुश हैं। स्टोन बॉय की सहृदयता का सिलसिला अब शिनचैन की ढिठाई तक आ पहुँचा है। सफ़र अभी ख़त्म नहीं हुआ है। मुहल्लों को दूरदर्शन खा गया, और दूरदर्शन को केबल, केबल को भी इंटरनेट का ख़ौफ़ हो गया। शेर को सवाशेर मिलता ही है। पर एक बात साफ़ है कि ऑडियन्स कैप्चर की इस शतरंज में मोहरे हैं – ‘हम लोग’!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
दिल की ज़मीन पर जो इक बीज पड़ गया है
हर हाल में फलेगा, ये सृष्टि का नियम है
कोई विचार मन में, आकर ठहर गया तो
जन्मों-जनम पलेगा, ये सृष्टि का नियम है
सुख-दुख के चंद पल हैं, जीवन जिसे हैं कहते
युग-युग के चक्करों में, बिन बात फँसते रहते
अज्ञानवश जो अपना गुलशन उजड़ गया है
वो ध्यान से खिलेगा, ये सृष्टि का नियम है
अन्तस् में हो गया जब, विश्वास का उजाला
अमृत बना दिया था, मीरा ने विष का प्याला
वरदान में न रखना, संकोच और शंका
विश्वास से मिलेगा, ये सृष्टि का नियम है
ये स्वर्ग-नर्क की सब, चर्चा उधार की है
जिस पर जहाँ टिका है, ताक़त विचार की है
मस्तिष्क में उपज कर, जो सोच में पला है
सच में वही घटेगा, ये सृष्टि का नियम है
✍️ चिराग़ जैन
Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose, Story
एक महान आदमी में सीखने की प्रवृत्ति इतनी अधिक थी कि उसने गधे को भी गुरू बना लिया। लेकिन आजकल लोग गुरु को गधा बनाने पर तुले रहते हैं। इसका कारण ये नहीं है कि नयी पीढ़ी उद्दंड है बल्कि सुभद्रा मैया जब पिताजी की डींगों का इम्प्रेशन अभिमन्यु पर झाड़ रही थी तो अभिमन्यु माँ के पेट पर पेट के बल लेटा था।
गुरु पूर्णिमा का पर्व बढ़िया पर्व है। लेकिन गुरू का आकार इतना विशाल है कि पूर्णिमा को गुरु अपने पीछे छिपा लेता है। चेले पूर्णिमा को देख ही नहीं पाते। गुरुर्ब्रह्मा…… टाइप के श्लोक या गुरु गोविन्द दोउ खड़े….. टाइप के दोहे दोहराने में ही उनकी अमावस हो जाती है और पूर्णिमा गुरू के आभामंडल में समा जाती है।
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Mann To Gomukh Hai, Poetry
जाने ये कैसा बदरा है
बदरा के भीतर मदिरा है
जब छलकी तो सब झूम उठे
जैसे मृदंग से धूम उठे
पीपल ने छेड़ी तान अलग
बूंदों ने गाया गान अलग
पुरवा ने ऐसा रास रचा
बिजुरी ने जी भर नाच नचा
पंछी कलरव करते डोले
कच्चे स्वप्नों ने पर खोले
बचपन बौराया तब भू पर
हाथों से बूंदें छू-छू कर
ऐसा मेघों में रोर हुआ
इक उत्सव-सा हर ओर हुआ
धुल गई धरा, खुल गई पवन
पावन पावन है अंतर्मन
श्वासों में शीतलता आई
नयनों में चंचलता छाई
सब कष्ट ग्रीष्म के भूल गए
बागों में झूले झूल गए
जिस क्षण जल से संलिप्त हुई
वसुधा की तृष्णा तृप्त हुई
ऐसा मौसम का ज्वर आया
प्यासों में पानी भर आया
जाने ऐसा क्या कृत्य करा
सब कुछ लगता है हरा-हरा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Prose, Quotation, Unpublished
सुना है बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री की कमर में दर्द हुआ।
पहली बार किसी वित्त मंत्री ने कमर तोड़ महँगाई को इतनी शिद्दत से महसूस किया है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose, Story
लाउड स्पीकर ने धर्मगुरु से पूछा- मैं तो साईं भी नहीं हूँ फिर मुझ पर विवाद क्यों?
धर्मगुरु बोले – क्योंकि तूने हमसे ऊंची आवाज़ में बात की।
लाउड स्पीकर झुक कर बोला – लेकिन मैंने तो आपकी ही आवाज़ बुलंद की हुजूर।
धर्मगुरु मुस्कुराए – ये समझ ले अब तू बेकार हो गया था। मीडिया की आवाज़ तुझसे ज़्यादा बुलंद है और मीडिया की मुंडेर तक पहुँचने के लिए तुझ पर खडा होना ज़रूरी था।
✍️ चिराग़ जैन