Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
प्रशांतभूषण (अजीत)- “केजरी डर्लिंग, सारा शहर मुझे ऑनेस्ट के नाम से जानता है। अगर सारे स्टिंग हासिल करना चाहते हो, तो मेरी कुछ शर्तें माननी होंगी।”
अरविंद केजरीवाल (धर्मेन्दर)- “कुत्ते-कमीने मैं तेरा इस्तीफ़ा ले लूंगा।”
योगेन्द्र यादव (अमज़द ख़ान)- “अरे ओ केजरी! ई बैंगलोर वाले कौन चक्की काआटा खिलाते हैं रे। जब से लउटे हो ससुर गाली पर गाली दिये जात हो।”
मनीष सिसोदिया (नाना पाटेकर)- हा हा हा हा, हा हा हा हा। आ गए, आ गए हमारी बदनामी का तमाशा देखने। अब स्टिंग चला देंगे। असलियत ऐसी बाहर आयेगी, सच्चाई बाहर आएगी। थोड़ी देर स्टिंग चलता रहेगा। फिर मेरा भाई एंकर बुलेटिन बना लेगा। फिर सब चर्चा करके घर चले जाएँगे, खाना खाएंगे, सो जाएंगे। तुम्हारी ये योगेन्द्र यादवी, ये भूषणी एक दिन इस पार्टी की मौत का तमाशा इसी ख़ामोशी से देखेगी।
अन्ना हज़ारे (अमिताभ बच्चन)- आज ख़ुश तो बहुत होंगे तुम। देखो, जो आज तक किसी स्टिंग में नहीं दिखा, जिसने आज तक किसी को गाली नहीं दी, जिसने आज तक किसी सफ़ाई अभियान में हिस्सा नहीं लिया, वो आज जगह जगह सफ़ाई देता फिर रहा है।
जनता (प्राण) – साब! आज तक जनता से किसी ने इतना बड़ा धोखा नहीं किया। ये तुम नहीं तुम्हारी 67 सीटें, तुम्हारी कुर्सी बोल रही है। जिस दिन ये पॉवर ये कुर्सी नहीं होगी उस दिन तुम… (केजरी जी स्टिंग वाली भाषा में चिल्लाते हैं) …चिल्लाओ नहीं साहेब…… ख़ांसी उठ जायेगी।
नोट : पिक्चर अभी बाक़ी है मेरे दोस्त।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Doha, Poetry, Unpublished
उत्सव हो, आह्लाद हो, हो अनुपम उल्लास।
अधरों पर मुस्कान हो, अन्तस में मधुमास।।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
अन्ना एक बार फिर आंदोलन मूड में आ गये हैं। जो लोग पिछली बार उन्हें हल्के में ले रहे थे वे गंभीर दिखाई दे रहे हैं। जिन लोगों ने केजरीवाल के शपथ ग्रहण समारोह के बाहर खड़े होकर अपनी क़िस्मत को कोसा था, उनको अन्ना ने एक बार फिर अवसर प्रदान कर दिया। वे भी सब अपनी-अपनी कोसी हुई किस्मत को धो-धा कर चैक की शर्ट और बाटा टाइप स्लीपर से सजा कर आंदोलन में जा पहुँचे। क्योंकि अब वे समझ चुके हैं कि इतिहासों में जो चूक हुई थी उसको सुधारने का यही एक मौक़ा है। अच्छी नौकरियाँ छोड़ चुके सभी निठल्लों की बीवियाँ पुरानी पैंट-शर्ट पहना कर अपने-अपने पिया की आरती कर उन्हें जंतर-मंतर भेज रही हैं। लुंगी लपेटे अपनी चांद पर हाथ फेरते पिता जब नालायक बेटे को जंतर-मंतर की ओर जाते देखते हैं तो मन ही मन ईश्वर से उसे बुद्धि देने की कामना करते हैं। दिन भर चीखने-चिल्लाने के बाद जब गला बैठाकर यह होनहार अश्वमेध के अश्व सा घर लौटता है और फटे स्पीकर सी आवाज़ में ‘माँ पानी’ के उद्गार उवाचता है तो ममता भीग उठती है। द्वार पर खड़ा पुत्र अचानक माँ को नये रूप में दीखने लगता है। महीनों से तेल के प्यासे उसके झूतरे अचानक चिपक कर साइड की मांग काढ़ लेते हैं। उसके लम्बे खुरदरे चेहरे के भीतर से एक गोल सा चिकना चेहरा उभरता है जिसका ऊपर का होंठ काली मूँछों के बालों से ढँका हुआ है। हमेशा ऊपर के तीन बटनों से विहीन रहने वाली उसकी कमीज़ अचानक सीधी हो जाती है और उस पर नीले रंग का एक स्वेटर चढ़ जाता है। सालों से बिना धुली उसकी जीन्स अचानक एक क्लर्क स्टाइल की पैंट में ढल जाती है जिसकी लुप्पियाँ बैल्ट के अभाव में किसी बेवा सी तो लगती हैं, पर अखरती नहीं। वाक्य के आदि में ‘अबे’ तथा ‘साले’ जैसे अलंकार लगाने वाला भाषा-संस्कार अचानक वाक्य के अंत में ‘जी’ लगाने लग गया है।
रात को बिस्तर पर लेटी हुई माँ विपरीत दिशा में मुँह किये पड़े अपने सुहाग से कहती है- ‘सुनो जी, आज तो पप्पू थक कर आया है।’
‘हम्म्म्म…’ उसी मुद्रा में लेटे-लेटे गहरी उच्छवास के साथ सुहाग हुंकारा भरता है।
‘जंतर मंतर गया था… अन्ना आंदोलन में’
‘हम्म्म्म’ …अबकी बार हुंकारे के साथ करवट लेते हुए सुहाग ने अपनी निगाहें दीवार की सीलन से हटा कर छत की सीलन पर टिका दीं।
‘ख़ूब नारे लगाये, गला भी बैठ गया बेचारे का।’ माँ की आवाज़ में रीझने से उत्पन्न होने वाली खनक मिल चुकी थी।
‘कुछ मुलहठी दे देती, गला खुल जायेगा।’ पिता की प्रतिक्रिया हुंकारे से आगे बढ़ी।
‘मुझे तो हमेशा लगता था, एक दिन हमारा पप्पू बहुत बड़ा आदमी बनेगा।’ …पिता की बात को हमेशा की तरह अनसुना करते हुए माँ बोली।
‘किस चीज़ का आंदोलन कर रहे हैं अन्ना?’ पिता ने उम्मीद की किरण के एक छोर को सावधानी से स्पर्श करते हुए उत्तर की अपेक्षा को ताक पर रख कर पूछा।
‘मुख्यमंत्री बनाने का…’ अबकी बार माँ की ममता अपने मन की आवाज़ अनसुनी न कर सकी।
अचानक रात के दूसरे पहर में कई झुग्गियों से एक साथ कई पिताओं की उच्छवास निकल कर आकाश पर छा गई। हर पिता के मुँह से निकली कार्बन डाईऑक्साइड की हर लक़ीर के पीछे अपने-अपने सुत के हित एक ही आशीर्वाद लटक रहा था- ‘केजरीवाल भव।’
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
बिहार में नये मुख्यमंत्री ने कहा है कि वे विकास को सबसे ऊपर रखेंगे। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने भी कहा था कि वे विकास को सबसे ऊपर रखेंगे। हरियाणा, महाराष्ट्र, केरल, तेलांगाना, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और अन्य प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों ने भी कहा कि हम विकास को सबसे ऊपर रखेंगे। प्रधानमंत्री जी ने भी हमेशा यही कहा है कि उन्होंने विकास को सबसे ऊपर रखा है। इस प्रकार विकास इतना ऊपर पहुँच गया है कि दिखाई देना बंद हो गया है। कांग्रेस सरकार ने भी विकास को हमेशा सबसे ऊपर ही रखा। कई बार मुझे लगता है कि विकास बड़ा उधमी है। जैसे ही राजनीति चुनाव में व्यस्त होती है तो आँख बचा कर ज़मीन पर उतर आता है। फिर नई सरकार को आते ही इसे कान पकड़ कर ऊपर रखना पड़ता है। इस मामले में जम्मू-कश्मीर बड़ा भाग्यशाली राज्य है। वहाँ ये साला विकास कितना भी नीचे उतरने की कोशिश करे, लेकिन उसके धरातल तक पहुँचने का ख़तरा पैदा नहीं होता। वैसे वहाँ ये ख़ुद भी आतंकवादियों के डर से वादियों में टहलने नहीं निकलता।
लेकिन बाक़ी पूरे देश में इसे ऊपर रखने के लिये हर सरकार बाक़ायदा मेहनत करती है। मैंने एक बुद्धिजीवी से पूछा कि एक बार सभी दल एकमत होकर इस विकास के बच्चे के हाथ-पैर बांध कर ऊपर क्यों नहीं डाल देते। वे बोले- दरअस्ल विकास एक बालक है, जिसका बहुत पहले अपहरण किया गया था। इसकी सलामती के लिये जनता समय समय पर अपहृताओं को वोट की फ़िरौती देती है। लेकिन फ़िरौती वसूलने के लिये जनता को यह तसल्ली देनी होती है कि आपका विकास हमारे पास पूरा साबुत हालत में मौज़ूद है। इसलिये हर चुनाव में सरकार ख़ुद उसके हाथ-पैर खोल कर उसको नीचे उतारती है और जनता को उसका चेहरा दिखाती है। मुँहदिखाई की रस्म के बाद फ़िरौती का नेग दिया जाता है और नई सरकार फिर से विकास को ताक पर रख देती है।
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
दिल्ली का चुनाव
चुनाव नहीं
बबाल था
एक तरफ़ पूरी बीजेपी थी
एक तरफ़ केजरीवाल था।
बीजेपी ने अपने रास्ते में
पहली खाई तब खोदी
जब दिल्ली जैसे छोटे चुनाव के लिये
रामलीला मैदान से दहाड़े थे पीएम मोदी।
और जीती हुई बाज़ी
विरोधियों के हाथ में तब देदी
जब सबके मना करने के बावज़ूद
छाँट कर लाए अपनी बुआ, बेदी।
इस फ़ैसले के बाद
दिल्ली के सारे लीडर
विभीषण हो गये
और सफ़लता के रास्ते
जो सुगम थे, अब भीषण हो गये।
उस पर और भी महान
साध्वियों और महाराजों के बयान
ऊपर से बेलगाम
किरण बेदी जी की ज़ुबान।
दुर्भाग्य का मास्टर पीस
एनडीटीवी के रवीश
जो कसर रह गई थी
वो भी पूरी कर दी
मैडम बेदी की हक़लाहटों के गले में
कुटी हुई मुलहठी भर दी।
मनोज तिवारी की लफ़्फ़ाज़ी
अमित शाह की जुमलेबाज़ी
जीत के नशे से चढ़ा गुमान
नये मेहमानों के लिये पुराने साथियों का अपमान
दिल्ली के सांसदों की कार्यकर्ताओं पर पकड़
और विजय रथ पर सवार चेहरों की अकड़
इन सब प्रहारों से प्रतिष्ठा का क़िला ढह गया
और कार्यकर्ताओं की अनदेखी करता नेतृत्व
एक-एक वोट के लिये तरसता रह गया
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
लाख दे कोई दलीलें, दिमाग़ की लेकिन
कुछ भी काफ़ी नहीं इस दिल के संभलने के लिए
ज़िन्दगी एक सफ़र है जहां का सच ये है
लोग मिलते ही हैं इक रोज़ बिछड़ने के लिए
✍️ चिराग़ जैन