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पलकों के भीतर

बंद पलकों के तले
आँखों के निचले बिस्तरे पर
जब मेरी दो पुतलियाँ
आराम करती हैं।

तब लगाकर कामना के पंख
पहरों तक विचरता है मेरा मन
बस तुम्हारे गिर्द।

तुम्हें अपलक निरखता है
उसे तुम भी कभी नज़रें हटाने को नहीं कहतीं।

जब बढ़ाकर हाथ
छू लेती है तुमको कल्पना
तब चैंक कर
तुम कब झटकती हो उसे

उस पल
महज मुस्कान होती है तुम्हारे नूर में
वो भी
शरारत से भरी
और प्यार से लबरेज।

लो, तुम्हें खुलकर बताता हूँ
मुझे पलकों के बाहर
तुम कभी अच्छी नहीं लगती।
बेतहाशा बंधनों की वादियों में
कामनाओं की नदी अच्छी नहीं लगती।

नियम, सीमाएँ, मर्यादा
रिवाज़ो-रस्म
-इन सबसे परे
जब प्रेम की उन्मुक्त देहरी पर
छलकती है लहर
बेलौस चाहत की
(जहाँ तुम सिर्फ़ तुम होती हो
और मैं सिर्फ़ मैं)
उस ठौर पर
आकण्ठ तुमसे प्रेम में संलग्न होता हूँ
जहाँ तुम मुझमें होती हो
जहाँ मैं तुममें होता हूँ।

✍️ चिराग़ जैन

संतोष आनन्द जी के घर महाशोक

जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जब शब्द हिचकियों और सुबकियों में अनूदित होजाते हैं। आज संतोष आनंद जी को सुबकते हुए देखा तो उनके गीतों की जिजीविषा वहाँ व्याप्त सन्नाटे में लास्य करने लगी। इसी जिजीविषा की उंगली थामकर मृत्त्यु के सम्मुख निरुपाय खड़ा एक बुज़ुर्ग बाप कदाचित् फिर से अपनी सुबकियों का शब्दानुवाद कर सके।
संकल्प और नंदिनी की शोकसभा में बैठा था तो कहीं दूर अवचेतन में एक गीत गूँजता रहा-
“जो दिल को तसल्ली दे, वो साज उठा लाओ
दम घुटने से पहले ही, आवाज़ उठा लाओ…”
संतोष जी को माइक दिया गया तो उनकी जिजीविषा ने उनकी जर्जर देह में प्रवेश किया, उन्होंने माइक लिया, एक पल को पलकें झपकीं, फिर अपने मेरुदंड को सीधा करते हुए सीने को प्राणवायु से लबरेज़ कर बोले- “मैं टूटुंगा नहीं… मैं इस बच्ची रिद्धिमा के लिये जिऊंगा… मैं इस परिवार के लिये जिऊंगा…!”
सबकी आँखें नम थीं, सभा समाप्त हुई, सब बाहर निकले… द्वार पर संतोष जी की पत्नी, उनकी दो बेटियाँ और उनकी पोती बैठी थी… संतोष जी अपने काँपते हाथों से सबका अभिवादनकर विदा कर रहे थे… उनकी आँखें लगातार बोल रही थीं- …मैं जिऊंगा …मैं टूटुंगा नहीं…!

✍️ चिराग़ जैन

प्रेम की तकनीकी चुनौतियां

यूरिया का ज़ोर, हर डाल कमज़ोर, अब
चंपा की टहनिया पे लूम नहीं सकते
एमएमएस बनने का डर लगा रहता है
प्यार के नशे में अब झूम नहीं सकते
प्यार के हज़ार दुश्मन हर मोड़ पे हैं
एक-दूसरे के साथ घूम नहीं सकते
और अब मुआ हैलमेट गले पड़ गया
बाइक पे बैठ के भी चूम नहीं सकते

✍️ चिराग़ जैन

अंजुरी

तुमसे मिलते ही
बह निकलती हो कविता
-ऐसा नहीं है।

न तो मोम है कविता
न ही आग हो तुम।

तुम तो
अंजुरी हो
छपाक से भर जाती हो
कविता में डूबकर!

✍️ चिराग़ जैन

संक्रमण काल

चौपालों पे कितने ठहाके गूंजा करते थे
आज अधरों पे मुस्कान भी नहीं रही
कभी स्वाभिमान तलवारों से दमकता था
आज तलवार छोड़ो, म्यान भी नहीं रही
पेड़ों से घरों की पहचान थी कभी पर अब
पेड़ भी नहीं हैं पहचान भी नहीं रही
नारियों के हाथ में भी आई न व्यवस्था और
हद ये है पुरुष प्रधान भी नहीं रही

✍️ चिराग़ जैन

चौरकर्म

फेसबुक के प्रयोक्ताओं को रोज़ कुछ अच्छा स्टेटस डालने का शौक तो चर्रा गया है, लेकिन इसके साथ अपनी सृजनात्मक क्षमता बढ़ाने की ललक नहीं जगी। ऐसे में दूसरों की प्रोफाइल से स्टेटस या स्टेटसांश कॉपी करके अपनी timeline पर पेस्ट करने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है। इसमें कोई बुराई तो नहीं है, लेकिन कष्ट तब होता है जब उसके नीचे से मूल लेखक का नाम गायब कर दिया जाता है।
जिनके अपने बच्चे नहीं होते वो दूसरों के चुरा लें क्या। ज़्यादा शौक़ है तो बच्चा गोद ले लो। गोद लेने वाली स्त्री को चरित्रहीन तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन बच्चा चुरा लेने वाली स्त्री अपराधिन अवश्य कहलाती है।
किसी की बात पसंद आये तो उसको कॉपी-पेस्ट करने की बजाय शेयर करने में क्या दिक्कत है भाई। कॉपी-पेस्ट करने में लेखक का नाम न लिखो तो “अज्ञात” या “फ़ॉर्वर्डेड” ही लिख दो।
विचार या रचनाएँ चुरानेवाले लोग कभी दो कौड़ी के दो शब्द भी ख़ुद लिख कर देखें। उसके बाद शब्दकोष में भी उन शब्दों को उसी क्रम में देख कर दुःख न हो तो कहना। किसी की रचना चुराने वाले बुरे लोग हैं। ऐसे लोगों का बहिष्कार करें और इसको स्वच्छ भारत अभियान का ही एक हिस्सा समझें।
-चौरकर्म पीड़ित

✍️ चिराग़ जैन

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